समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य
Samaj Se Prapt Brahmacharya
दादा भगवान द्वारा
स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पूर्)
कर लेगा! 'वे अभिप्राय पक्के नहीं हैं,' इसका क्या मतलब है कि उसमें जरा छूट रहने दी होती है।
निश्चय के परिपोषक
आपका संपूर्ण ब्रह्मचर्य पालन करने का निश्चय और हमारी आज्ञा, वह तो काम ही निकाल देगा, लेकिन यदि भीतर निश्चय जरा सा भी इधर-उधर नहीं हो तो! हमारी आज्ञा तो, वह जहाँ जाएगा वहाँ रास्ता दिखाएगी और हमें बिल्कुल भी प्रतिज्ञा नहीं छोड़नी चाहिए। विषय का विचार आ जाए तो आधे घंटे तक तो धोते रहना चाहिए कि क्यों अभी तक विचार आ रहे हैं! और आँखें गड़ाकर तो किसी के भी सामने देखना ही नहीं चाहिए। जिन्हें ब्रह्मचर्य पालन करना है, उन्हें आँखें गड़ाकर तो देखना ही नहीं चाहिए, बाकी सब तो देखेंगे। तू नीचे देखकर चलता है या ऊपर देखकर चलता है?
प्रश्नकर्ता : नीचे देखकर।
दादाश्री : कितने समय से?
प्रश्नकर्ता : जब से ज्ञान मिला है, तब से।
दादाश्री : उससे पहले ऊपर देखकर चलता था? उससे तो आँखें जल जाती हैं और सभी रोग उसी में हैं। देखते ही रोग घुस जाता है! उसमें क्या आँखों का दोष है? नहीं। अंदर की अज्ञानता का दोष है! अज्ञानता से उसे ऐसा ही लगता है कि 'यह स्त्री है', लेकिन ज्ञान क्या कहता है? कि 'यह शुद्धात्मा है'। मतलब जिसे ज्ञान है, उसकी तो बात ही अलग है न?!
हमारा वचनबल तो रहता है लेकिन इतनी चीजों का ध्यान रखना पड़ेगा। तब आपका निश्चय नहीं डिंगेगा। एक तो किसी के सामने दृष्टि नहीं गड़ानी चाहिए, धर्म संबंधित हो तो हर्ज नहीं है, लेकिन वह सहज होना चाहिए। दूसरा, कपड़े पहना हुआ इंसान
दृढ़ निश्चय पहुँचाए पार (खं-2-३)
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यों देखते ही अगर नंगा हो तो कैसा दिखेगा? फिर अगर चमड़ी निकाल दें तो कैसा दिखेगा? फिर चमड़ी काटकर आँतें बाहर निकाल दी हों तो कैसा दिखेगा? इस तरह संपूर्ण दृष्टि आगे-आगे बढ़ती रहे, तो वे सभी पर्याय यों एकजोड़ दिखेंगे। लेकिन ऐसा अभ्यास ही नहीं किया न? तो ऐसा कैसे दिखेगा? इसका तो पहले खूब-खूब सोचकर अभ्यास करना पड़ेगा। इस स्त्री जाति को सिर्फ यों हाथ छू गया हो तो भी निश्चय डिगा देता है। रात को सोने ही नहीं दे, ऐसे हैं वे परमाणु! इसलिए स्पर्श तो होना ही नहीं चाहिए और अगर दृष्टि संभाल ले तो फिर निश्चय नहीं डिगेगा!
ब्रह्मचर्य की भावना करना और बहुत स्ट्रोंग रहना! निश्चय में सावधान रहना, क्योंकि पुण्य अस्त होते देर नहीं लगती। खुद के निश्चय में बहुत ताकत हो तभी काम होता है। बार-बार मन बिगड़ जाता हो तो फिर निश्चय रहेगा ही नहीं न? निश्चय जबरदस्त होना चाहिए, 'स्ट्रोंग' होना चाहिए। उसके बाद सभी सहार देते हैं, सभी 'हेल्प' करते हैं। निश्चय के सामने किसी की नहीं चलती। निश्चय सबसे बड़ी चीज़ है। खुद का निश्चय मज़बूत होना चाहिए। उस निश्चय को, जब अंदर ही अंदर बात निकले तो ठगता रहता है, और फिर अंदर से ही सलाह दे देकर निश्चय को तोड़ देता है। तो जब-जब ये सलाह दी जाए, तब हमें उसकी नहीं सुननी चाहिए। तेरे साथ ऐसा होता है कभी?
प्रश्नकर्ता : दो महीने पहले इन सब में से गुज़र चुका हूँ।
दादाश्री : अभी नहीं होता न अब?
प्रश्नकर्ता : नहीं।
दादाश्री : तब अच्छा है। अंदर तो बहुत भारी 'रेजिमेन्ट' पड़ी हुई हैं, बहुत बड़ी-बड़ी हैं।
इतना ही संभाल लेना ज़रा
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हमारे वचनबल से कई लोगों का रेग्युलर हो जाता है। हमारा वचनबल और आपका अडिग नक्कीपन, इन दोनों का ही अगर गुणा(मल्टीप्लीकेशन) हो जाए तो बीच में किसी की ताकत नहीं है कि उसे बदल सके! ऐसा है हमारा यह वचनबल। हम आपसे क्या कहते हैं कि ‘आप अडिग हो जाओ, आप ढीले मत पड़ना।’ आपका दृढ़ निश्चय होना चाहिए कि दादा की आज्ञा ही धर्म है और आज्ञा ही मुख्य चीज है।
हम ब्रह्मचर्य व्रत हर किसी को नहीं देते हैं और अगर देते हैं तो भी हम कहते हैं कि ‘हमारा वचनबल है, जबरदस्त वचनबल है। जो कर्म के उदय को बदल दे, ऐसा वचनबल है, लेकिन यदि तेरी स्थिरता नहीं टूटे तो।’ तुझे बहुत मजबूती रखनी चाहिए। ज्ञानी के वचनबल के अलावा अन्य कोई यह कार्य नहीं कर सकता, ज्ञानी का वचनबल इतना अधिक होता है! ज्ञानी का मनोबल अलग तरह का होता है क्योंकि ज्ञानी खुद वचन के मालिक नहीं हैं, मन के मालिक नहीं हैं। जो वचन के मालिक होते हैं, उनके वचन में बल ही नहीं होता। पूरा जगत् वचन का मालिक बनकर बैठा है, उनके वचन में बल नहीं होता। बल तो, अगर वाणी रिकॉर्ड की तरह निकले, तो वह वचनबल कहलाता है।
हमारे वचनबल का काम ऐसा है कि सबकुछ पालन करने दे, सभी कर्मों को तोड़ दे! वचनबल में तो ग़ज़ब की शक्ति है कि काम निकाल दे! खुद यदि जरा भी नहीं डिगे तो कर्म उसे नहीं डिगा सकेगे! यदि कर्म डिगा दे तो उसे वचनबल कहेंगे ही नहीं न? वीतरागों ने वचनबल और मनोबल को तो टॉपमोस्ट कहा है, जबकि देहबल को पाशवी बल कहा है! देहबल से लेना-देना नहीं है, वचनबल से लेना-देना है!
प्रश्नकर्ता : मनोबल यानी क्या? ब्रह्मचर्य के लिए इस तरह पक्का हो जाए, डिगे नहीं, क्या उसे मनोबल कहते हैं?
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दादाश्री : वह तो अगर एक बंदर कूदे तो फिर दूसरा भी कूदता है। ऐसे एक बार देख ले तो फिर उसे कूदने की हिम्मत आती है। ऐसा करते-करते मनोबल बढ़ता जाता है, लेकिन जिसने देखा ही नहीं हो, वह कैसे कूदेगा?
प्रश्नकर्ता : तो अगर ये बातें सुनेगा तो कूदेगा?
दादाश्री : लेकिन वह तो साथ ही उसकी खुद की अंदर इच्छा हो, खुद की भावना ऐसी हो, तब ऐसी मजबूती आ पाएगी।
प्रश्नकर्ता : भावना तो मेरी ऐसी ही है।
दादाश्री : वह अपने आप ही मजबूत हो जाएगा। एक तरफ बाड़ बनाएँ और उस ओर की बाड़ में सियार छेद कर दें, और उन्हें अगर हम नहीं भरेँ तो क्या होगा? वह तो पीछे के सभी 'होल' भरते जाना चाहिए न? और नई बाड़ बनाते जाना पड़ेगा। भावना इतनी मजबूत हो तो सबकुछ हो सकता है।
प्रश्नकर्ता : पिछले होल भरना अर्थात् प्रतिक्रमण करके ही न?
दादाश्री : प्रतिक्रमण तो करने ही हैं, लेकिन अभी तो कमजोरियाँ जानी चाहिए न? मन मजबूत होना चाहिए न? उस तरफ दृष्टि भी नहीं जाए, ऐसा होना चाहिए। मन में तय किया हो कि उस ओर देखना ही नहीं है तो फिर देखेगा ही नहीं वह! फिर पीछे से भूतों की तरह कितना भी चिल्लाए, लेकिन फिर भी उस तरफ देखेगा ही नहीं, वह घबराएगा ही नहीं न! उस तरह का मनोबल दिन-ब-दिन विकसित होता जाए, तो ठीक है!
प्रश्नकर्ता : वैसी इच्छा तो अंदर से बिल्कुल भी नहीं होती।
दादाश्री : वह तो ऐसा लगता है। दो दिन के लिए ऐसा लगता है। लेकिन वह बात तो, जब एक साथ दस साल का
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हिसाब देखें, तब जाकर सही है!
प्रश्नकर्ता : यानी ऐसा दस साल तक रहना चाहिए?!
दादाश्री : दस साल नहीं, चौदह साल तक रहना चाहिए, राम वनवास गए थे उतने साल!! चौदह साल बीत गए, तब जाकर राम मजबूत हुए। इसलिए तो हम कहते हैं कि हमारी आज्ञा और साथ में इस ज्ञान को सिन्सियरली एक्जेक्टनेस में रखे तो ग्यारह साल या चौदह साल में पूर्णहुति हो जाएगी।
कहीं पोल को पोषण तो नहीं मिलता न?
प्रश्नकर्ता : ब्रह्मचर्य 'स्वभाव में होना' मतलब क्या?
दादाश्री : ब्रह्मचर्य 'स्वभाव में रहना' यह शब्द कहाँ से ले आया तू? आत्मा स्वभाव से ही ब्रह्मचारी है, आत्मा को ब्रह्मचारी होने की जरूरत नहीं है।
प्रश्नकर्ता : आपने वह बात कही थी कि पिछले जन्म में जो भावना की हो, अभी वह उसके उदय में आ जाए तो वह ब्रह्मचर्य पालन करता है।
दादाश्री : वह तो जो भावना पहले आई हो, जो पहले 'प्रोजेक्ट' की हो, उसी अनुसार अभी उदय आता है। जैनों के बेटे-बेटियाँ जो दीक्षा लेते हैं, तूने वह देखा है क्या? बीस साल का लड़का होता है, पढ़ा-लिखा होता है, धनवान होता है, वह दीक्षा ले लेता है। उसका क्या कारण है? पिछले जन्मों में उन्होंने दूसरे साधु-साध्वियों के संग में रहने से ऐसी भावना की थी और जैनों में ऐसा रिवाज है कि उनके बेटे-बेटी ऐसी दीक्षा लें तो उन्हें बहुत आनंद होता है, 'ओहोहो! उसके आत्मा का कल्याण कर रहा है। हमें तो मोह है और उसका मोह चला गया है।' इसलिए वे लोग तो बेटे की हेल्प करते हैं! जबकि अपने लोग तो हेल्प नहीं करते। अपने यहाँ तो ऐसा कहते हैं
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कि बेटा यदि चला जाएगा तो मेरा नाम लुप्त हो जाएगा। लेकिन अपने में भी पहले भावना की हो, तभी तो 'मुझे ब्रह्मचर्य पालन करना है' ऐसा स्ट्रॉंग बोलेगा, बर्ना अंदर डगमगाता रहेगा। क्या होता है ?
प्रश्नकर्ता : डगमगाता है।
दादाश्री : हाँ, डगमगाता है कि 'ऐसा करूँ या वैसा करूँ।' क्षणभर में विचार बदल जाता है और क्षणभर में विचार आता है। तेरा विचार बदल जाता है क्या कभी?
प्रश्नकर्ता : नहीं बदलता।
दादाश्री : कितने समय से नहीं बदला है?
प्रश्नकर्ता : चार महीनों से।
दादाश्री : चार महीने? मतलब अभी यह पौधा बड़ा नहीं कहलाएगा न? उसे तो इतना छोटा सा पौधा कहेंगे। वह तो अगर गाय के पैरों तले आ जाए तो भी दब जाएगा।
प्रश्नकर्ता : किसी का ब्रह्मचर्य का निश्चय डगमगाए तो क्या उसकी पहले की भावना ऐसी होगी, इसलिए?
दादाश्री : नहीं, ऐसा नहीं। निश्चय ही नहीं है उसका। यह पहले का प्रोजेक्ट नहीं है और यह जो निश्चय किया है, वह लोगों का देखकर किया है। यह सिर्फ देखा-देखी है, इसलिए डगमगाता रहता है, इससे अच्छा तो शादी कर ले ना भाई। क्या नुकसान हो जाएगा? कोई लड़की ठिकाने लगेगी। और जो शादी करता है उसकी जिम्मेदारी है न? नहीं करे तो कुछ जिम्मेदारी है क्या उसकी? दूसरे ने शादी की हो तो तुझ पर जिम्मेदारी आएगी? जितना बोझ उठा सको उतना उठाओ। दो बीवियाँ लानी हों तो दो लाओ। बोझ उठना चाहिए न तुमसे? और बोझ नहीं उठा सको तो यों ही कुंवारे रहो, ब्रह्मचारी रहो, लेकिन ब्रह्मचर्य का
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पालन होना चाहिए न?
नहीं चल सकता अपवाद ब्रह्मचर्य में
ये भाई सच कह रहे हैं कि ऐसे अगर डगमगाए तो उसका क्या अर्थ है?! डगमगाने का इतना ही कारण है कि आज के इन सब के हिसाब से हम करने जाते हैं, दौड़ते हैं लेकिन दौड़ा तो जाता नहीं, फिर वापस थोड़ी देर बैठे रहना पड़ता है। क्या?
प्रश्नकर्ता : ब्रह्मचर्य व्रत लेने के बाद किसी का डगमगा रहा हो तो?
दादाश्री : डगमगानेवाले को तो व्रत लेना ही नहीं चाहिए और व्रत लेगा तो उसमें बरकत आएगी भी नहीं। डगमगाए तो हम नहीं समझ जाएंगे कि 'कर्मिंग इवेंट्स कास्ट देर शैडोज बिफोर?!'
ब्रह्मचर्य में अपवाद रखा जाए, वह ऐसी चीज नहीं है क्योंकि इंसान का मन पोल (दूसरा उल्टा रास्ता) ढूँढ़ता है, किसी जगह पर अगर इतना सा भी छेद हो तो मन उसे बड़ा कर देता है!
प्रश्नकर्ता : ऐसे पोल ढूँढ़ निकालता है, उसमें कौन सी वृत्ति काम करती है?
दादाश्री : मन ही वह काम करता है, वृत्ति नहीं। मन का स्वभाव ही है। इस तरह से पोल ढूँढ़ने का।
प्रश्नकर्ता : मन पोल मार रहा हो तो उसे कैसे रोकें?
दादाश्री : निश्चय से। निश्चय होगा तो फिर वह पोल मारेगा ही कैसे? अपना निश्चय है तो कोई पोल मारेगा ही नहीं न? जिसे ऐसा निश्चय है कि 'मांसाहार नहीं करना है' तो वह खाता ही नहीं।
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प्रश्नकर्ता : तो क्या हर एक बात में निश्चय करके रखना है?
दादाश्री : निश्चय से ही सभी काम होते हैं।
प्रश्नकर्ता : आप यदि निश्चय पर इतना जोर देते हैं, तो फिर वह क्रमिकमार्ग नहीं कहलाएगा?
दादाश्री : नहीं, क्रमिक से लेना-देना नहीं है न! आत्मा प्राप्त होने के बाद क्रमिक कहाँ से आया? क्रमिक तो, अगर आत्मा प्राप्त नहीं किया हो, वहाँ तक के हिस्से को ही क्रमिक कहते हैं। आत्मा प्राप्त करने के बाद क्रमिक रहता ही नहीं।
प्रश्नकर्ता : आत्मा प्राप्त करने के बाद क्या निश्चयबल रखना पड़ता है?
दादाश्री : खुद को रखना ही नहीं है न? आपको तो 'चंद्रेश' से कहना है कि 'आप ठीक से निश्चय रखो।'
इस बारे में प्रश्न पूछना हो तो वह पोल ढूँढता है। इसलिए ऐसे प्रश्न पूछना हो तब उसे 'चुप' कह देना, 'गेट आउट' कहना ताकि वह चुप हो जाए। 'गेट आउट' कहते ही सबकुछ भाग जाएगा।
पुरुषार्थ ही नहीं, लेकिन पराक्रम से पहुँचो
दादाश्री : तुझे क्या होता है?
प्रश्नकर्ता : दिन में ऐसा एविडेन्स मिले तो विषय की एकाध गाँठ फूट जाती है, लेकिन फिर तुरंत श्री विजन सेट कर देता हूँ।
दादाश्री : नदी में तो एक ही बार डूबे कि मर जाता है न? या रोज रोज डूबे तो मरेगा? नदी में अगर एक ही बार डूब मरे तो उसके बाद कोई हर्ज है? नदी को क्या कोई नुकसान होनेवाला है?
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प्रश्नकर्ता : नदी को क्या नुकसान होगा?
दादाश्री : तब किसे नुकसान होगा?
प्रश्नकर्ता : जो मरा, उसे होगा।
दादाश्री : ऐसा? तब तू कह रहा है न, कि 'अभी भी मुझे विषय की गॉठ फूटती है?'
प्रश्नकर्ता : इसका क्या कारण है?
दादाश्री : वह तो तुझे दूँढ निकालना है। एक तो आज्ञा में नहीं रहते और वजह पूछते हो?!
शास्त्रकारों ने तो एक ही बार के अब्रह्मचर्य को मरण कहा है। ब्रह्मचारियों के लिए क्या कहा है, कि एक बार अब्रह्मचर्य होने से तो मरण अच्छा। मर जाना लेकिन अब्रह्मचर्य मत होने देना।
नर्क में जितनी गंदगी नहीं है, उतनी गंदगी विषय में है। लेकिन इस जीव को अभानता से समझ में नहीं आता। सिर्फ ज्ञानीपुरुष भान में होते हैं, इसलिए उन्हें यह गंदगी आरपार दिखती है। जिनकी दृष्टि इतनी विकसित हो, उन्हें राग कैसे उत्पन्न होगा?
कर्म का उदय आए और जागृति नहीं रहती हो, तब जोर-जोर से ज्ञान के वाक्य बोलकर जागृति लाए और कर्मों का विरोध करे तो वह सब पराक्रम कहलाता है। स्व-वीर्य को स्फुरायमान करना, वह पराक्रम है। पराक्रम के सामने किसी की ताकत नहीं है।
प्रश्नकर्ता : बहुत 'अटैक' आ जाए तो हिल जाता है।
दादाश्री : इसी को कहते हैं कि अपना निश्चय कच्चा है। निश्चय कच्चा नहीं पड़े, यही हमें देखना है। 'अटैक' तो, संयोग होता है इसलिए आता है। यदि गंध आए तो उसका असर हुए
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बिना रहता नहीं है न? इसलिए अपना निश्चय होना चाहिए कि मुझे उसे छूने नहीं देना है। निश्चय होगा तो कुछ नहीं होगा। जहाँ निश्चय है, वहाँ सबकुछ है। यहाँ पुरुषार्थ का बल है। आत्मा होने के बाद पुरुषार्थ हुआ, उसका यह बल है। वह बहुत गजब का बल है। फिर भी हम क्या कहते हैं कि अपने में जो कमजोरी है उसे जानो, लेकिन उसके सामने शूरवीरता रहनी चाहिए, तो कभी न कभी वह कमजोरी जाएगी। शूरवीरता होगी तो एक दिन जीत जाओगे, लेकिन खुद को निरंतर चुभना चाहिए कि यह गलत है।
अन्य धर्मों में भी ज्ञान के बगैर भी इतना जोर तो लगाते हैं कि, 'अरे, यार जाने दे, हिम्मते मर्दा तो मददे खुदा' जबकि हमारे पास तो ज्ञान है, तो क्या फिर समझ में नहीं आना चाहिए? 'हिम्मते मर्दा तो मददे खुदा' अगर ऐसा बोले न, तो शूरवीरता आ जाती है उसमें तो। अपना तो यह विज्ञान है। विज्ञानी में हिम्मत नहीं हो, ऐसा हो ही कैसे सकता है? हमें तो इतना कहनेवाला भी कोई नहीं मिला था। आप तो बड़े पुण्यशाली हो कि आपको तो ज्ञानीपुरुष मिले हैं, वर्ना तो गलत रास्ता दिखानेवाले लोग मिलते हैं।
निश्चय मांगे सिन्सियारिटी
अभी तो उम्र कम है न, इसलिए मोहनीय परिणाम अभी तक आए नहीं हैं। उन सभी कर्मों के उदय तो आए ही नहीं न? इसलिए अभी से ही अगर हमने यह सेट कर रखा हो तो कोई परेशानी नहीं आएगी। यह ज्ञान, यह निश्चय सबकुछ हम ऐसे सेट करके रखें ताकि इस मोहनीय परिणाम में भी हमें डगमगा नहीं दे। इस काल की बड़ी विचित्रता यह है कि इस काल के सभी लोग महा मोहनीयवाले हैं। इसलिए उन्हें 'कैसे हो?' पूछना। लेकिन उनसे नजर नहीं मिलानी चाहिए, नजर मिलाकर बातचीत भी नहीं करनी चाहिए। इस काल की विचित्रता है, इसलिए कह रहे हैं। क्योंकि सिर्फ यह विषयरस ही ऐसा है कि जो(हमारा) सर्वस्व गँवा दे। सिर्फ अन्नहृचर्य ही महा-मुशिकलवाला है। नहीं तो
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सुबह-सुबह तय कर लेना कि 'इस जगत् की कोई भी विनाशी चीज मुझे नहीं चाहिए', फिर उसके प्रति सिन्सियर रहना है। अंदर तो बहुत से लबाड़ हैं कि जो सिन्सियर नहीं रहने देते, लेकिन यदि निश्चय के प्रति सिन्सियर रहे तो फिर उसे कोई चीज बाधक नहीं रहेगी।
जितना तू सिन्सियर, उतनी ही तेरी जागृति। यह हम तुझे सूत्र के रूप में दे रहे हैं और छोटा बच्चा भी समझ जाए, इतने विवरण सहित दे रहे हैं। लेकिन जो जितना सिन्सियर, उतनी उसकी जागृति। यह तो साइंस है। जितनी इसमें सिन्सियारिटी उतना ही खुद का (काम) होता है और यह सिन्सियारिटी तो ठेठ मोक्ष की ओर ले जाती है। सिन्सियारिटी का फल, मोरालिटी आ जाती है। जो थोड़ा-थोड़ा सिन्सियर हो और यदि वह सिन्सियारिटी के पथ पर चले, उस रोड पर चले, तो वह मोरल हो जाता है। संपूर्ण मोरल हो गया, मतलब परमात्मा प्राप्त होने की तैयारी हो गई, इसलिए पहले सिन्सियारिटी की ज़रूरत है। मोरालिटी तो बाद में आएगी।
एक बार तू सिन्सियर हो जा। जितनी चीजों के प्रति तू सिन्सियर है, उतना ही उन चीजों को जीत लिया और जितनी चीजों के प्रति अनसिन्सियर, उतनी नहीं जीत पाए। इसलिए सभी जगह सिन्सियर हो जाओगे तो तुम जीत जाओगे। इस जगत् को जीतना है। जगत् को जीत लोगे तो मोक्ष मिलेगा। जगत् को जीते बगैर कोई मोक्ष में नहीं जाने देगा।
‘रिज पॉइन्ट’ पर रहे जोखिम तो देखो
प्रश्नकर्ता : उस दिन आप कुछ कह रहे थे कि जवानी में भी ‘रिज पॉइन्ट’ होता है, तो वह ‘रिज पॉइन्ट’ क्या है?
दादाश्री : ‘रिज पॉइन्ट’ मतलब यह जो छप्पर होता है, तो उसमें ‘रिज पॉइन्ट’ कहाँ होता है? सबसे ऊपर।
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हर एक चीज का उदयास्त होता है, उदय और अस्त। कर्मों का भी और सभी का, उदय और अस्त होता है। सूर्यनारायण का भी उदय और अस्त होता है या नहीं होता? सूर्यनारायण जब सेन्टर में होते हैं, उस स्थिति की तुलना में उदय के समय वे नीचे होते हैं और जब अस्त होते हैं तब भी नीचे होते हैं और बीच में जब बहुत टॉप पर जाते हैं, तब वह 'रिज पॉइन्ट' कहलाता है। उसी तरह हर एक कर्म 'रिज पॉइन्ट' पर पहुँचने के बाद फिर उतर जाता है। वैसे ही जवानी का उदय और जवानी का अस्त होता है। जवानी जब 'रिज पॉइन्ट' पर पहुँचती है, उसी समय सबकुछ गिरा देती है। उसमें से अगर वह पास हो गया, गुजर गया तो जीत गया। हम तो सबकुछ सँभाल लेते हैं, लेकिन यदि उसका खुद का मन बदल जाए तो फिर उपाय नहीं है। इसलिए हम उसे अभी, उदय होने से पहले सिखाते हैं कि भाई, नीचे देखकर चलना। स्त्री को मत देखना, बाकी सब, जलेबी-पकोड़े देखना। तुम्हारे लिए गारन्टी नहीं दे सकते। क्योंकि जवानी है। जवानी 'रिज पॉइन्ट' पर चढ़े, तब फिर क्या परिणाम आएँगे, वह कैसे कह सकते हैं? हालाँकि हमारे प्रोटेक्शन में कुछ बिगड़ेगा नहीं, लेकिन सौ में से पाँच प्रतिशत बिगड़ भी सकता है। ऐसे निकलते हैं या नहीं?
प्रश्नकर्ता : यानी जब तक हम हमारा 'रिज पॉइन्ट' क्रोस न कर लें, तब तक एकदम जागृति रखनी है?
दादाश्री : 'रिज पॉइन्ट' आने में तो बहुत टाइम लगता है। 'रिज पॉइन्ट' आ जाए तब तो बहुत हो गया। फिर भी इसका डर तो ठेठ तक रखने जैसा है। बाद में अपने आप पता चल जाएगा कि सेफ साइड हो गई, हमें ऐसा।
प्रश्नकर्ता : क्रोध-मान-माया-लोभ को तीन साल तक आहार नहीं मिले तो वे भूगर्भ में चले जाएँगे, ऐसा इन विषयों में भी है या नहीं?
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दादाश्री : इसमें तो ऐसा होता ही नहीं। इसमें 'नो' अपवाद! बाकी सभी में अपवाद, लेकिन इसमें तो अपवाद है ही नहीं।
ब्रह्मचर्य के लिए हमारी तरफ से आपके लिए पूरा बल है, आपकी प्रतिज्ञा मजबूत, सुंदर होनी चाहिए। आपकी प्रतिज्ञा, जोड़तोड़ रहित, लालच रहित और दुश्मनी रहित होनी चाहिए।
दृढ़ निश्चयी पहुँच सकते हैं
प्रश्नकर्ता : आप जब यह बताते हैं न, हमें खुद को नहीं दिख रहा हो तो हमें बल्कि कहना चाहिए कि, 'तुझमें ऐसा है, तभी दादा कह रहे हैं न।' तब फिर दिखने लगेगा।
दादाश्री : ऐसा जो कहते हो, तो वह बीज डाल रहे हो।
प्रश्नकर्ता : फिर भी जब से मैंने आलोचना दी है न, तब से निश्चय बहुत स्ट्रोंग हो गया है।
दादाश्री : वह निश्चय स्ट्रोंग नहीं कहलाता। निश्चय तो, जब मजबूत हो जाए, तब मैं (उसे) निश्चय कहता हूँ। सिर्फ मन से किया हुआ निश्चय नहीं चलेगा, निश्चय... व्यवहार में भी निश्चय होना चाहिए।
ब्रह्मचर्य का कोर्स पूरा करेगा?
प्रश्नकर्ता : जरूर। वह तो चाहिए ही नहीं अब। विषय का विचार तक अच्छा नहीं लगता, लेकिन जो अच्छा लगनेवाली बिलीफ है न, वह अभी भी रहा करती है। उसके प्रति जो रुचि है, वह अभी भी रहा करता है अंदर।
दादाश्री : और अरुचि भी है न?
प्रश्नकर्ता : जितनी रुचि रहती है, उससे अधिक अरुचि रहा करती है।
दादाश्री : लेकिन तूने तय क्या किया है?
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प्रश्नकर्ता : ब्रह्मचर्य का निश्चय बरते, ऐसा, लेकिन पुरुषार्थ में कमी रह जाती है, तो उसके लिए क्या करना चाहिए?
दादाश्री : वह पुरुषार्थ में कमी नहीं है। निश्चय, वही पुरुषार्थ है।
प्रश्नकर्ता : निश्चय हो तो फिर वह चीज़ रहेगी ही।
दादाश्री : वह कमी डिस्चार्ज में है। जो कमी है, वह डिस्चार्ज में है, चार्ज में नहीं है और जो डिस्चार्ज में है, उसकी कीमत नहीं है।
प्रश्नकर्ता : विषय के बारे में तो पहले से ही स्ट्रॉंग रखा हुआ है और अभी भी उस बारे में बहुत जागृति रखी हुई है ठेठ तक, लेकिन ये जो, संसार में दूसरी जो घटनाएँ होती हैं...
दादाश्री : उनका कुछ नहीं, उनकी कीमत ही नहीं है। कीमत इसी की है, ब्रह्मचर्य की। बाकी के सभी लोग मनुष्य देह में पशु हैं! पाशवता का दोष है। अन्य किसी चीज़ की कीमत है ही नहीं।
प्रश्नकर्ता : बाकी, विषय में तो इतना तक नक्की है कि अब यदि ऐसा कुछ हो जाए तो चंद्रेश को खत्म कर दूँ, लेकिन अब तो यह चाहिए ही नहीं।
दादाश्री : तो ब्रह्मचर्य के बारे में अच्छा कहा जाएगा। ऐसी समझ की जरूरत है। बाकी जिसमें हैवानियत हो, वह तो रकेगा ही नहीं न!
अधूरी समझ, वहाँ निश्चय कच्चा
प्रश्नकर्ता : आपने निश्चय पर अधिक जोर दिया है। तो निश्चय के लिए क्या होना चाहिए, ब्रह्मचारियों में?
दादाश्री : निश्चय यानी क्या? कि सभी विचारों को बंद
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करके सिर्फ एक ही विचार पर आ जाना, कि हमें यहाँ से स्टेशन जाना ही है। स्टेशन से गाड़ी में ही बैठना है। हमें बस में नहीं जाना है। तब फिर सभी संयोग वैसे ही मिलते हैं, अगर आपका निश्चय हो तो।
निश्चय कच्चा हो तो संयोग नहीं मिलते।
प्रश्नकर्ता : हाँ, वह निश्चय कच्चा पड़ जाता है तो फिर एकनुअल निश्चय के लिए क्या होना चाहिए? क्योंकि यह काल ही ऐसा है कि निश्चय को बदल दे।
दादाश्री : वह बदल जाए, तो उसे हमें वापस बदल देना है। वह बदल जाए तो हमें वापस बदल देना है। लेकिन काल वगैरह, वे हम से नहीं जीत सकते, क्योंकि हम पुरुष जाति हैं। बाकी सारी जातियाँ अलग हैं। अतः ये हम पुरुष जाति को नहीं जीत सकते।
प्रश्नकर्ता : लेकिन हम यों बदलते रहें, उससे अच्छा तो अगर एक्जेक्ट समझ लें तो फिर बदलेगा ही नहीं न, निश्चय।
दादाश्री : नहीं। समझ लेने की तो बात ही अलग है। बिना समझे कुछ करना ही नहीं होता न? लेकिन इतनी सारी समझ आनी मुश्किल है, उससे बजाय तो निश्चय लेकर चलना चाहिए।
प्रश्नकर्ता : आपने ऐसा कहा है कि यह अन्नब्रह्मचर्य ऐसी चीज है कि सिर्फ समझ से ही खत्म हो सकता है। अन्य किसी चीज से खत्म नहीं हो सकता।
दादाश्री : अगर समझकर हो तो उसे सोचते ही घिन आए ऐसा है। लेकिन घिन नहीं आती और क्यों रग होता है, भाव होता है, उस तरफ का? क्योंकि अभी भी समझा नहीं है, ठीक से।
प्रश्नकर्ता : यानी वह समझ नहीं है, इसलिए उसका निश्चय भी उतना ठीक नहीं है।
दृढ़ निश्चय पहुँचाए पार (खं-2-३)
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दादाश्री : हाँ, लेकिन समझ में आने में जरा देर लगे, ऐसा है। समझने जाए, तो समझ में आए ऐसा है। समझ सकता है। समझ में आ जाए तब तो निश्चय-विश्चय कुछ भी करने को नहीं रहेगा।
क्यों गाड़ियों से नहीं टकराता ?
विषय का स्वभाव क्या है? जितना स्ट्रोंग उतना विषय कम। इसमें जितना कमजोर, उतने ही विषय बढ़ेंगे। जो बिल्कुल कमजोर होता है, उसमें बहुत विषय होते हैं। इसलिए कमजोर को फिर से इसमें से बाहर निकलने ही नहीं देते, इतने सारे विषय चपके होते हैं जबकि मजबूत को छू ही नहीं सकते।
प्रश्नकर्ता : वह कमजोरी किस आधार पर टिकी हुई है?
दादाश्री : खुद की उसमें प्रतिज्ञा नहीं होती, कभी भी खुद की स्थिरता नहीं होती इसलिए वह फिसलता जाता है। फिसलते, फिसलते खत्म हो जाता है। 'ब्रह्मचर्य टूटे तो जहर खाकर भी उसे संभालना, कहते हैं। 'लेकिन ब्रह्मचर्य मत तोड़ना', वह क्रमिक ज्ञान में आता है।
प्रश्नकर्ता : ध्येय तक पहुँचना हो तो अक्रम मार्ग में भी निश्चय तो ऐसा ही रखना पड़ेगा न?
दादाश्री : निश्चय मजबूत रखना, निश्चय अत्यंत मजबूत होना चाहिए।
तेरा कुछ राह पर आएगा, लिखकर देनेवाला है? ऐसा। तो स्ट्रोंग रह। क्यों इतनी सारी गाड़ियों से नहीं टकराता? सामनेवाला टकराने आए फिर भी नहीं टकराना है, ऐसा निश्चय किया है न, तो कैसे निकल जाता है। टकराता नहीं है न?
प्रश्नकर्ता : नहीं...
दादाश्री : इतने से के लिए टकराता नहीं है न! चार अंगुल
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पूर्)
की दूरी की वजह से टकराव होने से रह जाता है न? रास्ते पर गाड़ी-वाड़ियों वगैरह के साथ!
प्रश्नकर्ता : वह तो अगर ऐसे होनेवाली हो, तो खुद जल्दी से खिसक जाता है। गाड़ी टकरानेवाली हो, तो खुद जल्दी से खिसक जाता है।
दादाश्री : अतः यदि ऐसा सब, तुम्हारा ऐसा निश्चय होगा न तो कुछ भी नहीं होगा।
जहाँ चोर नीयत, वहाँ नहीं है निश्चय...
प्रश्नकर्ता : चोर नीयत होना, वह निश्चय की कमी कहलाएगी?
दादाश्री : कमी नहीं कहते, इसमें तो निश्चय ही नहीं है। कमी तो निकल जाती है सारी, लेकिन उसमें तो निश्चय ही नहीं है।
प्रश्नकर्ता : लेकिन नीयत यों थोड़ी-थोड़ी चोर होती है या पूरी चोर होती है, ऐसा फर्क होगा न उसमें?
दादाश्री : चोर हुई मतलब पूरी ही चोर। थोड़ी चोर किसलिए? हमें मकान बनाना हो तो पहले से नक्शे में दरवाजे सुधार लेने चाहिए, दो खिड़कियाँ चाहिए हमें। बाद में चोरी करना, वह क्या अच्छा कहलाएगा? विचार तक भी क्यों आए ज़रा सा? अब्रह्मचर्य का विचार क्यों आना चाहिए? मैंने आपसे क्या कहा है? उगने से पहले उखाड़कर फेंक देना, वर्ना इसके जैसा जोखिम कोई नहीं है।
प्रश्नकर्ता : दादा ने एक-दो बार टोका, चोर नीयत के लिए, लेकिन अभी भी बात ठीक से पकड़ में नहीं आ रही है ऐसा है।
दादाश्री : पकड़कर क्या करना है? जैसे-जैसे लातें पड़ेंगी,
दृढ़ निश्चय पहुँचाए पार (खं-2-३)
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अंदर जलन पैदा होगी न, तो अपने आप पकड़ में आ जाएगी। अब तो अनुभव शुरू होगा न। पहले परीक्षा देते हैं और उसके बाद अनुभव शुरू होता है न!
प्रश्नकर्ता : चोर नीयत नहीं होगी, तो फिर विचार आना बिल्कुल बंद हो जाएगा?
दादाश्री : नहीं, भले ही विचार आए। विचार आए, तो उसमें हमें क्या हर्ज है? विचार बंद नहीं होंगे। चोर नीयत नहीं होनी चाहिए, अंदर भले ही कैसा भी लालच हो लेकिन उस पर ध्यान न दे, स्ट्रॉंग! विचार आएँगे ही कैसे?
प्रश्नकर्ता : अभी भी नीयत थोड़ी चोर है।
दादाश्री : चोर नीयत हो, उसे भी खुद जाने।
प्रश्नकर्ता : फिर कभी कभार बहुत विचार फूटते हैं, वह क्या है?
दादाश्री : विचार भले ही लाखों फूटें, फिर भी...
प्रश्नकर्ता : फिर हमें जो अंदर सुख रहता है, वह कम हो जाता है।
दादाश्री : वह सुख कम होता है, तब वह तपता है, लाल-लाल हो जाता है। वह तो, उस घड़ी तप करना पड़ता है न? सुख कम हो जाए तो क्या दुःख मोल लेना है?
प्रश्नकर्ता : इसलिए मैंने पूछा कि वह 'नीयत चोर' है इसलिए होता है।
दादाश्री : नीयत चोर नहीं है। इसमें तो क्षत्रियता चाहिए, क्षत्रियता! चितौड़ के राणा क्या कहते थे? नहीं झुकूँगा, झुकूँगा ही नहीं। उसने राजगद्दी छोड़ दी लेकिन झुका नहीं। भाग गया लेकिन झुका नहीं। नहीं तो बादशाह ने तो कह दिया कि, 'यदि आप
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झुकोगे, तो फिर इस गद्दी पर बैठ जाओ।' तब कहा, 'नहीं। मुझे ऐसी गद्दी नहीं चाहिए। मैं चित्तौड़ का राणा नहीं झुकूँगा।'
प्रश्नकर्ता : अभी भी प्रकृति परेशान करती है। लेकिन जब अंदर असल में लाल-लाल हो जाता है, तभी दादा का असल अनुभव होता है।
दादाश्री : वह तप पूरा करना पड़ेगा। उसके बाद आत्मा का अपार आनंद रहेगा। इस बाड़ को पार किया कि फिर अपार आनंद।
विषय के विष की परख क्यों नहीं होती ?
प्रश्नकर्ता : तो क्या ऐसा है कि विषय समझ से जाएगा? जैसे-जैसे समझ बढ़ती जाएगी, वैसे विषय चला जाएगा।
दादाश्री : समझ से ही चला जाएगा। यदि ऐसा समझ में आ गया न कि 'यह साँप जहरीला है और अगर काट लेगा तो तुरंत मर जाएँगे,' तो फिर वह जहरीले नाग से दूर ही रहेगा। उसी तरह इसमें भी समझ में आ जाना चाहिए।
प्रश्नकर्ता : हाँ। लेकिन वह समझ में क्यों नहीं आता?
दादाश्री : अनादिकाल से आराधन किया हुआ है न, उसी को सत्य माना है न।
प्रश्नकर्ता : वह ठीक है, लेकिन वह आराधन किया हुआ और आज का ज्ञान, उसमें अभी भी क्यों युद्ध चल रहा है?
दादाश्री : विस्तार से सोचने की खुद की शक्ति ही नहीं है न।
प्रश्नकर्ता : शक्ति नहीं है या उसकी इच्छा नहीं है?
दादाश्री : नहीं, शक्ति नहीं है। इच्छा तो है पूरी-पूरी।
दृढ़ निश्चय पहुँचाए पार (खं-2-३)
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प्रश्नकर्ता : अब मुझे ऐसा लग रहा है कि शक्ति तो है ही।
दादाश्री : और सारी शक्ति होती तो है, लेकिन वह उत्पन्न नहीं हुई है न?!
प्रश्नकर्ता : तो वह शक्ति उत्पन्न कैसे होगी?
दादाश्री : वह तो रात-दिन उसी के विचार हों, उसी पर विचारणा करता रहे और उसमें कितना आराधन करने योग्य है और वह कितना करने योग्य है, तुरंत अंदर जैसे-जैसे हमें विचारणा हो न, वैसे-वैसे खुलता जाएगा।
प्रश्नकर्ता : यानी इसका मीनिंग यही हुआ न कि कुछ भी करके यह व्यवहार खत्म कर देना चाहिए।
दादाश्री : इसलिए वे श्री विज्ञान इस्तेमाल करते हैं न? और सोचा हुआ होगा तो श्री विज्ञान भी इस्तेमाल नहीं करना पड़ेगा।
प्रश्नकर्ता : दिन भर के जो व्यवहार हैं, वे व्यवहार आवश्यक हैं। वही उसकी प्रगति में अंतरायरूप हैं न अभी, क्योंकि उसे सोचने का टाइम ही नहीं मिलता।
दादाश्री : इसलिए इसके बजाय, सबसे अच्छा यह है, कि अपनी दृष्टि कहीं पर भी चिपके, तो उखाड़ देना और प्रतिक्रमण कर लेना, बस।
प्रश्नकर्ता : उसके बाद मन कब तक इस एक ही सिद्धांत पर चलेगा? मन एक सिद्धांत पर कन्टिन्युअस नहीं चलता। बार-बार दृष्टि बिगड़ती है और प्रतिक्रमण करना या यह करना, यह सिद्धांत कन्टिन्युअस नहीं चलता। श्री विज्ञान भी एट-ए-टाइम नहीं चलता। कन्टिन्युअस रहना चाहिए और जब विस्तार से उसे समाधान हो, तब वह आगे बढ़ता है।
दादाश्री : वह विस्तार से सप्लाइ भी करना पड़ता है। अपने