भारतकोश
संग्रह पर लौटें

समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य

Samaj Se Prapt Brahmacharya

दादा भगवान द्वारा

स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

१६

समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

के बारे में समझने जाए तो बुद्धि विषय को लेट गो नहीं करेगी। ये बुद्धिमान लोग लेट गो करते हैं, इसका क्या कारण है? लोकसंज्ञा के अनुसार चलते हैं, इसलिए उस तरफ का आवरण नहीं टूटा।

एक जन ने कहा कि बुद्धिपूर्वक में क्या हर्ज है? तब मैंने कहा, बुद्धिपूर्वक की चीजें उजाले में करनी होती है। सीक्रेसी(गुप्त) नहीं होती। हजार लोगों की मौजूदगी में बैठकर जलेबी खा सकते हैं? जलेबी में हर्ज नहीं है न? उसे शर्म नहीं आती?

प्रश्नकर्ता : नहीं। शर्म नहीं आती, रौब से खाई जा सकती है!

दादाश्री : यानी विषय के बारे में यदि कोई सोचे न, यदि सोचना आए, तो वह विषय की ओर कभी जाएगा ही नहीं। लेकिन सोचना भी नहीं आता न? विषय, वह अजागृति है। विषय पुसाए ही कैसे? जो चीजें सोचने पर अच्छी नहीं लेंगे, उसी चीज का संबंध कैसे पुसाए?

निरि गंदगी दिखे विषय में

अब कितने ही लोग चारित्र (दीक्षा) लेने लगे हैं। क्योंकि विषय में इतनी गंदगी है कि जिस पर अगर निबंध लिखना हो तो निबंध लिखने में भी घिन आ जाए। यह तो ठीक है, एक तरह की हैबिट हो गई है। मूलतः अज्ञानता और मूर्च्छा की वजह से गंदगी में हाथ डाला। अब भान में आने के बाद क्या घिन नहीं आएगी? इस बिल्कुल ही गंदगीवाले सुख को छोड़ देना है। इसे तो गंदगी देखकर ही छोड़ देना है। यदि इस विषय का सुख छोड़ दे तो पूरी दुनिया का मालिक बन जाएगा। वास्तव में तो वह सुख है ही नहीं। इस जलेबी में सुख है, श्रीखंड में सुख है, ऐसा कह सकते हैं, उसके लिए मना नहीं कर सकते लेकिन इस विषय में तो सुख है ही नहीं।

मुझे तो इस विषय में इतनी गंदगी दिखती है कि मुझे यों

विश्लेषण, विषय के स्वरूप का (खं-1-1)

१७

ही सहज ही उस ओर का विचार तक नहीं आता। मुझे विषय का कभी भी विचार ही नहीं आता। मैंने इतना कुछ देख लिया है, इतना कुछ देखा है कि मुझे इंसान आरपार दिखाई दे, ऐसा देखा है। विषय का यदि पृथक्करण किया जाए, ज्ञान से नहीं लेकिन बुद्धि से, तो भी इंसान पागल हो जाए।

यह सब तो नासमझी से खड़ा है। प्याज की गंध किसे आती है? जो प्याज खाता है, उसे गंध नहीं आती। जो प्याज नहीं खाता है, उसे तुरंत ही गंध आती है। विषयों में पड़ा है इसलिए विषयों में रही गंदगी को नहीं समझ पाता। इसलिए विषय नहीं छूट पाता और राग करता रहता है। वह भी अभानता का राग है। सिर्फ आत्मा ही मांसरूपी नहीं है। बाकी सब निरा मांस ही है न? !

जिस तरह आहारी आहार करता है, उसी तरह विषयी विषय करता है लेकिन बात समझ में आनी चाहिए न? और वह लक्ष्य में रहना चाहिए न? आहार तो हर रोज अच्छा खाता है, लेकिन चार दिन का भूखा हो तो बासी गंदी रोटी भी खा जाता है। यह आहार तो अच्छा होता है, लेकिन यह विषय तो उससे भी ज्यादा गंदगीवाला है। भूख की जलन की वजह से गंदी रोटी खाता है। उसी तरह जलन की वजह से वह विषय भोगता है। लेकिन गंदी रोटी खाते समय कहता है, 'चलेगा'। लेकिन क्या फिर से वैसा खाने की इच्छा होती है? नहीं। दोबारा वैसा खाने की इच्छा तो किसी को भी नहीं होती लेकिन विषय में ऐसा नहीं रहता न? विषय में भी ऐसा ही रहना चाहिए।

कई लोग मांसाहार करते हैं, वे राजीखुशी से करते हैं न? और आपको मांसाहार करने को कहा हो तो? धिन आपणी न? इसका क्या कारण है? क्योंकि मांसाहार करनेवाले का डेवेलपमेन्ट अलग है और आपका डेवेलपमेन्ट अलग है। जैसे-जैसे डेवेलपमेन्ट बढ़ता जाता है, वैसे वैसे संसार की चीजों पर धिन आती जाती

१८

समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

है। इस विषय पर चिन्त नहीं आती न? लेकिन वह तो अन्य सभी गंदी चीजों से भी ज्यादा बुरा है। फिर भी लोगों को इसका पता नहीं चलता। डेवेलपमेन्ट की कितनी कमी है। पकौड़ों में पसीना गिर रहा है, ऐसा देखते हैं फिर भी खाते हैं, तो यह डेवेलपमेन्ट कितना कच्चा है? क्योंकि इस गंदगी को समझा ही नहीं। यह शरीर यों सुंदर दिखता है लेकिन यदि बनियान को निकालकर मुँह में डालो तब पता चलेगा कि वह कैसा है! वह कैसा लगता है? खारा लगता है न? बदबूदार! जिसके पास खड़े रहने पर भी बदबू आती है, वहाँ उसके प्रति विषय कैसे खड़ा हो सकता है? यह कितनी बड़ी भ्रांति है!!!

खरा सुख किस में?

इंसान को रोंग बिलीफ है कि विषय में सुख है। अब अगर विषय से भी ऊँचा सुख मिल जाए तो विषय में सुख नहीं लगेगा! विषय में सुख नहीं है लेकिन देहधारी को व्यवहार में चारा ही नहीं। बाकी जान-बूझकर गटर का ढक्कन कौन खोलेगा? विषय में सुख होता तो चक्रवर्ती इतनी सारी रानियाँ होने के बावजूद सुख की खोज में नहीं निकलते! इस ज्ञान से ऐसा ऊँचा सुख मिलता है। फिर भी इस ज्ञान के बाद तुरंत विषय चले नहीं जाते, लेकिन धीरे धीरे चले जाते हैं। फिर भी खुद को सोचना तो चाहिए कि यह विषय कितना गंदगीवाला है!

पुरुष को ऐसा दिखे कि स्त्री है, तो यदि पुरुष में रोग होगा तभी उसे ऐसा दिखेगा कि 'स्त्री है'। पुरुष में रोग नहीं होगा तो स्त्री नहीं दिखेगी।

ज्ञानियों की दृष्टि आरपार होती है। जैसा है वैसा दिखता है। वैसा दिखे तो फिर विषय रहेगा? उसे कहते हैं, ज्ञान। ज्ञान मतलब आरपार, जैसा है वैसा दिखना। यह हाफूस का आम हो तो उस विषय के लिए हम मना नहीं करते। उसे यदि काटे तो खून

विश्लेषण, विषय के स्वरूप का (खं-1-1)

१९

नहीं दिखेगा, तो उसे आराम से खा। इसे तो काटने से खून निकलता है, लेकिन उसकी जागृति नहीं रहती न? इसलिए मार खाता है। इसलिए यह संसार खड़ा रहा है। इस ज्ञान से जागृति धीरे धीरे बढ़ती जाती है, विषय खत्म होता जाता है। मुझे बंद करने के लिए कहना नहीं पड़ता। अपने आप ही आपका बंद होता जाता है।

दूषमकाल में हमेशा इंसान का मन कैसा होता है कि, 'कल से शक्कर नहीं मिलेगी' ऐसा कहा कि सभी भाग-दौड़ करके शक्कर ले आएँगे। यानी मन ऐसे हैं कि टेढ़े चलें। इसीलिए हमने सभी तरह की छूट दी है। दूषमकाल में मन पर बंधन लगाएँ कि 'ऐसा करो' तो मन उल्टा चले बिना नहीं रहेगा। इस दूषमकाल का स्वभाव है कि यदि रोका जाए तो बल्कि पूरे जोश के साथ उसी में पड़ेगा। इसलिए इस काल में हमारे निमित्त से अक्रम प्रकट हुआ है, जहाँ किसी भी तरह की रोकटोक नहीं है। इसलिए फिर मन जवान होता ही नहीं, मन बूढ़ा हो जाता है।' बूढ़ा हुआ कि निर्बल हो जाता है, फिर खत्म हो जाता है। जवान तो कब होता है कि जब उसे रोकें, तब। तृप्त इंसान विषय की गंदगी में हाथ ही नहीं डालेगा। यह तो भीतर तृप्ति नहीं है, इसलिए इस गंदगी में फँस गए हैं। वीतरागों का विज्ञान, वही तृप्ति लाता है।

कितने ही जन्मों का गिनें तो पुरुषों ने इतनी-इतनी स्त्रियों से शादी की और स्त्रियों ने पुरुषों से शादी की, फिर भी अभी तक उन्हें विषय का मोह नहीं टूटता। तब फिर इसका अंत कब आएगा? इससे अच्छा तो हो जाओ अकेले, ताकि झंझट ही खत्म हो जाए न? !

चल रहे हैं कहाँ? दिशा कौन सी?

यह इन्जिन होता है, तो कोई इंसान इन्जिन में तेल डालता रहे, उस इन्जिन को चलाता रहे, ऐसा एकाध साल तक करता रहे तो आसपास के लोग क्या कहेंगे उसे? 'अरे, इन्जिन को कोई पट्टा जोड़कर काम करवा ले न।' उसी तरह लोग जीवन जीने

२०

समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

के लिए अच्छा खाना खाते हैं, लेकिन फिर पट्टा ही नहीं जोड़ते! यानी कि इस मशीन से दूसरा काम करवा लेना चाहिए या नहीं करवाना चाहिए? क्या आपने करवाने का तय किया है? कुछ सदगति हो, मोक्ष हो, उसके लिए पट्टा जोड़ना है, जीवन जीकर काम निकाल (निपटारा) लेना है।

हम अगर लोगों से पूछें कि आप क्यों खाते हो? तो कहेंगे कि जीवन जीने के लिए और पूछेंगे कि जीवन क्यों जी रहे हो? तो कहेंगे, मुझे पता नहीं! अरे, यह कैसा? जीवन किसलिए जीना है? वह भी पता नहीं और बच्चों के कारखाने निकाले हैं! यह जीवन क्या बच्चों के कारखाने के लिए होगा? बच्चों के कारखाने, वह तो स्वभाविक है, लेकिन इससे क्या फायदा हुआ? शादी हुई तो बच्चे तो होते ही रहेंगे न? कुत्तों को भी बच्चे होते रहते हैं। वह तो अनपढ़ है, फिर भी बच्चे होते हैं। ये कुत्ते क्या पढ़े लिखे हैं? तो क्या उन्हें बच्चे नहीं होते होंगे? उन्होंने भी शादी की होती है। उनकी भी वाइफ होती है न? अतः कुछ समझना तो पड़ेगा न? तूने इंजिनियरिंग पास की है, इसलिए अब तेरे पास क्या हुआ? मेन्टेनन्स की तेरी व्यवस्था हो गई। अब तेरा इंजन चलता रहेगा। पेट्रोल और ऑइल के लिए सारी व्यवस्था हो गई। अब तुझे इस इंजन से क्या काम करवा लेना है? अपना कुछ हेतु तो होना चाहिए न? यह नौकरी-व्यापार करते हैं, पैसा कमाते हैं, फिर भी यह पैसा तो दिन-रात चिंता ही करवाता है और बुरे विचार ही आते रहते हैं। किसका भोग लूँ, किसका ले लूँ, सब अणहक्क (बिना हक्क का, अवैध) का भोगता रहता है और फिर नर्क में जाना पड़ता है। वहाँ भयंकर दुःख भुगतने पड़ते हैं। ये सुख तो उधार पर लिए हुए सुख कहलाते हैं और उधार के सुख लें, तो वे कितने दिन चलेंगे? नर्क गति में सूद के साथ लौटाने पड़ेंगे। उससे अच्छा उधार के सुख भी नहीं चाहिए और हमें वह दुःख भी नहीं चाहिए। बाकी तो सब खाओ आराम से। जलेबी खाओ, चाय पीओ!

विश्लेषण, विषय के स्वरूप का (खं-1-1)

२१

समझो ब्रह्मचर्य की कमाई

प्रश्नकर्ता : ब्रह्मचर्य से क्या फायदे होते हैं?

दादाश्री : इस अब्रह्मचर्य से क्या फायदा हुआ आपको, यह बताओ पहले। बेटा-बेटी हुए। वह क्या कोई कम फायदा है? निरा व्यापार ही है न, फायदा ही हुआ न! हिन्दुस्तान में कई लोग रोते हैं। 'क्यों, क्या हुआ भाई? आपको क्या तकलीफ आ गई?' मैं जैन बनिया, मेरी बेटी भागकर सुथार के यहाँ चली गई और उससे शादी कर ली। तो देखो, स्वाद आया न! कैसा मीठा स्वाद आया?। फिर घर में सभी के मन में ऐसा होता है कि इससे तो यह लड़की नहीं होती तो अच्छा था!

प्रश्नकर्ता : लेकिन किस फायदे के लिए ब्रह्मचर्य पालन करना चाहिए?

दादाश्री : यदि यहाँ पर हमें कुछ लगा हो और खून निकल रहा हो तो फिर बंद क्यों करते हैं? क्या फायदा?

प्रश्नकर्ता : ज्यादा खून न बह जाए।

दादाश्री : खून बह जाए तो क्या होगा?

प्रश्नकर्ता : शरीर में बहुत वीकनेस आ जाएगी।

दादाश्री : तो यह अधिक अब्रह्मचर्य से ही वीकनेस आ जाती है। ये सभी रोग अब्रह्मचर्य की वजह से ही है। क्योंकि जो कुछ खाना खाते हो, पीते हो, सांस लेते हो, इन सभी का परिणाम होते, होते, होते उसका... जिस तरह इस दूध से दही बनाते हैं तो दही, वह अंतिम परिणाम नहीं है। दही से फिर, वह होते होते फिर मक्खन बनता है, मक्खन से घी बनता है। घी वह अंतिम परिणाम है। उसी तरह इसमें ब्रह्मचर्य पुद्गलसार है पूरा!

यह खून बह जाए तो हर्ज नहीं, लेकिन पुद्गलसार निकल जाए तो मुश्किल है, बहुत हानिकारक। अभी तक पूर्ण किया,

२२

समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

उसका सार क्या है? तब कहते हैं, उसे नहीं संभालोगे तो मनुष्यपन चला जाएगा। सार का सार है वह। तत्त्व का तत्त्वार्क है, अर्क कम इस्तेमाल होगा तो अच्छा है या ज्यादा इस्तेमाल होगा तो?

प्रश्नकर्ता : कम इस्तेमाल होगा तो अच्छा है।

किंफायत करो वीर्य और लक्ष्मी की

दादाश्री : इसलिए इस जगत् में दो चीजों का अपव्यय नहीं करना चाहिए। एक तो लक्ष्मी और दूसरा वीर्य। जगत् की लक्ष्मी गटर में ही जा रही है। अतः लक्ष्मी खुद के लिए इस्तेमाल नहीं होनी चाहिए। बेकार में दुरुपयोग नहीं होना चाहिए और हो सके तब तक ब्रह्मचर्य पालन करना चाहिए। जो आहार खाते हैं, उसका अर्क बनकर अंत में वह अब्रह्मचर्य से खत्म हो जाता है। इस शरीर में कुछ नसें ऐसी होती है जो वीर्य संभालती हैं और वह वीर्य इस शरीर को संभालता है। इसलिए हो सके तब तक ब्रह्मचर्य संभालना चाहिए।

ब्रह्मचर्य का रिवाज तो सिर्फ मनुष्य जाति में ही हैं न! मजबूरन उपदेश देकर ब्रह्मचारी बनाते हैं। फिर भी वह फलदायी है, इसलिए इसे चलने दिया। वास्तव में तो ब्रह्मचर्य पालन समझकर करना चाहिए। ब्रह्मचर्य के फल स्वरूप यदि मोक्ष नहीं मिल रहा हो तो वह ब्रह्मचर्य नसबंदी के बराबर ही है। फिर भी उससे शरीर अच्छा रहता है, मजबूत रहता है, रूपवान बनते हैं, ज्यादा जीते हैं! बैल भी हृष्टपुष्ट रहता है न? बैल में भी ताकत बहुत रहती है, तभी तो वह खेत जोतने के काम आता है न? हम किसी की निंदा नहीं करते लेकिन बात का सार समझ लेना है! हजार का विदेशी नोट हो तो यहाँ इन्डिया में उसकी एक्सचेन्ज कीमत डेढ़ सौ रुपये ही होती है। इसलिए हजार के बदले हजार रुपया गिनकर नहीं दे सकते। अतः हमें ऐसी जाँच कर लेनी चाहिए कि इस चीज की एक्सचेन्ज कीमत क्या है? यह ब्रह्मचर्य कैसा है? और खरा ब्रह्मचर्य कैसा होता है? जिस ब्रह्मचर्य से मोक्ष हो, वह ब्रह्मचर्य काम का!

विरलेषण, विषय के स्वरूप का (खं-1-1)

२३

अक्रम विज्ञान प्राप्ति करवाए मोक्ष की

फिर भी यह विज्ञान किसी को भी, विवाहितों को भी मोक्ष में ले जाएगा लेकिन ज्ञानी की आज्ञानुसार चलना चाहिए। अगर कोई तेज दिमागवाला हो और वह कहे, 'साहब, मैं दूसरी शादी करना चाहता हूँ।' तेरा जोर होना चाहिए। पहले क्या शादियाँ नहीं करते थे? भरत राजा की तरह सौ रानियाँ थीं, फिर भी मोक्ष में गए! यदि रानियाँ बाधक होतीं तो मोक्ष में जा सकते थे क्या? तो बाधक क्या है? अज्ञान बाधक है। इतने सारे लोग हैं, उन्हें कहा होता कि स्त्री को छोड़ दो, तो वे सब कब स्त्रियों को छोड़ते? और कब उनका हल आता? इसलिए कहा, स्त्रियाँ भले रही और दूसरी शादी करनी हो तो मुझसे पूछकर शादी करना, पूछे बगैर मत करना। देखो छूट दी है न सारी?

कर्म के अधीन स्त्री-पुरुष बने हैं। एक पेड़ पर क्या सभी पंछी तय करके बैठते हैं? नहीं! उसी तरह ये सभी एक परिवार में जन्म लेते हैं। किसी के तय किए बिना ही कर्म के उदयानुसार ही घर के लोग इकट्ठे होते हैं और फिर बिखर भी जाते हैं। उसमें लोगों ने एडजेस्टमेंट लेकर, व्यवस्थित किया। यानी यह लड़का है तो उस पर पुत्रभाव रहता है। दूसरा, बहन के भाव रहते हैं, स्त्री के भाव रहते हैं। अभी लोगों में वे भाव विकृत हो गए हैं। बाकी, पहले किसी पर बहन का भाव आ जाए तो दूसरा भाव होता ही नहीं था। बहन कहा यानी सिर्फ बहन ही। माँ यानी माँ। दूसरा विचार ही नहीं आता था लेकिन अभी तो सभी जगह बिगड़ ही गया है।

इतना आवश्यक है, ब्रह्मचर्य के कैन्डिडेट के लिए

यह तो 'जैसा है वैसा' नहीं दिखने से मूर्च्छा रहती है। जब तक स्त्री को 'जैसा है वैसा' आरपार नहीं देख सके, तब तक विज्ञन नहीं खुलता। जब मन विषय में खुला होगा (जब विषय

२४

समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

का स्वरूप पूरी तरह से समझ में आ जाएगा) तब विज्ञान खुलेगा या फिर साल भर ब्रह्मचर्य पालन करे और विषय का विचार तक भी नहीं आए, तब विज्ञान खुलेगा। फर्स्ट विज्ञान में नेकेड दिखेगा, सेकन्ड विज्ञान में चमड़ी उतार दी हो ऐसा दिखेगा और अंत में आरपार दिखेगा तब जाकर विज्ञान खिलेगा।

अन्य कहीं दृष्टि बिगड़े, तब तो वह अधोगति की बहुत बड़ी निशानी कहलाती है। शादी हो गई है या नहीं?

प्रश्नकर्ता : नहीं हुई।

दादाश्री : तो शादी कर लो न?

प्रश्नकर्ता : शादी करने की इच्छा ही नहीं होती मुझे।

दादाश्री : ऐसा? तो शादी किए बिना चलेगा?

प्रश्नकर्ता : हाँ, मेरी तो ब्रह्मचर्य की ही भावना है। उसके लिए कुछ शक्ति दीजिए, समझ दीजिए।

दादाश्री : उसके लिए भावना करनी पड़ेगी। तू रोज बोलना कि, 'हे दादा भगवान! मुझे ब्रह्मचर्य पालन करने की शक्ति दीजिए।' और विषय का विचार आते ही निकाल देना। नहीं तो उसका बीज डल जाएगा। वह बीज यदि दो दिन तक रहे, तब तो मार ही डालेगा। फिर से उगेगा। इसलिए विचार आते ही उखाड़कर फेंक देना और किसी भी स्त्री पर दृष्टि नहीं गड़ाना। दृष्टि आकृष्ट हो जाए तो हटा देना और दादा को याद करके माफी माँग लेना। यह विषय आराधन करने जैसा है ही नहीं, ऐसा भाव निरंतर रहे तो फिर खेत साफ हो जाएगा। और अभी भी हमारी निश्रा में रहे तो उसका सबकुछ पूरा हो जाएगा।

प्रश्नकर्ता : हाँ, ठीक है।

दादाश्री : उसके कितने ही जन्म कम हो जाएँगे, कितने ही जन्मों के खड़े किए गए लफड़े भी खत्म हो जाएँगे।

विश्लेषण, विषय के स्वरूप का (खं-1-1)

२५

हरहाया विचार, वह तो पाशवता कहलाती है। जहाँ देखे वहाँ विचार आता है, वह हरहाया पशु जैसा कहलाता है। उससे तो एक कीले से बाँध देना अच्छा है। स्त्री, वह पुरुष का संडास है और पुरुष, वह स्त्री का संडास है। तो जब संडास जाते हो तब क्या शौचालय में बैठे रहने का मन होता है? उसी तरह यह भी संडास ही है। उसमें क्या मोह रखना?! विषय विषय को भोगता है, वह तो परमाणु का हिसाब है।

जिसे ब्रह्मचर्य पालन करना ही है, उसे तो संयम की खूब परीक्षा करके देख लेना चाहिए। कसौटी पर कस कर देख लेना चाहिए और यदि ऐसा लगे कि फिसल पड़ेगा तो शादी कर लेना अच्छा है। फिर भी वह कंट्रोलपूर्वक होना चाहिए। शादी करनेवाली से कह देना पड़ेगा कि मेरा ऐसा कंट्रोलपूर्वक का है।

ज्ञान किसे अधिक रहता है, दोनों में से?

प्रश्नकर्ता : जो विवाहित हैं, उन्हें ज्ञान देरी से आता है न? और जो ब्रह्मचर्य पालन करते हैं, उन लोगों को ज्ञान जल्दी आता है न?

दादाश्री : नहीं। ऐसा कुछ नहीं है। विवाहित हो और यदि ब्रह्मचर्यव्रत ले तो आत्मा का सुख कैसा है, वह उसे पूर्णतः समझ में आ जाता है। वनाँ तब तक, सुख विषय में से आ रहा है या आत्मा में से आ रहा है, वह समझ में नहीं आता और ब्रह्मचर्यव्रत हो तो, भीतर उसे आत्मा का अपार सुख बर्तता है, मन अच्छा रहता है, शरीर स्वस्थ रहता है!

प्रश्नकर्ता : और जिसने शादी किए बिना ही ब्रह्मचर्यव्रत लिया हो, उसे कैसा अनुभव होता है?

दादाश्री : इसे पूछकर देखो न! बहुत सुख बर्तता है और इसीलिए बहुत बदलाव आ गया है।

२६

समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

प्रश्नकर्ता : तो दोनों की ज्ञान की अवस्था एक समान होती है या उसमें अंतर होता है? शादी शुदावाले की और ब्रह्मचर्यावाले की?

दादाश्री : ऐसा है न, ब्रह्मचर्यव्रतवाला कभी भी नहीं गिरता। उसे कैसी भी मुश्किलें आए फिर भी नहीं गिरता। फिर उसे सेफ साइड कहते हैं।

शरीर का राजा कौन?

ब्रह्मचर्य तो शरीर का राजा है। जो ब्रह्मचर्य में रहे, उसका दिमाग तो कैसा सुंदर होता है। ब्रह्मचर्य, वह तो पूरे पुद्गल का सार है।

प्रश्नकर्ता : यह सार असार नहीं हो जाता न?

दादाश्री : नहीं, लेकिन वह सार खत्म हो जाता है, 'यूजलेस' हो जाता है न! जिसमें वह सार रहे, उसकी तो बात ही अलग है न? महावीर भगवान को बयालीस साल तक ब्रह्मचर्यसार था। हम जो आहार लेते हैं, उस सभी के सार का सार, वह वीर्य है, वह एक्स्ट्रैक्ट है। अब एक्स्ट्रैक्ट यदि ठीक से संभालकर रखे तो आत्मा जल्दी प्राप्त होता है, सांसारिक दुःख नहीं आते, शारीरिक दुःख नहीं आते, अन्य कोई दुःख नहीं आते।

प्रश्नकर्ता : लेकिन वह शारीरिक है या उसका आत्मा के साथ भी संबंध है?

दादाश्री : नहीं, आत्मा के साथ कोई संबंध नहीं है, वह शारीरिक है लेकिन अगर यह शरीर स्वस्थ रहेगा तो आत्मा मुक्त हो सकेगा न जल्दी? यह शरीर कमजोर होगा, तो क्रोध-मान-माया-लोभ खड़े हो जाएंगे। उसमें से बंधन होगा।

प्रश्नकर्ता : यानी यदि शारीरिक संपत्ति अच्छी हो, तो क्रोध-मान-माया-लोभ जरा कम उत्पन्न होते हैं, ऐसा?

दादाश्री : हाँ, लेकिन शारीरिक संपत्ति दो प्रकार की। एक

विश्लेषण, विषय के स्वरूप का (खं-1-1)

२७

तो पुण्य की वजह से शारीरिक संपत्ति होती है और दूसरी, उस एक्स्ट्रैक्ट की वजह से। और एक्स्ट्रैक्ट की वजह से यदि शारीरिक संपत्ति हो तो उसकी तो बात ही अलग है न?!

प्रश्नकर्ता : उस एक्स्ट्रैक्ट की वजह से शारीरिक संपत्ति अच्छी रहती है?

दादाश्री : हाँ, अच्छी रहती है। कोई अड़चन ही नहीं आती। किसी भी तरह का डिफेक्ट ही नहीं आता। क्रोध-मान-माया-लोभ भी उत्पन्न नहीं होते।

प्रश्नकर्ता : ब्रह्मचर्य, वह आत्मसुख के लिए किस तरह हेल्प करता है?

दादाश्री : बहुत हेल्प करता है। ब्रह्मचर्य नहीं हो तो देहबल के कम होते ही सारा मनोबल खत्म हो जाता है, और बुद्धिबल भी खत्म हो जाता है, अहंकार भी ढीला पड़ जाता है। बड़ा डी.एस.पी. हो, लेकिन बूढ़ा हो जाए तो ढीला पड़ जाता है या नहीं? यानी वह उसका तेज कहलाता है, ब्रह्मचर्य!

प्रश्नकर्ता : मतलब ये मन-बुद्धि-चित्त और अहंकार, ये सभी ब्रह्मचर्य से ज्यादा सुदृढ़ बनते हैं?

दादाश्री : उसी में से खड़े हुए हैं। अब्रह्मचर्य से वे सभी मर जाते हैं।

प्रश्नकर्ता : ब्रह्मचर्य तो अनात्म भाग में आता है न?

दादाश्री : हाँ, लेकिन वह पुद्गलसार है!

प्रश्नकर्ता : तो पुद्गलसार है, वह समयसार को किस तरह से हेल्प करता है?

दादाश्री : पुद्गलसार (प्राप्त) हो जाता है तभी समयसार हो सकता है। मैंने यह ज्ञान दिया, और यह तो अक्रम है इसलिए चल गया। दूसरी जगह पर तो नहीं चलेगा। उस क्रमिक में तो

२८

समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

पुद्गलसार चाहिए ही, वर्ना याद भी नहीं रहेगा कुछ भी। वाणी बोलने के भी लाले पड़ें।

प्रश्नकर्ता : यानी इन दोनों में कुछ ऐसा निमित्त-नैमित्तिक संबंध है क्या?

दादाश्री : है न! क्यों नहीं? मुख्य चीज़ है वह तो! ब्रह्मचर्य हो तो फिर आप जो तय करो, वह काम हो सकेगा। सभी तय किए हुए व्रत-नियम सब पालन कर सकोगे। आगे बढ़ सकोगे और प्रगति होगी। पुद्गलसार तो बहुत बड़ी चीज़ है। एक तरफ पुद्गलसार हो, तभी समय का सार निकाल सकेगा!

किसी ने लोगों को ऐसी सही समझ दी ही नहीं है न! क्योंकि लोग खुद ही पोल(गोलमाल, गड़बड़, इन्सिंसियर) स्वभाव के हैं। पहले के ऋषि-मुनि प्योर थे। इसलिए वे समझाते थे।

प्रश्नकर्ता : हम इस उम्रवाले विद्यार्थियों को सिखाते हैं। उम्र के हिसाब से जो कहना चाहिए उस तरह से, कि तू ऐसा करना ताकि वीर्यबल का जतन हो। तो निन्यानवे प्रतिशत लड़के नहीं मानते।

दादाश्री : और मैं इन लड़कों से कहता हूँ कि, ‘अरे, तुम शादी कर लो’ तब वे कहते हैं कि, ‘नहीं। हमें ब्रह्मचर्य पालन करना है।’ और आप कहते हो कि, ‘ब्रह्मचर्य पालन करो’ तब वे कहते हैं कि ‘नहीं। हमें शादी करनी है।’ यानी पहले उपदेश देनेवाले को वीर्यबल का पालन करना चाहिए। बोलनेवाला बलसहित होना चाहिए। आपके बोल की कीमत कब होगी? जब आप बलवान होंगे तभी सामनेवाला एक्स्प्रेट करेगा। वर्ना सामनेवाला आगे चलेगा ही नहीं न! अभी इसके जैसे कई लड़के मेरे पास हैं। उन्हें हमेशा के लिए ब्रह्मचर्य पालन करना है, मन-वचन-काया से।

[ २ ]

विकारों से विमुक्त की राह

विकारों को हटाना है ?

प्रश्नकर्ता : 'अक्रम मार्ग' में विकारों को हटाने का साधन कौन सा ?

दादाश्री : यहाँ विकारों को हटाना नहीं है। यह मार्ग अलग है। कुछ लोग यहाँ मन-वचन-काया से ब्रह्मचर्य(व्रत) लेते हैं और कुछ पत्नीवाले होते हैं, उन्हें हमने जो रास्ता बताया होता है, उस तरह उसका हल लाते हैं। यानी 'यहाँ' विकारी पद है ही नहीं, पद ही 'यहाँ' निर्विकारी है न! विषय, वे विष नहीं हैं, वे बिल्कुल विष नहीं है। विषय में निडरता, वह विष है। विषय तो मजबूरन, जैसे पुलिसवाला पकड़कर करवाए और करे, उस तरह का हो तो उसमें हर्ज नहीं। खुद की मर्जी से नहीं होना चाहिए। पुलिसवाला पकड़कर जेल में बिठाए तो आपको बैठना ही पड़ेगा न? वहाँ कोई चारा है? यानी कर्म उसे पकड़ता है और कर्म ही उसे पटकता है, उसके लिए मना नहीं कर सकते न। बाकी, जहाँ विषय की बात भी हो, वहाँ पर धर्म नहीं है। धर्म निर्विकार में होता है। भले ही कितने ही कम अंश का धर्म हो, लेकिन धर्म निर्विकारी होना चाहिए।

विकार से ही संसार खड़ा हुआ है। यह पूरा संसार यानी विषयों का विकार, इन पाँच इन्द्रियों के विषयों के विकार हैं और मोक्ष यानी निर्विकार, आत्मा निर्विकार है। वहाँ राग भी नहीं है और द्वेष भी नहीं है।

३०

समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पूर्व)

प्रश्नकर्ता : बात सही है, लेकिन उस विकारी किनारे से निर्विकारी किनारे तक पहुँचने के लिए कोई तो नाव होनी चाहिए न?

दादाश्री : हाँ, उसके लिए ज्ञान है। उसके लिए वैसे गुरु मिलने चाहिए। गुरु विकारी नहीं होने चाहिए। गुरु विकारी होंगे तो पूरा समूह नर्क में जाएगा। फिर से मनुष्यगति भी नहीं देख पाएँगे। गुरु में विकार शोभा नहीं देता।

किसी भी धर्म ने विकार को स्वीकार नहीं किया है। जो विकार को स्वीकार करे, वह वाम मार्गी कहलाता है। पहले के जमाने में वाम मार्गी थे, विकार में रहते हुए भी ब्रह्म ढूँढ़ने निकले थे।

प्रश्नकर्ता : वह भी एक विकृत रूप ही हो गया, ऐसा कहा जाएगा न?

दादाश्री : हाँ, विकृत ही न! इसलिए वाम मार्गी कहा न! वाम मार्गी यानी मोक्ष में नहीं जाते और लोगों को भी मोक्ष में नहीं जाने देते। खुद अधोगति में जाते हैं और लोगों को भी अधोगति में ले जाते हैं।

प्रश्नकर्ता : हर एक युग में ऐसे वाम मार्ग रहे होंगे न?

दादाश्री : हाँ, हर एक युग में वाम मार्ग तो होता ही है। कम या ज्यादा, वाम मार्ग होता तो है। पहले बहुत कम था। अभी कलियुग में बहुत ही ज्यादा है।

जब तक जरा सा भी विकारी संबंधवाला हो न, तब तक वह दुनिया में किसी को नहीं सुधार सकता। विकारी स्वभाव आत्मघाती स्वभाव ही है। अभी तक किसी ने सिखाया नहीं कुछ भी?

ब्रह्मचर्य, प्रोजेक्ट का परिणाम

प्रश्नकर्ता : कुदरत को यदि स्त्री-पुरुष की जरूरत नहीं होती, तो वह क्यों दिया?

विकारों से विमुक्त की राह (खं-1-2)

३१

दादाश्री : स्त्री-पुरुष वह कुदरती है और ब्रह्मचर्य का हिसाब वह भी कुदरती है। इंसान जिस तरह से जीना चाहे, वह खुद जैसी भावना करता है, उसी भावना के फल स्वरूप यह जगत् है। ब्रह्मचर्य की भावना पिछले जन्म में की होगी तो इस जन्म में ब्रह्मचर्य का उदय आएगा। यह जगत् प्रोजेक्ट है।

प्रश्नकर्ता : लेकिन अभी भी मुझे यह बात समझ में नहीं आ रही है कि इंसान को ब्रह्मचर्य पालन क्यों करना चाहिए?

दादाश्री : उसे लेट गो करो आप। ब्रह्मचर्य पालन नहीं करना है। मैं कुछ ऐसे मत का नहीं हूँ। मैं तो लोगों से कहता हूँ कि शादी कर लो। कोई शादी करे तो उसमें मुझे हर्ज नहीं है।

ऐसा है, जिसे सांसारिक सुखों की ज़रूरत है, भौतिक सुखों की जिसे इच्छा है, उसे शादी करनी चाहिए। सबकुछ करना चाहिए और जिसे भौतिक सुख अच्छे ही नहीं लगते और सनातन सुख चाहिए, उसे नहीं।

प्रश्नकर्ता : 'ब्रह्मचर्य पालन करना ही नहीं है' ऐसा मेरा चैलेन्ज नहीं है, लेकिन उस बात की समझ नहीं है।

दादाश्री : ठीक है। बात सही है। आपका चैलेन्ज नहीं है, वह बात सच है, और चैलेन्ज दिया जा सके, ऐसा है भी नहीं। क्योंकि इस दुनिया में किसी ने किस तरह के भाव किए हैं, उसने क्या प्रोजेक्ट किया है, वह क्या हम बता सकते हैं? किसी ने पूरी जिंदगी भक्ति का ही प्रोजेक्ट किया होगा तो पूरी जिंदगी भक्ति ही करता रहेगा। किसी ने दान देने का ही प्रोजेक्ट किया होगा तो दान देता रहेगा। किसी ने ऑब्लाइज़िंग नेचर का किया हो तो ऑब्लाइज़ करता रहेगा। कोई विकारी नेचर का हो, वह खुद की स्त्री का सुख भोगता है लेकिन अन्य कई लड़कियों का गलत फायदा उठाता है। वे सब भले ही कैसे भी लोग हों लेकिन

३२

समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

जैसा प्रोजेक्ट किया होगा, वैसा यह फल मिला है। उसके कड़वे फल मिलते हैं। उसे भुगतने नर्कगति में जाना पड़ता है।

उसके हेतु पर आधारित है

अगर विषय विकार होगा तो कितना ही योग करने पर भी वह फलदायी नहीं होगा।

प्रश्नकर्ता : विषय जो होता है, विकार अंदर भरा होता है, छोटे से बड़े जीव तक में, हर एक का विषय पुत्रदान के लिए ही होता है न?

दादाश्री : पुत्र या पुत्री कुछ भी हो, लेकिन वह संसार बढ़ाने के लिए ही है न! वंश बढ़ाने के लिए ही है न!

प्रश्नकर्ता : विषय करता है वह इच्छा से नहीं, सिर्फ संतान प्राप्ति के लिए ही विषय होना चाहिए, वह ठीक है?

दादाश्री : ऐसा है न, पुत्र के हेतु के लिए जो अब्रह्मचर्य करता है, उसका और ब्रह्मचर्य का कोई लेना-देना नहीं है। ब्रह्मचर्य तो बहुत ऊँची चीज है। प्रजा की उत्पत्ति के लिए अब्रह्मचर्य का इस्तेमाल करने की कोई जरूरत नहीं है। प्रजा की उत्पत्ति के लिए तो ये सभी जानवर भी करते ही रहते हैं न! उसमें नया क्या है? उससे तो मौज-मस्ती के लिए इस्तेमाल करे वह अच्छा। मौज-मस्ती के लिए हो रहा है और संतानोत्पत्ति के लिए करने से तो ऐसा लगता है कि मुझे यह फल मिला है। यह तो निम्नतम कक्षा की बात है। जैसा मेरी दृष्टि में हैं, वह आपको बता रहा हूँ। बाद में आपको जो ठीक लगे, वैसा समझना।

प्रश्नकर्ता : उसमें दोष है क्या?

दादाश्री : दोष तो है ही न! वह प्रजा उत्पत्ति के लिए नहीं होना चाहिए। उससे अच्छा तो आप अगर शौक के लिए कर रहे हो तो आखिर में उसका धक्का लगेगा, तब वापस पलटेंगा

विकारों से विमुक्ति की राह (खं-1-2)

३३

और इसमें तो प्रजा की उत्पत्ति में नौ बच्चे हो जाए फिर भी पलटेगा ही नहीं न!

प्रश्नकर्ता : आज के विकारमय वातावरण में, घर में रहकर भी आत्मा का, भगवान का अनुभव कैसे हो सकता है?

दादाश्री : घर में रहकर मतलब घर आपत्ति उठाता है?

प्रश्नकर्ता : वातावरण विकारी है।

दादाश्री : हाँ, लेकिन कहाँ पर विकारी नहीं है? जहाँ मन है, उस जगह पर विकारी वातावरण होता ही है। आप जहाँ जाओ, वहाँ मन तो साथ में रहेगा ही न? गुफाओं में जाने से तो घर अच्छा है। वहाँ गुफाओं में नई तरह के विकार खड़े होंगे। उससे तो ये पुराने विकार अच्छे, पुराने तो बूढ़े हो चुके होते हैं। वे विकार मर जाएँगे कभी न कभी। जबकि ये नए विकार नहीं मरेंगे।

प्रश्नकर्ता : क्या घर में रहकर मन के विकार छूट सकते हैं?

दादाश्री : हाँ, सबकुछ छूट ही जाता है न! घर में रहकर तो क्या, कहीं भी रहकर छूट सकता है, यदि 'ज्ञानीपुरुष' मिल जाएँ तो। 'ज्ञानीपुरुष' के मिलने पर भी यदि विकार नहीं छूटें तो वे ज्ञानी हैं ही नहीं। आप ज्ञानी से कहना, कि 'आप कैसे मिले हमें कि हमें यह विकार उत्पन्न हुए?' लेकिन लोग विनयी हैं न, इसलिए ऐसा नहीं कहते बेचारे। अंदर-अंदर परेशान होते रहते हैं, फिर भी नहीं कहते।

नहीं समझा जगत् ने, स्वरूप वासना का

प्रश्नकर्ता : कामवासना का सुख क्षणिक है, ऐसा समझने के बावजूद भी कभी कभार उसकी प्रबल इच्छा होने का कारण क्या है? और उस पर कैसे अंकुश लगाया जा सकता है?

दादाश्री : कामवासना का स्वरूप जगत् ने जाना ही नहीं।

३४

समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

कामवासना उत्पन्न क्यों होती है, यदि यह जान ले तो उसे क्राबू में लाया जा सकता है। लेकिन वस्तुस्थिति में वह कहाँ से उत्पन्न होती है, यह जानता ही नहीं। फिर क्राबू में कैसे ले सकता है? कोई क्राबू में नहीं ले सकता। जिसका ऐसा दिखता है, कि क्राबू में कर लिया है, वह तो पूर्व की भावना का फल है, बाकी कामवासना का स्वरूप कहाँ से उत्पन्न हुआ, उस उत्पन्न दशा को समझ ले और वहीं पर ताला लगा दिया जाए तभी उसे क्राबू में ले सकते हैं। इसके सिवा भले ही वह ताला लगाए या कुछ और करे फिर भी उसका कुछ चलेगा नहीं। काम-वासना नहीं करनी हो तो हम रास्ता दिखाएँगे।

अज्ञान की गलतियों की सजा इन्द्रियों को

प्रश्नकर्ता : ये जो इन्द्रियाँ हैं, वे भोगे बिना शांत नहीं होती। तो इसके अलावा और कोई उपाय है ?

दादाश्री : ऐसा कुछ भी नहीं है। बेचारी इन्द्रियाँ तो ठेठ तक भोग भोगती ही रहती हैं। उनमें जब तक सत्व रहे, तब तक। जीभ में अगर बरकत हो न तब उस पर हम कोई भी चीज रखे कि तुरंत उसका स्वाद हमें बता देगी, और बड़ी उम्र हो जाए और जीभ में बरकत नहीं रहे तो नहीं बताती। आखों में बरकत हो तो सभी, कोई भी चीज हो उसे बता देती है। बूढ़ापे की वजह से अगर बरकत जरा कम हो गई हो, तो नहीं बता सकती। अतः उम्र होने पर बेचारी इन्द्रियाँ तो अपने आप ही फीकी पड़ जाती हैं लेकिन ये विषय फीके नहीं पड़ते। ये इन्द्रियाँ विषयी नहीं हैं।

विषय इन इन्द्रियों का दोष नहीं है। इन्द्रियों को बिना वजह सजा देते हैं लोग। इन्द्रियों को, शरीर को सजा देते हैं न, सभी? वे भैंस की भूल पर चरवाहे को मारते हैं। भूल भैंस की और मारते हैं चरवाहे को। भूखा मारते हैं, बिना वजह। उनका क्यों नाम देता है तू? सीधा रह न। तेरा टेढ़ा है अंदर, नीयत चोर

विकारों से विमुक्त की राह (खं-1-2)

३५

हैं, और उस पर भी ज्ञानी नहीं मिले हैं, ज्ञानी मिल जाएँ तो सीधे रास्ते पर ले जाएँगे, देर ही नहीं लगेगी।

प्रश्नकर्ता : विषयों में से निकलने के लिए ज्ञान महत्वपूर्ण चीज है।

दादाश्री : सभी विषयों से छूटने के लिए ज्ञान ही जरूरी है। अज्ञान से ही विषय चिपके हुए हैं। कितने ही ताले लगाएँ, फिर भी विषय बंध नहीं होते। इन्द्रियों को ताला लगानेवाले मैंने देखे हैं, लेकिन विषय कहीं ऐसे बंद नहीं होते।

ज्ञान से सब चला जाता है। अपने यहाँ इन सभी ब्रह्मचारियों को विचार तक नहीं आता, ज्ञान से।

विषय का शौक, बढ़ाए विषय

प्रश्नकर्ता : हमारे जो सभी शौक हैं, उन्हें पूरे करने से हमें टेम्पररी आनंद मिलता है?

दादाश्री : लेकिन अभी आइस्क्रिम हो तो अच्छा नहीं लगता पेट में? लेकिन बाद में क्या, खा लेने के बाद? फिर, लाओ जरा सुपारी! क्यों वापस? यह आइस्क्रिम है फिर भी सुपारी की जरूरत? तब कहता है, 'नहीं, वह तो मुँह साफ करना पड़ता है न!' और सुपारी खाने के बाद क्या? जैसा था वैसा ही!

प्रश्नकर्ता : साइकॉलॉजी ऐसा कहती है कि आप एक बार पेट भरकर आइस्क्रिम खा लो। फिर आपको खाने का मन ही नहीं करेगा।

दादाश्री : दुनिया में ऐसा हो ही नहीं सकता। नहीं, पेट भरकर खाने से तो खाने का मन होगा ही लेकिन जो आपको नहीं खाना हो वही खिलाते रहते हैं, डालते रहते हैं, उसके बाद जब उल्टियाँ होती हैं तब फिर बंद हो जाता है। पेट भरकर खाने से तो वापस भूख जागेगी वह तो। यह विषय तो, हमेशा ही जैसे-