भारतकोश
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य

Samaj Se Prapt Brahmacharya

दादा भगवान द्वारा

स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

जैसे विषय भोगता जाता है, वैसे-वैसे ज्यादा सुलगता है। विषय तो ज्यादा सुलगते जाते हैं।

जो भी सुख भोगते हैं, उसकी प्यास बढ़ती जाती है। भोगने से प्यास बढ़ती जाती है। नहीं भोगने से प्यास मिट जाती है। उसे कहते हैं तृष्णा। नहीं भोगने से थोड़े दिन परेशान रहेंगे, शायद महीने-दो महीने लेकिन अपरिचय से फिर बिल्कुल भूल ही जाएँगे। और इस बात में दम नहीं है कि भोगनेवाला इंसान, वासना निकाल सकेगा। इसलिए लोगों की, शास्त्रों की खोज है कि यह ब्रह्मचर्य का रास्ता ही उत्तम है। अतः सबसे बड़ा उपाय है अपरिचय! ताकि जब विचार आएँ, तो उन्हें तौल सके और उसके परिणामों का पता चले। परिचय से तो पता ही नहीं चलता कि क्या दोष है! और अपरिचय से विषय छूट जाता है। हिन्दुस्तान में लोग यही नहीं समझते कि ब्रह्मचर्य किसे कहते हैं। अपरिचय से विषय पूरा खत्म हो जाता है।

और एक बार उस चीज़ से दूर रहे न, बारह महीने या दो साल तक दूर रहे तो उस चीज़ को भूल ही जाता है फिर। मन का स्वभाव कैसा है? दूर रहा कि भूल जाता है। नज़दीक जाएं तो फिर कोचता रहता है! मन का परिचय छूट गया। 'हम' अलग रहे, इसलिए मन भी उस चीज़ से दूर रहा, इसलिए फिर भूल जाता है, हमेशा के लिए। उसे याद तक नहीं आती। बाद में, कहने पर भी उस तरफ नहीं जाता। ऐसा तुझे समझ में आता है? तू तेरे दोस्त से दो साल दूर रहेगा तो फिर तेरा मन भूल जाएगा। महीने-दो महीने तक किच-किच करता रहेगा, मन का स्वभाव ऐसा है और अपना ज्ञान तो मन की सुनता ही नहीं है न?

नहीं रोकना चाहिए मन को

प्रश्नकर्ता : मन को जब विषय भोगने की छूट देते हैं,

विकारों से विमुक्ति की राह (खं-1-2)

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तब वह नीरस रहता है और जब हम उसे विषय भोगने में कंट्रोल करते हैं, तब वह ज्यादा उछलता है। आकर्षण रहता है, तो उसका क्या कारण है?

दादाश्री : ऐसा है न, इसे मन का कंट्रोल नहीं कहते। जो अपने कंट्रोल को नहीं स्वीकारे, वह कंट्रोल है ही नहीं। कंट्रोलर होना चाहिए न! खुद यदि कंट्रोलर होगा तो कंट्रोल को स्वीकार करेगा। खुद कंट्रोलर है ही नहीं, मन नहीं मानता, मन आपकी सुनता नहीं है न?

मन को रोकना नहीं है। मन के कॉंजेज़ को रोकना है। मन तो खुद एक परिणाम है। वह परिणाम बताए बगैर नहीं रहेगा। वह परीक्षा का रिज़ल्ट है। परिणाम नहीं बदलता, परीक्षा बदलनी है। जिससे वह परिणाम उत्पन्न होता है, उन कारणों को बंद करना है। तो वह पकड़ में कैसे आएगा? किस वजह से उत्पन्न हुआ है मन? तब कहते हैं, विषय में चिपका हुआ है। 'कहाँ चिपका है' यह दृढ़ निकालना चाहिए और फिर वहाँ पर काटना है।

प्रश्नकर्ता : उन विषयों में जाने से मन को कैसे रोकें?

दादाश्री : विषयों में जाने से रोकना नहीं है। जिन विषयों को मन खड़ा करता है, वही मन फिर पकड़ पकड़ता है। उन विषयों को हमें जहाँ तहाँ धीरे धीरे कम करना चाहिए। यानी उसके कॉंजेज़ बंद करने चाहिए।

हम पड़ोसी से कहें कि 'भाई, आप हमारे साथ झगड़ा मत करना। हमारे साथ तकरार मत करना।' फिर भी तकरार होती रहती हो तो हम नहीं समझ जाएँगे कि गलती कुछ और ही है। समझ जाएँगे या नहीं? तब पूछते हैं, 'कौन सी गलती?' तब कहता है, 'यह झगड़ा नहीं हो ऐसे कारण खड़े करो।' यानी वह झगड़ा तो होगा ही कुछ दिनों तक, लेकिन झगड़ा नहीं होने के कारणों का जब सेवन होगा, तब फिर वैसे परिणाम आएँगे। झगड़े के कारणों

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

का सेवन करें और झगड़ा बंद कर सकें, क्या ऐसा हो सकता है?

प्रश्नकर्ता : नहीं हो सकता।

दादाश्री : अतः उसके कारण बंद करने पड़ेंगे। मैंने कहा है न, कि मन-वचन-काया इफेक्टिव चीजें हैं। उनके कॉंजेज बंद करो!

प्रश्नकर्ता : कारण बंद करना यानी? ऐसा नहीं हो, ऐसे भाव करना, यही न?

दादाश्री : हमें कारण बंद करना है, यानी कल अगर पुलिसवाले ने अपना नाम लिख लिया हो, बगैर लाइटवाली साइकल पर जा रहे हों और नाम लिख ले तो दूसरे दिन हम कॉंजेज बंद कर लेंगे या नहीं? कि भई आज तो लाइट डालो। तो क्या फिर वह नाम लिखेगा? वह कारण बंद हो गया न? उसी तरह ये कॉंजेज बंद करने हैं। सबकुछ सीखा जा सकता है। सिर्फ 'चाय' की आदत पड़ गई है, झंझट इतनी ही है।

लाओ, जरा 'चाय' पी लेते हैं। अंदर अकुलाएगा, उस समय चाय पीने की जरूरत नहीं है। सोचने की जरूरत है। जबकि वहाँ पर चाय पी लेता है। जहाँ सोचने का स्कोप मिले दिमाग उलझ जाए तब कहेगा, 'चाय पीनी चाहिए'। अरे, अभी तो सोचने की जरूरत है। चाय अभी रहने दे, सुबह पीना। कॉंजेज बंद करेंगे तो हो सकेगा या नहीं?

प्रश्नकर्ता : समझ में आया।

दादाश्री : एक बार किसी के साथ हमने अविनय किया हो, कि दूर हट यहाँ से, और वह गाली दे दे तो दूसरी बार हम ऐसा नहीं करेंगे न?

प्रश्नकर्ता : नहीं।

विकारों से विमुक्त की राह (खं-1-2)

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दादाश्री : वह तो बंद नहीं होगा। आप यह रास्ता बदल लो। वह कहलाता है ज्ञान। उसे बंद करने का प्रयत्न करना, वही भ्रांति कहलाती है। भ्रांति हमेशा इफेक्ट को ही तोड़ने जाती है, जबकि ज्ञान कॉन्जेज को बंद करने जाता है।

वासना, वस्तु नहीं, लेकिन रस

प्रश्नकर्ता : मनुष्य की वासनाओं का मोक्ष कब होगा?

दादाश्री : वासनाओं का तो हो ही जाएगा। वासनाएँ तो आप ने खड़ी की हैं, आप ही उसके जन्मदाता हो और विलय करनेवाले भी आप ही हो।

आपकी वासना अलग और इस भाई की वासना अलग। हर एक की अलग-अलग वासनाएँ हैं न? और वासना तो साइंटिफिक सरकारमस्टेशियल एविडेन्स है। अभी अगर कोई मांसाहारी व्यक्ति मित्र बन जाए न, तो फिर मांस खाना भी सीख जाएगा। अब यह वासना कहाँ से लाए थे? तब कहते हैं, साइंटिफिक सरकारमस्टेशियल एविडेन्स इकट्टा होते हैं और वह नया नहीं है, यह गप्प नहीं है, और फिर पहले के कॉन्जेज के हिसाब से हैं, यह सब। इसलिए खाना सीख जाता है। दूसरा, संजोगो की वजह से वासनाएँ खड़ी होती है। बाकी एक लड़का है कि जो ऐसी जगह पर बड़ा होता है कि जहाँ कोई भी इंसान दिखे तक नहीं तो फिर वह विषय को नहीं समझ सकेगा। खाना-पीना समझ सकेगा। लेकिन वहाँ पर कोई जानवर भी नहीं होना चाहिए। उसे नजर नहीं आना चाहिए। तो उसे कोई वासना नहीं होगी। यह तो सब वासनाओं का संग्रहस्थान है और वहाँ पर जन्म होता है तो फिर क्या होगा उस संग्रहस्थान में से! वह नजर आया कि तभी से वासना खड़ी हो जाती है, और यह भी आश्चर्य है कि जब ज्ञान प्राप्त होता है, तब वासनाएँ कहाँ से कहाँ गायब हो जाती है, वही समझ में नहीं आता।

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पूर्)

प्रश्नकर्ता : अंदर का रस(रुचि) सूख जाता है।

दादाश्री : हाँ। वस्तु को वासना नहीं कहते, रस को वासना कहते हैं। यदि रस नहीं होगा तो वह वासना मानी ही नहीं जाएगी। यानि कि वासना कहाँ से कहाँ गायब हो जाती है। अब वह भी एक ही घंटे के प्रयोग से, ज्यादा प्रयोग नहीं, इस ज्ञान के बाद वासना चली जाती है न! रस चला जाता है न? बाकी सब स्थूल है।

ज्ञानी ही छुड़वाते हैं, वासना आसानी से

प्रश्नकर्ता : वासना छोड़ने का सबसे आसान रास्ता कौन सा?

दादाश्री : मेरे पास आना, वही उपाय है। और कौन सा उपाय? आप खुद वासना छोड़ने जाओगे तो दूसरी घुस जाएगी। क्योंकि खाली अवकाश रहता ही नहीं। आप वासना छोड़ते हो तो वहाँ अवकाश हो जाता है और वहाँ फिर दूसरी वासना घुस जाएगी।

प्रश्नकर्ता : इस वासना के बदले और कोई अच्छी वासना आ जाए तो क्या वह अच्छी चीज़ नहीं कहलाएगी?

दादाश्री : वासना चेन्ज हो सकती है। खराब वासना के बदले अच्छी वासना भीतर घुस सकती है, लेकिन अच्छी वासना भीतर घुस जाए तो वापस खराब तैयार कर रही होती है। यदि हमेशा के लिए अच्छी वासना रह सके, ऐसा हो तो यह जगत् बहुत अच्छा है लेकिन वैसा रह नहीं सकता। इसलिए इससे छुटकारा पाना अच्छा है। वासना को कन्वर्ट करें, और अच्छी वासना इकट्ठी करें, ऐसा हो ही नहीं सकता। यह पॉसिबल है ही नहीं। बिल्कुल शुभ वासनावाला इंसान मिलना ही मुश्किल है!

प्रश्नकर्ता : यानी सामान्य रूप से पुरुष को स्त्री के प्रति जो झुकाव रहता है, उससे कैसे मुक्ति पा सकते हैं?

विकारों से विमुक्ति की राह (खं-1-2)

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दादाश्री : ऐसा है न, जब तक खुद पुरुष है, तब तक स्त्री के प्रति झुकाव रहेगा ही, जब तक जवानी है, तब तक। अब अस्सी साल के बूढ़े को नहीं होगा! दुकान का दिवाला निकल जाने के बाद क्या होगा? दिवालिया दुकान में कुछ माल होगा क्या? बच्चों को नौ साल तक नहीं होता। यह बीचवाली दुकान जरा जबरदस्त चलती है, जोरदार। तभी यह सब होता है। जब तक पुरुष हैं, तब तक यह वासना रहेगी और स्त्रियाँ हैं, तब तक वासना रहेगी लेकिन अगर पुरुष ही खत्म हो जाएँ तो?

प्रश्नकर्ता : उसे कैसे मिटा सकते हैं?

दादाश्री : जो वासनावाला है, वह चंद्रेश है और आप तो 'माइ नेम इज चंद्रेश' कहते हो। इसलिए आप अलग हो इससे। इस बात पर भरोसा है? तो वह आप कौन हो? इतना ही आपको मैं रियलाइज करवा देता हूँ तो आपकी वासना छूट जाएगी।

अब ये वासनाएँ क्या हैं? 'मैं चंद्रेश हूँ' यह मिटेगा, तभी वासनाएँ जाएँगी, वनाँ वासनाएँ नहीं जाएँगी। मैं तो क्या कहता हूँ कि 'आत्मा क्या है' वह जानो, 'अनात्मा क्या है' वह जानो। इतना जानते ही वासनाएँ गायब हो जाएँगी।

जितना डेवेलपमेन्ट ऊँचा, उतनी मूर्च्छा कम। इसमें क्या भोगना है? सबकुछ भोगकर ही आएँ हैं। जिसने कम भोगा है, उसे मूर्च्छा ज्यादा है।

विषय और कषाय की भेदरेखा

प्रश्नकर्ता : आप ने ये क्रोध-मान-माया-लोभ बताए हैं न, तो यह विषय किस में आता है? 'काम' किस में आता है?

दादाश्री : विषय अलग है और ये कषाय अलग हैं। विषयों की यदि हम हद पार करें, हद से ज्यादा माँगे तो वह लोभ है।

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

प्रश्नकर्ता : स्त्री-पुरुष के विषय के बारे में प्रश्न है।

दादाश्री : हाँ, वही न! विषय के अतिरेक को लोभ कहा है।

प्रश्नकर्ता : कोई इंसान विषय भूखा होता है, वह क्या 'व्यवस्थित' के हिसाब से होता है?

दादाश्री : नहीं। ऐसा है न, कि यह बड़ी कड़ाही हो, और उसमें कढ़ी बनाई हो, उसमें हींग का बघार लगाया। अब छः महीने बाद उस कड़ाही को फिर से मांजकर उसमें खीर बनाओ, फिर भी अंदर हींग की गंध आएगी। क्यों? क्योंकि हींग का स्पर्श हो गया है। उसी तरह विषय का स्पर्श अंदर पड़ा है।

[ ३ ]

माहात्म्य ब्रह्मचर्य का

विषय की कीमत कितनी ?

प्रश्नकर्ता : अगर विषय में से विरक्त होने की तीव्र भावना हो, तो फिर क्या उसमें से धीरे-धीरे निकला जा सकता है ?

दादाश्री : हाँ। वह जो तमना है, वही इसमें से छुड़वाती है। लेकिन विषय की कीमत समझ लेनी चाहिए कि इसकी कीमत कितनी है ? बिगड़ी हुई दाल की कीमत है, बिगड़ी हुई कढ़ी की कीमत है, लेकिन विषय की कीमत नहीं है लेकिन यह बात पूरे जगत् को समझ में नहीं आती न !

प्रश्नकर्ता : यानी वह तो शून्य हुआ न ?

दादाश्री : शून्य तो अच्छा है, लेकिन यह तो निरा माइनस ही है।

इंसान को बैक(पीछे का) देखने की शक्ति ही नहीं है न ! इसलिए विषय चलता रहा है। देखो न, ऊपर से रौब से चलते भी हैं न ? इसलिए अगर ज्ञानीपुरुष से बात को समझ ले तो विषय जाएगा और मुक्ति होगी। विषय की वजह से ही तो यह सब(मोक्ष) रुका हुआ है।

विषय से जर्जरित हुए जीवन

प्रश्नकर्ता : जो बालब्रह्मचारी होते हैं, वह अधिक उत्तम

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

कहलाता है या शादी के बाद ब्रह्मचर्य पालन करना, वह उत्तम कहलाएगा?

दादाश्री : बालब्रह्मचारी की बात ही अलग है न! लेकिन आजकल के बालब्रह्मचारी कैसे हैं? यह जमाना खराब है। अभी तक का जो हुआ है, अगर उनका वह जीवन आप पढ़ो तो पढ़ते ही आपका सिर चकरा जाएगा।

प्रश्नकर्ता : हम खुद का ही जीवन देखें तो सिर चकरा जाए, तो भला उनके जीवन की क्या बात करें?

दादाश्री : फिर भी अगर अभी भी वे पालन करेंगे, अगर अभी भी बाड़ बॉथेंगे तो इसका कुछ इलाज हो सकेगा। ज्ञानीपुरुष की छत्रछाया तो कभी होती ही नहीं, और दिन बदलते नहीं। ज्ञानीपुरुष हों, तब इसका पालन हो सकता है, वरना कैसे पालन कर सकेंगे? ज्ञानीपुरुष की कृपा चाहिए। चारों ओर से जब उलझ जाए, तब मार्गदर्शन बतानेवाला चाहिए। इसमें से किस तरह छूटा जाए? इसकी सभी चाबियाँ ज्ञानीपुरुष को पता होती हैं।

ब्रह्मचर्य पालन करने की सीढ़ियाँ

प्रश्नकर्ता : स्वभाव की वजह से, प्राकृतिक गुणधर्म की वजह से अन्य कहीं दृष्टि बिगड़ जाए उस चीज़ को कैसे खत्म कर सकते हैं?

दादाश्री : हमारे पास उसे मिटाने की सभी दवाईयाँ हैं। इस वर्ल्ड में ऐसी कोई दवाई नहीं है कि जो हमारे पास नहीं हो। इन लड़कों को हमने ब्रह्मचर्यव्रत दिया है। अब ब्रह्मचर्यव्रत लेने के बावजूद भी यदि कोई स्त्री उसके सामने आ जाए और उसकी दृष्टि आकृष्ट हो जाए, और उसका मन भी बिगड़ जाए, तो इसे मैं दोष नहीं कहता लेकिन अगर ऐसा हो जाए तो उसे फिर तुरंत मिटा देना है। क्योंकि हमने साबुन दिया है। मैं रास्ते

माहात्म्य ब्रह्मचर्य का (खं-1-3)

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पर से गुजर रहा होऊँ और मेरे कपड़े पर दाग लग जाए अगर मुझे उसे तुरंत धोना आता हो, तो फिर मैं आपके यहाँ साफ-सुथरा होकर आऊँगा या नहीं?

प्रश्नकर्ता : हाँ, आ सकते हैं।

दादाश्री : उसी तरह इन्हें सभी साधन दिए हुए हैं। वर्ना मन-वचन-काया से ब्रह्मचर्यव्रत का पालन कैसे किया जा सकेगा? और वह भी ऐसे अंतरदाहवाले काल में!

यदि आपको ब्रह्मचर्य पालन करना हो तो आपको उपाय बताता हूँ। वह उपाय आपको करना पड़ेगा, नहीं तो फिर आपको ब्रह्मचर्य पालन करना ही चाहिए, यह ऐसी कोई अनिवार्य चीज़ नहीं है। वह तो जिसे अंदर कर्म का उदय होता है, तभी हो सकता है। शादी करने में कोई हर्ज नहीं है लेकिन इन लोगों को शादी में सुख दिखता ही नहीं है। उन्हें पुसाता ही नहीं है। जब वे मना करते हैं, तब हम ब्रह्मचर्यव्रत देते हैं, वर्ना मैं किसी को ऐसा ब्रह्मचर्यव्रत लेने के लिए नहीं कहता। क्योंकि व्रत लेना, व्रत का पालन करना, वह कोई ऐसी वैसी बात नहीं है। ब्रह्मचर्यव्रत लेना, वह तो अगर उसका पूर्वकर्म का उदय होगा तो संभाल सकता है। पूर्व में भावना की होगी तो संभाल सकता है, या फिर अगर आप संभालने का निश्चय करोगे तो संभाल सकोगे। हम क्या कहते हैं कि आपका निश्चय होना चाहिए और हमारा वचनबल साथ में हैं, तो यह संभाला जा सके, ऐसा है।

व्रत के परिणाम

प्रश्नकर्ता : वह तो उसकी भूमिका के अनुसार होगा न? सभी चीज़ें मनोबल पर आधारित नहीं हो सकतीं। उसकी आध्यात्मिक स्टेज की भूमिका होनी चाहिए, तभी यह चीज़ संभव है न?

दादाश्री : वह संभव हो या न हो, लेकिन अभी संभव हो गया है। कितने ही स्त्री-पुरुष हमारे पास हमेशा के लिए

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

ब्रह्मचर्यव्रत लेते हैं। इन भाई ने और इनकी वाइफ ने छोटी उम्र से ब्रह्मचर्य व्रत लिया है। मुंबई में ऐसा कई लोगों ने लिया है। क्योंकि अंदर गजब का सुख बर्तता है। इतना सुख बर्तता है कि विषय उन्हें याद ही नहीं आता।

प्रश्नकर्ता : देह के साथ जो कर्म चार्ज होकर आए हुए हैं, वे बदल तो नहीं सकते न?

दादाश्री : नहीं, कुछ भी नहीं बदल सकता। फिर भी विषय ऐसी चीज है न, कि ज्ञानीपुरुष की आज्ञा से सिर्फ इतना ही बदल सकता है। फिर भी यह व्रत सभी को नहीं दे सकते। हमने कुछ ही लोगों को यह दिया है। ज्ञानी की आज्ञा से सबकुछ बदल सकता है। सामनेवाले को सिर्फ निश्चय ही करना है कि कुछ भी हो जाए, लेकिन मुझे यह चाहिए ही नहीं। तो फिर हम उसे आज्ञा दे देते हैं और हमारा वचनबल काम करता है। इसलिए फिर उसका चित्त और कहीं नहीं जाता।

ब्रह्मचर्य का यदि कोई पालन करे न, यदि ठेठ तक पार निकल गया न, तो ब्रह्मचर्य तो बहुत बड़ी चीज है। यह 'दादाई ज्ञान', 'अक्रम विज्ञान' और साथ-साथ ब्रह्मचर्य वगैरह हो तो फिर उन्हें क्या चाहिए? एक तो यह 'अक्रम विज्ञान' ही ऐसा है कि यदि वह अनुभव कभी विशेष परिणाम पा गया तो वह राजाओं का राजा है। पूरी दुनिया के राजाओं को भी वहाँ नमस्कार करना पड़ेगा!

प्रश्नकर्ता: अभी तो पड़ोसी भी नमस्कार नहीं करता!

दादाश्री : पड़ोसी कैसे करेगा? जब तक अभी भी पराप खेत में घुस जाता है, तब तक ऐसा कैसे हो पाएगा?

आज्ञासहित व्रत ही सही

प्रश्नकर्ता : कोई विधवा हो, या विधुर हो, वे ब्रह्मचर्यव्रत

माहात्म्य ब्रह्मचर्य का (खं-1-3)

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पालन करते हैं, इसके बजाय आपका दिया हुआ ब्रह्मचर्यव्रत पालन करे तो बहुत फर्क पड़ेगा न?

दादाश्री : वह ब्रह्मचर्यव्रत कहलाता ही नहीं है न! जहाँ मन से ब्रह्मचर्य नहीं है, वह ब्रह्मचर्य नहीं कहलाता और बिना ज्ञान के किस ब्रह्मचर्य का पालन करेंगे? खुद को ज्ञान नहीं है। यह तो ‘मैं कौन हूँ’ इसी का ठिकाना नहीं है न?

प्रश्नकर्ता : मेडिटेशनवाले में ऐसा कहते हैं कि आप ब्रह्मचर्यव्रत का पालन करो।

दादाश्री : हाँ, लेकिन इतना कुछ आसान नहीं है। उसे कहना, ‘तू ही पालन कर न, मुझे क्यों कह रहा है?’ यों तो सभी से कहेंगे लेकिन खुद तो पोल मारते हैं। ब्रह्मचर्य पालन तो कौन कर सकता है? जो ज्ञानीपुरुष की छत्रछाया में हों, वे सभी ब्रह्मचर्य का पालन कर सकते हैं। अतः यदि ब्रह्मचर्य का यों ही पालन करने गया और यदि सँभालना नहीं आया तो इंसान मैड हो जाएगा। हमारी यह खोज बहुत सुंदर है, पूरा विज्ञान बहुत सुंदर है और पूरा वर्ल्ड एक्सेप्ट करे, ऐसा है। इन साइन्टिस्ट वगैरह को भी यह एक्सेप्ट करना पड़ेगा।

ब्रह्मचर्य तो कैसा होना चाहिए?

यह ‘अक्रम विज्ञान’ है। यह तो बहुत ग़ज़ब का विज्ञान है। जगत् जब इसे समझेगा तब नाच उठेगा।

आपको स्त्री पर वैराग आ गया या नहीं? कितनी देर में? अभी पंद्रह मिनिट में ही? तो फिर ज्ञानियों की चाबियों से कैसा वैराग आ जाता है! और यों पहरा लगाएँ तो कब अंत आएगा? यहाँ से पहरा लगाएँ तो उस ओर से घुस जाएगा। हम किसी पर भी पहरा लगाते ही नहीं न! हम कहाँ पहरा लगाएँ? जिसे इस गंदगी में डूबना ही है, उसे फिर हम छोड़ देते हैं!

यहाँ पर ये लड़के जो ब्रह्मचर्य पालन करते हैं, वह तो सहज

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

स्वभाव से रहता है, एक क्षण भी चूके बिना, निरंतर रहता है।

सातवीं नर्क का तो सिर्फ वर्णन तक किया जाए तो इंसान सुनते ही मर जाए। तो बोलो, वहाँ कितना भोगवटा (सुख या दुःख का असर) रहता होगा? कि फिर से संसार भोगने से तो बिल्कुल इन्कार! सिर्फ विषय की वजह से यह संसार खड़ा है। अगर यह स्त्री विषय नहीं होता न, तो बाकी सभी विषय तो कभी भी बाधा नहीं डालते। सिर्फ इस विषय का अभाव रहे तो भी देवगति मिल जाए। इस विषय का अभाव हुआ कि बाकी सभी विषय ऋषू में आ जाते हैं और इस विषय में पड़ा कि विषय से पहले जानवर गति में जाता है और यदि उससे अधिक विषयी हो तो नर्कगति में जाता है। विषय से बस अधोगति ही है। क्योंकि एक बार के विषय में तो कई करोड़ जीव मर जाते हैं! समझ नहीं है फिर भी जोखिमदारी मोल लेते हैं न! अतः जहाँ हिंसा है, वहाँ धर्म जैसा कुछ है ही नहीं।

प्रश्नकर्ता : समझते हैं फिर भी जगत् के विषयों में मन आकर्षित रहता है, समझते हैं कि सही-गलत क्या है, फिर भी विषयों से मुक्त नहीं हो पाते। तो इसका क्या उपाय?

दादाश्री : जो समझ क्रियाकारी हो वही सही समझ कहलाती है। बाकी सब बंजर समझ कहलाती है। अगर दो शीशियाँ हों और एक शीशे में विटामिन का पाउडर हो व दूसरी शीशे में पोइजन हो, दोनों में सफेद पाउडर हो और हम बच्चे को समझाएँ कि यह विटामिन है, यह लेना और इस दूसरी शीशे में से मत लेना। दूसरी शीशे में से लेगा तो मर जाएगा। उस बच्चे ने 'मर जाएगा' शब्द सुना इसका मतलब यह नहीं कि वह समझ गया। कहेगा जरूर कि यह दवाई लेने से मर जाते हैं, लेकिन मर जाना यानी क्या, उस बात को नहीं समझता। हमें उसे बताना पड़ता है, कि फलाने चाचा उस दिन मर गए थे न? फिर सभी ने उन्हें वहाँ जला दिया था, इस दवाई से वैसा ही हो जाता है।

माहात्म्य ब्रह्मचर्य का (खं-1-3)

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जब एक्जेक्टली ऐसा समझ में आ जाता है तब वह समझ ही क्रियाकारी हो जाती है। फिर वह पोइजन को छूएगा ही नहीं। अभी उसे इस समझ की एक्जेक्टनेस नहीं आई है। लोगों द्वारा सिखाई गई यह समझ तो लोन की तरह है।

प्रश्नकर्ता : वह समझ क्रियाकारी हो, उसके लिए क्या प्रयत्न करने चाहिए?

दादाश्री : मैं आपको विस्तार से समझाता हूँ। फिर वह समझ ही क्रियाकारी हो जाएगी। आपको कुछ भी नहीं करना है। बल्कि आप देखल करने जाओगे तो बिगड़ जाएगा। जो ज्ञान, जो समझ क्रियाकारी हो, वही सही समझ है और वही सही ज्ञान है।

मेरी बात आप पर थोपनी नहीं है। खुद आपको आपकी समझ में आना चाहिए। मेरी समझ मेरे पास और वह समझ आप पर थोप नहीं सकते और थोपने से तो कुछ काम होगा ही नहीं। आपमें वह समझ फिट हो जाए और आप अपनी समझ से चलो।

इस दुनिया में अगर किसी चीज की निंदा करने जैसी हो तो वह है अब्रह्मचर्य। अन्य सभी चीजें इतनी निंदा करने जैसी नहीं हैं।

ब्रह्मचर्य का पालन नहीं हो सके तो, वह अलग बात है, लेकिन ब्रह्मचर्य के विरोधी तो होना ही नहीं चाहिए। ब्रह्मचर्य तो सबसे बड़ा साधन है। अपना ब्रह्मचर्य, वह पवित्र चीज होनी चाहिए। ब्रह्मचर्य, वह मानसिक चीज नहीं है, इस अब्रह्मचर्य का बीड़ी के व्यसन जैसा नहीं है। विषय से संबंधित नासमझी की वजह से ब्रह्मचर्य नहीं टिक पाता। ब्रह्मचर्य के बारे में ज्ञानीपुरुष से यदि समझ ले तो ब्रह्मचर्य बहुत अच्छी तरह टिक सकेगा। समझने की ही जरूरत है इसमें। यह व्यसन अलग चीज है और अब्रह्मचर्य वह अलग चीज है। यह तो अनादि से लोक प्रवाह ऐसा ही चलता आ रहा है और उससे लौकिक ज्ञान खड़ा हो गया है

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और ऊपर से उसकी उल्टी समझ बैठ गई। अब जैसी समझ बैठ गई, फिर वैसा ही वर्तन में आए बिना रहेगा नहीं।

व्यवहार में भी ब्रह्मचर्य का पालन करने को क्यों कहते हैं कि नॉर्मलिटी में रहे। उससे देह, मन वगैरह स्वस्थ रहते हैं। जगत् के लोग तो मन-वचन-काया से ब्रह्मचर्य पालन कर ही नहीं सकते न? यह तो सिर्फ अपने यहीं पर पालन किया जा सकता है। ये लोग व्रत लेते हैं। व्रत लेने से क्या होता है कि उसके बाद मन ठिकाने रहता है। मन बाउन्ड्री में रहता है और जो व्रत नहीं लेते तो उनका चित्त सारा भटकता ही रहता है! फिर भी, संसार में भी यदि कभी दृष्टि का ध्यान रखे तो वह आगे ही आगे बढ़ता जाएगा और उसे भी मोक्ष का रास्ता मिल जाएगा। यह तो बाहर के उन लोगों के लिए कह रहा हूँ जो मुझसे नहीं मिले हैं!

ब्रह्मचर्य का यदि कभी सिर्फ छः महीने सच्चे दिल से पालन किया हो, मन-वचन-काया से, तो वे गुलाब इतने-इतने बड़े हो जाते हैं। ब्रह्मचर्य तो सबसे बड़ी खाद है। जिस तरह गुलाब में खाद डालने से जो इतने छोटे होते हैं, वे फिर इतने बड़े हो जाते हैं। अतः सिर्फ छः महीनों के लिए ही जिसे पालन करना हो वह करे! छः महीने के ब्रह्मचर्य से तो शरीर में कितना बदलाव आ जाता है। फिर वाणी बोले तो जैसे बम गिर रहा हो, ऐसी निकलती है! जब तक संसार के किसी भी विषय में मन घुसा हुआ रहेगा, तब तक सभी डिपार्टमेंट पर फुल शक्ति नहीं चलेगी! किसी भी दिशा में प्रवहन करना, वह मन का स्वभाव है! इसी वजह से मन को जैसा चाहें वैसे मोड़ा जा सकता है। उसे डाइवर्ट किया जा सकता है। दो-पाँच साल तक ही यदि मन को ब्रह्मचर्य की ओर मोड़े, इस एक ही दिशा में वहन करे तो उसके सामने कोई आँख भी नहीं गड़ा सकेगा!

अब्रह्मचर्य से ही सभी रोग खड़े होते हैं। इसलिए यह सिद्धांत रखना चाहिए कि ब्रह्मचर्य पालन करना है, और उसे पहले से ही समझ लेना अच्छा। अस्सी की उम्र में इस सिद्धांत को समझें तो

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वह किस काम का? अपना अस्तित्व(अस्तित्वपना) एक ही जगह पर रहना चाहिए, दो जगह पर नहीं रहना चाहिए। अतः जब तक हो सके तब तक सिद्धांत का पालन करना। आजकल चारित्र की कीमत ही खत्म हो गई है। ब्रह्मचर्य की तो कीमत ही खत्म हो गई है न? स्वच्छ जीवन जीने की कीमत ही खत्म हो गई है! पवित्र जीवन ही जीना है।

अभिप्राय बदलते ही निकलना शुरू

प्रश्नकर्ता : लेकिन मानसशास्त्री कहते हैं कि विषय बंद हो ही नहीं सकता, अंत तक रहता है। तो फिर वीर्य का ऊर्ध्वगमन होगा ही नहीं न?

दादाश्री : मैं क्या कहता हूँ कि विषय के प्रति अभिप्राय बदल जाए तो फिर विषय रहेगा ही नहीं! जब तक अभिप्राय नहीं बदलेगा, तब तक वीर्य का ऊर्ध्वगमन होगा ही नहीं। अपने यहाँ तो सीधा आत्मा में ही डाल देना है, वही ऊर्ध्वगमन है! विषय बंद करने से उसे आत्मा का सुख बर्तता है और विषय बंद हो जाए तो वीर्य का ऊर्ध्वगमन होता ही है। हमारी आज्ञा ही ऐसी है कि विषय बंद हो जाता है।

प्रश्नकर्ता : आज्ञा में क्या होता है? स्थूल बंद करना?

दादाश्री : स्थूल के लिए हम कुछ कहते ही नहीं। मन-बुद्धि-चित्त और अहंकार ब्रह्मचर्य में रहें, ऐसा होना चाहिए व यदि मन-बुद्धि-चित्त और अहंकार ब्रह्मचर्य के पक्ष में आ गए तो स्थूल(ब्रह्मचर्य) तो अपने आप आ ही जाएगा। तेरे मन-बुद्धि-चित्त और अहंकार को पलट। हमारी आज्ञा ऐसी है कि ये चारों पलट ही जाते हैं।

ग़ज़ब के वे ब्रह्मचारी

‘यह’ ‘पब्लिक ट्रस्ट’ ऐसा है कि संपूर्ण रूप से निरोगी है। वर्ल्ड का टॉपमोस्ट है यह! आपको जो भी रोग निकालने हों, वे निकाले जा सकते हैं! जो सुंदर ब्रह्मचर्य पालन करते हैं, उनके

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

अधीन रहकर ब्रह्मचर्य पालन किया जा सकता है। वर्ना जो खुद पालन नहीं करते हों, खुद के अंदर गुप्त 'डिफेक्ट' हो तो खुद को ही पालन करना मुश्किल हो जाता है। इसलिए पूरे हिन्दुस्तान में कहीं भी ब्रह्मचर्य से संबंधित बातें कोई करता ही नहीं है न? मैं जिसमें 'हन्ट्रेड परसेन्ट' कोरक्ट होऊँगा, उसी का आपको उपदेश दे सकता हूँ। तभी मेरा वचनबल फलदायी होगा। खुद में जरा सा भी 'डिफेक्ट' हो तो औरों को कैसे उपदेश दिया जा सकता है?

विषय की जोखिमदारी बहुत बड़ी है। सबसे बड़ी जोखिमदारी हो तो वह विषय की है। उससे पाँचों महाव्रत और अणुव्रत टूट जाते हैं।

प्रश्नकर्ता : ज्ञानीपुरुष के वाक्य किस प्रकार से विषय का विरेचन करवाते हैं?

दादाश्री : हर दिन विषय बंद होता जाता है। वर्ना लाख जन्मों तक किताबें पढ़ें, फिर भी कुछ नहीं होता।

प्रश्नकर्ता : उनका वाक्य इतना असरकारक क्यों होता है?

दादाश्री : उनका वाक्य बहुत जबरदस्त होता है, जोरदार होता है! 'जुलाब करवा दें ऐसे शब्द' कहा गया है। तभी से नहीं समझ जाना चाहिए कि उनके शब्दों में कितना बल है!

प्रश्नकर्ता : वह वचनबल ज्ञानी को कैसे प्राप्त हुआ?

दादाश्री : खुद निर्विषयी हो, तभी वचनबल प्राप्त होता है। वर्ना जो विषय का विरेचन करवा दे, ऐसा वचनबल कहीं होता ही नहीं न! जब मन-वचन-काया से संपूर्ण रूप से निर्विषयी हो, तब उनके शब्दों से विषय का विरेचन होता है।

'ज्ञानीपुरुष' के वाक्य विषय का विरेचन करवानेवाले होते हैं। जो विषय का विरेचन नहीं करवाए, वह 'ज्ञानीपुरुष' है ही नहीं।

खंड : २

‘शादी नहीं करने’ के निश्चयवालों के लिए राह

[ १ ]

किस समझ से विषय में से छूटा जा सकता है?

शादी नहीं करने के निश्चयवाले को

प्रश्नकर्ता : मुझे शादी करने की इच्छा नहीं है, लेकिन माँ-बाप और अन्य रिश्तेदार शादी के लिए दबाव डाल रहे हैं। तो मुझे शादी करनी चाहिए या नहीं?

दादाश्री : यदि शादी करने की इच्छा ही नहीं हो तो, क्योंकि आपने अपना यह ‘ज्ञान’ लिया है इसलिए आप पार उतर सकोगे। इस ज्ञान के प्रताप से सबकुछ हो सकता है। मैं आपको यह समझाऊँगा कि किस तरह रहना है, और यदि पार उतर गए तब तो अति उत्तम है। आपका कल्याण हो जाएगा!

प्रश्नकर्ता : शादी करवाने के लिए सभी लोग बहुत फोर्स कर रहे हैं।

दादाश्री : आपको ‘व्यवस्थित’ समझ में आ गया है या नहीं?

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

प्रश्नकर्ता : व्यवस्थित तो समझ में आ गया है।

दादाश्री : तो 'व्यवस्थित' के बाहर किसी का भी चलनेवाला नहीं है। इसलिए 'व्यवस्थित' पर छोड़कर तय रखो, दृढ़ निश्चय करो कि मुझे शादी करनी ही नहीं है।

लेकिन शादी किए बिना तुझे कैसे चलेगा?

प्रश्नकर्ता : कौन से जन्म में अनुभव नहीं किया है?

दादाश्री : सच कह रहा है कि किस जन्म में अनुभव नहीं किया! बकरी में, कुत्ते में, गधे में, बाघ में, जहाँ गए वहाँ यही अनुभव किए हैं न? ! लेकिन शादी करना यदि ध्येयपूर्वक छूटे तो अच्छा। 'लोगों को जो अनुभव हुए हैं, वे मुझे ही हुए हैं', अब ऐसा सेट कर लेना पड़ेगा न? वर्ना जगत् के लोग तुझे अनुभवहीन कहेंगे। शादी होगी या नहीं, वह 'व्यवस्थित' के अधीन है, लेकिन अभी यदि पाँच साल इस ज्ञान के आधार पर ब्रह्मचर्य पालन करे तो कितनी शक्तियाँ प्रकट हो जाएँगी और इस देह की रचना भी कितनी अच्छी हो जाएगी! पूरी जिंदगी बुखार आदि आयागा ही नहीं न!!

अपना यह विज्ञान ऐसा है कि थोड़े समय में सेफ साइड करवा दे। जिसे भगवान भी नहीं पूछ सकें, ऐसी सेफ साइड कर दे, ऐसा यह विज्ञान है। खाने-पीने की सभी छूट दी है न? मैंने यदि खाने-पीने में एतराज उठाया होता तो काफी कुछ लोग यहाँ पर आए ही नहीं होते। इसलिए हमने छूट दी है।

इस संसारचक्र का आधार विषय पर है। हैं तो पाँच ही विषय, लेकिन स्त्री से संबंधित विषय तो बहुत ही भारी है। उसके तो बाद में भारी स्पंदन उड़ते हैं। अपना ज्ञान इतना अच्छा है कि उसमें रहे तो उसे कुछ भी स्पर्श नहीं करेगा और पिछला सब धुल जाएगा लेकिन विषय के बारे में जागृत रहना पड़ेगा। वहाँ तो 'इसमें सुख है ही नहीं और यह फँसाव ही है।' ऐसा

किस समझ से विषय में... (खं-2-1)

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अभिप्राय रहना चाहिए। यह बगीचा नहीं है। यह फँसाव ही है। ऐसा भान रहेगा तो छूटा जा सकेगा। लेकिन यहाँ ऐसा भान नहीं रहता है न? फँसाव हो तो वहाँ कैसा रहता है? और बगीचे में घूम रहे हों, तब कैसा रहता है? बगीचे में तो यों उल्लास रहता है, जबकि फँसाव में तो कब इसमें से छूट जाऊँ, ऐसा रहता है न? इसलिए 'हमें' 'चंद्रेश' से कहना है कि 'चंद्रेश इसमें से कब छूटोगे! यह तो फँसाव है। इसमें पड़ने जैसा नहीं है।' लेकिन इसमें फँसाव जैसा नहीं लगता और वहाँ मुक्त भाव हो जाता है न? अब यदि पूरी समझ बदल दें, तो हल आएगा।

समझकर दखिल होना इसमें...

प्रश्नकर्ता : यह जो डिसीजन ले लिया है, लेकिन पिछला माल बहुत है। तो डिसीजन के आधार पर मैं इसमें से निकल पाऊँगा?

दादाश्री : डिसीजन सही होगा तो जरूर निकल पाओगे, निश्चय मुख्य चीज है। जिसने निश्चय को पकड़ा है, दुनिया में कोई उसका नाम नहीं देगा। तुझे क्यों शंका हो रही है? शंका हो रही है, वही अनिश्चय कहलाता है।

प्रश्नकर्ता : आपसे पूछकर पक्का कर रहा हूँ।

दादाश्री : नहीं, लेकिन शंका हो रही है, वही अनिश्चय है। कुछ भी नहीं होगा। दादा की छत्रछाया है, फिर क्या होनेवाला है? इसलिए शंका रखने जैसा नहीं है। यह ज्ञान है इसलिए ब्रह्मचर्य में रहा जा सकेगा, वर्ना मैं ही तुम्हें मना कर दूँ। मैं तो आज्ञा दे दूँ कि तुम्हें शादी करनी पड़ेगी। वह तो 'यह' ज्ञान है इसलिए तुम्हें अनुमति देता हूँ। क्योंकि इंसान को सुख का साधन चाहिए न? मरता हुआ इंसान किस सुख के सहारे जीएगा? यह ज्ञान ऐसा है कि आप इस ज्ञान से आत्मा के ध्यान में रहोगे तो तुरंत आनंद में आ जाओगे। या फिर अगर घंटे भर सभी के