भारतकोश
सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Samaveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished310 पृष्ठ

पृष्ठ 40, कुल 310 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 40

मूर्धानं दिवो अरतिं पृथिव्या वैश्वानरमृत आ जातमग्निम्. कवि ॐ सम्राजमतिथिं जनानामासन्नः पात्रं जनयन्त देवाः.. (५) हे अग्नि! आप सब से ऊपर (सर्वोपरि) हैं. आप स्वर्गलोक के वासी हैं. आप भूलोक के स्वामी हैं. आप यज्ञ में उत्पन्न हैं. आप ज्ञानी मनुष्यों में मेहमान की तरह पूजनीय हैं. मुख की तरह मुख्य हैं. आप को देवताओं ने उत्पन्न किया है. (५) वि त्वदापो न पर्वतस्य पृष्ठादुक्थेभिरग्ने जनयन्त देवाः. तं त्वा गिरः सुष्टुतयो वाजयन्त्याजिं न गिर्वाहणो जिग्युरश्वाः.. (६) हे अग्नि! जैसे पर्वत के ऊपरी भाग से जल उत्पन्न होता है, वैसे ही विद्वान् यजमान आप को अपनी स्तुतियों से प्रकट करते हैं. जैसे घोड़े युद्ध में विजय पाते हैं, वैसे ही आप हमारी स्तुतियों से संचालित होते हैं. इस से हमें विजय (कामना सिद्धि) मिलती है. (६) आ वो राजानमध्वरस्य रुद्रं ॐ होतारं ॐ सत्ययजं ॐ रोदस्योः. अग्निं पुरा तनयित्नोरचित्ताद्धिरण्यरूपमवसे कृणुध्वम्.. (७) हे अग्नि! आप यज्ञ के स्वामी हैं. आप देवताओं को बुलाने वाले हैं. आप शत्रुओं को रुलाने वाले हैं. आप स्वर्गलोक तथा पृथ्वीलोक के अन्नदाता हैं. आप आनंद एवं सत्य रूप को प्राप्त कराने वाले हैं. आप स्वर्ण के समान चमक वाले हैं. ऐसे स्वरूप वाले अग्नि को स्वाभाविक रूप से विद्युत् से पहले संरक्षण के लिए उत्पन्न किया है. (७) इन्धे राजा समर्यो नमोभिर्यस्य प्रतीकमाहुतं घृतेन. नरो हव्येभिरीडते सबाध आग्निरग्रमुषसामशोचि.. (८) हे अग्नि! आप श्रेष्ठ हैं. आप राजा हैं. आप को अन्नों से प्रज्वलित किया जाता है. आप को घी से बढ़ाया जाता है. सभी मिल कर हवन से आप की पूजा करते हैं. इस प्रकार अग्नि उषा काल के पूर्व (यानी माता के गर्भ से ही) उत्पन्न हुए हैं. (८) प्र केतुना बृहता यात्यग्निरा रोदसी वृषभो रोरवीति. दिवश्चिदन्तादुपमामुदानडपामुपस्थे महिषो ववर्ध.. (९) हे अग्नि! आप महान प्रकाश के साथ प्रकट होते हैं. स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक में बलवान हो कर गर्जना करते हैं. बिजली के गर्जन और जल मेघों के बीच बढ़ते हैं. (९) अग्निं नरो दीधितिभिररण्योर्हस्तच्युतं जनयत प्रशस्तम्. दूरेदृशं गृहपतिमथव्युम्.. (१०) हे अग्नि! आप प्रशंसा के योग्य हैं. आप दूर से दिखाई देते हैं. आप घर के रक्षक हैं. यजमान ने अग्नि को अरणि मथ कर प्रकट किया. (यानी अंगुलियों में अरणियों को पकड़ कर, घिस कर प्रकट किया है). (१०) ebook converter DEMO Watermarks*