भारतकोश
सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Samaveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished310 पृष्ठ

पृष्ठ 83, कुल 310 में से

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पृष्ठ 83

चौथा अध्याय पहला खंड प्रत्यस्मै पिपीषते विश्वानि विदुषे भर. अरङ्कमाय जग्मये ऽ पश्चादध्वने नरः.. (१) हे यजमानो! इंद्र यज्ञ के संचालक हैं. वे सोमरस पीने के इच्छुक रहते हैं. वे सभी जगह निर्धारित समय पर पहुंचते हैं. वे उपयुक्त स्थान के भागीदार हैं. सब से पहले उन को ही यज्ञ की वेदी पर प्रतिष्ठित किया जाता है. मनुष्यों के यज्ञ में वे जाने की इच्छा रखते हैं. आप सभी उन्हीं इंद्र को सोमरस से तृप्त करने की कृपा कीजिए. (१) आ नो वयो वयःशयं महान्तं गह्वरेष्ठाम्. महान्तं पूर्विणेष्ठामुग्रं वचो अपावधीः.. (२) हे इंद्र! आप पर्वतवासी हैं. हमें सोमरस दीजिए. वह सब जगह उपलब्ध है. आप घोर निंदास्पद बातों को हम से दूर करने की कृपा कीजिए. हे इंद्र! आप शत्रुओं को हराने वाले हैं. (२) आ त्वा रथं यथोतये सुम्नाय वर्तयामसि. तुविकूर्मिमृतीषहमिन्द्र शविष्ठ सत्पतिम्.. (३) हे इंद्र! आप शत्रुओं को हराते व यजमानों का पोषण करते हैं. हम आप से संरक्षण व सुख चाहते हैं. जैसे गतिशील रथ सब जगह घुमा कर ले आता है, उसी प्रकार यजमान आप को यज्ञ स्थान पर ले आते हैं. (३) स पूर्व्यो महोनां वेनः क्रतुभिरानजे. यस्य द्वारा मनुः पिता देवेषु धिय आनजे.. (४) यजमान द्वारा भेंट किए गए हवि के अन्न का भोग लगाने के लिए इंद्र यज्ञस्थल पर उपस्थित होते हैं. वे सभी देवताओं के पालक व बुद्धिशील हैं. (४) यदि वहन्त्याशवो भ्राजमाना रथेष्वा. पिबन्तो मदिरं मधु तत्र श्रवा सि कृण्वते.. (५) मरुद् आनंददायी हैं. वे मीठा सोमरस पीते और अन्न उपजाते हैं. वे तेजस्वी एवं तीव्र गतिमान हैं. वे इंद्र को यज्ञवेदी तक पहुंचाते हैं. (५) त्यमु वो अप्रहणं गृणीषे शवसस्पतिम्. ebook converter DEMO Watermarks*