भारतकोश
संग्रह पर लौटें

समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य

Samaj Se Prapt Brahmacharya

दादा भगवान द्वारा

स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

रहा न, मनुष्य का! अब कानून समझकर करना यह सब। जिसके वर्तन में आ जाए, तो उसका आना हम बंद कर देते हैं क्योंकि नहीं तो यह संघ टूट जाएगा। संघ में तो विषय की दुर्गंध आनी ही नहीं चाहिए। अतः अगर ऐसा हो तो मुझे बता देना। शादी करेगा फिर भी उपाय है। शादी करने से मोक्ष चला नहीं जाएगा। तेरे पास उपाय रहे, ऐसा कर देंगे।

आप्तपुत्रों के लिए दफाएँ

जिसका निश्चय है न, वह रह सकता है! सिर पर ज्ञानीपुरुष की छत्रछाया है। ज्ञान लिया हुआ है, अंदर सुख तो रहता ही है न, फिर किसलिए कुएँ में गिरना? इसलिए यह जो प्रमाद किए हैं न, उसके बाद मुझे अच्छे ही नहीं लगते तुम। अभी भी प्रमादी और यों सारे यूजलेस। कुछ ठिकाना ही नहीं है न! मेरी मौजूदगी में सोते हैं, फिर क्या बात करनी? कब लिखकर देनेवाले हो?

प्रश्नकर्ता : आप कहें तब। अभी लिखकर दे देते हैं।

दादाश्री : दो दफाएँ, एक विषयी व्यवहार, यदि विषयी व्यवहार हो जाए तो हम खुद ही निवृत्त हो जाएँगे, किसी को निवृत्त नहीं करना पड़ेगा। ऐसा लिखना है। हम खुद ही यह स्थान छोड़कर चले जाएँगे और दूसरा अगर यह प्रमाद हो जाए तो उस समय संघ हमें जो भी दंड देगा, वह। तीन दिन तक भूखे रहने की या कुछ भी, जो भी दंड देंगे, उसे स्वीकार कर लेंगे। हम कहाँ बीच में आएँ! यह संघ है न। ये लोग मेरी मौजूदगी में इतना सोते हैं तो क्या यह अच्छा दिखता है? हाँ, दोपहर में तो सो रहे थे, तो ये पकड़े गए सब। पहले भी कई बार पकड़े गए थे। यह तो सारा कचरा माल है। वह तो जैसे तैसे थोड़ा बहुत सुधरा। तुझे ऐसा लिखकर देना है। आप्तपुत्र ऐसा लिखकर देंगे, हमें। दो दफाएँ, कौन सी दफाएँ लिखकर देंगे?

विषयी आचरण? तो डिसमिस (खं-2-१०)

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प्रश्नकर्ता : एक तो, कभी भी विषय से संबंधित दोष नहीं करूँगा और करूँगा तो यह...

दादाश्री : करूँगा तो तुरंत ही मैं अपने घर चला जाऊँगा। आपतपुत्रों की यह जगह छोड़कर चला जाऊँगा। आपको मुँह दिखाने के लिए नहीं रुकूँगा।

और दूसरा ज्ञानीपुरुष की मौजूदगी में झोंका नहीं खाऊँगा। किसी भी प्रकार का प्रमाद नहीं करूँगा। ये दो शर्तें लिखकर सब तैयार हो जाओ। यानी कि ब्रह्मचर्य महत्वपूर्ण है।

मैं इन्हें कहता हूँ, शादी कर लो। लेकिन कहते हैं नहीं करनी। मैं मना नहीं करता। आप शादी कर लो। शादी करोगे फिर भी मोक्ष चला नहीं जाएगा। तब फिर हमारे सिर पर आरोप नहीं आएगा। आपको बीबी नहीं पुसाए तो उसमें मैं क्या करूँ! तब कहते हैं, हमें नहीं पुसाएगी। ऐसा खुलासा करते हैं न! इसलिए अगर तुझे पुसाए तो शादी करना और नहीं पुसाए तो मुझे बताना।

अंदर माल भरा हुआ हो तो शादी करके उसका हिसाब पूरा करो। शादी की, इसका मतलब हमेशा के लिए कहीं पति नहीं बन जाता। सभी रास्ते होते हैं।

मन बिगड़ जाए तो प्रतिक्रमण करने पड़ेंगे। वह भी शूट ऑन साइट होना चाहिए। मन से दोष हुए हों तो वह चला लेंगे। उसका हमारे पास इलाज है, उसका इस्तेमाल करके हम धो देंगे। वाणी से और काया से होगा तो नहीं चला सकते। पवित्रता आवश्यक है ही! दफाएँ तुझे अच्छी लगीं?

प्रश्नकर्ता : हाँ, अच्छी लगीं।

दादाश्री : तो लिखकर ले आना। अच्छी नहीं लगे तो नहीं। दफाएँ मंजूर नहीं हों तो अभी बंद रखना। जब एडमिशन लेने लायक हो जाए, तब करना।

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

हमारी मौजूदगी में बिल्कुल भी नींद नहीं आनी चाहिए, किसी को। कमी नहीं रहनी चाहिए। निरंतर विनय रहना चाहिए। मेरी मौजूदगी में कभी भी आँखें मिच जाएँ तो वह नहीं चलेगा और अपवित्रता तो बिल्कुल भी नहीं चलेगी, यहाँ बिल्कुल पवित्र पुरुषों का काम है। पवित्रता होगी तो वहाँ से भगवान जाएँगे नहीं!

मैंने सभी से कहा है, कि भई ऐसी पोल तो नहीं चलेगी। यह अनिश्चय है। इन आप्तपुत्रों ने शादी नहीं की लेकिन निश्चय है इसलिए आचरण मत बिगड़ने देना। हर एक जन बोलो, देखते हैं, कौन दृढ़ता से पालन करेगा? हर एक जन बोलो, खड़े होकर बोलो न!

जिसका आचरण बिगड़े, उसे तो डिस्मिस कर देना। क्रार लिखकर दिए हैं मुझे। नहीं चलेगी अपवित्रता, सूअर जैसा व्यवहार! सूअर और इसमें फर्क क्या रहा फिर? पवित्र लोग तैयार हुए हैं, जगत् का कल्याण करेंगे!

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सेफ साइड तक की बाड़

आवश्यकताएँ, ब्रह्मचर्य के साधक की

तुझे ब्रह्मचर्य की परख करना आता है? वह परख करना आ जाए तो काम का! सभी तरह से परख लेना चाहिए!

प्रश्नकर्ता : इसमें मुझे खुद को ऐसा लगता है, कि मेरा पुरुषार्थ बहुत मंद है।

दादाश्री : वह तो, वहाँ सभी के साथ रहेगा न, तब देखना पुरुषार्थ का योग! बाद में स्त्री को तो देखना तक अच्छा नहीं लगेगा। क्योंकि सत्संग में रहते हैं न वे सभी। फिर उस ओर के विचार ही नहीं आते!

प्रश्नकर्ता : उस संग का बहुत असर पड़ता है।

दादाश्री : फिर बहुत आसान हो जाता है। अभी तो संयोग नहीं हैं न? ये सारे विपरीत संयोग, कुसंग के और आज्ञा पालन करने की खुद की शक्ति नहीं है। दादा की आज्ञा पालन करेंगे तो कुछ भी बाधक नहीं होगा। यही है इसका उपाय, वहाँ सभी के साथ में रहेगा, तभी होगा। उसका और कोई उपाय नहीं है।

ब्रह्मचर्य पालन के लिए इतने कारण होने चाहिए। एक तो अपना यह 'ज्ञान' होना चाहिए, इसके अलावा इतनी आवश्यकता तो है ही कि ब्रह्मचारियों का समूह होना चाहिए। ब्रह्मचारियों की जगह शहर से जरा दूर होनी चाहिए और साथ ही पोषण होना

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पूर्व)

चाहिए। यानी ऐसे सारे 'कांजेज' होने चाहिए। ब्रह्मचारियों के समूह में रहे, तब तक वह प्रख्यात रहता है, लेकिन यदि अलग हो गया तो वह प्रख्यात नहीं रहेगा। फिर वह दूसरे ताल में आ जाता है न? ! समूह में रहे तब तो दूसरा विचार ही नहीं आता न? यही अपना संसार और यही अपना ध्येय! दूसरा विकल्प ही नहीं न! और अगर सुख चाहिए, तो वह तो अंदर अपार है, अपार सुख है!!

संग, कुसंग के परिणाम

प्रश्नकर्ता : ब्रह्मचर्य के लिए संगबल की जरूरत पड़ती है न?

दादाश्री : हाँ, जरूरत पड़ती है।

प्रश्नकर्ता : तो उसका मतलब ऐसा है कि मेरा निश्चय उतना कच्चा है?

दादाश्री : नहीं, संगबल की जरूरत तो है। भले ही कैसा भी ब्रह्मचारी हो, लेकिन कुसंग उसके लिए मात्र हानिकारक ही है। क्योंकि कुसंग का रंग यदि लग जाए तो वह हानि किए बगैर रहेगा ही नहीं।

प्रश्नकर्ता : इसका मतलब ऐसा हुआ कि कुसंग निश्चयबल को काट देता है?

दादाश्री : हाँ, निश्चयबल को काट देता है! अरे, इंसान में पूरा ही परिवर्तन कर देता है और सत्संग भी इंसान में परिवर्तन कर देता है। लेकिन एक बार जो कुसंग में चला गया हो, उसे सत्संग में लाना हो तो बहुत मुश्किल हो जाता है और सत्संगवाले को कुसंगी बनाना हो तो देर नहीं लगेगी। क्योंकि कुसंग वह फिसलनवाला है, नीचे जाना है जबकि सत्संग का मतलब चढ़ना है। कुसंगी को सत्संगी बनाना हो तो चढ़ना होता है, उसमें बहुत

सेफ साइड तक की बाड़ (खंड-2-११)

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देर लगती है और सत्संगी को कुसंगी बनाना हो तो तुरंत, एक कुसंगी परिचित मिल जाए तो तुरंत सबकुछ ठिकाने(!) पर ला देता है। इसलिए किसी पर विश्वास नहीं कर सकते। जो कोई अपना विश्वासपात्र हो, उसी के संग घूमना चाहिए।

कुसंग ही पोइजन है। कुसंग से तो बहुत दूर रहना चाहिए। कुसंग का असर मन पर होता है, बुद्धि पर होता है, चित्त पर होता है, अहंकार पर होता है, शरीर पर होता है। सिर्फ एक ही साल के कुसंग से होनेवाला असर तो पच्चीस-पच्चीस साल तक रहा करता है। यानी एक ही साल का कितना खराब फल आता है, फिर वह पछतावा करता रहे फिर भी छूट नहीं पाता और एक बार फिसलने के बाद और ज्यादा गहराई में उतरते जाता है और ठेठ तले तक उतार देता है। फिर अगर पछतावा करे, वापस लौटना चाहे फिर भी लौट नहीं सकता। अतः जिसका संग सुधरा, उसका सबकुछ सुधर गया और जिसका संग बिगड़ा, उसका सबकुछ बिगड़ गया। सब से बड़ा जोखिम कुसंग है। सत्संग में पड़े रहनेवाले को दिक्कत नहीं आती।

लशकर तैयार करके उतरो जंग में वीरो

प्रश्नकर्ता : जितनी भी गाँठें हैं, उनमें से विषय की गाँठ जरा ज्यादा परेशान करती है।

दादाश्री : कुछ गाँठें ज्यादा परेशान करती हैं। उसके लिए हमें लशकर तैयार रखना पड़ेगा। ये सभी गाँठें तो धीरे-धीरे एकजॉस्ट होती ही रहती हैं, घिसती ही रहती हैं, एक दिन वे सब इस्तेमाल हो ही जाएंगी न?!

पाकिस्तान का लशकर भले ही कभी भी हमला करे, उसके लिए अपने हिन्दुस्तान ने तैयारी रखी है या नहीं? वैसी तैयारी रखनी पड़ेगी।

प्रश्नकर्ता : इसीलिए ब्रह्मचारियों के संग में रहना है न?

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

दादाश्री : नहीं, तैयारी में सिर्फ़ इतना ही नहीं चलेगा। अभी तो ठेठ तक लश्कर रखना पड़ेगा।

प्रश्नकर्ता : संपूर्ण सेफ़ साइड कब होगी?

दादाश्री : संपूर्ण सेफ़ साइड कब होगी, उसका तो ठिकाना ही नहीं न! लेकिन पैंतीस साल के बाद ज़रा उसके दिन ढलने लगते हैं, इसलिए वह आपको बहुत परेशान नहीं करता। फिर आपके तय किए अनुसार चलता रहेगा, वह आपके विचारों के अधीन रहेगा। आपकी इच्छा नहीं बिगड़ेगी तो फिर आपको कोई नुकसान नहीं पहुँचाएगा। लेकिन पैंतीस साल तक तो बहुत ही जोखिम है!

प्रश्नकर्ता : पैंतीस साल तक सेफ़ साइड क्या है?

दादाश्री : वह तो अपना निश्चय! दृढ़ निश्चय और साथ में प्रतिक्रमण!

प्रश्नकर्ता : एक बार निश्चय दृढ़ हो जाए तो उसके बाद में क्या?

दादाश्री : बाद में निश्चय डगमगाए नहीं तो बहुत हो गया!

प्रश्नकर्ता : अभी हमारा निश्चय दृढ़ हो गया कहलाएगा?

दादाश्री : अभी नहीं माना जाएगा। अभी तो बहुत देर लगेगी। इसलिए अभी तो तुम्हें ब्रह्मचारियों के संग में ही रहना है। बाकी निर्भयपद है, ऐसा मान लेने जैसा नहीं है।

प्रश्नकर्ता : लश्कर मतलब क्या? प्रतिक्रमण?

दादाश्री : प्रतिक्रमण और दृढ़ निश्चय, यह सारा लश्कर रखना पड़ेगा और 'ज्ञानीपुरुष' के दर्शन। इस दर्शन से अलग हो जाओ तो भी गड़बड़ हो जाएगी। अतः सेफ़ साइड कोई आसान चीज़ नहीं है।

प्रश्नकर्ता : आपने कहा था कि ब्रह्मचारियों का संग, संसारियों

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से दूर और सत्संग की पुष्टि, इन तीन 'कॉजेज' का सेवन होगा तो सबकुछ हो जाएगा।

दादाश्री : यह सब निश्चय को हेल्प करता है और निश्चय मजबूत करना, वह अपने हाथ की बात है न!

सत्संग के परिचय में रहने से इंसान बिगड़ता नहीं है। कुसंग के परिचय से तो इंसान खत्म हो जाता है। अरे, कुसंग जरा सा भी छू जाए तो भी खत्म हो जाएगा। खीर में जरा सा भी नमक डाल दिया तो?

प्रश्नकर्ता : ऐसा आनंद तो कहीं भी देखा ही नहीं है। इसलिए कहीं भी जाने का मन नहीं करता। यहीं अच्छा लगता है।

दादाश्री : सिनेमा में आनंद मिलता होगा न?

प्रश्नकर्ता : लेकिन फिर बाहर निकलने पर वैसे के वैसे ही।

दादाश्री : हाँ, जैसा था वैसा ही वापस। अठारह रुपये खर्च हो गए और बल्कि परेशानी हो गई, तीन घंटे का टाइम खो दिया। मनुष्य जन्म के तीन घंटे कहीं बिगाड़े जाते होंगे?

प्रश्नकर्ता : तीन घंटे तो देखने में, लेकिन आगे-पीछे दूसरी तैयारी करने में भी समय जाता है न!

दादाश्री : हाँ, ऊपर से वह टाइम अलग। मैं लोगों से पूछता हूँ कि, 'चिंता होती है तब क्या करते हो?' तब कहते हैं कि, 'सिनेमा देखने चला जाता हूँ।' अरे, यह सही उपाय नहीं है। यह तो पेट्रोल डालकर अग्न को बुझाने जैसी बात है। यह जगत् पेट्रोल की अग्न से जल ही रहा है न? उसी तरह क्योंकि यह सूक्ष्म अग्न है इसलिए दिखाई नहीं देती, स्थूल में नहीं जलता।

कलियुग की हवा बहुत खराब है। यह तो ज्ञान की वजह से बच जाते हैं, वर्ना कलियुग की हवा का फटका ऐसा लगता है कि इंसान को खत्म कर दे।

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

इस बवंडर में तो फ्रैक्चर हो जाता है सबकुछ। इसलिए जितने हमें मिले उतने सभी बच गए। यह तो बवंडर है, प्रवाह है, उसमें टकराकर-कुटकर मरना है! दिन-रात जलन! कैसे जीते हैं, वही आश्चर्य है!

विषयी वातावरण से फैला व्यापार

प्रश्नकर्ता : ऑफिस में सभी और कुसंग बहुत ही है। वहाँ सब ऐसी विषय की और ऐसी ही बातें चलती रहती हैं, इसलिए उसकी रमणता चलती रहती है।

दादाश्री : यह जगत् अभी कुसंग रूपी ही है। इसलिए किसी के साथ खड़े रहना जैसा नहीं है, कहीं भी।

प्रश्नकर्ता : ऐसा होता है कि कब छूटेगा यह।

दादाश्री : या तो अकेले बैठे रहना, या फिर यहाँ आकर सत्संग में पड़े रहना। कभी भी कुसंग में खड़े रहने जैसा नहीं है।

प्रश्नकर्ता : लेकिन मुझे नौकरी का बिल्कुल भी शौक नहीं है।

दादाश्री : क्या करोगे नहीं जाओगे तो? बाहर का कुसंग छूना नहीं चाहिए, दादा का निदिध्यासन निरंतर रहना चाहिए। आँखें मीचकर दादा दिखें तो कुसंग छूएगा ही नहीं न! ऑफिस में कुसंग मिल जाता है, नहीं?

प्रश्नकर्ता : यानी हमें अच्छा नहीं लगता हो, ऐसा आए तब फिर संघर्ष होता है।

दादाश्री : संघर्ष होकर भी निकाल हो जाता है न? वह आता है न, 'और भी कोई हो तो आ जाओ, मुझे तो निकाल कर देना है', कहना, घबराना नहीं। जहाँ मानसिक संघर्ष है, वहाँ उसमें देर ही कितनी लगेगी? देह का संघर्ष नहीं होना चाहिए। मानसिक संघर्ष में हर्ज नहीं, उसका निकाल आ जाएगा।

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नहीं सुननी चाहिए विषयी वाणी

विषय-विकारवाली जो वाणी सुनता तक नहीं है, खुद बोलता भी नहीं है, विषय की वैसी बातें सुने तो मन में क्या होगा?

प्रश्नकर्ता : मन बिगड़ेगा।

दादाश्री : अतः ऐसी वाणी खुद बोलनी भी नहीं चाहिए, कोई बोल रहा हो तो सुननी भी नहीं चाहिए। यह वाणी महाभारत नहीं है कि सुनने जैसी हो।

प्रश्नकर्ता : ऑफिस में बैठे हों, तब मजबूरन वह सुननी पड़े तो?

दादाश्री : तो तुम पर असर न हो, ऐसा करना। तुम्हें इन्टरेस्ट हो तभी सुनाई देगा, वरना सुनाई नहीं देगा। अपना इन्टरेस्ट नहीं होगा तो कान सुनेंगे लेकिन तुम्हें नहीं सुनाई देगा!

प्रश्नकर्ता : उपयोग में कमी होगी, इसलिए ऐसा होता है?

दादाश्री : उपयोग में तो पूरी ही कमी है। यदि उपयोग होगा तो वह नहीं रहेगा और वह होगा तो उपयोग नहीं रहेगा!

प्रश्नकर्ता : वह आपने कहा था न कि छः महीने तक विचार आएँ कि 'शादी करनी है, शादी करनी है।' फिर भी अपने निश्चय में खुद स्थिर रहे तब तो पार निकल जाएँगे।

दादाश्री : वह खत्म हो जाएगा। निश्चय मजबूत होना चाहिए। निश्चय ढीला नहीं होना चाहिए।

प्रश्नकर्ता : फिर सर्विस में ये सारे जो कुसंग मिलते हैं। उनका निकाल कर देना है। आपने जो वह कहा है, तो उसमें क्या करना है? वह निकाल कैसे करना है?

दादाश्री : अपनी आज्ञा का पालन करके, प्रतिक्रमण से निकाल कर देना है। जिसे निकाल करना है, उसका निकाल हो

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जाएगा और जिसे लड़ना है, वह लड़ेगा और जिसे निकाल करना है, वह निकाल कर देगा। तेरी इच्छा तो निकाल करने की है न? कैसा भी हो फिर भी?

प्रश्नकर्ता : ऑफिस में सहकर्मी मुझसे पूछते हैं कि लड़की देखने पर तुझ पर कुछ असर होता है या नहीं?

दादाश्री : फिर?

प्रश्नकर्ता : फिर मैं कहता हूँ कि लड़की देखता हूँ तो आकर्षण होता है। लेकिन शादी नहीं करनेवाला, ऐसा नहीं कहता। वना वे लोग मजाक करेंगे कि तू लड़की देखता है और तुझ पर कुछ असर नहीं होता तो तुझ में कोई दम ही नहीं है। ऐसा सब तय कर लेते हैं, वे लोग। फिर उसका प्रचार करते हैं, इसलिए फिर कहता हूँ कि मुझे आकर्षण होता है।

दादाश्री : ऐसे झूठ नहीं बोलना है। दम उसी को कहते हैं कि जिसे आकर्षण नहीं हो, बल्कि बिना दमवाले को ही अधिक आकर्षण होता है। 'मुझे नहीं होता, मुझे तो छूता तक नहीं।' कहना। इसलिए हम कहते हैं न कि भाई, ये आप्तपुत्र एक जगह बस जाएंगे तो फिर ऐसी बातें सुनने को ही नहीं मिलेगी। पोइज़न नहीं चढ़ेगा।

समभावियों का समूह

यह बाहर का जो परिचय है, वह उल्टा परिचय है और अभी तक ज्ञानियों से पूरा परिचय नहीं हुआ है। यदि परिचय हुआ होता तो ऐसा नहीं होता। इसलिए ज्ञानियों के पास पढ़े रहना है। बाहर के परिचय से ही तो यह सारी मार खाई है न?! बाहर के परिचय से सबकुछ बिगड़ता ही रहता है, बहुत बिगड़ता है। यदि ब्रह्मचर्य पालन करना हो तो बाहर का परिचय भी रखे और ब्रह्मचर्य का पालन कर सके, ये दोनों एक साथ नहीं हो सकते! वह तो पूरा समूह होना चाहिए, अलग निवास स्थान होना चाहिए,

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वहाँ साथ में बैठकर बातचीत करें, सत्संग करें, थोड़ीदेर आनंद करें। उनकी दुनिया ही नई! इसके लिए तो ब्रह्मचारी साथ में रहने चाहिए। सब साथ में नहीं रहें और घर पर रहें तो परेशानी! ब्रह्मचारियों के संग के बिना ब्रह्मचर्य का पालन नहीं किया जा सकता। ब्रह्मचारियों का समूह होना चाहिए और वह भी पंद्रह-बीस लोगों का होना चाहिए। सभी साथ में रहेंगे तो दिक्कत नहीं आएगी। दो-तीन लोगों का काम नहीं है। पंद्रह-बीस होंगे तो उनकी तो हवा ही लगती रहेगी। हवा से ही सारा वातावरण उच्च प्रकार का रहेगा, वर्ना ब्रह्मचर्य पालन करना आसान नहीं है।

हम थोड़े ही कहीं वंश चलाने आए हैं? क्या राज्य स्थापित करने आए हैं? यह तो हम निकाल करने के लिए आए हैं, लेकिन यह तो बीच में नया आइटम निकल आया! तो ऐसा भी नहीं कह सकते कि तू ब्रह्मचर्य का पालन मत करना और हाँ भी नहीं कह सकते कि तू पालन करना। कर्म के उदय होंगे तो पालन कर भी सकता है और पालन कर सके तो फिर उसे अपने से मना भी नहीं किया जा सकता। ब्रह्मचर्य रहे तो लोगों का कल्याण करने में फिर निमित्त बन सकेगा!

ब्रह्मचर्य के लिए पिछले जन्म में कुछ निश्चय किया होगा, तभी तो इस जन्म में निश्चय करने का विचार आता है, वर्ना वह विचार ही नहीं आ सकता। बाकी देखा-देखी से किया जानेवाला काम का नहीं है। स्वाभाविक होना चाहिए। संग एक ही प्रकार का होना चाहिए। दूसरा संग नहीं घुसना चाहिए। दूध तो दूध और दही तो दही, और दूध और दही पास-पास रखे हों, तो भी दूध फट जाता है। फिर चाय नहीं बन सकेगी।

संगबल की सहायता, ब्रह्मचर्य के लिए

प्रश्नकर्ता : संग का इतना अधिक महत्व क्यों है?

दादाश्री : संग पर ही तो आधारित है।

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प्रश्नकर्ता : इतने सारे लोग इकट्ठा हो रहे हैं, तो संगबल बढ़ा है तो उससे परिणती भी बढ़ती जाएगी, ऐसा है?

दादाश्री : हाँ, जैसे-जैसे संगबल बढ़ता है, वैसे-वैसे परिणती बढ़ती है। अभी तीन ही सत्संगी हों तो कम परिणती रहती हैं, पाँच हों तो पाँच जितनी रहती हैं और हजार हों तो फिर कोई विचार ही नहीं आता। सभी का आमने-सामने इफेक्ट पड़ता है। अभी ब्रह्मचर्य रह पाता है, वह भी आपका पुण्य है और जब पुण्य बदले तब पुरुषार्थ की जरूरत है! इस वजह से समूह में रहना है। समूह में एक-दूसरे के विचारों का असर होता है! ब्रह्मचर्य का पालन करना आसान नहीं है, उसमें कुदरत का साथ चाहिए। अपना पुण्य और पुरुषार्थ चाहिए। फिर अंदर आनंद उत्पन्न होगा और वह भी आप सब साथ में रहोगे तब होगा। क्योंकि आमने-सामने असर होता है। पचास ब्रह्मचारियों के साथ पाँच नालायक लोगों को रख दें तो क्या होगा? दूध फट जाएगा।

दादा तो तैयार ही हैं, आप सब के निश्चय की जरूरत है। सबका हल आ जाएगा। अभी ठोकरे खा रहे हो, वह भी अच्छा है, क्योंकि अगर पहले अनुभव हो चुका हो तो बाद में आप देखोगे ही नहीं, लेकिन इस ओर का अनुभव नहीं हुआ हो तो फिर कच्चा पड़ जाता है। दीक्षा लेने के बाद कच्चा पड़े तो बल्कि बदनाम होगा और फिर उसे निकाल देंगे वहाँ से!

प्रश्नकर्ता : वह तो बहुत बड़ी जोखिमदारी कहलाएगी।

दादाश्री : जोखिमदारी ही है न! वहाँ से सब निकाल ही देंगे। फिर न रहे घर का और न रहे घाट का! इससे अच्छा अभी यहाँ गलती हुई होगी वह चला लेंगे, लेकिन बाद में वहाँ तो गलती होनी ही नहीं चाहिए। तुझे ठोकरें खाने को मिलती है या नहीं?

प्रश्नकर्ता : वे ठोकरें भी खाने जैसी नहीं है।

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दादाश्री : खाने जैसी नहीं हैं, लेकिन खा जाते हैं न! लेकिन वहाँ पर अगर ठोकरें खाओगे, वहाँ 'ब्रह्मचर्य आश्रम' में रहना हुआ, वहाँ पर अगर कुछ भूल-चूक हुई तो सब मिलकर निकाल ही देंगे। इसलिए पहले से संभलकर चलना, फिर भी अगर ठोकर खाएँ, तो याद रखना।

चारित्र से संबंधित शिकायत नहीं आनी चाहिए! जहाँ चारित्र से संबंधित शिकायत आए, वहाँ धर्म है ही नहीं। यह तो पूरी दुनिया कबूल करती है। चारित्र से संबंधित गड़बड़ नहीं होनी चाहिए वहाँ। यदि और कोई भूल-चूक होगी तो चला लेंगे, लेकिन चारित्र से संबंधित गड़बड़ तो चला ही नहीं सकते। चारित्र तो मुख्य आधार है। धर्म में तो विषय जैसा शब्द ही नहीं होता। धर्म हमेशा विषय के विरुद्ध ही होता है।

आप इस ब्रह्मचर्य को संभालोगे न?

प्रश्नकर्ता : हाँ दादा, संभालेंगे।

दादाश्री : मैं सभी से यही कहता हूँ कि आपको निश्चय मजबूत करना चाहिए। अपना यह ऐसा है कि 'ज्ञान' पार उतार दे, बाकी अगर 'ज्ञान' नहीं हो तो पार ही नहीं उतरे। 'ज्ञान' के आधार पर, 'ज्ञान' की वजह से आपको शांति रहती है, आनंद रहता है। आप ज्ञान में रहो तो आप विषय का दुःख भूल जाओगे।

अपना ज्ञान इतना अच्छा है कि विषय बगैर रहा जा सकता है, क्रमिकमार्ग में तो स्त्री को देख भी नहीं सकते, छू नहीं सकते, सारा खाना एक साथ मिलाकर खाना पड़ता है, ऐसे तरह-तरह के नियम होते हैं। ब्रह्मचर्य तो ऐसा होता है कि यों चेहरा देखकर ही लोग प्रभावित हो जाएँ, ब्रह्मचारी पुरुष तो ऐसे दिखने चाहिए!

[ १२ ]

तितिक्षा के तप से गढ़ो मन-देह

सीखो पाठ तितिक्षा के

तितिक्षा क्या है?

घास या चारे में सो जाना पड़े, तब कंकर चुभें, उस समय याद आए कि, 'अरे! घर पर कितना अच्छा था।' तो वह तितिक्षा नहीं कहलाती। कंकर चुभें तब ऐसा लगना चाहिए कि यह अच्छा है। यह तो मैंने आपको सिर्फ़ सोने की ही बात बताई, बाकी जब वैसे संयोग आ जाएँ, तब क्या करना पड़ेगा? यानी हर एक चीज़ में ऐसा होना चाहिए। सहन नहीं हो, वैसी सख्त ठंड में ओढ़े बिना सोना पड़े तब क्या करोगे? आपने तो ऐसी प्रैक्टिस नहीं की होगी। मैंने तो पहले ऐसी बहुत प्रैक्टिस की थी। लेकिन अब तो इतने सरल संयोग इकट्ठा हो गए हैं कि बल्कि मेरा तितिक्षा गुण कम हो गया है। वर्ना मैंने तो सभी तितिक्षा गुण विकसित किए थे। इन जैनों ने बाईस प्रकार के परिषद् सहन करने को कहा है। अतः यह सब समझने की जरूरत है। इसलिए अब आप शरीर के लिए तितिक्षा गुण विकसित करो ताकि इस शरीर को कठिनाईयों की प्रैक्टिस हो जाए! खाने में जो मिले उसमें आश्चर्य नहीं हो कि 'ऐसा? यह तो कैसे भाएगा?' वैसा ही सदी-गर्मी सभी में रहना चाहिए।

रात को दो बजे आपको कोई उठा ले जाए और फिर जाकर आपको स्मशान में रख दे तो आपकी क्या दशा होगी? एक और चिंता सुलग रही हो और दूसरी ओर हड़िड़यों में से फोस्फोरस

तितिक्षा के तप से गढ़ो मन-देह (खंड-2-१२)

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के थड़ाके हो रहे हों तो उस समय आपको अंदर क्या होगा?

प्रश्नकर्ता : ऐसा सोचा ही नहीं है!

दादाश्री : ऐसा सोचा ही नहीं?

प्रश्नकर्ता : हमें वस्तु(आत्मा) की समझ नहीं है, इसलिए अनुभव नहीं हो पाता। निरंतर वैसा अनुभव नहीं रह पाता?

दादाश्री : आपको तो इसकी समझ ही नहीं है न! यह तो आपको अंदर ठंडक अपने आप रहे तभी तक ठीक रहता है, लेकिन उसे गायब होने में तो देर ही नहीं लगेगी न! इन लड़कों को कुछ समझ ही नहीं है न! उन्हें अगर कोई कहेगा कि 'बच्चे, ले यह बिस्किट', तो वह बिस्किट देकर हीरा ले लेगा। तो इनकी समझ कैसी है? वस्तु की कीमत ही नहीं है न! फिर भी ये लड़के पुण्यशाली जरूर हैं, लेकिन हैं बालक। ये सभी व्रत लेनेवाले तो बालक जैसे हैं। थोड़ा सा भी दुःख आए तो यह सबकुछ दाव पर लगा दें! किसी भी प्रकार के दुःख पर ध्यान नहीं दे, तब जाकर यह व्रत रह पाएगा। मेरी आज्ञा में पूरी तरह से रहे, तब यह व्रत रह पाएगा!

प्रश्नकर्ता : आप तितिक्षा गुण कह रहे थे कि किसी भी अवस्था में दुःख सहन करना, ऐसा?

दादाश्री : इन लोगों ने कोई दुःख देखा ही नहीं है। दुःख देखना पड़े, उससे पहले तो इन लोगों का आत्मा ही निकल जाए। फिर भी ऐसे करते-करते इन लड़कों का अगर पोषण हो जाए और ऐसे दस-बीस साल बीत जाएँ तो फिर उन्हें समझ में आ जाएगा सबकुछ और जड़ें डाल देंगे। बाकी ये सब तो कमजोर इंसान कहलाते हैं।

प्रश्नकर्ता : यों तो सभी स्ट्रोंग लगते हैं।

दादाश्री : कौन? ये? नहीं, वह तो ऐसा लगता है आपको।

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

लेकिन ये तो सभी कमजोर! ये तो तुरंत सबकुछ छोड़ दें। स्ट्रोंग तो, कुछ भी हो जाए, मौत आ जाए फिर भी आत्मा मेरा है और दादा की आज्ञा छोड़ूँगा ही नहीं, उसे स्ट्रोंग कहते हैं। जो आना हो वह आओ, कहना! अब इन लड़कों की बिसात ही क्या? इनमें तितिक्षा नामक गुण का विकास ही नहीं हुआ है न?

प्रश्नकर्ता : आपको पैर में फ्रैक्चर हुआ था, जॉन्डिस हुआ था, ऐसे सारे कष्ट एक साथ आ गए। एक ही स्थान पर, एक ही पॉजिशन में चार महीनों तक बैठे रहना, तो ये सब टेस्ट एक्ज़ामिनेशन कहलाएगा न?

दादाश्री : यह तो कष्ट था ही नहीं, इसे कष्ट नहीं कह सकते।

प्रश्नकर्ता : आपको नहीं लगता?

दादाश्री : नहीं, बाकी औरों के लिए भी कष्ट नहीं माना जाएगा। इसे कहीं कष्ट माना जाता होगा? अरे, कष्ट तो तुमने देखा ही नहीं हैं। ब्रह्मचारी जी पत्थर पर खड़े रहकर जो तप करते थे, यदि उन्हें देखा होता तो आपको मन में ऐसा लगता कि ऐसा तो अपने से एक दिन के लिए भी नहीं हो सकता। मुझे भी ऐसा लगता था न, कि ये प्रभु श्री के शिष्य ब्रह्मचारी जी ऐसा करते हैं तो प्रभु श्री कितना करते होंगे? और कृपालुदेव तो न जाने कितना करते होंगे! लोग उनके ऊपर से मच्छर उड़ा जाते और कुछ ओढ़ाकर जाते तो वे खुद ओढ़ने का निकाल देते और आराम से मच्छरों को काटने देते थे! सिर्फ आत्मा ही प्राप्त करना है, ऐसा ध्येय लेकर बैठे थे। अब इन्हें यह पुण्य से मुफ्त में प्राप्त हो गया है, बाकी तितिक्षा होनी चाहिए।

प्रश्नकर्ता : उन लोगों ने तो, क्रमिकमार्ग था इसलिए त्याग किया था। अपने अक्रम मार्ग में तितिक्षा करनी हो तो क्या करना चाहिए?

तितिक्षा के तप से गद्गो मन-देह (खं-2-१२)

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दादाश्री : अपने यहाँ त्याग करने की जरूरत नहीं है। जिसने आत्मा प्राप्त कर लिया है उन्हें कभी-कभी ऐसे संयोग मिल जाते हैं। उस समय यदि वह स्ट्रोंग रहा तो रहा, बर्ना घबरा जाएगा। इसलिए पहले से ही तैयारी रखनी चाहिए।

प्रश्नकर्ता : ये लड़के अभी जिस सुख के सराउन्डिंग में जी रहे हैं, उस सुख में से उन्हें उठाकर कोई स्मशान में रख आए तो वह दुःख ज्यादा ही लगेगा न?

दादाश्री : क्यों स्मशान में? वहाँ क्या दुःख है?

प्रश्नकर्ता : वह ठीक है, लेकिन अमावस की रात में अंधेरे में कभी भी गया नहीं हो और वहाँ उल्लू बोले तो...

दादाश्री : हाँ, उल्लू तो क्या? लेकिन एक कौआ उड़े तो भी घबरा जाएगा। इसलिए इन लोगों को समतापूर्वक दुःख सहन करना चाहिए। जो कुछ भी करो, वह मुझसे पूछकर करना। अभी तो इन लोगों में इतना सा दुःख सहन करने की भी शक्ति नहीं है। पुलिसवाला मारे और कहे कि, 'आप पलटते हो या नहीं?' तो ये लोग पलट जाएंगे, आत्मा वगैरह सबकुछ छोड़ देंगे। जबकि क्रमिक-मार्गवालों को घानी में पीलें फिर भी कोई आत्मा नहीं छोड़ेगा। तितिक्षा, यह जैनों का शब्द नहीं है, यह वेदांतियों का शब्द है।

विकसित होता है मनोबल, तितिक्षा से

प्रश्नकर्ता : हमें यह तितिक्षा विकसित करनी पड़ेगी न?

दादाश्री : अब अगर यह गुण डेवेलप करने जाए तो आत्मा खो देगा। इसलिए जब आपके जाने का समय आ जाए, फिर भी आत्मा को मत छोड़ना, अंदर सिर्फ़ इतना रखना। देह अगर छूट जाएगी, तो देह तो वापस मिल जाएगी, लेकिन आत्मा वापस नहीं मिलेगा।

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

प्रश्नकर्ता : जैसे जैसे काल बदलता जा रहा है, वैसे वैसे दुःख सहन करने की शक्ति भी कम होती जा रही है न?

दादाश्री : ऐसा नहीं है। दुःख से काल को कुछ लेना देना नहीं है। उसके लिए तो मनोबल चाहिए। हमें देखने से बहुत मनोबल उत्पन्न होता है और मनोबल होगा तभी काम होगा। कैसे भी दुःख हों, फिर भी मनोबलवाला इंसान उन्हें पार कर देता है। 'अब, मेरा क्या होगा?' ऐसा वह नहीं बोलेंगा।

स्मशान में जाएँ और अगर वहाँ आग देखें तो ये लोग काँप जाते हैं। क्या वहाँ कोई खा जानेवाला है? अरे, क्या आत्मा को खा जानेवाला है? खा जाएगा तो देह को खा जाएगा। वहाँ स्मशान में कुछ नहीं है। सिर्फ अपने मन की कमजोरियाँ हैं। हाँ, दो दिन प्रैक्टिस करनी पड़ेगी। बाकी, इनकी ऐसी वैसी परीक्षा नहीं ले सकते। नहीं तो फिर बुखार उतरेगा ही नहीं। डॉक्टरों से भी नहीं उतर पाएगा। इसे घबराहट का बुखार कहते हैं। घबराहट का बुखार तो हमारे बहुत विधियाँ करने पर ही उतरता है। इससे अच्छा सोए रहना न घर पर चुपचाप, देख लेंगे आगे।

इन वेदांतियों ने तितिक्षा गुण को विकसित करने को कहा है, जैनों ने बाईस परिपह सहन करने को कहा है। भूख लगे, प्यास लगे, अंदर कलपने लगे इस तरह जो कुछ भी हो उन सब को समताभाव से सहन करना सीखो। प्यास तो इन लोगों ने देखी ही नहीं है। जंगल में गए हों और पानी नहीं मिले, उसे प्यास कहते हैं। वह भूख-प्यास हमने देखी है। कॉन्ट्रैक्ट के काम में जंगल में और सभी जगह गए हैं, तब देखी थी। और फिर बर्फ गिरे ऐसी ठंड सहन नहीं हो पाती थी, सख्त धूप होती थी, यहाँ शहर में होती है, ऐसी नहीं! बम गिर रहे हों, तब मनोबल का पता चलता है! मनोबलवाले को देखने से मनोबल उत्पन्न होता है। लेकिन जगत् ने, जीव ने मनोबल देखा ही नहीं है! हमारे में तो गजब का मनोबल है। लेकिन अगर वह देखे

तितिक्षा के तप से गद्गो मन-देह (खंड-2-१२)

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न(निरिक्षण करे), जितना वह देखेगा, उतनी ही उसमें शक्ति आएगी। मैं उस रूप हो गया हूँ और आप धीरे-धीरे उस रूप होते जा रहे हो। तो एक दिन उस रूप हो जाओगे। लेकिन आपको छोटा रास्ता मिल गया है और मुझे तो बहुत लंबा रास्ता मिला था। मैं त्याग और तितिक्षा कर-करके आया हूँ। तितिक्षा तो बेहिसाब की है। एक दिन चटाई पर सो जाना, एक दिन दो गद्गों पर सो जाना। यदि चटाई पर आदत पड़ जाए तो दो गद्गों पर नींद नहीं आए और गद्गों पर आदत पड़ जाए तो चटाई पर नींद नहीं आए!

प्रश्नकर्ता : हमें भी आपकी तरह त्याग और तितिक्षा में से गुजरना पड़ेगा?

दादाश्री : नहीं, आपको ऐसा कुछ रहा नहीं न! आपको तो ऐसे ही 'फ्री ऑफ कॉस्ट' मिला है। इसलिए आपकी गाड़ी तो चलती रहेगी। आपके पुण्य तो बहुत ज्यादा है न!

उपवास-उणोदरी मात्र 'जागृति' हेतु

मैंने पूरी ज़िंदगी में एक भी उपवास नहीं किया! हाँ, चोविहार (सूर्यास्त से पहले भोजन करना) किए हैं, बाकी कुछ भी नहीं किया। मेरी प्रकृति पित्तवाली इसलिए एक भी उपवास नहीं हो पाता। अब हमें इसकी जरूरत क्या है? हम आत्मा हो चुके हैं!! अब यह सब पराया, पराए देश का और फॉरिन डिपार्टमेंट में हमें इतना क्या झंझट? यह तो जिसे ब्रह्मचर्य व्रत लेना है, उसे यह झंझट करना है। वनाँ अपने 'पाँच वाक्यों' में तो सबकुछ आ जाता है। ये पाँच वाक्य ऐसे हैं कि इनसे निरंतर संयम परिणाम रह सकता है। लोग जो संयम रखते हैं, वह संयम माना ही नहीं जाएगा। उसे व्यवहार संयम कहते हैं, जिसे कि व्यवहार में लोग देख सकते हैं! जबकि अपना तो वास्तव में संयम है। लेकिन लोग ऐसा नहीं कहेंगे कि आपको संयम है। क्योंकि आपका निश्चय संयम है। निश्चय संयम, वह मोक्ष का कारण है और व्यवहार संयम, वह संसार का कारण है, संसार में ऊँची पुण्य बंधवाता है।