भारतकोश
सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Samaveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished310 पृष्ठ

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प्र सेनानीः शूरो अग्रे रथानां गव्यन्नेति हर्षते अस्य सेना. भद्रान् कृण्वन्निन्द्रहवांत्सखिभ्य आ सोमो वस्त्रा रभसानि दत्ते.. (१) हे सोम! आप सेनानायक व वीर हैं. आप यजमान के लिए गौ आदि धनों को देने की इच्छा रखते हैं. आप रथ के आगेआगे चलते हैं. आप को देख कर सेना का हौसला बढ़ता है. आप मित्रों और यजमानों के लिए इंद्र की प्रार्थनाओं को कल्याणकारी बनाते हैं. आप तेजस्वी हैं. (१) प्र ते धारा मधुमतीरसृग्रन्वारं यत्पूतो अत्येष्यव्यम्. पवमान पवसे धाम गोनां जनयंत्सूर्यमपिन्वो अर्कैः.. (२) हे सोम! जब आप भेड़ों की ऊन को पार कर के छनते हुए कलश में जाते हैं तब आप की धाराएं आनंद बरसाती हैं. पवित्र हो कर आप तेजस्वी सूर्य देव की तरह चमकने लगते हैं. (२) प्र गायताभ्यर्चाम देवान्त्सोम ॐ हिनोत महते धनाय. स्वादुः पवतामति वारमव्यमा सीदतु कलशं देव इन्दुः.. (३) हे यजमानो! हम सोम व अन्य देवताओं की स्तुति करें. हम बहुत धन पाने की इच्छा से अपनी स्तुतियों से सोम को प्रेरित करें. भेड़ के बालों से बनी छलनी से इस सोमरस को छानें. वह घड़ों में भरा रहे. (३) प्र हिन्वानो जनिता रोदस्यो रथो न वाज ॐ सनिषन्न्यासीत्. इन्द्रं गच्छन्नायुधा स ॐ शिशाणो विश्वा वसु हस्तयोराधधानः.. (४) सोम स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक को उत्पन्न करने वाले हैं. वे दोनों लोकों को गति देने वाले हैं. वे तेजी से इंद्र के पास जाते हैं. वे यजमानों को बहुत वैभव देने के लिए आते हैं. (४) तक्षद्यदी मनसो वेनतो वाग् ज्येष्ठस्य धर्मं द्युक्षोरनीके. आदीमायन्वरमा वावशाना जुष्टं पतिं कलशे गाव इन्दुम्.. (५) स्तुति उन्नति की भावना लिए व विचारों से प्रेरित होती है. उपासकों की स्तुतियां यज्ञों में देवताओं का गुणगान करती हैं. इस प्रकार तैयार कर के सोमरस में गायों का दूध मिलाया जाता है. यह सोमरस सब के लिए बहुत पौष्टिक होता है. (५) साकमुक्षो मर्ज्यन्त स्वसारो दश धीरस्य धीतयो धनुत्रीः. हरिः पर्यद्रवज्जाः सूर्यस्य द्रोणं ननक्षे अत्यो न वाजी.. (६) कर्मठ (काम करने वाली) अंगुलियां सोमरस को तैयार व उस को शुद्ध करती हैं. दसों अंगुलियां बलशाली सोम को धारण करती हैं. हरा सोमरस उसी तरह सभी दिशाओं में जाता है, जैसे गतिशील घोड़ा. वह घड़े में भरा रहता है. (६) ebook converter DEMO Watermarks*