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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य

Samaj Se Prapt Brahmacharya

दादा भगवान द्वारा

स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पूर्)

से हो सके तब तक, पहले तो यह उखाड़ देना चाहिए, तो चला फटाफट। खुद के खेत में यदि सारी कपास बोया है, कपास को पहचानते हैं कि यह कपास है, तब फिर अगर दूसरा कुछ उगे तो सिर्फ उसे निकाल देना है। उसे निराई कहते हैं। ऐसे निराई कर दें तो हो जाएगा। उगते ही सारा दबा दिया। तो हो गया। उससे पहले दबाया जा सके, ऐसा नहीं है। जब तक उगेगा नहीं तब तक बीज का पता नहीं चलेगा, उगते ही पहचान जाओगे कि यह बीज अलग है।

प्रश्नकर्ता : लेकिन उसका निश्चय होगा तो दूसरा कुछ उगते ही उसे पता चल जाएगा न?

दादाश्री : दूसरा बीज दिखे तो उसे उखाड़कर फेंक देना यानी संक्षेप में कहें तो यहीं सबसे अच्छा है।

प्रश्नकर्ता : लेकिन इस एक सिद्धांत पर ही तो नहीं बैठे रह सकते हैं न, आगे बढ़ना तो पड़ेगा न।

दादाश्री : उस घड़ी फिर से मिल जाएगा रास्ता। उस घड़ी अपने आप सभी संयोग मिल जाएंगे। तुझे काम आएंगी, ये सारी बातें? तुझे क्या काम आएंगी?

प्रश्नकर्ता : आएंगी ही न? अपने ध्येय का ही है न!

‘उदय’ की परिभाषा तो समझो

प्रश्नकर्ता : व्रत का ठीक से पालन हो रहा है या नहीं, वह हम कैसे समझें?

दादाश्री : ये तुम्हारी आँखों में चंचलता (विकारी भाव) आ जाती है या नहीं, उसका पता चलता है न? यदि कभी विषय के विचार तुम्हें अच्छे लगे तो? क्योंकि आत्मा थर्मामीटर जैसा है, तो तुरंत सबकुछ पता चल जाता है कि गलत रास्ते पर चला।

दृढ़ निश्चय पहुँचाए पार (खं-2-३)

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प्रश्नकर्ता : यानी खुद का निश्चय पक्का है। अब बाद में जो होता है, वह तो पूरा उदय का भाग आया न?

दादाश्री : उदय का भाग कौन सा कहलाता है कि संडास नहीं जाना है, वह ऐसे कहता है। यहाँ घर में तो संडास नहीं कर सकते न! इसलिए संडास को ठेठ तक रोककर रखता है और बाद में जाता है, वह उदय भाग कहलाता है। कहीं पर भी संडास करने बैठ जाए तो उसे उदय भाग नहीं कहा जा सकता। इस विषय में क्या होता है कि यह रस अच्छा लगता है, यह पुरानी आदत है। चखने की आदत है, इसलिए वह फिर उदय भाग में हस्तक्षेप करने जाता है। उदय भाग तो, खुद बिल्कुल मना करता हो और ठेठ तक स्ट्रॉग, मुझे फिसलना नहीं है, ऐसा कहता है। फिर फिसल जाए तो, वह बात अलग है। फिसलनेवाला इंसान कितनी सावधानी रखता है? सावधानीपूर्वक रहना, तो हर्ज नहीं हैं।

प्रश्नकर्ता : अर्थात यह डिमाकेशन बहुत सूक्ष्म है।

दादाश्री : बहुत सूक्ष्म है।

प्रश्नकर्ता : और खुद ही सख्त रहकर समझ सकता है। खुद ही सख्त रहे।

दादाश्री : ऐसे सख्त रहना चाहिए, फिर भी फिसल गए तो वह अलग बात है। जैसे तालाब में तैरनेवाला इंसान, डूबने का प्रयत्न ही नहीं होता न उसका।

प्रश्नकर्ता : अभी जो ब्रह्मचर्य से संबंधित निश्चय हो रहे हैं, वे किस आधार पर हो रहे हैं? किस पर आधारित है? स्ट्रॉग निश्चय?

दादाश्री : आपको जो करना है, उस पर। कोई लड़का अगर पानी में कूद जाए, खेलने या तैरने के लिए तो। वह किस आधार पर निश्चय करता है बचने का?

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

प्रश्नकर्ता : जीना है इसलिए।

दादाश्री : अगर वह सोचे कि जीएँ तो भी क्या और मरें तो भी क्या, तो उसका क्या होगा?

प्रश्नकर्ता : डूब ही जाएगा। खुद को यों ब्रह्मचर्य से संबंधित जो विवेक आता है, उसी के आधार पर यह निश्चय होता है?

दादाश्री : वह तो समझता है कि क्या करूँ तो सुखी हो सकूँगा। सुख दूँद रहा है और खुद का स्वभाव ब्रह्मचारी ही है, स्वभाव से!

दूढ़ निश्चय को कैसे अंतराय?

प्रश्नकर्ता : आपने कहा है कि 'अंतराय खड़े किए है और फिर कहता है कि मुझे दिख नहीं रहा।' तो इस संदर्भ में श्री विज्ञान के बारे में कौन से अंतराय हैं और किस प्रकार से अंतराय बाधक हैं?

दादाश्री : जो निश्चय कर ले कि मुझे अब ब्रह्मचर्य पालन करना है, उसे कुछ भी बाधक नहीं हो सकता। ये सारे तो बहाने बनाते हैं। अपने महात्मा कितने निश्चयवाले हैं यों, जरा सा भी डिगते नहीं हैं। श्री विज्ञान तो हेल्पिंग है। लेकिन जिसका निश्चय है, जिसे गिरना नहीं है, वह क्यों कुएँ में गिरे? तेरा निश्चय पक्का है न? एकदम पक्का?

प्रश्नकर्ता : एकदम पक्का।

दादाश्री : हाँ, ऐसा पक्का होना चाहिए।

सभी कितने पक्के। यह तो जिसके निश्चय का ठिकाना नहीं है, वह ऐसा सब दूँदता रहता है और अंतराय डालता है। खुद डूढ़ी तय कर ले कि भई, मुझे गिरना है ही नहीं। तो गिरेगा ही नहीं। फिर कोई धक्का मारेगा क्या! और तब आनंद रहता

दृढ़ निश्चय पहुँचाए पार (खं-2-३)

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है, यों ऐसे अंतराय-वंतराय दूँढने से कहीं आनंद रहता होगा?

प्रश्नकर्ता : दूसरे उपाय भी साथ में हैं ही न! फिर श्री विज्ञान के अलावा भी उपाय हैं ही न, प्रतिक्रमण है, वह सब...

दादाश्री : प्रतिक्रमण तो मन से गलती हो गई हो तो वर्ना प्रतिक्रमण की भी क्या जरूरत है? निश्चय अर्थात उसे कोई डराता नहीं है। यह सब तो जिसका ठिकाना नहीं हो, उसके लिए यह सब है। ये दूसरे उपाय क्यों दूँढते हैं। निश्चय मतलब निश्चय! जिसे शादी नहीं करनी है, उसे तय कर लेना चाहिए कि मुझे शादी करनी ही नहीं है। फिर कौन शादी करवाएगा? और जिसे शादी करनी है, उसे व्यर्थ में हाय-हाय करने की जरूरत नहीं है, शादी करके बैठ जाना। दही में और दूध में पैर नहीं रखना है किसी को भी।

जिसका ऐसा निश्चय है कि कुएँ में गिरना ही नहीं है, वह यदि चार दिन से सोया नहीं हो और उसे कुएँ की दीवार पर बिठा दिया जाए, फिर भी नहीं सोएगा वहाँ।

प्रश्नकर्ता : वहाँ तो प्रत्यक्ष दिखता है न कि गिर जाऊँगा यहाँ।

दादाश्री : हाँ, तो ऐसे प्रत्यक्ष से भी बुरा है यह तो। यह तो कितनी बड़ी खाई है! अनंत जन्मों के लिए जंगल लिपट जाता है। अर्थात मन मजबूत हुआ होगा तो हो सकता है, वर्ना यों तो नहीं हो पाएगा। यों कच्चे मन से ऐसे, ये धागे सिलाई के लिए नहीं है। कैसा स्ट्रोंग होना चाहिए कि मर जाऊँ लेकिन बूटे नहीं।

तेरा निश्चय मजबूत है न!

प्रश्नकर्ता : एकदम स्ट्रोंग। स्ट्रोंग-स्ट्रोंग कहने से भी स्ट्रोंग हो जाता है!

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

दादाश्री : ऐसा?

प्रश्नकर्ता : निश्चय स्ट्रोंग हो जाए तो सबकुछ आता ही जाता है।

दादाश्री : वह सीक्रेसी मिट गई तो 'ओपन टु स्काई' हो गया। उस गुप्त की वजह से यह सारी सीक्रेसी है। उसके बाद हमारी तरह बोला जा सकेगा, 'नो सीक्रेसी'।

जो निरंतर सुख भोग रहे हैं, उनके चेहरे तो देखो?! अरंडी का तेल पीया हो, वैसा दिखता है? और जो नहीं भोगते उनके?

प्रश्नकर्ता : निश्चय स्ट्रोंग है और मैंने कोई सीक्रेसी नहीं रखी है। आलोचना में आपके सामने सभी बातें ओपन की हुई हैं।

दादाश्री : वह सब ठीक है, लेकिन यह ऐसा सब तूफान दूँढना ही नहीं होता। निश्चय मतलब कुछ भी दूँढना नहीं होता। अपने आप ही आकर खड़ा रहे। अन्य किसी चीज की ज़रूरत ही नहीं है न! आए तो भी क्या और नहीं आए तो भी क्या। तो तू तेरे घर रह, कहना। वह स्थिति नहीं आ जाए, तब तक यहाँ आते रहना है।

प्रश्नकर्ता : मुझे ऐसा रहा करता है कि मेरा निश्चय इतना स्ट्रोंग है। ज्ञानीपुरुष के साथ का प्रत्यक्ष संयोग है, आप्तपुत्रों के साथ मैं रहता हूँ। मुझे इसमें बिल्कुल इन्टरेस्ट नहीं है, फिर भी आकर्षण क्यों रहा करता है?

दादाश्री : यह जो आकर्षण होता है न, वह पूर्व का हिसाब है इसलिए आकर्षण होता है। उसे तुरंत ही बो (निर्मूल) कर डालना।

प्रश्नकर्ता : प्रतिक्रमण।

दादाश्री : हाँ। वह कहीं अपने निश्चय को तोड़ता नहीं है।

दृढ़ निश्चय पहुँचाए पार (खं-2-३)

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आँखों को कुछ ठीक लगे तो आकृष्ट होती है, इससे कोई गुनाह नहीं लगता। वह तो प्रतिक्रमण कर लेने से धुल जाता है। वह पिछले जन्म की गलती है और जहाँ वैसा हिसाब होगा तभी वहाँ जाएगा, वर्ना जाएगा ही नहीं कभी भी। वह मिल जाए तभी आकर्षण होता है। वह तो प्रतिक्रमण से धुल जाएगा। उसका और क्या हिसाब है? वह तो, श्री विज्ञान रखने के बावजूद भी दिखता है कि आकर्षण हो रहा है। समझ में आए ऐसी बात है या नहीं?

प्रश्नकर्ता : समझ में आ रहा है न! मुझे ऐसा था कि इतना सुंदर ज्ञान मिला है और छूटने के ऐसे सब सुंदर संयोग मिले हैं, तो यदि प्योर हो जाएँ इस एक ही चीज़ में, तो बहुत अच्छा रहेगा, ऐसा।

दादाश्री : हाँ, लेकिन प्योर ही है। निश्चय है तब तक प्योर है और ऐसे इम्प्योरिटी माना, वह भी गलती है अपनी। निश्चय अपना था इसलिए प्योर रहता है। फिर जो आकर्षण होता है, उसके उपाय हैं! आकर्षण भी कैसा, फिसल गए तो क्या कोई गुनाह है? फिर से खड़े होकर चलने लगना। कपड़े बिगड़ गए हों तो धो लेना। हम फिसल पड़ें तो गुनाह है, फिसल गए तो गुनाह नहीं।

प्रश्नकर्ता : मुझे अंदर यों ऐसा खेद रहा करता है कि ऐसा सुंदर ज्ञान मिला है, फिर भी अभी तक ऐसी स्थिति क्यों अनुभव कर रहा हूँ?

दादाश्री : नहीं, वह तो सभी को ऐसा होता है। वह तो बल्कि यदि हम प्रतिक्रमण से धो डालें तो दिन बदलेंगे। वर्ना बाकी रहा, ऐसा कहा जाएगा। पिछले जन्म में जो हस्ताक्षर किए थे, वे छोड़ेंगे नहीं न!

[ ४ ]

विषय विचार परेशान करें तब...

वह तो है भरा हुआ माल

प्रश्नकर्ता : मुझे व्यापार के कारण बाहर बहुत घूमना पड़ता है।

दादाश्री : हाँ, लेकिन उन संयोगों में हमें सावधान रहना है, वह चढ़ बैठे तो चढ़ने मत देना। वह न्यूट्रल है और हम तो पुरुष हैं। न्यूट्रल कभी भी पुरुष को नहीं जीत सकता।

मांसाहार की दुकान में जाने पर भी विचार नहीं आते, ऐसा क्यों? क्योंकि वह माल नहीं भरा है न! तब फिर हमें समझ नहीं जाना चाहिए कि 'भाई, जो भरा हुआ है वही कूद रहा है। नहीं भरा होगा तो नहीं कूदगा।' इतना समझ सकते हैं या नहीं?

प्रश्नकर्ता : वह ठीक है। लेकिन बहुत विचार आते हैं, इसलिए फिर ऐसा लगता है कि अरे! ऐसा सब?!

दादाश्री : बाहर लोग शोर मचा रहे हों और हम दरवाजा बंद करके बैठे हों एक तरफ, तो कोई झंझट है? अगर हमें उसके साथ व्यवहार ही नहीं करना है तो फिर हम रह सकेंगे। यानी कि वह तूफान आकर फिर पार निकल जाएगा, और तूफान शांत हो जाएगा। बवंडर क्या रोज आते हैं? बस दो दिन। पूरे दिन चलता रहे तो भी उसका रास्ता निकालेंगे। ये सब बताते हैं न। इन्हें क्या बवंडर नहीं आते होंगे? अब इसे कितने बवंडर आते हैं, लेकिन क्या करे?

विषय विचार परेशान करें तब... (खंड-2-४)

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प्रश्नकर्ता : चंद्रेश विषय भोग रहा हो ऐसे विचार आते हैं। ऐसा सब दिखता है, फोटो दिखते हैं, अंदर। फिर अंदर कुछ भी अच्छा नहीं लगता।

दादाश्री : भले ही अच्छा न लगे। अच्छा नहीं लगता वह भी चंद्रेश को ही न? तुझे तो नहीं न? तू तो अलग है न इसमें! विषय नहीं होना चाहिए, अन्य कोई गलती हो जाए तो चला सकते हैं।

प्रश्नकर्ता : ऐसा विचार आता है कि मुझे इन्टरेस्ट है, अतः चोर नीयत होगी तभी इन्टरेस्ट आता है। नहीं तो इन्टरेस्ट आना ही नहीं चाहिए।

दादाश्री : इन्टरेस्ट आए ऐसा माल लेकर आए हो तुम। तुम्हें पता चलता है कि ओहो! इन्टरेस्ट आए ऐसा है। अतः तब कहना, 'इन्टरेस्ट का इस्तेमाल करो तुम। शादी भी कर लो, कौन मना कर रहा है?'

आत्मा को इसमें इन्टरेस्ट है ही नहीं। यह इन्टरेस्ट है, आहारी को। आहारी देखे हैं तूने? ज्यादा खा जाए तो भी दुःखी होते हैं और वापस वही आहारी उपवास भी करने बैठते हैं!

प्रश्नकर्ता : फिर ऐसे विचार आते हैं कि यह निश्चय में कमी है या चोर नीयत है या फिर ऐसा क्यों हो रहा है?

दादाश्री : नहीं, वह तो भरा हुआ माल है और टाइम आ गया है। आसपास के संयोग वैसे हैं, इसलिए फूट रहे हैं।

प्रश्नकर्ता : एक तो अज्ञाने में विषय में खिंच गए और दूसरा जागृतिपूर्वक खिंच गए, कुछ चला ही नहीं वहाँ पर। तब फिर क्या करें? और इसका कितना दोष लगता है?

दादाश्री : दोष तो है न! वैद्य ने कहा हो कि मिर्च मत खाना और हम मिर्च खाएँ, तो क्या होगा?

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

प्रश्नकर्ता : आज्ञा का पालन नहीं हो सका तो क्या करना चाहिए फिर?

दादाश्री : वह तो उसने मिर्च खाई, इसलिए फिर रोग बढ़ा।

प्रश्नकर्ता : लेकिन उसका उपाय तो होना चाहिए न?

दादाश्री : प्रतिक्रमण करना चाहिए।

प्रश्नकर्ता : लेकिन जिन्होंने आज्ञा दी है, उन्हें कहना तो पड़ेगा न?

दादाश्री : हाँ। कह दो फिर भी वे प्रतिक्रमण करने को कहेंगे। और क्या कहें? रूबरू प्रतिक्रमण कर।

कभी अगर अंदर कोई खराब विचार उग आए और निकाल देने में देर हो जाए तो उसका बड़ा प्रतिक्रमण करना पड़ेगा। वह तो जब विचार उगे कि तुरंत निकाल देना है, फेंक देना है।

प्रश्नकर्ता : पहले ऐसी स्थिति थी कि मैं इन सबसे अलग हो जाऊँ न, तो ब्रह्मचर्य रह ही नहीं पाता था, ऐसी स्थिति हो गई थी। जरा सा भी इस समूह से जुदा रहूँ या अकेला घर पर रहूँ न तो सभी विचार घेर लेते थे।

दादाश्री : विचार घेर लेते हैं, उसमें अपना क्या जाता है? हम देखनेवाले हैं उसे! होली में क्यों हाथ नहीं डालते? होली का दोष निकाले, वह गलत है न! दोष तो, अगर तुम हाथ डाल दो, उसे कहते हैं।

विचार तो सभी तरह के आ सकते हैं। मच्छर घेर लेते हो, उन्हें हम यों-यों करे तो नहीं रहेंगे। इसमें तो हाथ दर्द करता है, लेकिन कुदरत का हाथ तो दुःख ही नहीं सकता। हम कहें कि मच्छर छूने नहीं देना है, तो अंदर वैसा ही हो जाएगा। ऐसा निश्चय करो तब कैसा सुंदर ब्रह्मचर्य पालन किया जा सकेगा!!

विषय विचार परेशान करें तब... (खं-2-४)

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जुदापन से जीत सकते हैं

दादाश्री : तुझे कैसा रहता है? तेरा ठीक हो जाएगा न?

प्रश्नकर्ता : हो जाएगा।

दादाश्री : हं। तू तो ऐसा ही कहता है न, 'गिर जाएगा, गिर जाएगा', उसी जगह से उगता है और उसी जगह पर ढलता है। वह गिरता नहीं न, वह कहता है, गिर जाएगा सूर्यनारायण!

प्रश्नकर्ता : ये अंदर का ठीक हो जाएगा, चंद्रेश का।

दादाश्री : ऐसा। लेकिन शादी करने का कहता है?

प्रश्नकर्ता : वैसी गाँठें फूट रही हैं।

दादाश्री : उसे कहना कि 'यदि गाँठें फूटेंगी न, तो जब तक हम एक्सेप्ट नहीं करेंगे तब तक तुम्हारा कुछ नहीं चलनेवाला। बेकार में तेरे दिन ही बिगड़ेंगे, चुपचाप बैठ रह न।' बेकार में शादी करना और विधुर होना। शादी करना और विधुर होना, ऐसे करते रहते थे। बैठे रहो न, शादी भी मत करना और विधुर भी मत होना। हम कोई सहायोग नहीं देंगे।

प्रश्नकर्ता : यानी कि जब तक मैं दस्तखत नहीं करता, तब तक गाड़ी फर्स्ट क्लास चलती है।

दादाश्री : तुम्हें खुद को ही डाँटना पड़ेगा कि कुछ नहीं होगा। इसलिए चुप बैठो न! ऐसे दो-चार प्रकार के प्रयोग सेट कर देना ताकि जुदा रह सको।

दादाश्री : तुझे पछतावा नहीं होता, शादी नहीं की उसका?

प्रश्नकर्ता : नहीं, ऐसा नहीं है।

दादाश्री : तो शादी नहीं की, वह अच्छा लगा तुझे?

प्रश्नकर्ता : हाँ, दूसरे लोग जो शादीशुदा हैं, उनका सारा

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

दुःख देखने को मिलता है न? घर और बाहर, सभी ओर देखने को मिलता है। खुला ही है न!

दादाश्री : अरे, इन प्रत्यक्ष दिखाई देनेवाले दुःखों को छोड़ो न। उन दुःखों को देख लेंगे थोड़ा बहुत। दादा के कहे अनुसार करेंगे तो, ठीक हो जाएगा। अपने महात्माओं को तो पच जाएगा। लेकिन एक वह (ब्रह्मचर्य की) किताब रखनी पड़ेगी साथ में। तू नहीं रखता?

प्रश्नकर्ता : रखता हूँ।

दादाश्री : पढ़ता है न फिर। थोड़ा-थोड़ा पढ़ना पड़ेगा। उसे पढ़ने से, मन जो बहुत उछल-कूद कर रहा था, वह शांत हो जाएगा। तेरा तो बिल्कुल ठीक रहता है न?

प्रश्नकर्ता : ठीक है। वह किताब हेल्प करती है थोड़ी-बहुत, लेकिन यह विज्ञान तो बिल्कुल जुदा ही रखता है।

दादाश्री : इस विज्ञान की तो बात ही अलग है। इस विज्ञान की तो बात ही क्या!

प्रश्नकर्ता : इस किताब की हेल्प लेते हैं न, लेकिन विज्ञान पर अधिक जोर देते हैं हम।

दादाश्री : विज्ञान तो बहुत काम करता है।

प्रश्नकर्ता : फिर भले ही कैसे भी संयोग आएँ वे इस किताब में नहीं है।

दादाश्री : तेरी गाड़ी राह पर आ गई है, अब। पहले तो मुझे लगता था, कि यह स्त्री बन जाएगा। लेकिन फिर बहुत टोका। नहीं तो क्या करें? मैंने कहा, 'अगले जन्म में स्त्री के कपड़े पहनने पड़ेंगे, साड़ी-ब्लाउज।' और क्या कहूँ? अब सब निकल गया। चेहरे पर देख लेते हैं न हम! उसके विचार वगैरह सब

विषय विचार परेशान करें तब... (खं-2-४)

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दिखाई देते हैं हमें। स्त्री के कपड़े पहनने अच्छे लगेंगे? विषय चाहिए तो स्त्री के कपड़े लाने ही पड़ेंगे न फिर?

प्रश्नकर्ता : आपने शुरू से ही हमारा बहुत ध्यान रखा है।

दादाश्री : वह तो रखना ही पड़ेगा न! अब ध्यान रखने जैसा नहीं है, अब चलता रहेगा। इसलिए अब दूसरे को पकड़ते हैं। जो कच्चा है, उसे पकड़ते हैं।

प्रश्नकर्ता : लेकिन अभी भी बहुत ज़रूरत है। अब सबकुछ जल्दी से खाली हो जाए, ऐसा कुछ कर दीजिए।

दादाश्री : ऐसा है न, जल्दी खाली होने का मतलब इस देह का खत्म होना।

प्रश्नकर्ता : यानी कि यह जो सारा विषय और कपट का जो माल भरा है, वह सारा माल खाली करना है।

दादाश्री : ओहोहो! विषय का! विषय का खाली करना है, क्या? लेकिन उसके टाइम पर खाली करोगे तब भी हर्ज क्या है लेकिन?

प्रश्नकर्ता : वह चुभता है अंदर।

दादाश्री : वह माल फूटे तो उसमें तुझे क्या परेशानी है? चुभेगा तभी जब तू उस तरफ सो जाएगा। इस ओर सो जाऊँ, अपने अंदर सो जाऊँ तो? 'स्त्री' के पलंग पर सो जाएगा, तब चुभेगा न! 'अपने' पलंग पर सो जाऊँ तो फिर हमें क्या चुभेगा? बहुत चुभता है? तो फिर शादी कर ले।

प्रश्नकर्ता : नहीं, ऐसा नहीं। ये जो गॉटें फूटती हैं, वे चुभती हैं।

दादाश्री : उसमें क्या चुभना? 'देखते' रहना है। उसमें चुभता क्या है? 'हम' 'वहाँ' बैठेंगे तभी चुभेगा।

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प्रश्नकर्ता : हाँ। यानी कि चंद्रेश को ही चुभता है कि 'ऐसा नहीं होना चाहिए।'

दादाश्री : चंद्रेश को चुभे उसमें तुझे क्या है? चंद्रेश से कहना, 'ले अब ले स्वाद!' ले तेरा किया तू भुगत। हमें कुछ नहीं कर सकता। तुम्हारी तो उम्र छोटी है तो अभी परेशानीवाले स्टेशन आएँगे। निरी झाड़ी और जंगल सारा!

स्त्री विषय, वह गलत चीज़ है, ऐसा तुझे निरंतर रहा करता है?

प्रश्नकर्ता : निरंतर।

दादाश्री : और अभिप्राय भी वही रहता है?

प्रश्नकर्ता : वही।

दादाश्री : अब पहले माना था कि स्त्री विषय अच्छा है, इसीलिए तो अंदर गँठि भर गई हैं, अब वे खत्म हो जाएँगी धीरे-धीरे। नया माल नहीं भर रहा है, इसलिए तुझे जोखिम नहीं रहा न! नया भर सके, अपना ज्ञान ऐसा है ही नहीं न!

सत्संग में भी सतर्क रहना है

जिन स्त्री-पुरुषों में विकार नहीं हों, वे पवित्र।

तुम जितना काम का बदला दोगे, उससे अधिक बदला तुम्हें मिलेगा, इसलिए यह करना है। जगत् कल्याण होगा और अपना भी। वर्ना इसमें तो कोई माल ही नहीं था। नमक-मिर्च भी नहीं था न! वह तो अब जो है, नए सिर से बड़ी बड़ी दुकानें खुली हैं।

प्रश्नकर्ता : विषय से संबंधित खास ध्यान रखना पड़ता है। गाँवों में जाते हैं न, वहाँ जेन्ट्स से अधिक लेडीज होती हैं हमेशा। ये गाँवों में सत्संग में जाते हैं न तो सत्तर प्रतिशत तो लेडीज

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ही होती हैं और पुरुष तीस प्रतिशत ही होते हैं इसलिए ब्रह्मचर्य से संबंधित अत्यंत जागृत रहना पड़ता है। उन लोगों का रिस्पोंन्स बहुत होता है। जैसे कि अच्छे पद गवाई, तो वे लोग यों खुश हो जाती हैं।

दादाश्री : ऐसा स्थूल अब्रह्मचर्य तो नहीं होता न! झंझट तो सूक्ष्म में है। वे भी रास्ते में और शहरों में मिलते हैं। गाँवों में तो रुचि का इतना कारण ही नहीं है न!

प्रश्नकर्ता : लेकिन गाँठें फूटती हैं कभी कभार।

दादाश्री : उन्हें तो तोड़ देना।

प्रश्नकर्ता : उनका निवारण तुरंत हो जाता है, तुरंत पाँच ही मिनट में।

दादाश्री : जितना धुल जाए, उतना कम है। 'शूट ऑन साइट' ही होना चाहिए।

प्रश्नकर्ता : 'शूट ऑन साइट' ही हो जाता है। यह तो हमें जब मिलने का मौका आता है न। यों घर पर रहते हैं तब नहीं आते।

दादाश्री : अनंत जन्मों से यही के यही प्रतिस्पंदन। पहले के संस्कार, वह भान ही नहीं था न!

मन की पोलों के सामने...

कोई स्त्री अपने सामने आँख मारती रहे तो, उसमें हमें क्या? वह तो स्त्री तो मारेगी ही। उससे हमें क्या? तू भी गजब का है? ऐसा कानून है क्या, कि स्त्री आँखें नहीं मार सकती? क्या हम उसे ऐसा कह सकते हैं?

प्रश्नकर्ता : स्त्री से नहीं कह सकते। लेकिन चंद्रेश अंदर लपेट में आ जाता है। उसका क्या? चंद्रेश खिंच जाता है।

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दादाश्री : इसीलिए, वह शादी कर ले तो अच्छा है न!

प्रश्नकर्ता : नहीं, ऐसा नहीं चाहिए।

दादाश्री : ऐसा ही है न! यही तेरी कमजोरी है! आँख मारे, उसमें तुझे क्या? श्री विज्ञन से देख ले तो, क्या दिखेगा उसमें? तू श्री विज्ञन नहीं देखता?

माँ-बाप अगर तेरे ध्येय को बदलवा रहे हों तो तू वह नहीं सुनता तो मन की क्यों सुने? उठाकर ले गया कोई?

प्रश्नकर्ता : खुद ही खिंच गए।

दादाश्री : जो साँप के मुँह में जाए, उसका कोई क्या करे?

मन से कह देना कि 'तू अब फँसाएगा तो मैं आपत्तियों को सौ रुपये की आइस्त्रीम खिलाऊँगा या खाना खिलाऊँगा।' तो फिर नहीं करेगा वैसा। एक गलती पर सौ रुपया का दंड!

प्रश्नकर्ता : तभी अंदर हुआ कि यह गलत है, फिर भी उस ओर चला गया। मन का मान लिया उस समय।

दादाश्री : तो फिर अब गलत हुआ, वह जानता है। ऊपर से यह भी जानता है कि 'समुद्र में डूब जाऊँगा और मर जाऊँगा,' फिर भी यदि कोई जाए तो क्या समुद्र उसे मना करेगा? समुद्र तो कहेगा, 'आ भाई, मैं तो विशाल पेटवाला हूँ। कई लोगों को समा लिया है।'

प्रश्नकर्ता : पिछले एक साल से मैं रजिस्ट कर रहा था।

दादाश्री : मन तो बहुत मजबूत है, लेकिन तू खुद कमजोर होगा तो फिर से शादी कर लेगा।

प्रश्नकर्ता : जब ऐसा हो, तब मन मजबूत कहलाता है?

दादाश्री : इंसान कमजोर ही कहलाएगा न! मन कमजोर

विषय विचार परेशान करें तब... (खं-2-४)

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नहीं कहलाता। बल्कि मन उसे खींच ले गया। मन तो मजबूत कहलाएगा।

प्रश्नकर्ता : इस केस में आपने मन को ‘मजबूत’ कहा और ईंसान को ‘कमजोर’ कहा। तो ईंसान यानी कौन कमजोर कहलाएगा?

दादाश्री : अहंकार और बुद्धि कमजोर हैं। इसमें असल गवर्नमेन्ट का राज है, तो इसमें बुद्धि और अहंकार हैं। इसमें अगर मन का राज हो जाए तो खत्म। मन का तो पार्लियामेन्टरी पद्धति से, उसका सिर्फ एक रोल ही है। वह भी अगर बुद्धि माने, स्वीकार करे, तब अहंकार दस्तखत करता है। बर्ना तब तक दस्तखत भी नहीं होते।

प्रश्नकर्ता : यों अकेले सो गए हों न, तो वे विचार फूटते हैं कि ऐसा हो जाए तो? इस तरह विषय भोंगें तो? फिर उस समय मुझे आश्चर्य होता है कि मुझे तो ब्रह्मचर्य पालन करना है तो यह सब फूटा कहाँ से? और अच्छे भी लगते हैं, वे विचार।

दादाश्री : फूटें उसमें हर्ज नहीं है, लेकिन वे तो तुझे अच्छे लगते हैं?

प्रश्नकर्ता : वे किसी को तो अच्छे लगते ही होंगे न अंदर?

दादाश्री : ओहो, तुझे किसी से लेना-देना है?!

प्रश्नकर्ता : वे जिसे अच्छे लगते हैं, उसे भी निकालना तो पड़ेगा न!

दादाश्री : उसे डॉटना, ‘यहाँ क्या हंगामा मचा रखा है हमारे घर में? हमारे पवित्र घर में, होम में?’

प्रश्नकर्ता : तो फिर इसका इलाज क्या है?

दादाश्री : तुझे इलाज करके क्या करना है?

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प्रश्नकर्ता : लेकिन यह तो बहुत बड़ा रोग है। यह तो फिर वापस बिल्ली मटकी में मुँह डाले न, तो उसे लेकर घूमना पड़ेगा फिर।

दादाश्री : उसमें तो चारा ही नहीं है न। बाद में कौन निकालेगा? बीत गई यह पूरी ज़िंदगी! आ फँसे भई आ फँसे। दुःख अच्छा लगता हो तो फिर उसका कोई उपाय ही नहीं है न!

प्रश्नकर्ता : दुःख अच्छा नहीं लगता। लेकिन वह विषय का इन्टरेस्ट अच्छा लगता है, उसमें कहाँ दुःख है?

दादाश्री : नहीं, उसका फल ही दुःख आता है न! जिसका फल दुःख आए, वह चीज़ अच्छी नहीं लगनी चाहिए। वह दुःख ही है।

प्रश्नकर्ता : ऐसे विचार आ गए, फिर बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता कि 'ये ऐसे विचार क्यों आए?'

दादाश्री : वह तो मटकी में मुँह डालने के बाद न? फँसने के बाद आएँगे विचार! अरे, एक बार विचारों को उखाड़कर-निकालकर कहना, 'इन सभी लोगों ने शादी की ही हैं न।'

प्रश्नकर्ता : शादी के विचार आते हों तो अच्छा है। एक बार शादी कर ले। ये तो विषय के विचार आते हैं। इसमें जोखिमदारी कितनी है!! फिर ऐसा विचार आता है कि दादा तो कहते हैं कि ऐसा नहीं चलाएँगे, तो क्या होगा मेरा?

दादाश्री : क्या होनेवाला है? क्या इस नर्मदा का गोल्डन ब्रिज गिर गया है? गोल्डन ब्रिज बनानेवाले चले गए, सभी चले गए! क्या हो जाएगा? क्या वह गिर जाएगा? अपनी तैयारी होनी चाहिए।

प्रश्नकर्ता : लेकिन तैयारी में अंदर पोल (ढील) बहुत हो

विषय विचार परेशान करें तब... (खं-2-४)

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जाती है। संयोग नहीं मिलें तब तक अच्छा रहता है, लेकिन मिल जाएँ तब सारा माल निकलता है।

दादाश्री : नहीं, लेकिन यह जो बात तू कर रहा है न, वह सब के लिए नहीं है। यह सिर्फ तेरे लिए है। किसी और की बात नहीं है। तुझे जैसा ठीक लगे, उस अनुसार कर ले ताकि झंझट मिटे। फिर औरों का कोई झंझट नहीं। इससे तो दूसरों के मन बिगड़ते हैं फिर। क्या होगा फिर? अच्छा लगे, तब? अच्छा लगे, तब तक हम कुछ नहीं कह सकते। मालिक भी कहता है कि अच्छा लग रहा है और अच्छा लगनेवाला कहता है कि अच्छा लग रहा है। दोनों ऐसा कहेंगे तो फिर क्या होगा?

प्रश्नकर्ता : जो अच्छा लगे उसे खत्म करना पड़ेगा न?

दादाश्री : यह तो अच्छा लगनेवाला कहता है, 'मुझे पसंद है' और मालिक कहता है, 'पसंद नहीं है' यदि इन दोनों में संघर्ष हो तो खत्म कर सकते हैं। यह तो संघर्ष नहीं है, एक मत है, फिर कैसे खत्म करेंगे?! मियाँ-बीवी राजी तो क्या करेगा मियाँ काजी? फिर काजी साहब क्या करेंगे?!

प्रश्नकर्ता : लेकिन फँसना तो अच्छा नहीं लगता मुझे। इस विषय में फँसना मुझे अच्छा नहीं लगता।

दादाश्री : देख अब क्या कह रहा है, पहले क्या कह रहा था, अभी?

प्रश्नकर्ता : वे जो विचार आते हैं, वे अच्छे लगते हैं, वे उतने समय के लिए ही। फिर बाद में...

दादाश्री : आत्महत्या करना अच्छा लगता है लेकिन मरना नहीं है! एक दिन करके तो देख!

प्रश्नकर्ता : वह जोखिमदारी है। उसके लिए सारी मार खानी पड़ेगी न! कभी ऐसे। फिर ऐसा विचार आता है कि इस पुद्गल

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

के फोर्स की वजह से ऐसा हो रहा होगा, इसलिए फिर पुद्गल के फोर्स को कम कर दें, खाना कम कर दें, उसका कोई रास्ता बताइए।

दादाश्री : लेकिन उससे तुझे क्या? तुझे अच्छा नहीं लगता हो तो रास्ता बता सकते हैं। तुझे तो अच्छा लगता है न?

प्रश्नकर्ता : ऐसे लगातार अच्छा नहीं लगता। वे विचार आते हैं न, तो थोड़े वक्त के लिए ही अच्छा लगता है। बाद में कहीं ऐसा अच्छा लगता होगा?

दादाश्री : नहीं, नहीं। अच्छा लगता है मतलब साइन हो गई न थोड़ी देर के लिए। तू अगर विरोधी हो तो बात काम की।

प्रश्नकर्ता : पूरे चौबीस घंटों में मैं विरोधी ही हूँ। लेकिन वे संयोग ऐसे आ मिलते हैं कि विचार फूटें तो एक जरा सा, एक मिनट के लिए अच्छा लग जाता है कि ये विचार अच्छे हैं।

दादाश्री : मिनट के लिए ही लोगों ने शायदियाँ कर लीं।

प्रश्नकर्ता : पूरे दिन मैं ऑफिस में 'दादा, मुझे ब्रह्मचर्य पालन करने की शक्ति दीजिए' ऐसे माँगता ही रहता हूँ।

दादाश्री : हाँ, तो माँगता रह न फिर। लेकिन अगर अच्छा लगता है तो उसमें हर्ज नहीं है न! अंदर हैं न, ऐसे व्यापारी हैं न! हर तरह के व्यापारी होते हैं न! नुकसान करें ऐसे व्यापारी! कभी अगर डूब गए तो क्या हर्ज है?

प्रश्नकर्ता : लेकिन वह जो आप एक्जेक्ट उदाहरण देते हैं न, कि भाई एक बार तू नदी में डूब जाएगा तो? तो वह सोचने लगता है कि यदि एक बार विषय में स्लिप हो जाऊँगा तो?

दादाश्री : नहीं, लेकिन दूसरी बार उसे जागृति रहती है

विषय विचार परेशान करें तब... (खं-2-४)

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न! सौ दिन तक तैरे लेकिन एक दिन डूब गए तो फिर व्यर्थ ही है!

पिछले जन्म की माँ आज बेटी भी बन सकती है। जैसा ऋण बंधा हो वैसा ही होता है। काकी बन सकती है, मामी बन सकती है, मौसी बन सकती है, पत्नी भी बन सकती है। ऐसा सब हो सकता है! यदि माँ हो और इस जन्म में पत्नी बने तो वैराग्य नहीं आएगा? ऐसा समझना है!

प्रश्नकर्ता : जब तक कुसंग का वातावरण है, तब तक इसका निबेड़ा नहीं है।

दादाश्री : इस सत्संग से निबेड़ा आता ही है न! अपनी सारी मेहनत मिट्टी में मिला देता है कुसंग।

प्रश्नकर्ता : कुसंग में माल फूटता है।

दादाश्री : कुसंग की गंध ही ऐसी है। कुसंग में जाना पड़े तो भी प्रतिक्रमण करना पड़ेगा।

प्रश्नकर्ता : मतलब एक ओर विषय के विचार अच्छे लगते हैं और एक ओर नहीं भी लगते, इस प्रकार दोनों चीज होती हैं।

दादाश्री : ऐसा नहीं चलेगा, अगर ब्रह्मचारी रहना हो तो। वरना शादी कर लो।

बहुत लूज हो रहा हो तो मजबूत कर दे अब! ऐसे पूछना और सारी बातचीत करना!

बुद्धि की वकालत, बिना फीस के

प्रश्नकर्ता : प्रकृति अभी भी एकदम अपना स्वभाव तुरंत छोड़ती नहीं है न! विचार वगैरह सब थोड़ा-थोड़ा रहता है।

दादाश्री : बहुत नहीं न लेकिन!