भारतकोश
सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Samaveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished310 पृष्ठ

पृष्ठ 220, कुल 310 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 220

ऋषिभिः संभृतो रसो ब्राह्मणेष्वमृत ॐ हितम्.. (३) ऋषियों ने जो मंत्र रचे हैं, वे मंत्र ब्राह्मणों के लिए अमृत सरीखे कल्याणकारी, हितकारी व घी से चुए हुए हैं. वे स्नेह की धाराओं से सने हुए और श्रेष्ठ फलदायी हैं. (३) पावमानीर्दधन्तु न इमं लोकमथो अमुम्. कामान्त्समर्धयन्तु नो देवीर्देवैः समाहृताः.. (४) देवी और देवताओं ने मंत्र संकलित किए हैं. वे मंत्र न केवल इस लोक में बल्कि परलोक में भी हमारे लिए कल्याणकारक हों. वे हमारी सारी इच्छाएं पूरी करने वाले हों. (४) येन देवाः पवित्रेणात्मानं पुनते सदा. तेन सहस्रधारेण पावमानीः पुनन्तु नः.. (५) देवतागण जिन से सदा अपने को निर्मल (पवित्र) बनाते हैं, वैसी ही हजारों धाराओं से वेदों के मंत्र हमें पवित्र बनाने की कृपा करें. (५) पावमानीः स्वस्त्ययनीस्ताभिर्गच्छति नान्दनम्. पुण्याँ श्च भक्षान्भक्षयत्यमृतत्वं च गच्छति.. (६) जो यजमान पवित्रतादायी मंत्रों से प्रेरणा लेता है, जो यजमान हितकारी मंत्रों में रुझान रखता है, वह परमानंद का भागी होता है. वह पुण्य अर्जित कराने वाले अन्न को खाता है और अमरता का भागीदार होता है. (६) आठवां खंड अगन्म महा नमसा यविष्ठं यो दीदाय समिद्धः स्वे दुरोणे. चित्रभानु ॐ रोदसी अन्तरूर्वी स्वाहुतं विश्वतः प्रत्यञ्चम्.. (१) हे अग्नि! कौन सी ऐसी जगह है, जहां आप नहीं जा सकते? आप स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक में भलीभांति प्रज्वलित (प्रकाशित) होते हैं. आप खूब प्रकाशवान, अच्छी आहुतियों वाले व युवा हैं. हम आप को नमस्कार करते हैं और आप की शरण में हैं. (१) स मह्ना विश्वा दुरितानि साह्वानग्नि ष्टवे दम आ जातवेदाः. स नो रक्षिषद्वुरितादवद्यादस्मान्गृणत उत नो मघोनः.. (२) हे अग्नि! आप का प्रकाश ज्ञान वाला है. आप उस प्रकाश को फैलाते रहते हैं. आप तेजस्वी हैं और संसार के सभी पापों का नाश करने में समर्थ हैं. आप दुष्कर्म करने से हमें रोकते हैं और हमारी रक्षा करते हैं. आप हमारी आहुतियों को ग्रहण करते हैं. आप हमारे प्रति कल्याण की भावना धारण करते हैं. (२) त्वं वरुण उत मित्रो अग्ने त्वां वर्धन्ति मतिभिर्वसिष्ठाः. त्वे वसु सुषणनानि सन्तु यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (३) ebook converter DEMO Watermarks*