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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य

Samaj Se Prapt Brahmacharya

दादा भगवान द्वारा

स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

‘विषय’ के सामने विज्ञान से जागृति (खं-2-१५)

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है और मुझ में शुद्धात्मा है। इन दोनों में कौन सी दृष्टि उच्च मानी जाएगी?

दादाश्री : उसमें तो दोनों दृष्टियाँ रखनी पड़ेंगी। वह शुद्धात्मा है, ऐसी दृष्टि तो अपने आप है ही। और दूसरी दृष्टि तो अगर जरा सा भी यदि आकर्षण होने लगे तो जैसा है, वैसी ही रखनी चाहिए, वना मोह हो जाएगा।

प्रश्नकर्ता : हाँ, ठीक है। मैं भी शुद्धात्मा और वह भी शुद्धात्मा ऐसा हो, तो जो अन्य प्रकार का आकर्षण है, वह नहीं रहेगा।

दादाश्री : नहीं रहेगा, लेकिन इतनी अधिक जागृति नहीं रह पाती। जब आकर्षण होता है, तब शुद्धात्मा को भूल जाता है। शुद्धात्मा भूले, तभी उसे आकर्षण होता है, वना आकर्षण नहीं हो सकता। इसीलिए तो हमने तुम्हें ऐसा ज्ञान दिया है कि तुम्हें आत्मा दिखे। फिर क्यों मोह होता है?!

तुम्हें आकर्षित नहीं होना हो, फिर भी आँखें आकृष्ट हो जाती है। तुम यों आँखें दबाते रहो, फिर भी उस तरफ चली जाती हैं!

प्रश्नकर्ता : ऐसा क्यों होता है? पुराने परमाणु हैं इसलिए?

दादाश्री : नहीं, पहले भूल की है, पहले तन्मयाकार होने दिया है, उसी का यह फल आया है तो अब उस आकर्षण में वापस तन्मयाकार नहीं होकर उसका प्रतिक्रमण करके वह भूल निकाल देनी है। अगर फिर से तन्मयाकार हो जाए तो फिर नये सिर से भूल हुई, तो उसका फल अगले जन्म में आएगा। अतः तन्मयाकार नहीं हो, ऐसा यह विज्ञान है अपना!! सामनेवाले में शुद्धात्मा ही देखते रहना व और कुछ दिखे और आकर्षण हो जाए तो प्रतिक्रमण करना, अन्यथा भय-सिग्नल ही है। बाकी सबका तुम्हें समभाव से निकाल करना। इसमें तो सामनेवाला जबरदस्त बड़ी

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फरियाद करनेवाला है, इसलिए सावधान रहना। हम चेतावनी देते हैं।

प्रश्नकर्ता : यही गड़बड़ हो जाती है न!

वहाँ पर देखो शुद्धात्मा ही

दादाश्री : तो तू सावधानी नहीं रखता?

प्रश्नकर्ता : सावधानी तो रखता हूँ न, लेकिन यह तो निरंतर सावधान रहना है।

दादाश्री : फिर भी जहाँ पर हमें आकृष्ट नहीं होना हो, उसके बावजूद भी आकर्षण होता रहे तो वह पहले की, पिछले जन्म की गलती है, इतना तय हो गया। नये सिरे से आकर्षण हो, वह चीज हमें समझ में आती है कि यदि हमें नहीं देखना है तो देखें ही नहीं, ऐसा होना चाहिए। लेकिन यह तो पुराना है, इसलिए वहाँ तो हमें नहीं देखना हो फिर भी खिंच जाते हैं।

प्रश्नकर्ता : इस जगह पर पुरुषार्थ करना है। जागृति रखना, वही पुरुषार्थ है?

दादाश्री : हाँ, वैसी जागृति रखना। तू रखता है, इतनी जागृति?

प्रश्नकर्ता : वहाँ पर पुरुषार्थ है पूरा।

दादाश्री : ऐसा? तुझे समझ में आता है कि यह पिछले जन्म की गलती है, ऐसा? क्या आता है समझ में? तुझे ऐसा अनुभव हुआ है?

प्रश्नकर्ता : हाँ, मतलब खुद की जागृति है कि यह दोष हुआ। अब उसे धोकर खुद तैयार हो जाए, खुद उससे मुक्त हो जाए लेकिन फिर से सरकारमस्टेशियल एविडेन्स मिल जाए, निमित्त मिल जाए तो फिर वापस विषय की गाँठ फूटती ही है। खुद की जबरदस्त तैयारी हो कि उपयोग चूकना ही नहीं है, लेकिन

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‘वह’ फूटता है। फिर वापस धो डालते हैं, लेकिन वह वापस खड़ा हो जाता है!

दादाश्री : अतः इस इन्द्रिय ज्ञान का स्वभाव ऐसा है कि सामनेवाला बहुत आकर्षक हो और रागी स्वभाववाला हो तो, वह आपकी आँखों में धूल झोंकता है। उस समय बहुत जागृत रहना पड़ेगा। हम जानते हैं कि इसे नहीं देखना है, फिर भी आकर्षण क्यों हो रहा है? वहाँ पर हमें क्या करना चाहिए कि शुद्धात्मा को ही देखते रहना चाहिए।

प्रश्नकर्ता : उस समय फिर से प्रत्याख्यान करना चाहिए?

दादाश्री : प्रतिक्रमण भी करना है और प्रत्याख्यान भी करना है, दोनों करने हैं। प्रतिक्रमण इसलिए करना है कि पूर्व जन्म में कुछ देखा है, उसी से यह उत्पन्न हुआ है। यह संयोग क्यों मिला? वर्ना हर एक को कोई नहीं देखता। यह तो देखने को मिला सो मिला, लेकिन उसमें से आकर्षण का प्रवाह क्यों बह रहा है? अतः पूर्व जन्म का हिसाब है, इस जन्म में उसके प्रतिक्रमण करने पड़ेंगे। जो-जो विषय-विकारी भाव किए हों, इच्छा, चेष्टा, संकल्प-विकल्प किए हों, उन सबका प्रतिक्रमण करना पड़ेगा और फिर प्रत्याख्यान करना पड़ेगा और फिर उनके शुद्धात्मा को ही देखते रहना पड़ेगा।

पुद्गल का स्वभाव ज्ञान से...

पुद्गल का स्वभाव यदि ज्ञान से रह पाए तब तो फिर आकर्षण होगा ही नहीं। लेकिन पुद्गल का स्वभाव ज्ञान से रह पाता, ऐसा तो होता ही नहीं है न किसी को! पुद्गल का स्वभाव, हमें तो ज्ञान से रहता है।

प्रश्नकर्ता : पुद्गल का स्वभाव ज्ञान से रहे तो आकर्षण नहीं रहेगा, यह समझ में नहीं आया।

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दादाश्री : मतलब क्या है कि किसी स्त्री ने या पुरुष ने भले ही कैसे भी कपड़े पहने हों, पर वे कपड़े रहित दिखते हैं, वह ज्ञान से पहला दर्शन है। दूसरा, सेकन्ड दर्शन यानी शरीर पर से चमड़ी निकल जाए, वैसा दिखता है और थर्ड दर्शन यानी अंदर का सभी कुछ दिखाए ऐसा दिखाई देता है। फिर आकर्षण रहेगा क्या? ऐसा तुझे रहता है?

प्रश्नकर्ता : ऐसा अभ्यास दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है।

दादाश्री : तो अच्छा है। ऐसा अभ्यास करना अच्छा है।

दृष्टि निर्मल कर सकते हैं ऐसे

कोई स्त्री खड़ी हुई हो, उसे देखा लेकिन तुरंत नजर वापस खींच ली। फिर भी वह दृष्टि तो वापस वहीं के वहीं जाती है, इस तरह दृष्टि वहीं आकृष्ट होती रहे तो वह 'फाइल' कहलाती है। यानी इतनी ही गलती इस काल में समझनी है। पिछली जो फाइल खड़ी हुई हो, भले ही छोटी सी भी, लेकिन 'फाइल' कि जो हमें आकर्षित करे ऐसी हो, ऐसा हमें पता चले कि यह 'फाइल' है तो वहाँ पर सावधान रहना है। अब सावधान रहने के अलावा और क्या करना है? जिसे शुद्धात्मा देखना आ गया है, उसे उसके शुद्धात्मा देखते रहना है। उससे वह पूरी तरह से चला जाएगा।

प्रश्नकर्ता : साथ-साथ प्रतिक्रमण और प्रत्याख्यान भी करना है न?

दादाश्री : हाँ, वह तो करना ही पड़ेगा न!

प्रश्नकर्ता : आकर्षण की फाइल कहीं 'कन्टिन्युअस' नहीं रहती। लेकिन जब यह आकर्षण उत्पन्न होता है, जैसे यहाँ पर लोहचुंबक रखा हो और पिन का यहाँ से गुजरना और खिंच जाना, लेकिन तुरंत पता चल जाता है कि खिंच गया, तो फिर तुरंत ही वापस खींच लेना चाहिए।

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दादाश्री : जितना भी पता चलता है वह इस ‘ज्ञान’ की वजह से पता चलता है, वर्ना दूसरा तो मूर्छित हो जाए। इस ‘ज्ञान’ की वजह से पता चलता है इसलिए फिर हमें उसका प्रतिक्रमण करना पड़ेगा। फिर हमें निर्मल दृष्टि दिखानी चाहिए। अपने में रोग होगा तभी सामनेवाला व्यक्ति अपना रोग पकड़ सकेगा न? और यदि वह अपनी निर्मल दृष्टि देखे तो? दृष्टि निर्मल करना आता है या नहीं आता?

प्रश्नकर्ता : जरा और समझाइए कि दृष्टि कैसे निर्मल करनी है?

दादाश्री : ‘मैं शुद्धात्मा हूँ’ इस जागृति में आ जाने के बाद, फिर दृष्टि निर्मल हो जाती है। अगर नहीं हुई हो तो शब्दों में पाँच-दस बार बोलना कि ‘मैं शुद्धात्मा हूँ, मैं शुद्धात्मा हूँ, मैं शुद्धात्मा हूँ’ तब भी वापस आ जाएगा और ‘दादा भगवान जैसा निर्विकारी हूँ, निर्विकारी हूँ’ ऐसा बोलेंगे तब भी वापस आ जाएगा। इसका उपयोग करना पड़ेगा, बाकी कुछ नहीं। यह तो विज्ञान है, तुरंत फल देता है और यदि जरा सा भी गाफिल रहा तो दूसरी तरफ फेंक दे ऐसा है!

अन्य कोई चीज बाधक हो, ऐसी नहीं है। स्त्री का स्पर्श हो जाए और फिर भीतर भाव बदल जाए तो वहाँ जागृति रखनी है। क्योंकि स्त्री जाति के परमाणु ही ऐसे हैं कि सामनेवाले के भाव बदल ही जाते हैं। यह तो, जब हम (दादाश्री) हाथ रखते हैं तो उसे अगर विचार आया हो तो बल्कि वह भी बदल जाता है, उसके ऐसे खराब विचार ही गायब हो जाते हैं!

विषय की योजना के अलावा बाकी सभी योजनाएँ, शायद अगर तोड़-फोड़ करे तो चला लेंगे। क्योंकि बाकी सभी मिश्रचेतन के साथ की योजनाएँ नहीं है, जबकि यह विषय की योजना तो मिश्रचेतन के साथ की योजना है। हम छोड़ दें, फिर भी सामनेवाला

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दावा करे तो क्या होगा? इसलिए इसमें सावधान रहने को कहा है। बाकी चीजों में अगर गाफिल रहे तो चलेगा। गाफिल रहने का फल यह कि जागृति जरा कम रहेगी। लेकिन यह विषय तो सबसे बड़ा जोखिम है, सामनेवाला जिस स्थान पर जानेवाला हो उसी स्थान पर अपने को ले जाएगा! अपने ज्ञान के साथ अब उस स्थान पर हम कैसे रह पाएँगे? एक तरफ जागृति और दूसरी तरफ यह पाश, वह कैसे चलेगा? लेकिन फिर भी हिसाब चुकाना पड़ता है।

प्रश्नकर्ता : वह रूपक में तो आएका न?

दादाश्री : हाँ, वह कैसा रूपक में आएका कि वह स्त्री दूसरे जन्म में अपनी मदर बनेगी, वाइफ बनेगी, यदि विषय संबंधित उसके बारे में सिर्फ एक ही घंटे का ध्यान करे तो! ऐसा है यह! सिर्फ इसी में हमें सावधान रहने जैसा है! बाकी किसी में सावधान रहने को नहीं कहते।

विचार ध्यान में तो परिवर्तित नहीं होते न?

अंदर विषय का विचार उगे तो क्या करना चाहिए? इन किसानों का ऐसा रिवाज है कि जमीन में इतनी-इतनी कपास वगैरह उग जाए, उसके बाद अंदर साथ में अन्य चीजें घास या बेल उग आए हों तो उन्हें वे निकाल देते हैं। उसे निराई कहते हैं। कपास के अलावा अन्य किसी भी तरह का पौधा दिखाई दे कि तुरंत उसे उखाड़कर फेंक देते हैं। उसी तरह हमें सिर्फ विषय के विचारों को उगने के साथ ही तुरंत उखाड़कर फेंक देना चाहिए, वर्ना पौधे के बड़े हो जाने के बाद उसमें फिर फल आएँगे, उन फलों में से वापस बीज आएँगे। इसलिए इसे तो उगते ही उखाड़ देना, फल आने से पहले ही उखाड़ देना।

प्रश्नकर्ता : वह कैसे?

दादाश्री : हमारे अंदर विचार बदले तो पता नहीं चलेगा

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कि अभी किस का विचार शुरू हुआ? वह विचार आने के बाद उसे ज्यादा नहीं चलने देना चाहिए। वह विचार ध्यान में परिवर्तित नहीं हो जाना चाहिए। विचार भले ही आए। विचार तो अंदर हैं इसलिए आए बिना रहेंगे नहीं। लेकिन वह ध्यान में परिवर्तित नहीं होना चाहिए। ध्यान में परिवर्तित होने से पहले ही विचार को उखाड़कर फेंक देना चाहिए।

प्रश्नकर्ता : ध्यान में परिवर्तित नहीं होना यानी कैसे?

दादाश्री : उसी विचार में रमणता करते रहना, उसे ध्यान में परिवर्तित होना कहते हैं। अगर आप एक ही विचार में रमणता करते रहो, तो वह उस विचार का ध्यान कहलाता है। उससे फिर बाहर बेध्यानपना रहता है, क्या ऐसे बेध्यानवाले नहीं होते लोग? तेरा ध्यान कहाँ है, लोग ऐसा नहीं पूछते? तब हमें पता चलता है कि ध्यान यहाँ पर है। जहाँ ‘दादा’ ने मना किया था, वहाँ है। उन्हीं विचारों में रमणता चलती रहे तो वह ध्यान कहलाता है। वह ध्यान फिर उसके ध्येय स्वरूप बन जाता है। उन विचारों का ध्यान हुआ, फिर अपना चलता ही नहीं। ध्यान नहीं हुआ तो कोई हर्ज नहीं।

प्रश्नकर्ता : ध्यान में परिवर्तित नहीं हुआ और वह उखड़ गया है, ऐसा कैसे पता चलेगा?

दादाश्री : उगते ही हमें वह चीज़ फेंक देनी चाहिए और फिर आगे उस विचारधारा को बदल देना पड़ेगा, दूसरी रख देनी पड़ेगी। नहीं तो फिर जाप शुरू करना पड़ेगा। वह टाइम बीत जाए तो फिर उसकी मुद्दत निकल जाएगी। हमेशा हर एक चीज़ का टाइम होता है कि साढ़े सात से आठ तक ऐसे विचार आएँ और अगर उतना टाइम गुजार दें तो फिर हमें परशानी नहीं है।

देखने से पिघलें, गाँठें विषय की

प्रश्नकर्ता : लेकिन गाँठें तो देखने से पिघलेंगी न? तो

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यदि हम दूसरी ओर देखें तो उन गाँठों को देखना रह जाएगा न?

दादाश्री : वह तो अगर तुम में शक्ति हो तो नया उपयोग दूसरी ओर नहीं रखकर उसी को देखो। शक्ति नहीं हो तो उपयोग बदलकर दूसरी ओर नया उपयोग रख दो।

प्रश्नकर्ता : तो दोनों संभव हैं?

दादाश्री : संभव ही है न! इस ओर नया उपयोग रख दे। तो तू ऐसा करता है न? वह ठीक है।

प्रश्नकर्ता : विषय के बहुत जोरदार विचार आएँ तो दूसरी ओर देख लेना है ताकि वे निकल जाएँ।

दादाश्री : बस। वे अपने आप चले जाएँगे। सबसे आखिरी रास्ता यही है कि उन्हें एक्जेक्ट देखकर जाने देना। लेकिन वह नहीं हो पाए तो इस रास्ते से करोगे तो भी तुम्हें चलेगा।

प्रश्नकर्ता : तो फिर यह बीच का रास्ता हुआ न!

दादाश्री : यह नजदीकी रास्ता।

प्रश्नकर्ता : यानी सबसे आखिरी तो देखकर जाने देना, वह है।

दादाश्री : फिर ज्यादा नहीं रहेगा, थोड़ा सा ही हिसाब बचेगा। लेकिन अभी तुम उलझ जाते हो, उसके बजाय भले ही नजदीकी रास्ता लो।

प्रश्नकर्ता : मुझे ऐसा विचार आया था कि मैं त्रिमंत्र पढ़ रहा हूँ। नमस्कार विधि वगैरह सब पढ़ रहा हूँ और जब आपने इस तरह देखने को कहा तब ऐसे कुछ छू नहीं रहा था। तब बिल्कुल सीधा चल रहा था। लेकिन जब यह विधि करना चूक गए, तब वापस यह सब ऐसे ही आने लगा अंदर। इसलिए वापस मुझे थोड़ा इफेक्ट हो जाता था।

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दादाश्री : नहीं, उसमें तो दूसरा शुरू कर दो वापस। देखने बैठो, भले ही कुछ भी करो। उपयोग कहीं और रखो, किसी काम में लगा दो।

प्रश्नकर्ता : आखिर में ये गॉठें तो देखनी ही पड़ेगी या फिर ऐसा ज़रूरी नहीं है?

दादाश्री : ऐसा है न, अभी तो सेकन्डरी स्टेज से काम लेना, तुम से सहन नहीं हो रहा हो तो। यानी कि तुम दूसरा उपयोग रखना ताकि वह स्टेज अपने आप गुजर जाए। जब कभी वह वापस आएगी, तब देखना तो पड़ेगा एक दिन, तब उस दिन अभी के बजाय काफी आसान रहेगा बिल्कुल सहज रूप से। कि हाथ लगाते ही चले जाऐंगे सारे।

प्रश्नकर्ता : मतलब उस समय ज़ाता-दृष्ट आसानी से रह पाऐंगे!!

दादाश्री : हाँ, सरलता से। बल्कि तुझे देखना अच्छा लगेगा। हल्का हो जाएगा बिल्कुल और तुझ में शक्ति बढ़ गई होगी, उस समय। अभी तो तू निर्बल हो गया है।

प्रश्नकर्ता : यानी जब तक देखने की शक्ति नहीं है, तब तक ऐसा करना पड़ेगा।

दादाश्री : यानी अभी किसी भी उपाय से, उसमें से अलग हो जाओ।

प्रश्नकर्ता : विषय से संबंधित दोष हो रहे हों तो इसका स्लिप होने का मुख्य कॉज तो मन है। तो इस मन से जो विषय हो रहे हों और उन्हें दूर करना हो तो कैसे कर सकते हैं?

दादाश्री : मन की ओर ध्यान नहीं देना है। ‘मन’ को ‘देखते’ रहना है।

प्रश्नकर्ता : क्योंकि अभी तो चंद्रेश का पूरा कंट्रोल ‘मन’

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ने ही ले लिया है। इसलिए मन के कहे अनुसार ही चल रहा है। दादा का सत्संग हो तब भी मन बताता है न, उसी तरफ वह खिंच जाता है। लेकिन कुछ बातों में मन की नहीं सुनता हूँ, जब सत्संग में आना हो तब मन वह सब बताता है, लेकिन उस ओर ध्यान नहीं देता। सत्संग में आ जाता हूँ।

तो इस मन से जो दोष हो रहे हों, उन्हें कैसे खत्म करना चाहिए?

दादाश्री : अपना ज्ञान लेने के बाद दोष होते ही नहीं हैं न।

प्रश्नकर्ता : हाँ, दोष तो नहीं होते। इसके बावजूद दूसरी ओर दृष्टि आकृष्ट हो जाती है, तो इसमें पूरा काम मन का ही है न?

दादाश्री : हाँ, मन तो होता ही है। लेकिन अपना 'ज्ञान' ज्ञान में रहता है न! 'ज्ञान' को ज्ञान में रखना चाहिए। 'ज्ञान' को अज्ञान में दखिल नहीं होने देना चाहिए।

प्रश्नकर्ता : मतलब अगर ऐसा हुआ तो जो हो रहा है, उसे 'देखते रहे' ऐसा?

दादाश्री : और कुछ भी नहीं।

प्रश्नकर्ता : लेकिन जो विषय है, उसमें तो देखना भी जोखिमवाला है न! कब स्लिप हो जाए, वह तो कह ही नहीं सकते न!

दादाश्री : कुछ नहीं होगा। खुद ज्ञाता-द्रष्टा रहे तो कुछ नहीं होगा। स्लिप हो जाएँगे, ऐसा कह ही नहीं सकते।

प्रश्नकर्ता : लेकिन वह डिसाइड कैसे कर सकते हैं, कि खुद ज्ञाता-द्रष्टा में है?

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दादाश्री : जिसे शंका है, उसी को ऐसा सब हो जाता है। जिसे शंका नहीं है, उसे कुछ नहीं होता।

प्रश्नकर्ता : तभी तो यह सब जो हुआ है, वह शंका के आधार पर ही हुआ है? अभी इस चंद्रेश की जो अवस्था है, पूरी शंका के आधार पर ही है?

दादाश्री : तो और किसके आधार पर?

प्रश्नकर्ता : इसीलिए खुद पर शंका हुई है उसे।

दादाश्री : ऐसा है न, ‘चंद्रेश क्या कर रहा है’ उसे देखते रहना है। उसे कह सकते हैं कि ‘तू नालायक है’ ऐसा वैसा सब कह सकते हैं। तन्मयाकार नहीं हो जाना, तो शक्ति उत्पन्न हो जाएगी बाद में। ‘ज्ञान’ अज्ञान में नहीं घुस जाना चाहिए।

प्रश्नकर्ता : कई बार तो यह भी डिसाइड नहीं हो पाता कि यह ज्ञान है या अज्ञान है?

दादाश्री : डिसाइड हुए बिना रहेगा ही नहीं न!

प्रश्नकर्ता : बार-बार अगर उस तरफ खिंच रहा हो तो खुद को शंका रहती है कि यह ज्ञान में है या अज्ञान में है।

दादाश्री : जो खिंच रहा है उसे भी, जिसे खींच रहा है, ‘जो’ वह सब ‘जानता’ है, वह ‘ज्ञान’ है। अगर जाने नहीं तो फिर ज्ञान हट गया है, ऐसा कहा जाएगा, अज्ञान में घुस गया।

प्रश्नकर्ता : कैसे?

दादाश्री : ऐसे तू अज्ञान में घुस जाता है फिर?

प्रश्नकर्ता : यही होता है, खुद के प्रति भी ऐसा हो जाता है कि यह चंद्रेश बिगड़ गया। खुद को ऐसा लगता है कि मैं बिगड़ गया। यों खुद के प्रति तिरस्कार होता है, कि ऐसा? कहाँ

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पहलेवाला चंद्रेश और कहाँ अभी का चंद्रेश। क्या ऐसा सब है? कई बार तो प्रतिक्रमण भी नहीं हो पाते।

दादाश्री : कैसे होगा लेकिन? ज्ञान अगर अज्ञान में घुस जाए फिर कैसे होगा? अलग रहोगे तो होगा।

प्रश्नकर्ता : ज्ञान, अज्ञान में घुस जाता है, तो उसका इतना लंबा पीरियड है। तो अब उसके लिए क्या करना चाहिए?

दादाश्री : कुछ भी नहीं करना है।

प्रश्नकर्ता : तो यह जो अज्ञान में घुस गया है, उसे भी देखना है?

दादाश्री : हाँ।

प्रश्नकर्ता : यह बिगड़ गया है, उसे सुधारना तो पड़ेगा ही न!

दादाश्री : तो सत्संग में ज्यादा जाना चाहिए। सत्संग में ज्यादा यानी रेग्युलर।

प्रश्नकर्ता : हाँ, वह तो देखा कि सत्संग में आते हैं, तब बहुत क्लियर हो जाता है।

दादाश्री : हाँ, लेकिन सत्संग में ज्यादा पड़े रहना पड़ेगा। उतना टाइम निकालकर रखना चाहिए, सत्संग के लिए।

‘देखना’ ‘जानना’ आत्मस्वरूप से

प्रश्नकर्ता : देखने से पुद्गल शुद्ध हो जाता है, वह क्या विषय के लिए भी करेक्ट है?

दादाश्री : विषय में सब को ऐसा रह नहीं सकता न! सिर्फ विषय ही ऐसा है जिसे देख नहीं सकता। चूक जाता है। बाकी सब में देख सकता है तुरंत। विषय के अलावा बाकी सब में

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देख सकता है, जलेबी खाता भी है और जलेबी खानेवाले को भी देखता है। जलेबी कैसे चबाता है, उस पर खुद हँसता भी है कि ‘ओहोहो! क्या चंद्रेशभाई, क्या टेस्ट से जलेबी चबाने लगे हो आप तो!’

प्रश्नकर्ता : हम किसी जगह पर बैठे हों और वहीं पास में कोई स्त्री आ जाए, और हमें स्पंदन खड़े होने लगे, तो उन्हें ‘देखेंगे’ तो चलेगा या प्रतिक्रमण करना पड़ेगा?

दादाश्री : प्रतिक्रमण करना पड़ेगा। ‘देखना’ उसे कहते हैं कि जब वह ‘देख रहा’ हो तो हम चंद्रेश से कहेंगे, ‘ओहोहो चंद्रेशभाई! आप तो स्त्रियों को भी देखते हो, अब तो रौब में आ गए लगते हो।’ उसे ‘देखना’ कहेंगे। आँखों से जो देखते हैं, वह तो इस दुनिया के सभी लोग देखते ही है न! आँखों से देखा हुआ इन्द्रिय ज्ञान कहलाता है।

प्रश्नकर्ता : यह तो अंदर स्पंदन उत्पन्न होते हैं, उन्हें देखना है कि ये स्पंदन उत्पन्न हुए। ऐसा देखने से जाएगा!

दादाश्री : ‘देखना’। ‘देखने में’, हम जो कहते हैं, वह अलग कह रहे हैं। हम तो, ‘यह क्या कर रहा है,’ उसे हम ‘जानते’ हैं। मैं तो कहता हूँ कि ‘अंबालालभाई, आप तो मजे से खाना खाने लगे न!’

प्रश्नकर्ता : इस तरह कहने को ‘देखना’ कहते हैं, आप ऐसा कहना चाहते हैं? यानी पूरी ‘देखने’ की जो प्रक्रिया है, वह इस तरह बातचीत के द्वारा स्पष्ट रूप से रह सकती है।

दादाश्री : हाँ। यानी तुम सब यह जो ‘देखते’ हो, उसे ‘देखना’ नहीं कह सकते। वह तुम्हारी भाषा में तुम्हारी होशियारी से करने जाओगे न, तो बल्कि मार खा जाओगे। हम से पूछना कि हमारी होशियारी ऐसी है, क्या वह ठीक है?

प्रश्नकर्ता : इसमें ऐसा होता है कि विषय का विचार आता

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है और इस ओर छेदन हो जाता है, वापस आता है, वापस छेदन कर देते हैं। मतलब यह खुद की पकड़ नहीं छोड़ता लेकिन वे विचार भी चलते रहते हैं, दोनों आम्ने-सामने चलते रहते हैं।

दादाश्री : वह छोड़ेगा नहीं न! इसलिए पहले विचार को ही निकालकर फेंक देना। बाद में कोई जाप करने बैठ जाना, 'दादा भगवान को नमस्कार करता हूँ', ऐसा-वैसा करना, भजन गाने लगना, ये जाप ही है सारे। अंदर से कहना कि, 'चंद्रेशभाई, गाओ'। ज्ञान तो बोलता ही रहेगा, बेचारा। वह ज्ञान तो जागृत ही करता रहता है कि जागो, जागो, जागो! अंदर से ऐसा नहीं करता?

प्रश्नकर्ता : हाँ, बहुत करता है, उसके प्रताप से ही तो सब टिका हुआ है।

दादाश्री : अब बाहर के लोग कैसे टिक सकेंगे बेचारे? ज्ञान नहीं हो तो कैसे टिकेंगे? नहीं टिक सकेंगे। उन्हें तो प्रकृति जैसे ले जाए, वैसे घिसटते जाते हैं।

जहाँ जागृति में झोंका, वहाँ विषय की फटकार

प्रश्नकर्ता : इस ज्ञान की जागृति से प्रकृति के सामने बहुत बड़ा फोर्स खड़ा हो गया है।

दादाश्री : हाँ। यह ज्ञान है इसलिए प्रकृति के सामने जीत जरूर जाता है, लेकिन साथ ही साथ अपना जो अस्तित्व है, वह ज्ञान के साथ होना चाहिए। अस्तित्व अगर पुद्गल के साथ रहेगा तो खत्म कर देगा। यानी स्वपरिणामी होना चाहिए।

उन विचारों में मिठास लगे तो हो गया, वे फिर खत्म कर देंगे। क्योंकि उस ओर परपरिणाम हुए। अब वे विचार ऐसे होते हैं न कि मिठास आए? या कड़वाहट आती है?

प्रश्नकर्ता : मिठास आए ऐसे आते हैं।

दादाश्री : इसीलिए वहाँ सावधान रहना है! ऐसा विवेचन

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और कहीं पर तो नहीं कर सकते न! यह तो विज्ञान है इसलिए विवेचन कर सकते हैं। यह रोग कोई निकालता ही नहीं है न! यह रोग कैसे निकले? इसका इलाज अपने यहाँ होता है। यहाँ पर स्त्रियाँ बैठी हों, फिर भी अपने यहाँ दिक्कत नहीं आती। और कहीं पर तो ऐसी बात होती ही नहीं न!

जागृति मंद हुई कि विषय घुस जाता है। जागृति मंद हुई कि फिर उसे धक्का लगता है। विषय एक ऐसी खराब चीज है कि उसमें एक बार फिसल जाए तो फिर जागृति पर गाढ़ आवरण आ जाता है। उसके बाद अगर जागृति रखनी हो, फिर भी नहीं रह पाती। जब तक एक भी बार गिरा नहीं है, तब तक जागृति रहती है। शायद आवरण आ जाए, लेकिन जागृति तुरंत ही आ जाती है। लेकिन एक ही बार फिसला तो जबरदस्त गाढ़ आवरण आ जाता है, फिर सूर्य-चंद्र नहीं दिखते। एक ही बार फिसले तो भी बहुत नुकसान है।

प्रश्नकर्ता : जागृति मंद यानी एकनुअली कैसे होता है?

दादाश्री : एक बार आवरण आ जाता है उसे। उस शक्ति को संभालनेवाली जो शक्ति है न, उस शक्ति पर आवरण आ जाता है, उसका काम करना मंद हो जाता है। फिर उस समय जागृति मंद हो जाती है। उस शक्ति के मंद होने के बाद कुछ नहीं हो सकता, कुछ नहीं होता। बाद में वापस मार खाता है, फिर मार खाता ही रहता है। फिर मन, वृत्तियाँ, वगैरह सब उसे उल्टा ही समझाते हैं कि, ‘हमें तो अब कोई हर्ज नहीं। इतना सब तो है न?’ फिर ऐसा समझानेवाले वकील अंदर होते हैं, उस वकील का जजमेन्ट वापस शुरू हो जाता है। फिर कहेगा कि परहेज करो, मुक्त थे उससे फिर हुए परहेज। ऐसा हो, उससे तो शादी करना अच्छा, बनी ऐसा होना ही नहीं चाहिए।

प्रश्नकर्ता : उस शक्ति की रक्षा करनेवाली शक्ति यानी क्या?

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दादाश्री : एक बार स्लिप हुआ, तो अंदर जो स्लिप नहीं होने की शक्ति थी, वह घिस जाती है यानी वह शक्ति ढीली पड़ जाती है। इसलिए फिर बोटल यों टेढ़ी हुई कि दूध अपने आप ही बाहर निकल जाता है, जबकि पहले तो हमें ढक्कन निकालना पड़ता था। यह तुझे समझ में आया?

प्रश्नकर्ता : एक असंयम परिणाम से फिर गुणन से ही (मल्टीप्लाई होकर) पूरा डाउन में चला जाता है और असंयम बढ़ता ही जाता है। ऐसा न?

दादाश्री : हाँ, तो असंयम बढ़ता ही जाता है! इसलिए वापस ढीला ही पड़ता जाता है। एक तो ढीला पड़ा हुआ है और वापस ढीला पड़ गया, तो फिर रहा ही क्या? बाद में तो अंदर मन-बुद्धि सलाह देनेवाले और अंदर जज व बाकी सभी गवाही देनेवाले निकल आते हैं। अरे, गवाही देनेवाले कोई भी नहीं थे, तो फिर कहाँ से आए? तब कहते हैं कि 'हमें पहले से ही कहा था कि आप गवाही देने आना, सो हम गवाही देने आए हैं! कि अब कोई दिक्कत नहीं है। आपकी तो इतनी जागृति है। अब आपको क्या दिक्कत है, अब आपका जरा भी दोष नहीं है।' तेरे कभी ऐसे गवाही देनेवाले नहीं आते?

प्रश्नकर्ता : हाँ, आते हैं न। लेकिन मेरे साथ कैसा होता है कि, पहले यों ग्राफ ऊपर जाता है, फिर जागृति मंद होती हुई दिखाई देती है, फिर पता चल जाता है कि अब डाउन होने लगा है। इसलिए फिर वापस तुरंत जोश आ जाता है कि यह तो गलती हो रही है, कहीं। इसलिए फिर पता लगाते हैं और वापस ऊपर आ जाता है, लेकिन ऐसे डाउन हो जरूर जाता है!

दादाश्री : हाँ, लेकिन अगर वह डाउन हो जाए तो वह कब तक चल सकता है? जब तक हमसे एक बार भी गलती नहीं हो, तब तक चल सकता है, लेकिन एक बार गलती हुई कि ढीला पड़ जाता है। संसारीपने में हज़ार बार भूल खा जाए

‘विषय’ के सामने विज्ञान से जागृति (खं-2-१५)

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तो उसमें हर्ज नहीं है क्योंकि जब ढीला हो ही गया है तो फिर उसमें हर्ज ही क्या? उसी को ढीला पड़ना कहते हैं न! लेकिन यहाँ तो तुमने टाइट रखा है, उसे टाइट ही रखना है, और यदि वह शक्ति ऊर्ध्वगामी हो गई तो बहुत काम निकाल देगी।

प्रश्नकर्ता : वह किस प्रकार के दोष से ढीला होना शुरू होता है?

दादाश्री : संयम, असंयम हुआ कि ढीला हो ही जाता है। संयम जब तक संयम भाव में रहता है, तब तक ढीला नहीं पड़ता। यों कम-ज्यादा होता रहे तो उसमें हर्ज नहीं है। लेकिन वह संयम टूटा कि फिर हो चुका। वह संयम कब टूटता है? कि ‘व्यवस्थित’ के पिछले संधान हों, तब टूटता है। और टूटने के बाद फिर उसे मटियामेट कर देता है।

मूर्च्छा चली जाए तो फिर हर्ज नहीं। मूर्च्छा ही निकालनी है। ‘मेरी मूर्च्छा चली गई’ ऐसा कहने से कुछ नहीं होगा, मूर्च्छा तो एक्जेक्ट रूप से जानी ही चाहिए। और वह भी ज्ञानीपुरुष से टेस्ट करवा लेना चाहिए कि ‘साहब, मेरी मूर्च्छा गई या नहीं, वह टेस्ट करके दीजिए।’ वनां अंदर तो ऐसी ऐसी वकालत चलती है कि, ‘बस, अब सारी मूर्च्छा चली गई है, अब कोई हर्ज नहीं है!’ यानी वकालत करनेवाले बहुत हैं न! इसलिए जागृत रहना। जहाँ अपराध होने की संभावना हो, ऐसी जगह पर से खिसक जाना। आत्मा तो दिया है और वह आत्मा असंग स्वभाव का है, निर्लप स्वभाव का है। लेकिन अनंत जन्म से पुद्गल की खेंच है। आप अलग हुए, लेकिन पुद्गल की खेंच छोड़ती नहीं है न! वह खेंच जाती नहीं है न! स्त्री-पुरुष के आकर्षण में वह जागृति नहीं रखी तो पुद्गल की खेंच उसे अंधेरे में डाल देगी।

अंत में तो आत्मरूप ही होना है

प्रश्नकर्ता : जब से ब्रह्मचर्य की विचारणा शुरू हुई है, तब

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

से उस तरफ मजबूत होने लगा है। तो साथ ही साथ अंदर यह अहंकार भी खड़ा होने लगा है, यह भी परेशान करता है कई बार।

दादाश्री : कैसा अहंकार खड़ा होता है?

प्रश्नकर्ता : ‘मैं कुछ हूँ, मैं कितना अच्छा ब्रह्मचर्य पालन करता हूँ’ ऐसा।

दादाश्री : वह तो निर्जीव अहंकार है।

प्रश्नकर्ता : अंदर इसकी खुमारी भर गई हो, ऐसा हो जाता है।

दादाश्री : हाँ, लेकिन फिर भी वह सारा तो निर्जीव अहंकार है। मरा हुआ ईसान उठ बैठे तो क्या हमें वहाँ से भाग जाना चाहिए? वना ब्रह्मचर्य का सही अर्थ क्या है कि ब्रह्म में चर्या। शुद्धात्मा में ही रहना, वही ब्रह्मचर्य कहलाता है। लेकिन ये लोग तो ब्रह्मचर्य का क्या मतलब निकालते हैं? नल को डाट लगा दो। लेकिन दूध पीया, उसका क्या होगा? पूरे जगत् ने विषय को विष कह दिया है। लेकिन हम कहते हैं, ‘विषय विष नहीं हैं, लेकिन विषय में निडरता, वह विष है।’ वना महावीर भगवान को बेटी कैसे होती? जगत् बात को समझा ही नहीं। रिलेटिव में ब्रह्मचर्य होना चाहिए, लेकिन यह तो वापस एक ही कोने में पड़े रहते हैं और ब्रह्मचर्य का ही आग्रह रखते हैं और उसी का दुराग्रह रखते हैं। ब्रह्मचर्य के आग्रही होने में हर्ज नहीं है, लेकिन अगर दुराग्रही हो गए तो उसमें हर्ज है। आग्रह, वह अहंकार है और दुराग्रह, वह जबरदस्त अहंकार है। ब्रह्मचर्य का दुराग्रह किया तो भगवान कहते हैं, ‘बेकार है’ फिर भले ही ब्रह्मचर्य पालन कर रहा हो।

प्रश्नकर्ता : सभी चीजों में मुझे किसी के दोष नहीं दिखते, लेकिन ब्रह्मचर्य के बारे में मुझे कोई कुछ उल्टा कहे तो मेरा दिमाग घूम जाता है, तुरंत ही उसके दोष दिखने लगते हैं।

‘विषय’ के सामने विज्ञान से जागृति (खं-2-१५)

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दादाश्री : ऐसा क्यों? कि आत्मा पर प्रीति नहीं है, ब्रह्मचर्य पर प्रीति है। लेकिन ब्रह्मचर्य तो पुद्गल है। आत्मा खुद तो ब्रह्मचारी ही है, निरंतर ब्रह्मचारी है! यह तो हम बाहर का उपाय करते हैं और वह भी कुदरती तरीके से अगर डिस्चार्ज के रूप में आया हो, तभी हो पाएगा। इसलिए ब्रह्मचर्य कोई मुख्य चीज नहीं है। उसे मुख्य मानेंगे तो आत्मा का मुख्यत्व चला जाएगा। मुख्य वस्तु तो आत्मा है, बाकी कुछ भी मुख्य है ही नहीं। बाकी के ये सब तो संयोग हैं और फिर संयोग वियोगी स्वभाव के हैं। आत्मा और संयोग दो ही हैं, और कुछ है ही नहीं जगत् में। अतः मुख्यत्व एक मात्र आत्मा में आ गया, बाकी सब को संयोग कह दिया। संयोग को अच्छा-बुरा करने जाओगे तो बुद्धि इस्तेमाल की और बुद्धि इस्तेमाल की तो आत्मा दूर चला जाएगा। अपना साइन्स कितना अच्छा है!

ब्रह्मचर्य व्यवहार के अधीन है। निश्चय तो ब्रह्मचारी ही है न! आत्मा तो ब्रह्मचारी ही है न!

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[ १६ ]

फिसलनेवालों को उठाकर दौड़ाते हैं

सिर-माथे पर रखना ज्ञानी को, अंत तक

पंद्रह साल के लिए जेल में डाल दिया हो तो क्या करोगे? 'दादा की जेल में ही हूँ', कहना। कुछ तो शूरवीरता रखो न! शूरवीरता! एक ही जन्म। मोक्ष में जाना है यह तो। अन्य सभी जगह यही झंझट चल रही है न। 'इसमें क्या सुख है?' और अगर एक बाड़ तुम पार कर लोगे मेरे कहे अनुसार, तो फिर मुक्त हो जाओगे। एक ही बाड़ को पार करने की जरूरत है। तुझे दादा हाज़िर रहते हैं या नहीं रहते? तुझे दादा हाज़िर रहते हैं तो फिर क्या दुःख है? अरे, इसमें ऐसे तो कौन से सुख हैं कि इतनी पकड़ में आ गया है! दादा तो ऐसे है कि हर तरह से रक्षा करें, मूलतः इसका यह आड़ाई (अहंकार का टेढ़ापन) का स्वभाव है न, वह नहीं छूटता न! सपने में आ जाऊँ, तब से कल्याण हो गया। सपने में ऐसे ही कोई चीज़ आती है क्या?! इसलिए इस दुनिया का जो होना हो वह हो, लेकिन इन दादा को नहीं छोड़ना है और दादा की इस एक आज्ञा का पालन कर लेना तो वश हो जाएगा सबकुछ। और वनाँ अगर तुझे शादी करनी हो तो बता न, हर्ज नहीं है। कर देंगे फिर रास्ता।

आज्ञा में नहीं रह सके तो क्या किसी को जेल में थोड़े ही डालते हैं? वनाँ ऐसे यदि जेल में डालना पड़े तो हमें कितनों को जेल में डालना पड़े? सभी को डाल देना पड़ेगा।