भारतकोश
संग्रह पर लौटें

समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य

Samaj Se Prapt Brahmacharya

दादा भगवान द्वारा

स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

४१६

समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

हाँ, मोक्ष दे रहा हो तो चलो न, हम दिन-रात क्यू में खड़े रहेंगे।

यानी आज के विषय संडास जैसे हो गए हैं। जैसे संडास के लिए खड़ा रहता है न! वैसे ही इन विषयों के लिए लाइन में खड़ा रहता है। संडास लगी कि भागा।

इसे प्रेम कहेंगे ही कैसे? प्रेम तो वह है कि विषय नहीं मिले फिर भी चिढ़ न मचे। यह तो जंगलीपन है। इसके बजाय तो साधु बनकर मोक्ष में चले जाने का विचार करना अच्छा। हम अपने गाँव ही अच्छे! अपने गाँव स्वतंत्र तो रह सकते हैं। ऐसा तो कहीं अच्छा लगता होगा?

अहमदाबाद के सेटों को मैंने देखा है। ऑफिस में लोग हाथ जोड़ते हैं और घर पर वह क्यू में खड़ा रहता है। इसमें तो स्वमान जैसा कुछ रहा नहीं न? इसे तो सामान्य जनता कहा जाएगा। हमें तो कुदरती रूप से क्यू मिली ही नहीं। क्या क्यू हमें शोभा देती है? जहाँ अंदर त्रिलोक के नाथ हैं, वहाँ?

यदि कभी लगनवाला प्रेम हो तो संसार है, बर्ना फिर विषय तो संडास है। वह फिर कुदरती हाजत में गया। उसे हाजतमंद कहते हैं न? जैसे सीताजी और रामचंद्रजी विवाहित ही थे न? सीताजी को ले गए फिर भी राम का चित्त सिर्फ सीता में ही था और सीता का चित्त सिर्फ राम में ही था। विषय तो चौदह साल तक देखा तक नहीं था, फिर भी चित्त उन्हीं में था। उसे विवाह कहते हैं। बाकी, ये तो हाजतवाले कहलाते हैं। कुदरती हाजत!

शादी की, मतलब समझना कि एक शौचालय आ गया अपने पास! यह जो शादी है, वह तो पूरा संडास है। स्त्री ने एक ही बार परपुरुष के साथ दोष किया हो तो उसे पाँच सौ-हज़ार जन्मों तक स्त्री बनना पड़ता है। विषय में फिसले तो नर्क की वेदना

दादा देते पुष्टि, आप्तपुत्रियों को (खं-2-१८)

४१७

भुगतनी पड़ेगी इसलिए आँखें गड़ाना ही नहीं। अन्य दोष चला सकते हैं, लेकिन यह अत्यंत दुःखदाई है। नर्क में पड़ने जैसा दुःख लगता है। अरे, इसकी बजाय नर्क में पड़ना अच्छा। अपने आप शादी सामने से आए तो उस समय शादी करना। जगत् के लोग निंद्य माने, उससे तो भयंकर दुःख पड़ते हैं वैसा होना ही नहीं चाहिए इसलिए तुरंत प्रतिक्रमण कर लेना चाहिए। लेकिन यदि शक्ति हो तो संयम लो और शक्ति नहीं हो तो शादी कर लेना। शादी करने से दोष नहीं लगता। बाकी विषय जैसी मार जगत् में अन्य कोई है ही नहीं। विषय का विचार आया कि तभी से वेदना उत्पन्न हुई, जलन होती रहती है। विषय को जीत लिया मतलब सबकुछ जीत लिया।

अगर पति होगा तभी झंझट रहेगा न? लेकिन यदि ब्रह्मचर्य व्रत ले लिया हो तो विषय से संबंधित झंझट ही नहीं रहेगा न! और ऐसा ज्ञान हो तो वह काम ही निकाल दे! लेकिन स्त्री को स्त्री-जाति का जबरदस्त अवरोध है, इसलिए श्रेणी बहुत ऊपर चढ़ती है लेकिन स्त्री-जाति है, इसलिए रुक जाती है न! स्त्री-जाति कितनी बाधक है! स्त्री-जाति को बाधकता उत्पन्न होती है, कि कब उसका लेवल खिसक जाए, वह कह नहीं सकते। जबकि पुरुष को तो खुद 'एक्जेक्टनेस' में आ चुका हो तो फिर वह खिसकेगा नहीं, उसकी गारन्टी!

तुझे अच्छा रहता है न?

प्रश्नकर्ता : यों तो अच्छा है, लेकिन दादा स्त्री-प्रकृति है न! आगे नहीं बढ़ने देगी, ऐसा होता है।

दादाश्री : लेकिन वह तो यदि बहुत प्रतिक्रमण करे और स्ट्रोंग रहे तो कुछ नहीं होगा। स्ट्रोंग रहना चाहिए। एक बार फिसलने के बाद मार खा खाकर मर जाएगी। एक ही बार फिसली तो खत्म हो गया। यानी विषय वह भोगने की चीज नहीं है, ऐसा मान ले तो चलेगा! भोगने की कई चीजें हैं बाहर। यह तो निरी

४१८

समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

जूटन, गंदगी सारी। आँखों को अच्छा नहीं लगता, कान को अच्छा नहीं लगता, जीभ को अच्छा नहीं लगता।

वह पढ़ती हो?

प्रश्नकर्ता : पढ़ नहीं पाती खास।

दादाश्री : उसे पढ़ने से तो पूरी प्रकृति अलग हो जाती है, वर्ना फिर शादी कर लेना अच्छा। तुझे तो चलेगा न?

प्रश्नकर्ता : प्रकृति टेन्शनवाली है न, इसलिए ज्ञान का परिणाम जैसा आना चाहिए वैसा नहीं आता।

दादाश्री : ज्ञान का परिणाम तो अगर सत्संग हो न, तभी आता है। वह तो सत्संग नहीं है, इसलिए। वह तो अपने यहाँ पर जब बन जाएगा सभी के साथ रहने से विचार भी नहीं आएगा, बल्कि आनंद होगा। वह मकान जब बनेगा वहाँ पर ब्रह्मचारीणियाँ रहेंगी, नहीं तो फिर शादी करवाने को कह देना।

अच्छे सत्संग में आए तो वह टेन्शनवाली प्रकृति हमेशा नहीं रहेगी, वह तो सबकुछ बदल जाएगा। वह तो कुसंग में जाए तभी बाधक रहता है सब।

उसमें भी अगर यह विषय पसंद ही नहीं हो तो छुटकारा होगा। फिर भी किसी पर दृष्टि आकृष्ट हो तो प्रतिक्रमण से खत्म हो जाएगा। लेकिन अगर अंदर से विषय पसंद हो तो शादी कर लेना अच्छा।

प्रश्नकर्ता : खुद के हित का नहीं सोचती।

दादाश्री : हित तो है ही नहीं न, भान ही नहीं है। मिटास में जो इंसान फँस जाए, उसका तो हित का ठिकाना ही नहीं रहता न!

प्रश्नकर्ता : उस समय खुद ने जो निश्चय किया है, वह कहाँ चला जाता है?

दादा देते पुष्टि, आप्तपुत्रियों को (खं-2-१८)

४१९

दादाश्री : जैसा खुद हो जाए, निश्चय भी वैसा ही हो जाता है। खुद कमजोर हो जाए, तो हो गया अनिश्चय।

प्रश्नकर्ता : लेकिन इस तरफ का निश्चय करने में इतनी देर लगती है जबकि शादी का निश्चय तुरंत ही हो जाता है। ऐसा क्यों?

दादाश्री : नहीं, यहाँ पर देर लगती ही नहीं। यहाँ पर, वह बिना देरीवाला ही है।

प्रश्नकर्ता : यहाँ पर भी बिना देरी का ही?

दादाश्री : हाँ, जैसा वह तुरंत, वैसा ही यह भी तुरंत। यहाँ पर अगर देर लगाकर किया हो तो उसका निश्चय बदलेगा ही नहीं न! कभी भी नहीं बदलेगा, मार डाले फिर भी नहीं बदलेगा।

प्रश्नकर्ता : हम सभी को अगर ठीक से समझकर यह निश्चय स्ट्रॉंग करना हो, तो समझ तो हम पूरी-पूरी लाए ही नहीं हैं न! तो फिर वह स्ट्रॉंगनेस कैसे आएगी?

दादाश्री : तेरा ध्येय होगा तो सबकुछ आएगा।

प्रश्नकर्ता : यानी जिसे स्ट्रॉंग करना है, उसका होगा ही?

दादाश्री : नहीं। ध्येय तय किया होगा न तो स्ट्रॉंग रहेगा तो फिर हो जाएगा। यह ध्येय नहीं है, उसका ध्येय नहीं है कुछ भी।

प्रश्नकर्ता : आपने दादा एक बार कहा था कि निश्चय मजबूत करना हो तो निश्चय के विरुद्ध का एक भी विचार नहीं आना चाहिए।

दादाश्री : हाँ। और अगर उस ध्येय को नुकसान पहुँचनेवाला कुछ भी आए तो उसे हटा देना चाहिए।

४२०

समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पृ०)

ऐसी 'समझ' कौन देगा?

इन बहन का तो निश्चय है कि 'एक ही जन्म में मोक्ष में जाना है। अब यहाँ नहीं चलेगा, इसलिए एक अवतारी ही बनना है।' तो फिर उन्हें सभी साधन मिल गए, ब्रह्मचर्य की आज्ञा भी मिल गई!

प्रश्नकर्ता : हम भी क्या एक अवतारी बनेंगे?

दादाश्री : तुझे थोड़ी देर लगेगी। अभी तो थोड़ा हमारे कहे अनुसार चलने दे। एक अवतारी तो आज्ञा में आने के बाद, इस ज्ञान में आने के बाद काम होगा। यों तो आज्ञा के बिना भी मोक्ष दो-चार जन्मों में होनेवाला है, लेकिन अगर आज्ञा में आ जाए तो एक अवतारी हो जाए! इस ज्ञान में आने के बाद हमारी आज्ञा में आना पड़ेगा। अभी तक आप सभी को ब्रह्मचर्य की आज्ञा दी नहीं है न? वह हम जल्दी से देते भी नहीं हैं क्योंकि सभी को पालन करना नहीं आता, अनुकूल नहीं रहता। उसके लिए तो मन बहुत मजबूत होना चाहिए।

आज सत्संग में जो साड़ी पहनी है, तो कितना अच्छा दिख रहा है। कल शादी में जाना था तब साड़ी पहनी थी, यदि कोई देखता तो कहता कि 'जबरदस्त दिख रही हो।' इस तरह जिससे लोगों को आश्चर्य हो, वैसा नहीं पहनना चाहिए। सादा पहनना, उसकी कीमत है। वह तो मोही कहलाता है। जो सादा और सलीकेवाला कहलाए, वैसा पहनना चाहिए। मैं भी नये कपड़े पहनता हूँ न? लेकिन वे सलीकेवाले होते हैं। भड़कीले कपड़े पहने हों तो लोग समझेंगे कि यह मूर्छित है। तुम ऐसे कपड़े पहनोगी तो लोग समझेंगे कि यह सत्संग में गई ही नहीं होगी, इसलिए सिम्पल साड़ी अच्छी। साड़ी के आधार पर देह है या देह के आधार पर साड़ी है? सिम्पल साड़ी ही प्रभावशाली होती है। लड़के भी भड़कीले कपड़े पहनते हैं न? तुम्हें मोक्ष में जाना

दाला देते पुष्टि, आप्तपुत्रियों को (खं-2-१८)

४२१

है या ऐसे लाल-पीली साड़ियाँ पहननी हैं और फिर से संसार में रहना है? ये लाल, पीली, नीली साड़ियाँ नहीं होनी चाहिए, वे सब तो मोहवाली चीजें हैं। कभी न कभी तो मोह छोड़ना ही पड़ेगा न?! क्या सिर्फ साड़ी को ही छोड़ना है? कभी न कभी देह को भी छोड़ना ही पड़ेगा न?

अर्थात् इसमें सच्चा सुख है ही नहीं। यह तो सब कल्पित सुख है। विषयों में भी कल्पित सुख है और अन्य चीजों में भी कल्पित सुख है। सच्चा सुख आत्मा में है। सनातन सुख! वह कभी भी नहीं जाता। हमारा सुख कभी भी जाता ही नहीं है न! यदि तुम्हें ब्रह्मचर्य पालन करना हो तो इतना सावधान रहना है कि परपुरुष का विचार तक नहीं आना चाहिए और विचार आते ही धो देना चाहिए।

प्रश्नकर्ता : आपने कहा था मिश्रचेतन से सावधान रहना।

दादाश्री : बस, इस मिश्रचेतन से जो सावधान रहा, उसका कल्याण हो गया! एक शुद्धचेतन है और एक मिश्रचेतन है। मिश्रचेतन में यदि फँस गए तो अगर आत्मा प्राप्त किया हो, फिर भी उसे भटकना देगा। अतः इसमें अगर विकारी संबंध हो गए तो भटकना पड़ेगा क्योंकि हमें मोक्ष में जाना है और वह व्यक्ति अगर जानवर में जानेवाला हो तो हमें भी वहाँ खींच ले जाएगा। संबंध हुआ तो वहाँ जाना पड़ेगा। इसलिए इतना ही देखना है कि विकारी संबंध खड़ा ही नहीं हो। मन से भी बिगड़ा हुआ नहीं हो, तब वह चारित्र कहलाता है। उसके बाद ये सब तैयार हो जाएँगे। बिगड़े हुए मन होंगे तो फिर वह फ्रैक्चर हो जाएगा, वर्ना एक-एक लड़की में कितनी शक्ति है! वह क्या कुछ ऐसी-वैसी शक्ति है? यह तो, अगर हिन्दुस्तान की बहनें हों और साथ में वीतराग का विज्ञान हो तो फिर बाकी क्या रहा?

माँ-बाप खुद की बेटी से चारित्र संबंधित बातचीत कैसे कर

४२२

समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

सकते हैं? तो वह कौन बातचीत कर सकता है? सिर्फ एक 'ज्ञानीपुरुष' ही बातचीत कर सकते हैं क्योंकि ज्ञानी किसी लिंग में नहीं होते। वे पुरुष लिंग में नहीं होते, स्त्री लिंग में नहीं होते, न ही नपुंसक लिंग में होते हैं। वे तो आउट ऑफ लिंग होते हैं। बहुत विचित्र जमाना आया है, फिसलता काल है, लड़कियों को कोई ज्ञान है नहीं, आगे का मार्गदर्शन नहीं है। इन लड़कियों को कितनी परेशानियाँ हैं! इसलिए यह मार्गदर्शन दे रहा हूँ।

इसलिए यह ज्ञान निकला। मेरी बहुत समय से इच्छा थी कि ऐसा ज्ञान निकले, लेकिन उसका टाइम आना चाहिए न? यह ज्ञान इतनों को तो मिला। सभी को जरूरत तो है ही न! इस ज्ञान की तो सभी को जरूरत है!

ब्रह्मचर्य व्रत पालन करना कहीं छोटे बच्चों का खेल नहीं है! विषय का विचार ही नहीं आना चाहिए और आ जाए तो उसे तुरंत प्रतिक्रमण करके धो देना। विचार तो आऐंगे ही। इस कलियुग में तो निरं ऐसे विचार आते ही हैं! लेकिन उन्हें धो देना।

प्रश्नकर्ता : विषय में हमने आनंद का आरोपण किया है, इसलिए वह आता है, लेकिन हमें ब्रह्म के आनंद की अनुभूति हो जाए तो वह आनंद ऑटोमैटिक छूट जाएगा?

दादाश्री : हाँ, क्योंकि जलेबी खाने के बाद चाय पीओगे, तो अपने आप ही न्याय हो जाएगा न! उसी प्रकार आत्मा का आनंद चखने के बाद विषय अपने आप ही फीके पड़ जाते हैं। इन लड़कियों को फीका ही पड़ गया है न! तभी तो राह पर आ गया न! इन लड़कियों को ब्रह्म का आनंद उत्पन्न हुआ और आरोपित आनंद फ्रैक्चर हो गया! इसीलिए खुद के दोनों पर रोना आया न? और लड़कियाँ तो यहाँ आकर मुझसे कहती हैं कि 'बहुत ही शक्ति बढ़ गई, जबरदस्त शक्ति बढ़ गई!' खुद का

दादा देते पुष्टि, आप्तपुत्रियों को (खं-2-१८)

४२३

सुख खुद के पास है, लोग ऐसा समझे ही नहीं हैं न? और सुख को ढूँढने बाहर जाते हैं।

प्रश्नकर्ता : लेकिन सुख को किसी न किसी का आधार है ही, मन का, वचन का.....

दादाश्री : परावलंबी सुख को सुख कहेंगे ही कैसे?

प्रश्नकर्ता : सिर्फ बहनों की शिविर करवाइए।

दादाश्री : तब तो बहुत प्रभाव पड़ेगा। वे जब सच्चा ब्रह्मचर्य पालन करेंगी, तो वह लाइट अलग ही तरह की होगी। यह तो जन्म लिया और मर गए यहीं पर, जानवर की तरह, वह किस काम का? बहनों सुन रही हो न, मेरी बात कड़वी लगे फिर भी अंदर उतारना। भले ही कड़वी लगे, लेकिन अंत में मीठी निकलेगी। मीठी निकलेगी या नहीं?

प्रश्नकर्ता : निकलेगी।

दादाश्री : अभी तो कड़वी लगेगी। मैंने कहा है सिर्फ यही एक सेफ साइड है, बाकी सब फँसाव है।

कल्याण करना है या कल्याण स्वरूप बनना है?

प्रश्नकर्ता : ये दीक्षा लेनेवाली जो बहने हैं, उन्हें धर्म का ऐसा कुछ रहस्य समझाइए कि जिससे उनका कल्याण हो और समाज को और लोगों को भी फायदा हो।

दादाश्री : कल्याण करने में एक ही चीज़ है कि जो खुद का कल्याण कर ले, वह बिना बोले दूसरों का कल्याण कर सकता है! अतः करना कितना है? 'ज्ञानीपुरुष' के पास खुद का कल्याण कर लेना है। फिर खुद कल्याण स्वरूप हुआ कि बिना बोले लोगों का कल्याण हो जाएगा और जो लोग बोलते रहते हैं, उससे कुछ नहीं होता। सिर्फ भाषण करने से, बोलते रहने से कुछ नहीं होता।

४२४

समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पूर्)

बोलने से तो बुद्धि इमोशनल हो जाती है। यों ही उनका चारित्र देखने से, उस मूर्ति को देखने से ही सभी भावों का शमन हो जाता है यानी कि उन्हें तो केवल खुद ही उस रूप हो जाने जैसा है। 'ज्ञानीपुरुष' के पास रहकर उस रूप होना है। ऐसी पाँच ही लड़कियाँ तैयार हो जाएँ तो कितने ही लोगों का वे कल्याण कर सकेंगी! बिल्कुल निर्मल बन जाना चाहिए और 'ज्ञानीपुरुष' के पास निर्मल हो सकते हैं और निर्मल होनेवाले हैं।

मूल गुजराती शब्दों के समानार्थी शब्द

हूँफ़ : अवलंबन, सलामती

निर्जरा : आत्म प्रदेश में से कर्मों का अलग होना

गलन : डिस्चार्ज होना, खाली होना

पुद्गल : जो पूर्ण और गलन होता है

गलगलिया : वृत्तियों को गुदगुदी होना, मन में मीठा लगना

निकाल : निपटारा

अटकण : जो बंधनरूप हो जाए, आगे नहीं बढ़ने दे

अरीसा : दर्पण

पूर्णण : चार्ज होना, भरना

उणोदरी : जितनी भूख लगे उससे आधा भोजन खाना

तरंगें : शेखचिल्ली जैसी कल्पनाएँ

उपाधि : बाहर से आनेवाला दुःख

निकाल : निपटारा

अणहक्क : बिना हक का, अवैध

भोगवटा : सुख या दुःख का असर

ऊपरी : बाँस, वरिष्ठ मालिक

तरछोड़ : तिरस्कार सहित दुत्कारना

राजीपा : गुरुजनों की कृपा और प्रसन्नता

चोविहार : सूर्यास्त से पहले भोजन करना

आश्रव : कर्म में उदय की शुरुआत, उदय कर्म में तन्मयाकार होना

आर्याबिल : जैनों में किया जानेवाला व्रत, जब भोजन में एक ही प्रकार का धान खाया जाता है

आड़ाई : अहंकार का टेढ़ापन

क्षपक : कर्मों का क्षय करनेवाला

दादा भगवान फाउन्डेशन के द्वारा प्रकाशित पुस्तकें

१. ज्ञानी पुरुष की पहचान २. सर्व दुःखों से मुक्ति ३. कर्म का सिद्धांत ४. आत्मबोध ५. मैं कौन हूँ ? ६. वर्तमान तीर्थंकर श्री सीमंधर स्वामी ७. भुगते उसी की भूल ८. एडजस्ट एवरीव्हेयर ९. टकराव टालिए १०. हुआ सो न्याय ११. चिंता १२. क्रोध १३. प्रतिक्रमण १४. दादा भगवान कौन ? १५. पैसों का व्यवहार १६. अंतःकरण का स्वरूप १७. जगत कर्ता कौन ? १८. त्रिमंत्र १९. भावना से सुधरे जन्मोंजन्म २०. माता-पिता और बच्चों का व्यवहार २१. प्रेम २२. समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य | २३. दान २४. मानव धर्म २५. सेवा-परोपकार २६. मृत्यु समय, पहले और पश्चात २७. निजदोष दर्शन से... निर्दोष २८. पति-पत्नी का दिव्य व्यवहार २९. क्लेश रहित जीवन ३०. गुरु-शिष्य ३१. अहिंसा ३२. सत्य-असत्य के रहस्य ३३. चमत्कार ३४. पाप-पुण्य ३५. वाणी, व्यवहार में... ३६. कर्म का विज्ञान ३७. आप्तवाणी - १ ३८. आप्तवाणी - २ ३९. आप्तवाणी - ३ ४०. आप्तवाणी - ४ ४१. आप्तवाणी - ५ ४२. आप्तवाणी - ६ ४३. आप्तवाणी - ८ ४४. समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पूर्वार्ध-उत्तरार्ध) ---|---

★ दादा भगवान फाउन्डेशन के द्वारा गुजराती भाषा में भी ५५ पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। वेबसाइट www.dadabhagwan.org पर से भी आप ये सभी पुस्तकें प्राप्त कर सकते हैं।

★ दादा भगवान फाउन्डेशन के द्वारा हर महीने हिन्दी, गुजराती तथा अंग्रेजी भाषा में “दादावाणी” मैगैज़ीन प्रकाशित होता है।

प्राप्तिस्थान

दादा भगवान परिवार

अडालज : त्रिभंदि, सीमंथर सिटी, अहमदाबाद-कलोल हाईवे, पोस्ट : अडालज, जि.-गांधीनगर, गुजरात - 382421. फोन : (079) 39830100, E-mail : info@dadabhagwan.org

राजकोट : त्रिभंदि, अहमदाबाद-राजकोट हाईवे, तरघड़िया चौकड़ी (सर्कल), पोस्ट : मालियासण, जि.-राजकोट. फोन : 9924343478

भुज : त्रिभंदि, हिल गार्डन के पीछे, एयरपोर्ट रोड. फोन : (02832) 290123

मोरबी : त्रिभंदि, मोरबी-नवलखी हाईवे, पो-जेपुर, ता.-मोरबी, जि.-राजकोट. फोन : (02822) 297097

सुरेन्द्रनगर : त्रिभंदि, सुरेन्द्रनगर-राजकोट हाईवे, लोकविद्यालय के पास, मुख्य रोड. फोन : 9737048322

गोधरा : त्रिभंदि, भांमैया गाँव, एफसीआई गोडाउन के सामने, गोधरा. (जि.-पंचमहाल). फोन : (02672) 262300

अहमदाबाद : दादा दर्शन, ५, ममतापार्क सोसाइटी, नवगुजरात कॉलेज के पीछे, उस्मानपुरा, अहमदाबाद-380014. फोन : (079) 27540408

वडोदरा : दादा मंदिर, १७, मामा की पोल-मुहल्ला, रावपुरा पुलिस स्टेशन के सामने, सलाटवाड़ा, वडोदरा. फोन : 9924343335

मुंबई : 9323528901 दिल्ली : 9810098564

कोलकता : 9830093230 चेन्नई : 9380159957

जयपुर : 9315408285 भोपाल : 9425024405

इन्दौर : 9039936173 जबलपुर : 9425160428

रायपुर : 9329644433 भिलाई : 9827481336

पटना : 7352723132 अमरावती : 9422915064

बंगलूर : 9590979099 हैदराबाद : 9989877786

पूणे : 9422660497 जलंधर : 9814063043

U.S.A. : Dada Bhagwan Vignan Institute :

100, SW Redbud Lane, Topeka, Kansas 66606

Tel. : +1 877-505-DADA (3232),

Email : info@us.dadabhagwan.org

U.K. : +44 330-111-DADA (3232) UAE : +971 557316937

Kenya : +254 722 722 063 Singapore : +65 81129229

Australia : +61 421127947 New Zealand : +64 21 0376434

Website : www.dadabhagwan.org

उसने जीत लिया जगत्!

अब्रह्मचर्य के विचार आएँ लेकिन अगर ब्रह्मचर्य की शक्तियाँ माँगता रहे, तो वह बहुत बड़ी बात है। ब्रह्मचर्य की शक्तियाँ माँगते रहने से किसी को दो साल में, किसी को पाँच साल में, लेकिन बैसा उदय आ जाता है। जिसने अब्रह्मचर्य जीत लिया, उसने पूरा जगत् जीत लिया। ब्रह्मचर्यवाले पर तो शासन देवी-देवता बहुत खुश रहते हैं!

-दादाश्री

dadabagwan.org

ISBN 978-81-81128-46-3

9 788158 128663 >

Printed in India

Price ₹ 100