भारतकोश
सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Samaveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished310 पृष्ठ

पृष्ठ 225, कुल 310 में से

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पृष्ठ 225

उपो षु जातमप्तुरं गोभिर्भङ्गं परिष्कृतम्. इन्दुं देवा अयासिषुः.. (१३) हे सोम! देवगण आप का रस पीते हैं. उसे गाय के दूध और जल में मिला कर परिष्कृत किया गया है. वह चमकीला है. (१३) तमिद्वर्धन्तु नो गिरो वत्सꣳ संशिश्वरीरिव. य इन्द्रस्य हृदꣳसनिः.. (१४) माता जैसे शिशु के शरीर को अपने दूध से बढ़ाती है, वैसे ही हमारी स्तुतियां सोम की बढ़ोतरी करें. वे इंद्र के हृदय में निवास करते हैं. (१४) अर्षा नः सोम शं गवे धुक्षस्व पिप्युषीमिषम्. वर्धा समुद्रमुक्थ्य.. (१५) हे सोम! आप उपास्य हैं और समुद्र की तरह उमड़ कर श्रेष्ठ पात्र में विराजिए. हमारे घर धनधान्य से भरे रहें. आप की कृपा से हमारा गोधन भी सुखी रहे. (१५) बारहवां खंड आ घा ये अग्निमिन्धते स्तृणन्ति बर्हिरानुषक्. येषामिन्द्रो युवा सखा.. (१) इंद्र जवान व यजमान के मित्र हैं. यजमान अग्नि को प्रज्वलित करते हैं. यजमान देवताओं के लिए कुश के आसन बिछाते हैं. (१) बृहन्निदिध्म एषां भूरि शसं पृथुः स्वरुः. येषामिन्द्रो युवा सखा.. (२) यजमान के पास देवताओं के लिए भरपूर समिधाएं, प्रचुर शस्त्र, अगणित प्रार्थनाएं हैं. इंद्र इन यजमानों के मित्र हैं और वे सदा जवान हैं. (२) अयुद्ध इद्युधा वृत्तꣳ शूर आजति सत्वभिः. येषामिन्द्रो युवा सखा.. (३) युवा इंद्र जिन यजमानों के मित्र हैं वे युद्ध में रुचि नहीं रखते हैं, फिर भी शक्तिशाली सैन्य बल वाले शत्रु को हरा सकते हैं. (३) य एक इद्विदयते वसु मर्ताय दाशुषे. ईशानो अप्रतिष्कुत इन्द्रो अङ्ग.. (४) इंद्र संसार के ईश्वर और यजमानों को भरपूर वैभव देने वाले हैं. वे अकेले ही शत्रुओं को हराने के लिए पर्याप्त हैं. (४) यश्चिद्धि त्वा बहुभ्य आ सुतावाँ आविवासति. उग्रं तत्पत्यते शव इन्द्रो अङ्ग.. (५) हे इंद्र! लाखों में से जो कोई यजमान सोमयज्ञ से आप को भजता है, आप उसे जल्दी ही ओजस्वी बना देते हैं. (५) कदा मर्तमराधसं पदा क्षुम्पमिव स्फुरत्. कदा नः शुश्रवद्गिर इन्द्रो अङ्ग.. (६) हे इंद्र! आप स्तुति न करने वालों को मामूली पौधों की तरह कब हटाएंगे? कब आप ebook converter DEMO Watermarks*