समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य
Samaj Se Prapt Brahmacharya
दादा भगवान द्वारा
स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)
प्रकाशक : अजीत सी. पटेल दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', 5, ममतापार्क सोसाइटी, नवगुजरात कॉलेज के पीछे, उस्मानपुरा, अहमदाबाद - ३८००१४, गुजरात फोन - (०७९) ३९८३०१००
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प्रथम संस्करण : प्रतियाँ २,००० दिसम्बर, २०१४
भाव मूल्य : 'परम विनय' और 'मैं कुछ भी जानता नहीं', यह भाव!
द्रव्य मूल्य : १०० रुपये
मुद्रक : अंबा ओफसेट पार्श्वनाथ चैम्बर्स, नई रिजर्व बैंक के पास, उस्मानपुरा, अहमदाबाद-३८० ०१४. फोन : (०७९) २७५४२९६४
त्रिमंत्र
नमो अरिहंताणं नमो सिद्धाणं नमो आयरियाणं नमो उवज्झायाणं नमो लोए सव्वसाहूणं एसो पंच नमुक्कारो, सव्व पावप्पणासणो मंगलाणं च सव्वेसिं, पढमं हवइ मंगलम् १ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय २ ॐ नमः शिवाय ३ जय सच्चिदानंद
समर्पण
विकराल विषयागिन में दिन-रात जलते; अरे रे! अवदशा फिर भी उसी में विचरते!
संसार के परिभ्रमण को सहर्ष स्वीकारते; और परिणाम स्वरूप दुःख अनंत भुगतते!
दावा क्रारी, मिश्रचेतन-संग चुकाते; अनंत आत्मसुख को विषय भोग से विमुखते!
विषय अज्ञान टले, ज्ञानी से 'ज्ञान' मिलते ही; 'दृष्टि' निर्मलता की कुंजियाँ मिलते ही!
'मोक्षगामी' के लिए - ब्रह्मचारी या विवाहित; शील की समझ से मोक्ष पद करवाते प्राप्त!
अहो! निर्ग्रंथज्ञानी की वाणी की अद्भुतता; अनुभवी वचन निर्ग्रंथ पद तक पहुँचाता!
मोक्ष पथ पर विचरते 'शील पद' की भावना करते; वीतराग चारित्र के बीज-अंकुर विकसित करते!
अहो! ब्रह्मचर्य की साधना के लिए निकली; आंतर बाह्य उलझनों के सत् हल बताती!
ज्ञान वाणी का यह संकलन, 'समझ ब्रह्मचर्य' की है देता; आत्मकल्याणार्थ 'यह', महाग्रंथ जगचरण समर्पिता!
‘दादा भगवान’ कौन ?
जून १९५८ की एक संध्या का करीब छः बजे का समय, भीड़ से भरा सूरत शहर का रेल्वे स्टेशन, प्लेटफार्म नं. 3 की बेंच पर बैठे श्री अंबालाल मूलजीभाई पटेल रुपी देहमंदिर में कुदरती रूप से, अक्रम रूप में, कई जन्मों से व्यक्त होने के लिए आतुर ‘दादा भगवान’ पूर्ण रूप से प्रकट हुए। और कुदरत ने सर्जित किया अध्यात्म का अद्भुत आश्चर्य। एक घंटे में उन्हें विश्वदर्शन हुआ। ‘मैं कौन ? भगवान कौन ? जगत् कौन चलाता है ? कर्म क्या ? मुक्ति क्या ?’ इत्यादि जगत् के सारे आध्यात्मिक प्रश्नों के संपूर्ण रहस्य प्रकट हुए। इस तरह कुदरत ने विश्व के सम्मुख एक अद्वितीय पूर्ण दर्शन प्रस्तुत किया और उसके माध्यम बने श्री अंबालाल मूलजीभाई पटेल, गुजरात के चरोतर क्षेत्र के भादरण गाँव के पाटीदार, कॉन्ट्रैक्ट का व्यवसाय करनेवाले, फिर भी पूर्णतया वीतराग पुरुष !
‘व्यापार में धर्म होना चाहिए, धर्म में व्यापार नहीं’, इस सिद्धांत से उन्होंने पूरा जीवन बिताया। जीवन में कभी भी उन्होंने किसी के पास से पैसा नहीं लिया, बल्कि अपनी कमाई से भक्तों को यात्रा करवाते थे।
उन्हें प्राप्ति हुई, उसी प्रकार केवल दो ही घंटों में अन्य मुमुक्षु जनों को भी वे आत्मज्ञान की प्राप्ति करवाते थे, उनके अद्भुत सिद्ध हुए ज्ञानप्रयोग से। उसे अक्रम मार्ग कहा। अक्रम, अर्थात् बिना क्रम के, और क्रम अर्थात् सीढ़ी दर सीढ़ी, क्रमानुसार ऊपर चढ़ना। अक्रम अर्थात् लिफ्ट मार्ग, शॉर्ट कट
वे स्वयं प्रत्येक को ‘दादा भगवान कौन ?’ का रहस्य बताते हुए कहते थे कि “यह जो आपको दिखते हैं वे दादा भगवान नहीं हैं, वे तो ‘ए.एम.पटेल’ हैं। हम ज्ञानीपुरुष हैं और भीतर प्रकट हुए हैं, वे ‘दादा भगवान’ हैं। दादा भगवान तो चौदह लोक के नाथ हैं। वे आप में भी हैं, सभी में हैं। आपमें अव्यक्त रूप में रहे हुए हैं और ‘यहाँ’ हमारे भीतर संपूर्ण रूप से व्यक्त हुए हैं। दादा भगवान को मैं भी नमस्कार करता हूँ।”
निवेदन
आत्मविज्ञानी श्री अंबालाल मूलजीभाई पटेल, जिन्हें लोग 'दादा भगवान' के नाम से भी जानते हैं, उनके श्रीमुख से अध्यात्म तथा व्यवहार ज्ञान संबंधी जो वाणी निकली, उसको रिकॉर्ड करके, संकलन तथा संपादन करके पुस्तकों के रूप में प्रकाशित किया जाता हैं।
ज्ञानी पुरुष संपूज्य दादा भगवान के श्रीमुख से अध्यात्म तथा व्यवहारज्ञान संबंधी विभिन्न विषयों पर निकली सरस्वती का अद्भुत संकलन इस आप्तवाणी में हुआ है, जो नये पाठकों के लिए वरदानरूप साबित होगी।
प्रस्तुत अनुवाद में यह विशेष ध्यान रखा गया है कि वाचक को दादाजी की ही वाणी सुनी जा रही है, ऐसा अनुभव हो, जिसके कारण शायद कुछ जगहों पर अनुवाद की वाक्य रचना हिन्दी व्यकरण के अनुसार त्रुटिपूर्ण लग सकती है, परन्तु यहाँ पर आशय को समझकर पढ़ा जाए तो अधिक लाभकारी होगा।
ज्ञानी की वाणी को हिन्दी भाषा में यथार्थ रूप से अनुवादित करने का प्रयत्न किया गया है किन्तु दादाश्री के आत्मज्ञान का सही आशय, ज्यों का त्यों तो, आपको गुजराती भाषा में ही अवगत होगा। जिन्हें ज्ञान की गहराई में जाना हो, ज्ञान का सही मर्म समझना हो, वह इस हेतु गुजराती भाषा सीखें, ऐसा हमारा अनुरोध है।
प्रस्तुत पुस्तक में कई जगहों पर कोष्ठक में दर्शाये गये शब्द या वाक्य परम पूज्य दादाश्री द्वारा बोले गये वाक्यों को अधिक स्पष्टतापूर्वक समझाने के लिए लिखे गये हैं। जबकि कुछ जगहों पर अंग्रेजी शब्दों के हिन्दी अर्थ के रूप में रखे गये हैं। दादाश्री के श्रीमुख से निकले कुछ गुजराती शब्द ज्यों के त्यों रखे गये हैं, क्योंकि उन शब्दों के लिए हिन्दी में ऐसा कोई शब्द नहीं है, जो उसका पूर्ण अर्थ दे सके। हालाँकि उन शब्दों के समानार्थी शब्द अर्थ के रूप में कोष्ठक में और पुस्तक के अंत में भी दिये गये हैं।
अनुवाद संबंधी कमियों के लिए आपसे क्षमाप्रार्थी हैं।
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संपादकीय
जीवन के जोखिमों को तो जान लिया, लेकिन अनंत जन्मों के जोखिमों की जो जड़ है, उसे जिसने जाना है तभी वह उसमें से छुटकारा पा सकता है! और वह जड़ है विषय की!
इस विषय में तो कैसी भयंकर परवशता सर्जित होती है? पूरी जिंदगी इसमें किसी का गुलाम बनकर रहना पड़ता है! कैसे चलेगा? वाणी और वर्तन इतना ही नहीं, लेकिन उसके मन को भी दिन-रात संभालते रहना पड़ता है! इसके बावजूद हाथ में क्या आएगा?! संसार की निरी परवशता, परवशता और परवशता! खुद पूरे ब्रह्मांड का मालिक बनकर संपूर्ण स्वतंत्र पद में आ सके, ऐसी क्षमता रखनेवाला विषय में डूबकर परवश बन जाता है। यह तो कैसी करुणाजनक स्थिति!
विषय की वजह से जलन का कारण विषय के प्रति घोर आसक्ति है और सर्व आसक्ति का आधार विषय के वास्तविक स्वरूप की ‘अज्ञानता’ है। ‘ज्ञानीपुरुष’ के बिना यह अज्ञानता कैसे दूर होगी?!
जब तक विषय की मूर्च्छा में बरतता है, तब तक जीव के अधोगमन या ऊर्ध्वगमन का थर्मामीटर यदि आंकना हो तो वह उसकी विषय के प्रति क्रमशः रुचि या फिर अरुचि है! लेकिन जिसे संसार के सभी बंधनों से मुक्त होना है, वह यदि सिर्फ विषय बंधन से मुक्त हो गया तो सर्व बंधन आसानी से छूट जाते हैं! संपूर्ण ब्रह्मचर्य पालन से ही विषयासक्ति की जड़ निर्मूल हो जाए, ऐसा है।
यथार्थ ब्रह्मचर्य पालन करने में, उसकी शुद्धता को संपूर्ण रूप से सार्थक करने के लिए ‘ज्ञानीपुरुष’ के आश्रय में रह कर एक जन्म बीत जाए तो वह अनंत जन्मों की भटकन का अंत ला दे, ऐसा है!! इसमें यदि कोई अनिवार्य कारण है तो वह है खुद का ब्रह्मचर्य पालन करने का दृढ़ निश्चय। उसके लिए ब्रह्मचर्य के निश्चय को तोड़नेवाले हर एक विचार को पकड़कर उसे जड़ से उखाड़ते रहना है। निश्चय का छेदन करनेवाले विचार, जैसे कि ‘विषय के बिना रहा जा सकेगा या नहीं? मेरे सुख का क्या? पत्नी के बिना रहा जा सकेगा या नहीं? मुझे किसका
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सहारा? पत्नी के बिना अकेले कैसे निभा पाऊँगा? जीवन में किसकी हूँफ़ (अवलंबन, सलामती) मिलेगी? घरवाले नहीं मानेंगे तो ?! 'वगैरह वगैरह निश्चय का छेदन करनेवाले अनेकों विचार स्वभाविक रूप से आएँगे ही। तब उन्हें तुरंत उखाड़कर निश्चय को वापस और अधिक मजबूत कर लेना है। विचारों को खत्म करनेवाला यथार्थ 'दर्शन' भीतर खुद अपने आप को दिखाना पड़ेगा, कि 'विषय के बिना कितने ही जी चुके हैं। इतना ही नहीं लेकिन सिद्ध भी बने हैं। खुद आत्मा के रूप में अनंत सुख का धाम है। विषय की उसे खुद को जरूरत ही नहीं है। जिनकी पत्नी का देहांत हो जाए, क्या वे अकेले नहीं जीते? हूँफ़ किसकी खोजनी है? खुद का निरालंब स्वरूप प्राप्त करना है और दूसरी ओर हूँफ़ खोजनी है? ये दोनों एक साथ कैसे हो सकते हैं?' और जहाँ खुद का निश्चय मेरु पर्वत की तरह अडिग रहता है, वहाँ कुदरत भी उसका साथ देती है और विषय में फिसलनेवाले संयोग मिलने ही नहीं देती। अर्थात पूरा आधार खुद के निश्चय पर ही है।
ब्रह्मचर्य पालन करना है, ऐसा अभिप्राय दृढ़ होने से ही कहीं पूरा नहीं हो जाता। ब्रह्मचर्य की जागृति उत्पन्न होना अति-अति महत्वपूर्ण चीज है। प्रतिक्षण ब्रह्मचर्य की जागृति रहे, तब ब्रह्मचर्य वर्तन में रह सकता है। मतलब जब दिन-रात ब्रह्मचर्य से संबंधित विचारणा ही चलती रहे, निश्चय दृढ़ होता रहे, संसार में वैराग लानेवाला स्वरूप दिन-रात दिखता रहे, ब्रह्मचर्य के परिणाम सतत दिखते रहें, किसी भी संयोग में ब्रह्मचर्य नहीं भूलें, जब ऐसी उत्कृष्ट दशा में आ जाए, तब अब्रह्मचर्य की ग्रंथियाँ टूटने लगती हैं। ब्रह्मचर्य की जागृति इतनी अधिक बर्तें कि विषय का एक भी विचार, एक क्षण के लिए भी विषय की तरफ चित्त का आकर्षण, उसकी जागृति के बाहर नहीं जाए और वैसा होने पर तत्क्षण प्रतिक्रमण हो जाए और उसका कोई भी स्पंदन नहीं रहे, इतना ही नहीं लेकिन सामायिक में उस दोष का गहराई से विश्लेषण करके जड़मूल से उखाड़ने की प्रक्रिया चलती रहे, तब जाकर विषयबीज निर्मूलन के यथार्थ मार्ग पर प्रयाण होगा।
ब्रह्मचर्य का निश्चय दृढ़ हो जाए और ध्येय ही बन जाए, फिर उस ध्येय के प्रति निरंतर 'सिन्सियर' रहने से, ध्येय तक पहुँचानेवाले संयोग
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आसानी से सामने आते जाते हैं। ध्येय निश्चित होने के बाद ‘ज्ञानीपुरुष’ के वचन उसे आगे ले जाते हैं, या फिर फिसलनेवाली परिस्थिति में वह वचन ध्येय को पकड़े रखने में सहायक बन जाते हैं। ऐसे करते-करते अंत में खुद ही ध्येय स्वरूप बन जाता है। उसके बाद फिर भले ही किसी भी तरह के डिगानेवाले, अंदर के या बाहर के जबरदस्त विचित्र संयोग आ जाएँ, फिर भी जिसका निश्चय नहीं डिगता, जो निश्चय के प्रति ही ‘सिन्सियर’ रहता है, उसे दिककत नहीं आती।
शुद्ध ब्रह्मचर्य पालन करने के लिए ‘ज्ञानीपुरुष’ का सानिध्य एवं ब्रह्मचारियों का संग अति-अति आवश्यक है। उसके बगैर भले ही कितनी भी स्ट्रोंग भावना होगी, फिर भी सिद्धि तक पहुँचने में अनेकानेक अंतराय आ सकते हैं! ‘ज्ञानीपुरुष’ के सतत् मार्गदर्शन तले साधक मार्ग पर आनेवाली हर एक मुश्किल को पार कर सकता है! और गृहस्थियों के संग के असर से दूर रहकर, ब्रह्मचारियों के ही वातावरण में ठेठ तक खुद के ध्येय को पकड़े रखकर ध्येय को प्राप्त कर लेता है। ‘ज्ञानीपुरुष’ के उपदेश को ग्रहण करके ब्रह्मचर्य के दृढ़ निश्चयवाला साधक, ब्रह्मचारियों के संग के बल से भी पार उतर सकता है, ऐसा है!
ब्रह्मचर्य की भावना जागृत होने और उसके प्रति दृढ़ निश्चय हो जाए, उसके लिए सतत् मार्गदर्शन मिलता रहे, वह तो अत्यंत आवश्यक है, लेकिन हर तरह से ब्रह्मचर्य की ‘सेफ साइड’ रखने के लिए खुद की आंतरिक जागृति भी उतनी ही जरूरी है। ‘अनसेफ’ जगह से ‘सेफली’ निकल जाने की जागृति और ‘प्रेक्टिकल’ में उसकी समय सूचकता की बाड़ साधक के पास होना जरूरी है। वर्ना जो दुर्लभ है, ब्रह्मचर्य के ऐसे उगे हुए पौधे को बकरा चबा लेगा!! एक तरफ मौत को स्वीकार करना पड़े तो उसे सहर्ष स्वीकार कर ले, लेकिन खुद की ब्रह्मचर्य की ‘सेफ साइड’ न चूके, स्थूल संयोगों के क्रिटिकल दबाव के बीच भी, वह विषय के गड़बड़े में गिरे ही नहीं, ब्रह्मचर्य भंग होने ही न दे, इस हद तक की ‘स्ट्रोंगेनेस’ जरूरी है। लेकिन उसके लिए जागृति कैसे लाई जाए? वह तो ब्रह्मचर्य पालन करने की खुद की साफ नीयत, उसकी संपूर्ण ‘सिन्सियारिटि’ से ही आ सकती है!
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ब्रह्मचर्य की 'सेफ साइड' के लिए आंतरिक और बाह्य 'एविडेन्स' को सिफ़त से खत्म करने की क्षमता प्रकट होनी ज़रूरी है। आंतरिक विकारी भावों को समझ से, ज्ञान के पुरुषार्थ से विलय करे, जिनमें से विषय जो है वह संसार की जड़ है, प्रत्यक्ष नर्क समान है, फिसलानेवाली चीज़ है, जगत् कल्याण के ध्येय में अंतराय लानेवाली चीज़ है और 'श्री विज्ञन' की जागृति और अंत में 'विज्ञान जागृति' द्वारा आंतरिक विषय को खत्म कर सकते हैं। 'विज्ञान जागृति' में खुद कौन है, खुद का स्वरूप कैसा है, विषय का स्वरूप क्या है, वे किसके परिणाम है, आदि पृथक्करण के परिणाम स्वरूप आंतरिक सूक्ष्म विकारी भाव भी क्षय हो सकते हैं। हालांकि बाह्य संयोगों में दृष्टिदोष, स्पर्शदोष और संगदोष से विमुख रहने की व्यवहार जागृति का उत्पन्न होना भी ज़रूरी है। वनां थोड़ी सी अजागृति विषय के कौन से और कितने गहरे गड़बड़े में गिरा दे, वह कोई नहीं बता सकता!
विषय का रक्षण, विषय के बीज को बार-बार सजीव कर देता है। 'विषय में क्या बुराई है,' कहा कि विषय का हुआ रक्षण!! 'विषय तो स्थूल है, आत्मा सूक्ष्म है, मोक्ष प्राप्ति के मार्ग में विषय बाधक नहीं है। भगवान महावीर ने भी शादी की थी, फिर हमें क्या दिक्कत है?' बुद्धि ऐसी वकालत करके विषय का जबरदस्त 'प्रोटेक्शन' करवाती है। एक बार विषय का 'प्रोटेक्शन' हुआ कि उसे जीवनदान मिल गया! फिर उसमें से वापस जब जागृति के शिखर तक पहुँचे, तब जाकर विषय में से छूटने के पुरुषार्थ में आ सकता है! वनां वह विषयरूपी अंधकार में मटियामेट हो जाएगा, यह इतना भयंकर है!
विषयी सुखों की मूर्च्छा ऐसी है कि कभी भी मोक्ष में नहीं जाने दे। लेकिन विषयी सुख परिणाम स्वरूप दुःख देनेवाले ही सिद्ध होते हैं। प्रकट 'ज्ञानीपुरुष' द्वारा विषयी सुखों की (!) यथार्थता का पता चलता है। उस समय जागृति में आकर उसे सच्चे सुख की समझ उत्पन्न होती है तथा विषयी सुख में असुख की पहचान होती है। लेकिन फिर ठेठ तक 'ज्ञानीपुरुष' की दृष्टि से चलकर विषय बीज निर्मूल करना है। उस पथ पर हर प्रकार से 'सेफ साइड' का ध्यान रखकर पार उत्तर चुके 'ज्ञानीपुरुष' द्वारा बताए गए रास्ते पर चलकर ही साधक को, वह साध्य सिद्ध करना होता है।
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जिसे इसी देह में आत्मा का स्मष्टवेदन अनुभव करना हो, उसे विशुद्ध ब्रह्मचर्य के बिना इसकी प्राप्ति संभव ही नहीं है। जब तक ऐसी सूक्ष्मातिसूक्ष्म ‘रोंग बिलीफ’ है कि विषय में सुख है, तब तक विषय के परमाणु संपूर्ण रूप से निर्जरित नहीं होंगे। जब तक वह ‘रोंग बिलीफ’ संपूर्ण सर्वांग रूप से खत्म न हो जाए तब तक अति-अति सूक्ष्म जागृति रखनी चाहिए। जरा सा भी झोंका आ जाए तो वह संपूर्ण निर्जरा (आत्म प्रदेश में से कर्मों का अलग होना) होने में अंतराय डालती है।
विषय होना ही नहीं चाहिए। हममें विषय क्यों रहे ? या फिर जहर पीकर मर जाऊँगा लेकिन विषय के गड़दे में गिरूँगा ही नहीं, ऐसा अहंकार करके भी विषय से दूर रहने जैसा है। यानी किसी भी रास्ते से अंत में अहंकार करके भी इस विषय से मुक्त होने जैसा है। अहंकार से ब्रह्मचर्य पकड़ में आता है, जिसके आधार पर काफी कुछ स्थूल विषय जीता जा सकता है और फिर सूक्ष्मता से ‘समझ’ को समझकर और आत्मज्ञान के सहारे संपूर्ण रूप से, सर्वांग रूप से विषय से मुक्ति पा लेनी है।
जब तक निर्विकारी दृष्टि प्राप्त नहीं हुई, तब तक कहीं भी नजरे मिलाना, वह भयंकर जोखिम है। उसके बावजूद जहाँ-जहाँ दृष्टि बिगड़े, मन बिगड़े, वहाँ-वहाँ उस व्यक्ति के शुद्धात्मा का दर्शन करके, प्रकट ‘ज्ञानीपुरुष’ को साक्षी रखकर मन से, वाणी से या वर्तन से हुए विषय से संबंधित दोषों का बहुत-बहुत पछतावा करना चाहिए, क्षमा प्रार्थना करना और फिर से कभी भी ऐसा दोष नहीं हो, ऐसा दृढ़ निश्चय करना चाहिए। यों यथार्थ रूप से आलोचना, प्रतिक्रमण और प्रत्याख्यान होगा, तब विषय दोष से मुक्ति होगी।
जहाँ ज्यादा बिगड़ रहा हो, वहाँ उसी व्यक्ति के शुद्धात्मा से मन ही मन ब्रह्मचर्य की शक्तियाँ माँगते रहनी पड़ेगी और जहाँ बहुत ही गाढ़ हो, वहाँ घंटों प्रतिक्रमण करके धोना पड़ेगा, तब जाकर ऐसे विषय दोष से छूटा जा सकेगा।
सामायिक में आज तक पहले जहाँ-जहाँ, जब-जब विषय से संबंधित दोष हुए हैं, उन सभी दोषों को आत्मभाव में रहकर, जागृतिपूर्वक देखकर उसका यथार्थ प्रतिक्रमण करना होता है, तब जाकर उन दोषों से
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मुक्ति मिलती है। पूरे दिन में हुए थोड़े से भी विचार दोष या दृष्टि दोष का प्रतिक्रमण करके तथा उन दोषों का, विषय के स्वरूप का, उसके परिणामों का, उसके प्रति जागृति का, उपायों का पृथक्करण सामायिक में होता है। वास्तव में तो विषय दोषों का प्रतिक्रमण ‘शूट ऑन साईट’ करना ही चाहिए। फिर भी अगर अजागृति से छूट गया हो या फिर जल्दी में अधूरा हुआ हो, तो फिर जब सामायिक में स्थिरतापूर्वक संपूर्णतः गहराई से ‘ऐनैलिसिस’ होता है, तब जाकर वे दोष धुलते हैं।
जब विषय की गॉठें फूटती रहती हो, चित्त विषय में ही खोया रहता हो, बाह्य संयोग भी विकार को उत्तेजित करनेवाले मिलें, ऐसे समय में कई बार श्रुतज्ञान भी काम में नहीं आता, वहाँ पर तो तब ‘ज्ञानीपुरुष’ के पास प्रत्यक्ष में ही उलझनों की आलोचना करें, प्रतिक्रमण करें, प्रत्याख्यान करें तभी हल आता है!
विषय रोग पूरी तरह से कपट के आधार पर ही टिका हुआ है और कपट किसी को बता दिया जाए तो विषय निराधार बन जाता है! निराधार विषय फिर कितना खींच सकेगा? विषय को निर्मूल करने के लिए ‘यह’ सबसे बड़ी, मूल और अति महत्वपूर्ण बात है। विषय से संबंधित भले ही कितना भी भयंकर दोष हो गया हो, लेकिन अगर उसकी ‘ज्ञानीपुरुष’ के पास आलोचना की जाए तो दोष से छूटा जा सकता है! क्योंकि इसमें पिछले गुनाह नहीं देखे जाते, उसका निश्चय देखा जाता है! विषय में से छूटने की जो तमन्ना जागृत होती है, वह अगर ठेठ तक टिके तो वह तमन्ना ही विषय से मुक्त करवाती है।
अखंड ब्रह्मचर्य पालन करने का ध्येय, उसमें ब्रह्मचर्य की आवश्यकता, ब्रह्मचर्य की सिद्धि के परिणाम स्वरूप प्राप्त होनेवाली आत्मसिद्धि की पराकाष्ठा, आत्मा का स्पष्ट अनुभव, आत्म सुख का स्पष्ट वेदन इत्यादि की निरंतर चिंतवना विषय की भ्रांत मान्यताओं से मुक्त करवाकर सही दर्शन फिट करवाता है। ऐसी चिंतवनावाली सामायिक बार-बार करनी चाहिए। उससे हर बार नया-नया दर्शन होता रहेगा और परिणामतः ध्येय स्वरूप हुआ जा सकेगा।
खुद का स्वरूप शुद्धात्मा है कि जो सूक्ष्मतम है और विषय मात्र
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स्थूल है। स्थूल को सूक्ष्म कैसे भोग सकेगा? यह तो अहंकार से विषय भोगता है और आरोपण आत्मा पर जाता है! कैसी प्रांति! ‘आत्मा सूक्ष्मतम है और विषय स्थूल हैं। सूक्ष्मतम आत्मा स्थूल को कैसे भोग सकता है?’ ‘ज्ञानीपुरुष’ के इस वैज्ञानिक वाक्य को, खुद के सूक्ष्मतम स्वरूप में ही निरंतर अनुभवपूर्वक रहनेवाली दशा में पहुँचे बिना उपयोग करने लगे तो सोने की कटार पेट में भोंकने जैसी दशा होगी! इस वाक्य का उपयोग उन्हीं के लिए है जो जागृति की परम सीमा तक पहुँच चुके हों। और ऐसी जागृति तक पहुँचे हुए को स्थूल और सूक्ष्म विषय तो खत्म ही हो चुके होते हैं! विषयों से बाहर निकले बिना यदि इस वाक्य को खुद ‘एडजस्ट’ कर ले, उसका जोखिम तो ‘खुद विषय से जकड़ा हुआ है और उससे छूटना चाहता है’ ऐसा स्वीकार करनेवालों से भी बहुत ही ज्यादा है।
‘अक्रम विज्ञान’ से जो जागृति उत्पन्न होती है, उसकी सहायता से विषय संपूर्ण रूप से जीता जा सकता है। इस विज्ञान से, विषय का विचार तक नहीं आए, विषय में चित्त भी न जाए, उस हद तक की शुद्धि हो सकती है। उसमें ‘ज्ञानीपुरुष’ की कृपा तो है ही और उसमें भी विशेष-विशेष कृपा ही बहुत-बहुत बड़ी भूमिका निभाती है। साधक का तो इसमें ऐसा ही दृढ़ निश्चय चाहिए कि विषय से छूटना ही है। बाकी तो ‘ज्ञानीपुरुष’ के वचनबल तथा ‘ज्ञानीपुरुष’ की विशेष कृपा से इस काल में भी अखंड शुद्ध ब्रह्मचर्य का पालन किया जा सकता है!
अब अंत में, ‘ज्ञानीपुरुष’ की यह शील संबंधित वाणी अलग-अलग निमित्ताधीन, अलग-अलग क्षेत्रों में, संयोगाधीन निकली है। उस सारी वाणी को एक साथ संकलित करके यह ‘समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य’ ग्रंथ बना है। इस दृषमकाल के विकराल महा-महा मोहनीय वातावरण में ‘ब्रह्मचर्य’ से संबंधित अद्भुत विज्ञान जगत् को देना, वह सोने की कटार जैसा साधन है और उसका सदुपयोग अंत में आत्म कल्याणकारी बन सकता है, ऐसा है। पाठक को तो विनम्र निवेदन इतना ही करना है कि संकलन में किसी भी प्रकार की भास्यमान क्षतियों के लिए क्षमा करके इस अद्भुत ग्रंथ का सम्यक आराधन करें!
- डॉ नीरु बहन अमीन के जय सच्चिदानंद
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उपोद्घात
खंड - १
विषय का स्वरूप, ज्ञानी की दृष्टि से
१. विश्लेषण, विषय के स्वरूप का
विषय किसे कहते हैं? जिस चीज में लुब्ध हो जाएँ, उसी को विषय कहते हैं। अन्य सबकुछ जरूरतें कहलाती है। खाना-पीना, वह विषय नहीं है।
विषय के कीचड़ में क्यों पड़ता है, वही समझ में नहीं आता। पाँच इन्द्रियों के कीचड़ में मनुष्य जो कि ऐश्वर्य प्राप्तवाला ईश्वर कहलाता है, वह क्यों पड़ा हुआ है? जानवर भी इसे पसंद नहीं करते।
भगवान महावीर ने इस काल के मनुष्यों को ब्रह्मचर्य नामक यह पाँचवा महाव्रत क्यों दिया? क्योंकि इस काल के लोग विषय का इतना भारी आवरण लेकर आए हैं कि उन्हें इसकी अभानता में से बाहर निकालकर मोक्ष में ले जाने के लिए, यह पाँचवा महाव्रत दिया!
विषय, वह विकृति है! मन को बहलाने का साधन बनाया है! पूरे दिन धूप से तप्त भैंसें गंदे कीचड़ में क्यों पड़ी रहती हैं? ठंडक की लालच में दुर्गंध को भूल जाती हैं! उसी तरह आज के मनुष्य दिन भर की भागदौड़ की थकान से तंग आकर, नौकरी-व्यापार या घर के टेन्शन में, अत्यंत मानसिक तनाव भुगतते हुए, अंतरदाह में से डाइवर्ट होने के लिए विषय के कीचड़ में कूद जाते हैं और उसके परिणाम भूल जाते हैं! विषय भोगने के बाद अच्छे से अच्छा शूरवीर मुर्दे जैसा हो जाता है। क्या पाया उसमें से?
विषय जहर है, ऐसा जानने के बाद फिर क्या कोई उसे छूएगा? जगत् में भय रखने जैसा यदि कुछ हो तो वह, यह विषय ही है! इन सौंप, बिच्छू, बाघ और शेर से कैसे घबराते हैं? विषय तो उनसे भी अधिक विषमय है। जिसका भय रखना है उसी को लोग परम सुख मानकर भोगते हैं! विपरीत मति की परिधि क्या?
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अनंत जन्मों की कमाई का उच्च उपादान लेकर आता है, मोक्ष के लिए, और विषय के पीछे उसे क्षणभर में ही खो देता है!! अरे! हे मानव! तेरी समझ कैसे आवृत हो गई?!
मनुष्य निरालंब नहीं रह सकता। निरालंब तो सिर्फ ज्ञानीपुरुष ही रह सकते हैं! उनके अलावा बाकी लोग बुद्धि के आशय में स्त्री, पुत्रादि के टेन्डर भरकर ही लाते हैं, जिससे उनके बिना उन्हें नहीं चलता। माँगी थी सिर्फ स्त्री, लेकिन साथ-साथ आ गए सास, ससुर, साला, साली, ममेरे ससुर, चचेरे ससुर। बड़ा लंगर लग गया! 'अरे, मैंने तो एक स्त्री ही माँगी थी और यह लशकर कहाँ से आ गया?!' 'अरे, स्त्री कहीं ऊपर से टपककर आती है। वह आएगी तो साथ-साथ यह लशकर आएगा ही न! तुझे क्या पता नहीं था?' इसी को कहते हैं अभानता! परिणाम का विचार ही नहीं आता कि एक विषय के पीछे कितने लंबे लशकर की लाइन लग जाती है!! अरे, घानी के बैल की तरह पूरी जिंदगी बीत जाती है उसके पीछे!
किसी ने सही बात सिखाई ही नहीं। बचपन से ही माँ-बाप या बुजुर्ग दिमाग में डालते रहते हैं कि बहू तो ऐसी लाएँगे और शादी किए बिना तो चलेगा ही नहीं और वंश तो चलता ही रहना चाहिए।
आत्मसुख खचने के बाद विषयसुख फीके लगते हैं, जलेबी खाने के बाद चाय कैसी लगती है? जीभ का विषय 'ओ के' कर सकते हैं, लेकिन बाकी सब में तो कुछ बरकत है ही नहीं। मात्र कल्पनाएँ ही हैं सारी! घृणा उपजाए, ऐसी चीज़ है विषय!
पाँचों इन्द्रिय में से किसी को भी विषय भोगना अच्छा नहीं लगता। आँखों को देखना अच्छा नहीं लगता, इसलिए अंधेरा कर देते हैं। नाक को भी बिल्कुल अच्छा नहीं लगता। जीभ की तो बात ही क्या करनी? बल्कि उल्टी हो जाए, ऐसा होता है। स्पर्श करना भी अच्छा नहीं लगता, फिर भी स्पर्श सुख मानते हैं! किसी को भी अच्छा नहीं लगता फिर भी किस आधार पर विषय भोगते हैं, वही आश्चर्य है न? लोकसंज्ञा से ही इसमें पड़े हैं!
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विषय, वह तो संडास है, गलन (डिस्चार्ज होना, खाली होना) है! इसमें भी तन्मयाकार हो जाता है इसलिए उसमें से नए कॉजेज डलते हैं! यदि विषय का पृथक्करण करे तो वह दाद को खुजलाने जैसा है!
अरे रे! अनंत जन्मों से यही किया ??! इस गटर को कैसे खोला जा सकता है? निरी दुर्गंध, दुर्गंध और दुर्गंध!! श्रीमद् राजचंद्र ने विषय को, 'वमन करने योग्य जगह भी नहीं है,' ऐसा कहा है! 'थूकने जैसा भी नहीं है वहाँ!'
विषय बुद्धि की वजह से नहीं है, मन की एंटन की वजह से है, इसलिए बुद्धि से उसे दूर किया जा सकता है।
प्याज की गंध किसे आती है? जो नहीं खाता हो, उसे! जिस तरह आहारी आहार करता है, उसी तरह विषयी विषय करता है! लेकिन वह लक्ष्य में रहना चाहिए न? लेकिन अज्ञानता के आवरण की वजह से लक्ष्य में नहीं रह पाता। चार दिन का भूखा बासी गंदी रोटी भी खा जाता है! आजकल के लोग तो इतने बदबूदार होते हैं कि यदि जरा भी नजदीक आ जाईं तो अपना सिर फट जाए। तभी तो ये सब परफ्यूम्स छिड़कते रहते हैं, चौबीसों घंटे!
विषय में सुख होता तो चक्रवर्ती राजा इतनी सारी रानियाँ होने के बावजूद सबकुछ छोड़कर सच्चे सुख की तलाश में निकल नहीं पड़ते!
जीवन किसलिए है? संसार बसाकर मरने के लिए? सुख के लिए या जिम्मेदारियाँ खड़ी करके बीमारियों को न्यौता देने के लिए? इतने पढ़े-लिखे लेकिन पढ़ाई का उपयोग क्या है? मेन्टेनन्स के लिए ही न? इस इन्जन से कौन सा काम करवा लेना है? कुछ हेतु तो होना चाहिए न? इस मनुष्य जन्म का हेतु क्या है? मोक्ष! लेकिन अपनी दिशा कौन सी और चल रहे हैं कहाँ??!
चोट लगी हो और खून बह रहा हो तो हम उसे बंद क्यों करते हैं? बंद नहीं करेंगे तो? तब तो वीकनेस आ जाएगी! उसी तरह यह विषय बंद नहीं होने से शरीर में बहुत वीकनेस आ जाती है! ब्रह्मचर्य को पुद्गलसार (जो पूर्ण और गलन होता है) कहा गया है! इसलिए उसे
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संभालो! इसलिए बचत करो, वीर्य और लक्ष्मी की! भोजन खाकर उसका अर्क बनकर उससे वीर्य बनता है, जो अब्रह्मचर्य से खत्म हो जाता है। इसलिए ब्रह्मचर्य का सेवन करो!
जिस ब्रह्मचर्य से मोक्ष हो, वह काम का।
यह अक्रम विज्ञान विवाहित लोगों को भी मोक्ष में ले जा सकता है, ऐसा है!
जिसे पहले से ही ब्रह्मचर्य पालन करने की भावना हो, उसे दादा से शक्ति माँगनी चाहिए, 'हे दादा भगवान, मुझे ब्रह्मचर्य पालन करने की शक्ति दीजिए।' विषय का विचार आते ही, तत्क्षण ही उसे उखाड़कर फेंक देना चाहिए। किसी भी स्त्री के प्रति दृष्टि नहीं गड़ना। दृष्टि आकृष्ट हो जाए तो तुरंत ही हट लेनी चाहिए और शूट ऑन साइट प्रतिक्रमण कर लेना चाहिए। विषय चाहिए ही नहीं, निरंतर ऐसा निश्चय रहना चाहिए और प्रखर आत्मस्थ ज्ञानीपुरुष की निश्रा में रहकर उसमें से छूट जा सकता है!
हरहाए पशु की तरह जीने के बजाय तो एक कीले से बंधना अच्छा। जगह-जगह दृष्टि नहीं बिगड़नी चाहिए। स्त्री, वह पुरुष का संडास है और पुरुष, वह स्त्री का संडास है। संडास में क्या मोह रखना? ब्रह्मचर्य का निश्चय करते-करते अपने आपको खूब परखकर देखना पड़ता है। कसौटी पर रखना पड़ता है। यदि नहीं हो पाए, ऐसा हो तो शादी करना उत्तम है, लेकिन बाद में भी कंट्रोलपूर्वक होना चाहिए।
ब्रह्मचर्य आत्मसुख प्राप्ति में कैसे मदद करता है? बहुत मदद करता है। अब्रह्मचर्य से तो देहबल, मनोबल, बुद्धिबल, अहंकारबल सभी कुछ खत्म हो जाता है! जबकि ब्रह्मचर्य से पूरा अंतःकरण सुदृढ़ हो जाता है!
ब्रह्मचर्य पालन हो सके तो उत्तम है और नहीं हो सके तो अगर सिर्फ इतना जान ले कि अब्रह्मचर्य गलत है, तो भी बहुत हो गया।
ब्रह्मचर्य महाव्रत बरता उसे कहते हैं कि जब विषय याद तक नहीं आए, ब्रह्मचर्य या अब्रह्मचर्य का अभिप्राय नहीं रहे, तब वह व्रत बरता कहा जाता है।
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बाकी, आत्मा तो सदा ब्रह्मचर्यवाला ही है। आत्मा ने विषय कभी भोगा ही नहीं। आत्मा सूक्ष्मतम है और विषय स्थूल है। इसलिए स्थूल को सूक्ष्म भोग ही नहीं सकता!
परम पूज्य दादाश्री कहते हैं कि, 'इस ज्ञान के बाद मुझे कभी विषय का विचार तक नहीं आया।' तभी तो ऐसी विषय रोग को उखाड़कर खत्म कर देनेवाली वाणी निकली है!
२. विकारों से विमुक्त की राह
अक्रम मार्ग में विकारी पद हैं ही नहीं। जैसे पुलिसवाला पकड़कर करवाए, उस तरह का होता है। स्वतंत्र मर्जी से नहीं होता। जहाँ विषय है, वहाँ पर धर्म नहीं है। निर्विकार रहे, वहाँ पर धर्म है! किसी भी धर्म ने विकार को स्वीकार नहीं किया है। हाँ, कोई वाम मार्गी हो सकता है।
ब्रह्मचर्य, वह तो पिछले जन्म की भावना के परिणाम स्वरूप किसी महा-महा पुण्यशाली महात्मा को प्राप्त होता है। बाकी सामान्यतः तो जगह-जगह अब्रह्मचर्य ही देखने मिलता है! जिसे भौतिक सुखों की वांछना है, उसे तो शादी कर ही लेनी चाहिए और जिसे भौतिक नहीं लेकिन सनातन सुख ही चाहिए, उसे शादी नहीं करनी चाहिए। उसे मन-वचन-काया से ब्रह्मचर्य पालन करना चाहिए।
भगवान को प्राप्त करने के लिए विकारमुक्त होना पड़ेगा और विकारमुक्त होने के लिए क्या संसारमुक्त होना पड़ेगा? नहीं। मन तो, अगर जंगल में जाएँ तो भी साथ में ही जाएगा! क्या वह छोड़नेवाला है? यदि ज्ञानीपुरुष मिल जाएँ तो आसानी से निर्विकार रहा जा सकता है।
तृष्णा, उसे कहते हैं कि जो भोगने से बढ़ती ही जाए और नहीं भोगने से मिट जाए! इसीलिए ब्रह्मचर्य की खोज हुई है न, विकारों से मुक्त होने के लिए!
विषयी कौन है? इन्द्रियाँ या अंतःकरण? भैंस कौन और चरवाहा कौन? सामान्यतः इन्द्रियों का दोष माना जाता है! नसबंदी करवाने से कहीं विषय छूटता है? तेरी नीयत कैसी है विषय में? चोर नीयत की
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वजह से ही विषय टिका हुआ है। ज्ञान से सबकुछ चला जाएगा! विषय का विचार तक नहीं रहेगा!
मन का स्वभाव कैसा है? साल, दो साल किसी चीज से अलग रहे कि वह चीज विस्मृत हो जाती है, हमेशा के लिए!
वाम मार्गी क्या सिखाते हैं कि जिस चीज को एक बार जी भरकर भोग लेने पर ही उससे छूटा जा सकता है। विषय के बारे में तो बल्कि और ज्यादा सुलगता जाता है। शराब से संतुष्ट होकर क्या उससे छूटा जा सकता है?
विषय के बारे में अगर कंट्रोल करने जाए तो वह और ज्यादा उछलता है। मन को खुद कंट्रोल करने जाएगा तो नहीं हो सकता। कंट्रोलर ज्ञानी होने चाहिए। सचमुच तो मन को रोकना नहीं है। मन के कारणों को रोकना है। मन तो खुद ही एक परिणाम है। उसे बदला नहीं जा सकता। कारण बदले जा सकते हैं। कौन से कारण से मन विषय में चिपका है, उसे ढूँढ़कर उससे छूटा जा सकता है।
ज्ञानी चीजों को वासना नहीं कहते, रस(रुचि) को वासना कहते हैं। आत्मज्ञान के बाद वासनाएँ चली जाती हैं।
स्त्री से संबंधित वासनाएँ क्यों नहीं जातीं? जब तक 'मैं पुरुष हूँ' और 'वह स्त्री है', ऐसी मान्यता है, तब तक वासनाएँ हैं। वह मान्यता अगर निकल जाए तो वासना को जाना ही पड़ेगा! वह मान्यता जाएगी कैसे? जिसे वासनाएँ हैं, उससे आप खुद अलग ही हो, खुद कौन है, जब यह ज्ञान हो जाएगा, भान हो जाएगा, तभी वह छूट सकेगा। और ज्ञानी की कृपा से ज्ञान हो सकता है!
३. माहात्म्य ब्रह्मचर्य का
ब्रह्मचर्य पालन नहीं किया जा सके तो कोई बात नहीं, लेकिन उसके विरोधी तो बनना ही नहीं चाहिए। अध्यात्म मार्ग में ब्रह्मचर्य, वह सबसे बड़ा एवं सबसे पवित्र साधन है! नासमझी से अब्रह्मचर्य टिका हुआ है। ज्ञानी की समझ से समझ लेने पर वह रुक जाता है। व्यवहार में भी मन-वाणी और देह नॉर्मैलिटी में रहें, उसके लिए ब्रह्मचर्य को
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आवश्यक कहा गया है। आयुर्वेद भी ऐसा ही सूचित करता है! छः महीने ही यदि मन-वचन और काया से ब्रह्मचर्य पालन करे तो मनोबल, वचनबल एवं देह में भी जबरदस्त बदलाव हो जाते हैं!
अब्रह्मचर्य से बहुत सारे रोग उत्पन्न होते हैं। उसमें तो मन और चित फ्रैक्चर हो जाते हैं!
कई मानसशास्त्री कहते हैं कि विषय बंद हो ही नहीं सकता। अंत तक! लेकिन दादाश्री क्या कहते हैं, कि विषय के अभिप्राय बदल जाएँ तो फिर विषय रहता ही नहीं। जब तक अभिप्राय नहीं बदल जाते, तब तक वीर्य का ऊर्ध्वगमन होता ही नहीं है। अक्रममार्ग में तो डायरेक्ट आत्मज्ञान प्राप्त होता है, वही ऊर्ध्वगमन है!
ज्ञानीपुरुष संपूर्ण निर्विषयी हो चुके होते हैं, इसलिए उनमें जबरदस्त वचनबल प्रकट हो चुका होता है, जो विषय का विरेचन करवा देता है। जो विषय का विरेचन नहीं करवाएँ, तो वह 'ज्ञानीपुरुष' है ही नहीं। सामनेवाले की इच्छा होनी चाहिए।
खंड - २
'शादी नहीं करने' के निश्चयवालों के लिए राह
१. किस समझ से विषय में से छूटा जा सकता है?
अक्रम विज्ञान थोड़े ही समय में ब्रह्मचर्य में सेफ साइड करवा देता है। कौन से जन्म में अब्रह्मचर्य का अनुभव नहीं किया है? कुत्ता, बिल्ली, पशु, पक्षी, मनुष्य, सभी ने कब नहीं किया? सिर्फ इस एक जन्म में ब्रह्मचर्य का अनुभव तो करके देखो! उसकी खुमारी, उसकी मुक्तता, निर्बौद्धता महसूस तो करके देखो!
ब्रह्मचर्य का निश्चय होना, वही बहुत बड़ी चीज है! ब्रह्मचर्य के दृढ़ निश्चयी का दुनिया में कोई नाम देनेवाला नहीं है!
ब्रह्मचर्य का निश्चय देखा देखी, जोश में आकर या डर के मारे होगा तो उसमें दम नहीं होगा! वह कभी भी फिसलाकर गिरा सकता है। समझ से और मोक्ष के ध्येय के लिए करना है और उस निश्चय को
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बार-बार मजबूत करना है और ज्ञानी के पास जाकर निश्चय मजबूत करवा लेना चाहिए और बार-बार बोलना, 'हे दादा भगवान, मैं ब्रह्मचर्य पालन करने का निश्चय मजबूत कर रहा हूँ मुझे निश्चय मजबूत करने की शक्ति दीजिए'। तो वह मिलेगी ही। जिसका निश्चय नहीं डिगता, उसका निश्चय सफल होता ही है और निश्चय डगमगाया कि सभी भूत घुस जाते हैं!
ब्रह्मचर्य का दृढ़ निश्चय धारण होने के बाद साधक को बार-बार एक प्रश्न सताता रहता है कि अंदर विषय के विचार तो आ रहे हैं। उसके लिए दादाश्री मार्ग बताते हैं कि विषय के विचार आएँ, उसमें हर्ज नहीं है लेकिन जो विचार आते हैं, उन्हें देखते रहो लेकिन 'तुम' उनके अमल में एकाकार मत हो जाना। वह कहे 'हस्ताक्षर करो!' तो भी तुम स्ट्रॉंगली मना कर देना! और उसे देखते ही रहना। यह है मोक्ष का चौथा स्तंभ, तप और फिर उसके प्रतिक्रमण करवाना। मन-वचन-काया से जो जो विकारी दोषों, इच्छाएँ, चेष्टाएँ, वगैरह, उन सभी दोषों का प्रतिक्रमण करना पड़ेगा। अगर विषय के विचार से मुक्त हो जाए तो कैसा आनंद-आनंद हो जाता है। तो फिर यदि उससे हमेशा के लिए मुक्त हो जाएगा तो कितना आनंद रहेगा?
अब्रह्मचर्य के विचारों के सामने ज्ञानी से ब्रह्मचर्य की शक्तियाँ माँगते रहने से दो-पाँच साल में वैसे उदय आ जाएँगे। जिसने अब्रह्मचर्य जीत लिया उसने पूरी दुनिया जीत ली! उस पर सभी देवी-देवता बहुत खुश रहते हैं!
विषय के विचार आएँ तो, उन्हें दो पत्तियाँ निकलने से पहले ही उखाड़कर फेंक दो! फूटने के बाद विचार कॉपल से आगे, दो पत्तियों तक खिल नहीं जाने चाहिए। वहीं पर तुरंत ही उखाड़कर फेंक देने पड़ेंगे, तभी छूटा जा सकेगा! और यदि वह उग गया तो वह अपना असर दिखाए बगैर जाएगा ही नहीं!
विषय की दो स्टेज। एक चार्ज और दूसरा डिस्चार्ज। चार्ज बीज को थो देना है।
रास्ते पर निकले और 'सीन सीनरी' आए कि दृष्टि आकृष्ट हुए बिना नहीं रहती। वहाँ दृष्टि गढ़ाएँगे तभी दृष्टि बिगड़ेगी न? इसलिए नीचा
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