भारतकोश
सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Samaveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished310 पृष्ठ

पृष्ठ 99, कुल 310 में से

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पृष्ठ 99

अस्तु श्रौषट् पुरो अग्निं धिया दध आ नु त्यच्छर्धो दिव्यं वृणीमह इन्द्रवायू वृणीमहे. यद्द्द्र क्राणा विवस्वते नाभा सन्दाय नव्यसे. अध प्र नूनमुप यन्ति धीतयो देवाँ अच्छा न धीतयः.. (५) हम यजमानों ने बुद्धिपूर्वक अग्नि की यज्ञवेदी में स्थापना की है. हम दिव्य अग्नि की उपासना करते हैं. हम इंद्र और वायु से भी अपनी स्तुति सुनने का अनुरोध करते हैं. दोनों देव हमें यश और धन प्रदान करने की कृपा करें. हमारी प्रार्थनाएं संबंधित देवों के पास जरूर पहुंचेंगी. हमारे सभी यज्ञ संबंधी कार्य देवों के पास पहुंचाने के लिए ही किए जा रहे हैं. (५) प्र वो महे मतयो यन्तु विष्णवे मरुत्वते गिरिजा एवयामरुत्. प्र शर्धाय प्र यज्यवे सुखादये तवसे भन्ददिष्टये धुनिव्रताय शवसे.. (६) हे इंद्र! आप महान हैं. एवयामरुत् (ऋषि) आप की उपासना करते हैं. एवयामरुत् ऋषि की स्तुतियां मरुद्गणों तक पहुंचें. एवयामरुत् ऋषि की स्तुतियां विष्णु तक पहुंचें. यजमानों का कल्याण हो. यजमानों को सुखादि प्राप्त हो. यजमानों को मरुद्गणों का बल प्राप्त हो. (६) अया रुचा हरिण्या पुनानो विश्वा द्वेषा ꣲ सि तरति सयुग्वभिः सूरो न सयुग्वभिः. धारा पृष्ठस्य रोचते पुनानो अरुषो हरिः. विश्वा यद्रूपा परियास्यृक्वभिः सप्तास्येभिर्ऋक्वभिः.. (७) हे सोम! आप का रस हरे रंग का है. परिष्कृत सोमरस शत्रुनाशक है. उस की धारा चमकीली और तमहारी (अंधकार दूर करने वाली) है. परिष्कृत हरी व लाल आभा वाला सोमरस चमकता हुआ शोभित होता है. उस की सात रंगों वाली किरणें अनेक रूप धारण करती हैं. (७) अभि त्यं देव ꣲ सवितारमोण्योः कविक्रतुमर्चामि सत्यसव ꣲ रत्नधामभि प्रियं मतिम्. ऊर्ध्वा यस्यामतिर्भा अदिद्युतत्सवीमनि हिरण्यपाणिरमिमीत सुक्रतुः कृपा स्वः.. (८) हे सविता! हम आप की उपासना करते हैं. आप कवि, सत्यवान व अत्यंत प्रिय हैं. आप का प्रकाश पृथ्वीलोक से अंतरिक्षलोक तक फैलता है. आप सुनहरे प्रकाश वाले हैं. आप हम यज्ञ करने वालों पर अपनी कृपा बनाए रखते हैं. (८) अग्नि ꣲ होतारं मन्ये दास्वन्तं वसोः सूनु ꣲ सहसो जातवेदसं विप्रं न जातवेदसम्. य ऊर्ध्वया स्वध्वरो देवो देवाच्या कृपा. घृतस्य विभ्राष्टिमनु शुक्रशोचिष आजुह्वानस्य सर्पिषः.. (९) हे अग्नि! आप को हम होता मानते हैं. हम आप के दास हैं. आप धनदाता, ज्ञानदाता व सर्वज्ञाता हैं. आप जैसे सर्वज्ञाता और ब्राह्मण को हम आहुति प्रदान करते हैं. हम अपने यज्ञ में ऊर्ध्व (ऊंचे) लोकों में रहने वाले देवों की कृपा चाहते हैं. पवित्र और प्रकाशमान आप को ebook converter DEMO Watermarks*