भारतकोश
सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Samaveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished310 पृष्ठ

पृष्ठ 267, कुल 310 में से

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पृष्ठ 267

आप की स्तुति हम करते हैं. आप उन्हीं के समान सुखद हैं. आप जितनी जल्दी हो सके हमारे यज्ञ स्थान पर पधारिए व सोमपान करिए. (२) इमा उत्वा पुरूवसो गिरो वर्धन्तु या मम. पावकवर्णाः शुचयो विपश्चितो ऽ भि स्तोमैरनूषत.. (३) हे इंद्र! हमारी स्तुतियां आप का यशवर्धन करें. हमारी स्तुतियां श्रेष्ठ ज्ञानमय हैं. ज्ञानी और तेजस्वी यजमान आप की स्तुति करते हैं. (३) अय ॐ सहस्रमृषिभिः सहस्कृतः समुद्र इव पप्रथे. सत्यः सो अस्य महिमा गृणे शवो यज्ञेषु विप्रराज्ये.. (४) हे इंद्र! आप समुद्र की भांति विस्तृत हैं. आप हजारों ऋषियों जैसे बलवान हैं. आप सत्यवान व शक्तिमान हैं. ब्रह्मज्ञानी लोगों के निर्देशन में आप की स्तुतियां गाई जाती हैं. (४) यस्यायं विश्व आर्यो दासः शेवाधिपा अरिः. तिरश्चिदर्ये रुशमे पवीरवि तुभ्येत्यो अज्यते रयिः.. (५) हे इंद्र! यह सारा विश्व आप का है. आर्य दास की भांति आप की सेवा करते हैं. आप शत्रुओं के अधीश हैं. रुश्म और पवि शक्तिमान हो कर भी आप की पूजा करते हैं. (५) तुरण्यवो मधुमन्तं घृतश्चुतं विप्रासो अर्कमानृचुः. अस्मे रयिः पप्रथे वृष्ण्य ॐ शवो ऽ स्मे स्वानास इन्दवः.. (६) हे इंद्र! हम आप की अर्चना करते हैं. यजमान ब्राह्मण यज्ञ करते हैं. वे यज्ञ में शहद और घी से भरी हुई आहुतियां व हम हवि रूपी धन देते हैं. सोम प्रसिद्धि प्राप्त करें. (६) गोमन्न इन्दो अश्ववत्सुतः सुदक्ष धन्विव. शुचिं च वर्णमधि गोषु धारय.. (७) हे सोम! आप हमें गोवान व अश्ववान बनाइए. आप गाय के दूध में मिल कर पवित्र सफेद रंग प्राप्त करते हैं. (७) स नो हरीणां पत इन्दो देवप्सरस्तमः. सखेव सख्ये नर्यो रुचे भव.. (८) हे सोम! आप हरे हैं. आप देवताओं द्वारा ईप्सिततम (सब से ज्यादा चाहे गए) हैं. आप उसी तरह हम में रुचि लेते हैं, जैसे एक मित्र दूसरे मित्र का सहयोग करने के लिए रुचि लेता है. (८) सनेमि त्वमस्मदा अदेवं कं चिदत्रिणम्. साह्वां इन्दो परि बाधो अप द्वयुम्.. (९) हे इंद्र! आप प्राचीन काल से चले आ रहे सुख हमें दीजिए. आप सुख में बाधा पैदा करने वाले शत्रुओं, दोगले व्यवहार वालों व स्वार्थियों का भी नाश कीजिए. (९) अज्जते व्यज्जते समज्जते ऋतु ॐ रिहन्ति मध्वाभ्यज्जते. ebook converter DEMO Watermarks*

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