भारतकोश
सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Samaveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished310 पृष्ठ

पृष्ठ 86, कुल 310 में से

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पृष्ठ 86

विश्वाः पृतना अभिभूतरं नरः सजूस्ततक्षुरिन्द्रं जजनुश्च राजसे. क्रत्वे वरे स्थेमन्‍यामुरीमुतोग्रमोजिष्ठं तरसं तरस्विनम्‌.. (१) इंद्र यज्ञ में सर्वश्रेष्ठ स्थान पर विराजते हैं. वे सेनानायक व ओजस्वी हैं. उन की सेना संगठित है. वे अस्त्रशस्त्र धारण करते हैं. वे शत्रुनाशक, उग्र व महिमावान हैं. यजमान तेजी से कार्य करते हैं. वे इंद्र की उपासना करते हैं. (१) श्रत्ते दधामि प्रथमाय मन्यवे ऽ हन्यद्दस्युं नर्यं विवेरपः. उभे यत्वा रोदसी धावतामनु भ्यसाते शुष्मात्पृथिवी चिदद्रिवः.. (२) हे इंद्र! आप दुष्टों (दुश्मनों) का नाश करने वाले हैं. आप प्राणियों के हित के लिए जल बरसाते हैं. स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक आप की इच्छा से क्रियाशील होते हैं. हम इंद्र के उस क्रोध की प्रशंसा करते हैं, जो अन्याय को दूर करता है. हम यजमान आप पर बहुत श्रद्धा रखते हैं. (२) समेत विश्वा ओजसा पतिं दिवो य एक इद्दूरतिथिर्जनानाम्. स पूर्व्यो नूतनमाजिगीषन् तं वर्तनीरनु वावृते एक इत्‌.. (३) हे यजमानो! इंद्र अपने पुरुषार्थ से स्वर्गलोक के स्वामी बने हैं. वे मनुष्यों में पूजनीय, अपूर्व व जीतने के इच्छुक को विजय दिलाते हैं. आप सब मिल कर उन की उपासना कीजिए. (३) इमे त इन्द्र ते वयं पुरुष्टुत ये त्वारभ्य चरामसि प्रभूवसो. न हि त्वदन्यो गिर्वणो गिरः सघत्क्षोणीरिव प्रति तद्ध्वर्य नो वचः.. (४) हे इंद्र! आप बहुत धनवान हैं. सभी जगह आप की प्रशंसा होती है. हम आप की शरण में हैं. आप जैसा उपासना योग्य और कोई देवता नहीं हैं. हम आप की उपासना करते हैं. आप हमारे उपासना वचनों को (सब कुछ स्वीकारने वाली) पृथ्वी माता के समान स्वीकारिए. (४) चर्षणीधृतं मघवानमुक्थ्या ३ मिन्द्रं गिरो बृहतीरभ्यनूषत. वावृधानं पुरुहूत ॐ सुवृक्तिभिरमर्त्यं जरमाणं दिवेदिवे.. (५) हे इंद्र! आप सभी मनुष्यों का पालनपोषण करते हैं. आप धनवान, प्रसिद्ध एवं आप यजमानों की बढ़ोतरी करते हैं. आप अमर हैं. हम प्रतिदिन आप के लिए कई प्रशंसापरक स्तुतियां करते हैं. हम कई दिव्य उपासनाओं से बारबार आप की उपासना करते हैं. (५) अच्छा व इन्द्रं मतयः स्वर्य्युवः सध्रीचीर्विश्वा उशतीरनूषत. परिष्वजन्त जनयो यथा पतिं मर्यं न शुन्ध्युं मघवानमूतये.. (६) हे इंद्र! हम अपने संरक्षण, धनसंपदा व बुद्धि पाने के लिए आप को चाहते हैं. हम आप से अपनी उन्नति की इच्छा रखते हैं. महिलाएं जैसे पति को चाहती हैं, वैसे ही हमारी प्रार्थनाएं ebook converter DEMO Watermarks*