समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य
Samaj Se Prapt Brahmacharya
दादा भगवान द्वारा
स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)
न हो असार, पुद्गलसार (खं-2-१३)
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सार मर जाता है। उसके बाद वह मरा हुआ अंदर पड़ा रहेगा। फिर जब सब इकट्ठा हो जाता है, उसके बाद बाहर निकलता है। तब उसे तो ऐसा ही लगता है कि आज मुझे डिस्चार्ज हो गया। डिस्चार्ज तो था ही अंदर, हो ही रहा था। वह बूंद-बूंद करते डिस्चार्ज होता रहता है।
प्रश्नकर्ता : बहुत पहले बात निकली थी, तब आपने कहा था कि जब अंदर तन्मयाकार होता है, उसी समय परमाणुओं का स्खलन होता है।
दादाश्री : बस, तन्मयाकार का मतलब ही मंथन। यदि इतना ही समझ ले, तब तो ब्रह्मचर्य का सबसे बड़ा साइन्स समझ जाएगा। विचार आया और तन्मयाकार हो जाए तो अंदर स्खलन हो जाता है, लेकिन इन लोगों को समझ में नहीं आता, समझ ही नहीं है। उस समय भान ही नहीं रहता न! फिर भी प्रतिक्रमण करते हैं तो उससे चल जाता है।
प्रश्नकर्ता : यानी कि जैसे ही विचार आएँ, तभी से सावधान हो जाना है?
दादाश्री : विचार आया और यदि प्रतिक्रमण नहीं किया तो खत्म।
प्रश्नकर्ता : तो वास्तव में तो विचार ही नहीं आना चाहिए न?
दादाश्री : विचार तो आए बिना रहेंगे नहीं। अंदर भरा हुआ माल है, इसलिए विचार तो आएँगे, लेकिन प्रतिक्रमण उसका उपाय है। विचार नहीं आना चाहिए, ऐसा हो जाए तो गुनाह है।
प्रश्नकर्ता : वहाँ तक की स्टेज आनी चाहिए, ऐसा?
दादाश्री : हाँ, लेकिन विचार नहीं आना, वह तो बहुत समय के बाद डेवेलप होते-होते जब आगे बढ़ेगा, प्रतिक्रमण करते-करते
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आगे बढ़ेगा, तब उसके बाद पूर्णाहुति होगी न! प्रतिक्रमण करने लगे तो फिर पाँच जन्मों में, दस जन्मों में भी पूर्णाहुति हो जाएगी न। एक जन्म में शायद खत्म न भी हो।
प्रश्नकर्ता : जो विचार आते हैं, वह भरा हुआ माल है?
दादाश्री : वह सब भरा हुआ माल ही है न! विचार अपने आप ही आते हैं।
प्रश्नकर्ता : कभी कभार ऐसा भी होता है कि विचार भी चलते रहते हैं और प्रतिक्रमण भी चलते हैं, दोनों क्रियाएँ साथ में चलती हैं।
दादाश्री : उसमें हर्ज नहीं है। भले ही विचार चलते रहें, लेकिन अगर साथ में प्रतिक्रमण भी चलते रहें तो फिर उसमें हर्ज नहीं है।
प्रश्नकर्ता : यह तो गजब का साइन्स उजागर हुआ है, दादा!
दादाश्री : लेकिन लोगों को समझ में नहीं आ सकता न! यह तो सब पढ़ते हैं इतना ही, फिर भी इतना पढ़ते हैं, वह भी अच्छा है, जिम्मेदारी समझें तो भी बहुत हो गया! जोखिमदारी समझ में आ जाए तो भी बहुत हो गया। यह तो ऐसा समझता है कि विचार आ गया, तो उसमें क्या बिगड़ गया? लेकिन वह तो अभानता है। फिर भी जो बहुत विचारवंत हो, ब्रिलियेन्ट हो, उसे तो ठीक से समझ में आ जाता है और वह बात को समझ भी सकता है, उसे हेल्प भी होती है। यह तो लोग जानते नहीं है कि विचार आ जाए तो क्या होगा? ये तो कहेंगे कि विचार आया तो उसमें क्या बिगड़ गया? लोगों को पता नहीं होता कि विचार में और डिस्चार्ज में, इन दोनों की लिंक कैसे है? यदि अपने आप यों ही विचार नहीं आए तो बाहर देखने से भी विचार उत्पन्न हो सकता है।
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प्रश्नकर्ता : कई बार अकेले होते हैं, फिर भी अपने आप अंदर से विचार फूटने लगते हैं।
दादाश्री : अकेले जैसा कुछ होता ही नहीं है, लेकिन जब टाइमिंग होता है, तब टाइम दिखा ही देता है।
ये सब सूक्ष्म बातें हैं, कुछ-कुछ विचारशील लोगों को ही समझ में आती हैं। अगर नहीं समझेगा तो मार खाएगा। कुदरत के घर क्या कुछ कम परेशानी हैं?!
प्रश्नकर्ता : मान लो कि उसकी वह विचारधारा पाँच-दस मिनट चली तो? और फिर तुरंत ही उसका प्रतिक्रमण कर ले तो?
दादाश्री : उसमें हर्ज नहीं है। लेकिन विचारधारा के कुछ समय के अंतराल में ही कर लेना चाहिए। एकदम टाइम भी नहीं जाने देना चाहिए, वना फिर मंथन हो जाता है।
प्रश्नकर्ता : यानी एक विचार आया कि तुरंत?
दादाश्री : तुरंत ही, यानी कि वह आगे और प्रतिक्रमण उसके पीछे, ऐसा। जैसे आगेवाले एक इंसान के पीछे दूसरा इंसान जा रहा हो, वैसा। तो आगे यह विचार हो और पीछे यह प्रतिक्रमण होना चाहिए।
प्रश्नकर्ता : यानी एक सेकन्ड की भी देर नहीं लगनी चाहिए?
दादाश्री : सेकन्ड की देर लगी हो तो चल सकता है। क्योंकि इस प्रतिक्रमण में बहुत ताकत है। इसलिए वह विचार शुरू होते ही उसे तेजी से उड़ा देना। प्रतिक्रमण में तो बहुत जोर होता है। प्रतिक्रमण का जोर अतिक्रमण के जोर से बहुत ज्यादा होता है।
जहर पी लिया हो तो अगर घूंट उसके गले से नीचे उतरने
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से पहले ही उल्टी कर दे तो कुछ नहीं, लेकिन घूंट नीचे उतर गया तो फिर असर हुए बिना रहेगा ही नहीं। अरे, फिर तो उल्टियाँ करवाने पर भी थोड़ा रह ही जाएगा। वैसा ही इस विषय के संबंध में है! जिसे ब्रह्मचर्य पालन करना हो, उसे विषय संबंधित विचार आएँ तो देखते ही तुरंत प्रतिक्रमण कर लेना चाहिए। उसमें जरा सी भी देर हुई और अंदर मंथन हुआ कि मंथन होने के बाद स्खलन होता रहेगा। किसी भी रास्ते, एनी-वे स्खलन हो ही जाएगा।
अपना मार्ग है ही बहुत उच्च न? प्रतिक्रमण का पूरा मार्ग ही उच्च है। आधा घंटा उल्टा चले और यदि जागृत हो जाए तो दो मिनट में ही एकदम से सब फ्रैक्चर कर देगा। यह 'अक्रम विज्ञान' है ही बहुत उच्च कक्षा का। हमने तो निरीक्षण करके अपने अनुभव से यह पूरा विज्ञान रखा है। मेरे कितने ही जन्मों पहले के निरीक्षण होंगे, वह आज आपके अंदर अंकित हो गया।
हमें तो 'एट-ए-टाइम' कितने ही बेहिसाब दर्शन घेर लेते हैं, वाणी में तो कुछ ही निकल पाते हैं और जब आपको समझाते हैं, तब तो कुछ ही निकलते हैं। वह भी संज्ञा में, अंदर जो समझ में आया हो, वैसा तो होता ही नहीं है न?! फिर भी ज्ञानीपुरुष की वाणी है, इसलिए सुननेवाले के लिए क्रियाकारी हुए बिना रहेगी ही नहीं।
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[ १४ ]
ब्रह्मचर्य प्राप्त करवाए ब्रह्मांड का आनंद
इससे क्या नहीं मिल सकता ?
इस कलियुग में, इस दुष्मकाल में ब्रह्मचर्य पालन करना बहुत मुश्किल है। अपना ज्ञान है कि जो इतना ठंडकवाला है। अंदर हमेशा ठंडक रहती है, इसलिए ब्रह्मचर्य पालन कर सकते हैं। बाकी, अब्रह्मचर्य है किस वजह से ? अंतरदाह की वजह से। पूरे दिन कामकाज करके जलन, निरंतर जलन खड़ी हुई है। यह ज्ञान है, इसलिए मोक्ष में कोई बाधा नहीं होगी, लेकिन साथ में यदि ब्रह्मचर्य हो तो उसका आनंद भी ऐसा ही रहेगा न ?! अरे ! अपार आनंद। वह तो दुनिया ने चखा ही नहीं है, ऐसा आनंद उत्पन्न हो जाता है ! यानी ऐसे व्रत में ही यदि वह पैंतीस साल का पीरियड गुज़ार दे तो उसके बाद तो अपार आनंद उत्पन्न होगा ! अगर ऐसा उदय आया है, वह तो धन्य भाग्य ही कहलाएगा न ? अब अच्छी तरह से पार उतर जाना चाहिए। जो आज्ञा सहित हो, वास्तव में वही ब्रह्मचर्य है और तभी काम होता है। गलती हो जाए तो दादा से माफी माँग लेना।
उधार जितना ज्यादा होता है, विचार उतने ही खराब होते हैं, बहुत ही खराब विचार होते हैं।
प्रश्नकर्ता : खराब विचार तो मुझे भी आते हैं।
दादाश्री : हाँ, वह उसका उधार है।
प्रश्नकर्ता : वह उधार कैसे खत्म करना है ?
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)
दादाश्री : वह तो ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करोगे तो सरप्लस आ जाएगा। ब्रह्मचर्य सारे नुकसान की भरपाई कर देता है, हर तरह के नुकसान की भरपाई कर देता है।
प्रश्नकर्ता : इस तरह बहुत सारे खराब विचार आए तो? ऐसी इच्छा नहीं होती, लेकिन संयोग मिलते ही विचार आते हैं और कभी कभार स्लिप हो जाते हैं।
दादाश्री : इच्छा तो आपकी है नहीं, लेकिन अगर चिकनी मिट्टी में जाओगे तो फिर क्या होगा? अपने आप स्लिप हो जाओगे। यानी यह सारा जो पिछला उधार है न, वह वापस गड़बड़ करवाता है। वे गड़बड़ियाँ खत्म तो करनी पड़ेंगी न! इच्छा तो अभी है ही नहीं, लेकिन क्या हो सकता है?
प्रश्नकर्ता : वह कच्चा रह गया कहलाएगा?
दादाश्री : ऐसा है कि जिसने ब्रह्मचर्य बिगाड़ दिया, उसका सबकुछ बिगड़ गया।
प्रश्नकर्ता : सभी के साथ रहने का हो जाए तो जल्दी-जल्दी नुकसान की भरपाई हो जाएगी न?
दादाश्री : हाँ, जल्दी से सारे नुकसान की भरपाई हो जाएगी। नुकसान की भरपाई हो जाने के बाद तेजी आती है, फायदा मिलता है। फिर तो वचनबल भी उत्पन्न हो जाता है। जैसा बोलते हैं, वैसा हो जाता है। अभी तो मेहनत करते हैं फिर भी मेहनत व्यर्थ जाती है, यहाँ आना हो, फिर भी देर हो जाती है, और अंदर फिर टिमिडनेस(घबराहट) के विचार आते हैं, उससे सारे काम उलझ जाते हैं। इसलिए इन मन-वचन-काया से अच्छी तरह से ब्रह्मचर्य पालन करोगे न, तो दिनोंदिन सारे नुकसान की भरपाई हो जाएगी।
ब्रह्मचर्य सँभल पाए, तो चेहरे पर कुछ नूर आएगा। नूर तो होना ही चाहिए न? वर्ना यह भी पता नहीं चलता न कि किस
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जाति के हैं? ब्रह्मचर्य से नूर आता है। काला-गोरा नहीं देखना है। कितना भी काला हो, लेकिन उसमें नूर होना चाहिए। बिना नूर के लोग किस काम के? वर्ना ब्रह्मचर्य का तेज तो ऐसा होना चाहिए कि सामनेवाली दीवार पर पड़े! फॉरिनवाले देखें तो देखते ही खुश हो जाएँ कि इन्डियन ब्रह्मचारी आए हैं, ऐसा होना चाहिए। कोई गोरा हो सकता है, कोई काला लेकिन वह नहीं देखना है, ब्रह्मचर्य देखना है। इसलिए ऐसा कुछ करो कि ब्रह्मचर्यव्रत खिल उठे।
प्रश्नकर्ता : तो क्या करना है?
दादाश्री : करना तो अपने में कुछ है ही नहीं न! करोमि, करोसि और करोति तो अपने में कुछ है नहीं, लेकिन बात को समझो अब।
प्रश्नकर्ता : अभी जो करते हैं, उसमें मूलतः किस चीज की कमी है?
दादाश्री : ये तुम्हारे पहले के जो नुकसान हैं, तो उस नुकसान की भरपाई हो जाए, उसके लिए तुम जागृति रखो कि नुकसान की भरपाई हो जाए और उसके बाद फिर सरप्लस बढ़ेगा तो फायदा दिखेगा! मैं सोलह साल का था, तब जब मुहल्ले से गुजरता था तो आते-जाते हुए भी लोगों को सुनाई देता था कि यह जमीन थर्रा (उठी) है! सोलह साल का था, तो भी जमीन थर्रा उठती थी! तुम से हमारा ऐसा कहना है कि समझ लो कि पिछले नुकसान की भरपाई कैसे हो? गलतियों तो खत्म करनी ही पड़ेंगी न? या ऐसे ही चलने देना है?
जिसे शुद्धात्मा का वैभव देखना हो, उसके लिए ब्रह्मचर्य व्रत अत्यंत हितकारी है। हम भी रिलेटिव में इस एक ही व्रत के लिए हेल्प करते हैं, बाकी हम और किसी चीज में हस्तक्षेप नहीं करते। इस ज्ञान में यदि सचमुच में कोई चीज मददगार है तो
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)
वह ब्रह्मचर्य ही है। ब्रह्मचर्य पालन करोगे तो ऐसा सुख भोगोगे, जो कि देवलोक भी नहीं भोगते, लेकिन अगर पालन नहीं कर पाए और बीच में ही फिसल गए तो मारे जाओगे! ब्रह्मचर्य व्रत, वह महान व्रत है और उससे आत्मा का स्मेशल अनुभव हो जाता है।
समझो गंभीरता, ब्रह्मचर्य व्रत की
सभी को ब्रह्मचर्यव्रत लेने की जरूरत नहीं है। वह तो जिसे उदय में आए। अंदर ब्रह्मचर्य के बहुत विचार आते रहते हों, वह फिर व्रत ले। जिसे ब्रह्मचर्य बरते, उनके दर्शन की तो बात ही अलग है न? किसी को उदय में आए, उसी के लिए ब्रह्मचर्य व्रत है। उदय में नहीं आए तो बल्कि दिक्कत हो जाती है, गड़बड़ हो जाती है। ब्रह्मचर्य व्रत साल भर के लिए ले सकते हैं या छः महीने का भी ले सकते हैं। जिसे ब्रह्मचर्य के बहुत विचार आते रहें, उन विचारों को दबाते रहने पर भी विचार आते रहें तभी ब्रह्मचर्य व्रत माँगना, वर्ना यह ब्रह्मचर्य व्रत माँगने जैसा नहीं है। यहाँ पर ब्रह्मचर्य व्रत लेने के बाद व्रत तोड़ना, वह महान गुनाह है। आपको किसी ने बाँधा नहीं है कि आप व्रत लो ही! अंदर यदि व्रत लेने के लिए इच्छाएँ बहुत उछल-कूद कर रही हों तभी व्रत लेना। कभी अगर व्रत भंग हो जाए तो ज्ञानी उसका इलाज भी बताते हैं। विषय का कभी भी विचार नहीं आए, वह ब्रह्मचर्य महाव्रत। यदि विषय याद आए तो व्रत टूटा।
हम तुम्हें ब्रह्मचर्य के लिए आज्ञा देते हैं, उसमें अगर तुम से गलती हो जाए तो उसकी जोखिमदारी बहुत भयंकर है। तुम यदि गलती नहीं करोगे तो फिर सबकुछ हमारी जोखिमदारी पर! तुम मेरी आज्ञापूर्वक जो कुछ भी करोगे उसमें तुम्हारी जोखिमदारी नहीं और मेरी भी जोखिमदारी नहीं! तुम आज्ञापूर्वक करोगे तो तुम्हारा अहंकार खड़ा नहीं होगा। इसलिए तुम्हारी जोखिमदारी नहीं आएगी और तो फिर आज्ञा देनेवाले की जोखिमदारी तो है ही न?! लेकिन
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आज्ञा देनेवाला स्यादवाद हो तो उन्हें जोखिमदारी कैसे आएगी? अतः खुद जोखिम नहीं लेते, इस तरह से आज्ञा देते हैं! यह व्रत, क्या कोई बाजारू चीज है? व्रत के बिना ईंसान में ब्रह्मचर्य रह सकता है, लेकिन अगर वह सहज भाव से हो तो, वरना मन कच्चा पड़ जाता है। यह ज्ञान मिलने के बाद सत्ता खुद के हाथ में आ गई, परसत्ता में होने के बावजूद स्वसत्ता में है। जिसका मन बंधा हुआ नहीं है, उसका मन परसत्ता में काम करता रहता है। बंधे हुए मन के लिए तो दादा का वचनबल काम करता है, उन एविडेन्सेस को तोड़ देता है। ज्ञानीपुरुष का वचनबल संसार की भक्ति तोड़ देता है।
यहाँ तो जो माँगोगे, वह शक्ति मिले, ऐसा है! यहाँ याद न आए तो घर जाकर माँगना। दादा को याद करके माँगोगे तब भी मिले, ऐसा है। दादा से कहना कि मुझ में शक्ति होती तो आपके पास माँगता ही क्यों? आप शक्ति दीजिए। दादा भगवान तो ऐसे हैं कि जो माँगोगे वह शक्ति देंगे! यह तो सब संक्षेप में कहना होता है। इसके लिए कोई विवेचन नहीं करना होता। मार्ग ओपन हुआ है, तो क्यों न माँगे?
आजीवन ब्रह्मचर्य, शुरू करवाए क्षपक श्रेणियाँ
प्रश्नकर्ता : दादाजी, आप मुझे विधि कर दीजिए, मुझे जिंदगीभर के लिए ब्रह्मचर्य व्रत लेना है।
दादाश्री : तुझे दिया जा सकता है और तू पालन कर सकेगा, ऐसा स्ट्रोंगपन है तुझ में, फिर भी जब तक हम विधि न कर लें, तब तक यह भावना करना। दादा तो सोच-समझकर चलते हैं, बहुत सोच-समझकर चलते हैं, इसलिए अभी तू भावना करना, उसके बाद देंगे। इस काल में तो पूरी जिंदगी का ब्रह्मचर्य देने जैसा नहीं है। देना ही जोखिम है। साल भर के लिए दे सकते हैं। बाकी पूरी जिंदगी की आज्ञा ली और यदि वह गिर जाए
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न, तो खुद तो गिरेगा लेकिन हमें भी निमित्त बनाएगा। फिर अगर हम महाविदेह क्षेत्र में वीतराग भगवान के पास बैठे हों तो वहाँ पर आकर भी हमें खड़ा करके कहेगा, ‘क्यों आज्ञा दी थी? आपको किसने जरूरत से ज्यादा समझदारी करने को कहा था?’ तो वीतराग के पास भी हमें चैन से बैठने नहीं देगा! तो खुद तो गिरेगा ही लेकिन दूसरे को भी खींच ले जाएगा। इसलिए भावना करना और हम तुझे भावना करने की शक्ति दे रहे हैं। सही तरीके से भावना करना, जल्दबाजी मत करना। जितनी जल्दबाजी, उतना ही कच्चा। हम तो किसी को भी ऐसा नहीं कहते कि ब्रह्मचर्य पालन करना, ये आज्ञा पालन करना। ऐसा कह ही कैसे सकते हैं? यह ‘ब्रह्मचर्य क्या चीज है?’ वह तो हम ही जानते हैं! यदि तेरी तैयारी हो तो हमारा वचनबल है, वरना फिर जहाँ है वहीं पड़ा रह न! यदि यह ब्रह्मचर्य व्रत लेकर संपूर्ण करेक्ट पालन करेगा, तो वर्ल्ड में अनोखा स्थान प्राप्त करेगा और एकावतारी बनकर यहाँ से सीधा मोक्ष जाएगा। हमारी आज्ञा में बल है, जबरदस्त वचनबल है। यदि तू कच्चा नहीं पड़ेगा तो व्रत नहीं टूटेगा, इतना अधिक वचनबल है।
फिर इसका क्या फल आएगा? सर्वसंग परित्याग उदयमान होगा। उसे त्याग नहीं कहते, वह उदय में आता है। उदय यानी जो बरते! ऐसा सर्वसंग परित्याग उदय में आए तो फिर उसे वीतरागों की दीक्षा दे सकते हैं। ऐसी दीक्षा मिल जाए तो बहुत शक्ति उत्पन्न होती है। दीक्षा का स्वभाव ही ऐसा है। ‘व्यवस्थित’ भी वैसा ही लेकर आया होता है। सभी की भावना फलेगी। हमारी ओर से आशीर्वाद मिलने से इन सभी में बहुत शक्ति उत्पन्न होगी। यदि ऐसी दीक्षा मिल जाए तो वीतराग धर्म का उद्धार होगा, वीतराग मार्ग का उत्थान होगा और वह होनेवाला है!
तब तक सबकुछ अंदर परखकर देख लेना कि भावना जगत् कल्याण की है या मान की? खुद के आत्मा को परखकर देखे
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तो सबकुछ पता चले, ऐसा है। शायद अंदर मान पड़ा होगा तो वह भी निकल जाएगा। क्योंकि किसी प्रधान को बाहर सब अच्छा हो और घर में दुःखी हो तो उसे सत्ता दी जाए तो वह एक-दो लाख खा जाएगा, लेकिन बाद में अघा जाएगा न? और अपना तो यह विज्ञान है। इसलिए अब जो मान है, वह निकाली माल है न! वह धीरे-धीरे खत्म हो जाएगा, फिर भी तब तक पूरी जागृति रखनी पड़ेगी। कोई गाली दे, अपमान करे फिर भी मान नहीं जागना चाहिए। कोई मारे फिर भी मान क्यों जागे? हमें तो जानना चाहिए कि सात मारी या तीन? जोर से मारी या धीरे से? ऐसे जानना है। खुद के स्वभाव में आना तो पड़ेगा न?! आपको तो सुबह में तय करना है, कि आज पाँच अपमान मिलें तो अच्छा और फिर पूरे दिन में एक भी नहीं मिला तो अफसोस रखना, तब मान की गाँठ पिघलेगी। जब अपमान हो, उस समय जागृत हो जाना।
अगर एक ही सच्चा इंसान होगा तो जगत् कल्याण कर सकेगा! संपूर्ण आत्मभावना होनी चाहिए। एक घंटे तक भावना करते रहना और अगर टूट जाए तो जोड़कर वापस शुरू कर देना। यह भावना की है तो भावना का जतन करना! लोगों का कल्याण हो इसलिए त्यागी वेष में, दीक्षा लेने की इच्छा है। अगर मन नहीं बिगड़ता हो तो फिर दीक्षा लेने में हर्ज नहीं।
जगत् का कल्याण अधिक से अधिक कब हो सकता है? त्याग मुद्रा हो, तब अधिक होता है। गृहस्थ मुद्रा में जगत् का कल्याण अधिक नहीं हो सकता, ऊपर-ऊपर सब होता है। लेकिन भीतर में सारी पब्लिक प्राप्ति नहीं कर पाएगी! ऊपर-ऊपर के सभी, बड़े-बड़े वर्ग के लोगों को प्राप्ति हो जाती है, लेकिन पब्लिक को नहीं हो पाती। त्याग अपने जैसा होना चाहिए। अपना त्याग, वह अहंकारपूर्वक नहीं है न?! और यह चारित्र तो बहुत उच्च कहलाता है!
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)
‘मैं शुद्धात्मा हूँ’ वह निरंतर लक्ष्य में रहे, तो वह महानतम् ब्रह्मचर्य है। उसके जैसा ब्रह्मचर्य और कुछ भी नहीं है। फिर भी अगर अंदर आचार्यपद प्राप्त करने के भाव हों, तब तो वहाँ बाहर का ब्रह्मचर्य चाहिए, वहाँ लेडी नहीं चलेगी।
ज्ञानीपुरुष की आज्ञा से चारित्र लेने में हर्ज नहीं, लेकिन इसके साथ ही चारित्र लेने के बाद इस चीज़ पर इतना अधिक सोच लेना चाहिए कि उस सोच के अंत में खुद का ही मन ऐसा हो जाए कि विषय तो बहुत ही बुरी चीज़ है। यह तो महा-महा मोह के कारण उत्पन्न हुई चीज़ है।
सिर्फ अब्रह्मचर्य छोड़ दे तो पूरा जगत् अस्त हो जाता है, तेजी से! सिर्फ ब्रह्मचर्य पालन करने से तो पूरा जगत् ही खत्म हो जाता है न! वर्ना हजारों चीज़ें छोड़ने पर भी उद्धार नहीं होगा।
चारित्र का सुख कैसा बरते
ज्ञानीपुरुष से चारित्र ग्रहण करे, सिर्फ ग्रहण ही किया है, अभी तक पालन तो हुआ ही नहीं है, तभी से बहुत आनंद होने लगता है। तुझे आनंद हुआ क्या?
प्रश्नकर्ता : हुआ है न, दादा! उसी क्षण से अंदर पूरा उघाड़ हो गया।
दादाश्री : लेते ही खुलासा हो गया न? लेते समय उसका मन क्लियर (साफ) होना चाहिए। उसका मन उस समय क्लियर था, मैंने जाँच लिया था। इसे चारित्र ग्रहण करना, कहा जाता है, व्यवहार चारित्र! और वह ‘देखना’ ‘जानना’ रखे, वह निश्चय चारित्र! चारित्र के सुख को जगत् समझा ही नहीं है। चारित्र का सुख कुछ अलग ही तरह का है।
हम इस स्थूल चारित्र की बात कर रहे हैं। जिसमें यह चारित्र उत्पन्न होता है, वह बहुत पुण्यशाली कहलाता है। ये सब लड़के
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कितने पुण्यशाली हैं! इन्होंने ब्रह्मचर्य व्रत की आज्ञा ली थी, सो उन्हें आनंद भी कैसा रहता है!
प्रश्नकर्ता : ऐसा आनंद तो मैंने कभी भी देखा ही नहीं था। निरंतर आनंद रहता है!
दादाश्री : अभी इस काल में लोगों का चारित्र खत्म हो गया है। कहीं भी अच्छे संस्कार रहे ही नहीं हैं न! यह तो, यहाँ आ गए और यह ज्ञान मिल गया, इसलिए ठीक हो गया है। ये तो कितने पुण्यशाली हैं, वर्ना कहीं के कहीं भटक गए होते। यदि इंसान का चारित्र बिगड़ जाए तो लाइफ यूजलेस हो जाती है। दुःखी-दुःखी हो जाता है! वरीज, वरीज, वरीज! रात को नींद में भी वरीज! इन्हें तो बहुत आनंद रहता है।
प्रश्नकर्ता : हाँ, पहले तो जीवन जीने योग्य ही नहीं था।
दादाश्री : ऐसा? अब जीने जैसा लगता है? घर में सभी की इच्छा हो कि बेटा दीक्षा ले, तो उसके 'व्यवस्थित' में वैसा है, ऐसा समझ सकते हैं। वही सबूत है। उसमें हम हस्तक्षेप नहीं करते। फिर अगर 'व्यवस्थित' में होगा तभी घर के सभी लोगों को इच्छा होगी। किसी का भी विरोध आया तो 'व्यवस्थित' बदला हुआ लगता है। क्योंकि 'व्यवस्थित' यानी क्या? किसी की तरफ से भी विरोध नहीं। सभी सिर्फ़ हरी झंडी ही बताएँ तो समझना कि 'व्यवस्थित' है।
ब्रह्मचर्य की आज्ञा मिलने के बाद यदि कोई (विषय के) बम फेंकने आए, तो हमें सावधान हो जाना चाहिए। यह आज्ञा मिली है, यह तो बहुत ही बड़ी चीज है! इस आज्ञा के पीछे दादा की खूब सारी शक्ति खर्च होती है। यदि आपका निश्चय नहीं छूटे तो दादा की शक्ति आपको हेल्प करेगी और आपका निश्चय छूट गया, तो दादा की शक्ति खिसक जाएगी। ब्रह्मचर्य तो बहुत बड़ा खजाना है! लोग तो लूट जाते हैं। छोटे बच्चे को बेर देकर
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)
हाथ के कड़े निकाल लें, उसके जैसा है। बेर की लालच में बच्चा फँस जाता है और कड़े दे देता है, इस तरह जगत् लालच में फँसा हुआ है।
ब्रह्मचर्य व्रत लेने के बाद आनंद बहुत बढ़ गया है न? अव्रत की वजह से ही यह सारा झंझट खड़ा हुआ है? इससे आत्मा के यथार्थ स्वाद का पता नहीं चलता। महाव्रत का आनंद तो अलग ही है न! उसके बाद तो आनंद बहुत बढ़ जाता है, बेहद आनंद होता है!
फायदा उठाएँ या नुकसान रोकेँ?
प्रश्नकर्ता : विषय से मुक्त हुआ कब कहलाएगा?
दादाश्री : उसे फिर विषय का एक भी विचार नहीं आए।
विषय से संबंधित कोई भी विचार नहीं, दृष्टि नहीं, वह लाइन ही नहीं। जैसे वह जानता ही नहीं हो, ऐसे रहता है, वह ब्रह्मचर्य कहलाएगा।
प्रश्नकर्ता : जैसे बाल्यावस्था होती है, वैसा?
दादाश्री : नहीं, जैसे किसी चीज से आप अंजान हों, उसका विचार आपको नहीं आया हो, उसके जैसा होता है। जिसने कभी भी मांसाहार खाया ही नहीं हो तो उसे मांसाहार के विचार ही नहीं आते। उस ओर दृष्टि ही नहीं होती और उस ओर का कुछ भी नहीं होता।
प्रश्नकर्ता : हमारी वह दशा कब आएगी?
दादाश्री : कब आएगी, वह नहीं देखना है! चलते रहो न तो अपने आप गाँव आ जाएगा। चलते रहने से गाँव आता है, बैठे रहने से नहीं आता। रास्ता ज्ञानीपुरुष ने बता दिया है और वह रास्ता तूने पकड़ लिया है। अब कब आएगा ऐसा कहने से
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थकान लगेगी। इसलिए बस चलते रहो न! तो अपने आप आ जाएगा। तुम्हारे जैसी समाधि बड़े-बड़े संतों को भी नहीं रहती। फिर इससे अधिक और क्या सुख चाहिए?
प्रश्नकर्ता : फिर भी अभी बाकी ही है न?
दादाश्री : भगवान का कानून कैसा है? हमें जो मिला, वही सही है। जो मिला, उसे नहीं भोगता और जो नहीं मिला, उसके लिए झंझट करता है, वह मूर्ख इंसान है। आगे बढ़ने के प्रयत्न तो जारी ही हैं, उसका बोझ रखने की जरूरत नहीं है। हम चल रहे हों और फिर कहें कि, 'गाँव कब पहुँचेंगे? गाँव कब पहुँचेंगे?' तो क्या होगा?! अरे, तू चल तो रहा ही है, अब क्यों बक-बक कर रहा है? चलने में आनंद आए तो देखने का मन होगा कि 'यह आम, यह जामुन' ऐसा आराम से सब देखे, लेकिन अगर 'कब पहुँचेंगे, कब पहुँचेंगे?' करते रहें न, तो फिर आनंद नहीं रहेगा।
प्रश्नकर्ता : व्रत लिए दो साल हो गए, फिर भी बाहर ऐसा कुछ खास परिणाम जैसा नहीं दिखता।
दादाश्री : वे तो तुम्हारे बेहिसाब घाटे हैं न!
प्रश्नकर्ता : लेकिन कितना घाटा?
दादाश्री : बहुत जबरदस्त घाटा! फिर भी अब तो जगत् जीत लेना है। अपना पद तो दिनोंदिन अपने आप आ ही रहा है।
प्रश्नकर्ता : कई बार ऐसा लगता है कि धीरे-धीरे कब पार उतरेंगे? यह महीना तो गया। इसमें कुछ प्रोग्रेस नहीं हुई।
दादाश्री : तुझे प्रोग्रेस नहीं देखनी है, लेकिन यही देखना है कि जिनसे नुकसान हो, ऐसे कोई साधन तो खड़े नहीं हो गए? फायदा तो निरंतर हो ही रहा है। आत्मा का स्वभाव है,
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फायदा करना! प्रोग्रेस भी आत्मा का स्वभाव है। आपको तो सिर्फ जागृति ही रखनी है कि गिर न जाए। और नीचे गया हो, उसे सुधारने के लिए 'फुल' 'फेज' में मशीनें और लश्कर-वशकर सहित तैयारी करो! अपनी सेफ साइड रहे, उस तरह चलते ही रहना। अपनी ट्रेन मोशन में ही रहे, वैसा करते रहना। सिर्फ विषय के बम ही बहुत जबरदस्त होते हैं, एक मिनट के लिए भी उसका विश्वास नहीं रख सकते।
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[ १५ ]
‘विषय’ के सामने विज्ञान से जागृति
आकर्षण के सामने चाहिए खुद का विरोध
प्रश्नकर्ता : “स्त्री पुरुषना, विषय संगते, करार मुजब देह भटकशे, माटे चेतो मन-बुद्धि।”
यह समझाए क्योंकि आपने कहा था कि हर कोई अपनी-अपनी भाषा में ले जाता है, तो इसमें ‘यथार्थ रूप से’ क्या होना चाहिए ?
दादाश्री : जहाँ आकर्षण हो जाए, उस आकर्षण में यदि तन्मयाकार हो गया तो वह चिपक गया। आकर्षण हो जाए, लेकिन आकर्षण में तन्मयाकार नहीं हो तो नहीं चिपकेगा। फिर अगर आकर्षण हो जाए तो उसमें हर्ज नहीं है।
प्रश्नकर्ता : खुद को यह चीज कैसे समझ में आएगी कि खुद इसमें तन्मयाकार हो गया है ?
दादाश्री : उसमें ‘अपना’ विरोध होना चाहिए, ‘अपना’ विरोध, वही तन्मयाकार नहीं होने की वृत्ति है। ‘हमें’ विषय के संग में चिपकना नहीं है, इसलिए ‘अपना’ विरोध तो रहता ही है न ? विरोध है, वही अलग रहना कहलाता है और गलती से चिपक जाए, गच्चा खाकर चिपक जाए, तो फिर उसका प्रतिक्रमण करना पड़ेगा।
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)
प्रश्नकर्ता : निश्चय से तो खुद का विरोध है ही, फिर भी ऐसा होता है कि उदय ऐसे आ जाते हैं कि उसमें तन्मयाकार हो जाते हैं, वह क्या है?
दादाश्री : विरोध है तो तन्मयाकार नहीं हो सकते और तन्मयाकार हुए तो 'गन्धा खा गए' ऐसा कहलाएगा। तो ऐसे गन्धा खाया, उसके लिए प्रतिक्रमण तो है ही लेकिन गन्धा खाने की आदत मत डाल लेना, गन्धा खाने के 'हेबीच्युएटेड' मत हो जाना। क्या कोई जान-बूझकर फिसलता है? यहाँ चिकनी मिट्टी हो, कीचड़ हो, वहाँ लोगों को जान-बूझकर फिसलने की आदत होती है या नहीं? लोग क्यों फिसल जाते होंगे?
प्रश्नकर्ता : वह मिट्टी का स्वभाव है और खुद मिट्टी पर चला, इसलिए।
दादाश्री : मिट्टी के स्वभाव को तो वह खुद जानता है इसलिए फिर पैर की उंगलियाँ जमाकर चलता है, और भी सभी प्रयत्न करता है। हर तरह के प्रयत्न करने के बावजूद भी अगर गिर जाए, फिसल जाए, तो उसके लिए भगवान उसे अनुमति देते हैं। लेकिन फिर वह ऐसी आदत ही डाल दे, तो क्या होगा?!
प्रश्नकर्ता : आदत नहीं पड़नी चाहिए।
दादाश्री : फिसलना तो अपने हाथ में, क़ाबू में नहीं रहा, इसलिए सबसे अच्छा तो 'अपना' विरोध, जबरदस्त विरोध! फिर जो कुछ हुआ, उसका जिम्मेदार तू नहीं है। तू चोरी करने के बिल्कुल विरोध में हो, फिर तुझ से चोरी हो जाए तो तू गुनाहगार नहीं है। क्योंकि तू उसके विरोध में है।
प्रश्नकर्ता : हम विरोध में हैं ही, फिर भी यह जो चूक जाते हैं, वह क्या चीज़ है?
दादाश्री : बाद में चूक जाते हैं, उसका सवाल नहीं है।
‘विषय’ के सामने विज्ञान से जागृति (खं-2-१५)
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उसे चूक जाने में भगवान के यहाँ कोई हर्ज नहीं है। जितना चूक गए हैं, भगवान तो उसे याद नहीं रखते। क्योंकि चूक जाने का फल तो उसे तुरंत ही मिल जाता है। उसे दुःख तो होता ही है न? वनां अगर वह शौक की खातिर करता, तो उसे आनंद होता।
प्रश्नकर्ता : इस विषय के बारे में खुद की होशियारी कितनी चल सकती है?
दादाश्री : ज्ञान मिला हो तो पूरी होशियारी चल सकती है।
प्रश्नकर्ता : ज्ञान मिल जाने के बावजूद भी कुछ अंश तक तो प्रकृति भूमिका निभाती ही है न?
दादाश्री : नहीं। ज्ञान से प्रकृति निर्मल हो जाती है। विषय में खुद की सहमति नहीं हो तो निर्मल होती जाती है।
प्रश्नकर्ता : विषय में सहमति नहीं होती फिर भी आकर्षित हो जाता है।
दादाश्री : वह आकर्षित तो हो सकता है। ऐसे आकर्षित हो जाए तो उसे भी जानना चाहिए। लेकिन स्ट्रॉंग निश्चय कभी भी किया ही नहीं।
प्रश्नकर्ता : कभी भी न चूकें ऐसा चाहिए।
दादाश्री : अपना तो निश्चय होना चाहिए कि हमारा यह ऐसा निश्चय है। फिर अगर कुदरत करे, तो वह अपने हाथ का खेल नहीं है। वह साइन्टिफिक सरकारमस्टेशियल एविडेन्स है, उसमें किसी का नहीं चलता।
प्रश्नकर्ता : इसका अर्थ तो यह हुआ कि ऐसे संयोग मुझे मिलने ही नहीं चाहिए। लेकिन यह कैसे होगा?
दादाश्री : ऐसा होगा ही नहीं न! जब तक जगत् है, संसार
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)
है, तब तक ऐसा नहीं हो सकता। ऐसा कब होगा? कि जैसे-जैसे आप आगे बढ़ते जाओगे, वैसे ही ऐसे संयोग कम होते जाएंगे, वैसे-वैसे उस जगह पर भूमिका अपने आप ही आएगी। ज्ञानी की भूमिका सेफ साइडवाली होती है! उनके सभी संयोग सुगम होते हैं।
प्रश्नकर्ता : उनका व्यवस्थित उस तरह गढ़ा हुआ होता है?
दादाश्री : हाँ, वैसा गढ़ा हुआ होता है। लेकिन वह एकदम से ऐसे नहीं हो सकता। आपको तो अभी कई मील पार करने के बाद वह रोड आएगी। सभी जगह आकर्षण नहीं होता। तुझे कितनी जगह पर आकर्षण होता है? क्या 'सौ' में से अस्सी जगह आकर्षण होता है?
पूर्व में चूके, उसके ये फल हैं
प्रश्नकर्ता : वह कैसा है कि यों दृष्टि गई कि अंदर खड़ा हो जाता है, और दृष्टि नहीं गई हो तो कुछ भी नहीं। लेकिन एक बार यों देख लिया हो तो फिर अंदर चंचल परिणाम खड़े हो जाते हैं।
दादाश्री : दृष्टि, वह वस्तु 'हम' से अलग है। तो फिर दृष्टि गई, उससे हमें क्या फर्क पड़ा? लेकिन हम अंदर चिपकना चाहें, तब दृष्टि क्या करे बेचारी?! होली की जब पूजा करने जाते हैं, तब वहाँ अपनी आँखें झुलस जाती हैं क्या? यानी होली को देखने से आँखें नहीं झुलसतीं। क्योंकि उसे हम सिर्फ देखते ही हैं। उसी तरह इस दुनिया में किसी भी जगह पर आकर्षण हो, ऐसा है ही नहीं, लेकिन अगर खुद के अंदर ही यदि कुछ टेढ़ा है तो आकर्षण होगा!
प्रश्नकर्ता : दो प्रकार की दृष्टि है, उसमें एक दृष्टि ऐसी है कि हम देखते हैं कि चमड़ी के नीचे खून-मांस और हड्डियाँ हैं, उसमें क्या आकर्षण? और दूसरी दृष्टि यह कि उसमें शुद्धात्मा