सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Samaveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
की धारा से हमें सींचने की कृपा कीजिए. (१२) सातवां खंड यदिन्द्रा्हं यथा त्वमीशीय वस्व एक इत्. स्तोता मे गोसखा स्यात्.. (१) हे इंद्र! आप धन के एकमात्र ईश्वर हैं. हम भी आप जैसे हो जाएं तो हमारे उपासक गायों के साथ हमारी प्रशंसा करेंगे. (१) शिक्षेयमस्मै दित्सेय ꣲ शचीपते मनीषिणे. यदहं गोपतिः स्याम्.. (२) हे शचीपति (इंद्र)! यदि हम गोपति हो जाएं तो अपने इन मनीषी उपासकों को धन देने की इच्छा करें और उन्हें धन भी दें. (२) धेनुष्ट इन्द्र सूनृता यजमानाय सुन्वते. गामश्वं पिप्युषी दुहे.. (३) हे इंद्र! आप अपने पुत्र यजमानों को इष्ट पदार्थ गाय, घोड़े आदि प्रदान करने की कृपा कीजिए. (३) आपो हि ष्ठा मयोभुवस्ता न ऊर्जे दधातन. महे रणाय चक्षसे.. (४) हे जल! आप ऊर्जा धारक व सुखदायी हैं. आप हमें संग्राम के लिए बल प्रदान करने की कृपा कीजिए. (४) यो वः शिवतमो रसस्तस्य भाजयतेह नः. उशतीरिव मातरः.. (५) हे जल! मां जैसे बालक को दूध (रस) से पोसती है, उसी तरह आप अपने कल्याणकारी रस से हमें पोसने की कृपा कीजिए. (५) तस्मा अरं गमाम वो यस्य क्षयाय जिन्वथ. आपो जनयथा च नः.. (६) हे जल! आप हमें पुत्रपौत्र सहित क्षयकारी रोगों को जीतने की शक्ति उपजाने की कृपा कीजिए. (६) वात आ वातु भेषज ꣲ शम्भु मयोभु नो हृदे. प्र न आयू ꣲ षि तारिषत्.. (७) हे वायु! आप पधारिए. आप हमारे हृदय को खिलाइए (खुश रखिए). आप हमारे लिए कल्याणकारी ओषधियां ले कर आइए. आप हमें दीर्घायु प्रदान कीजिए. (७) उत वात पितासि न उत भ्रातोत नः सखा. स नो जीवातवे कृधि.. (८) हे वायु! आप के सिवाय कोई हमारा पिता, भाई व मित्र नहीं है. आप हमारे जीवन को सामर्थ्यवान बनाने की कृपा कीजिए. (८) यददो वात ते गृहे ३ ऽ मृतं निहितं गुहा. तस्य नो धेहि जीवसे.. (९) ebook converter DEMO Watermarks*
हे वायु! आप के पास गुप्त रूप से अमृत है. आप हमें जीने के लिए छिपा कर रखा हुआ वह गुप्त अमृत प्रदान करने की कृपा कीजिए. (९) अभि वाजी विश्वरूपो जनित्र २४ हिरण्ययं बिभ्रदत्क २४ सुपर्ण:. सूर्यस्य भानुमृतुथा वसान: परि स्वयं मेधमृज्रो जजान.. (१०) हे अग्नि! आप विश्वरूप व सुपर्ण (गरुड़) जैसे वेगवान हैं. आप उत्पत्ति स्थान (यज्ञवेदी) को सोने सा चमका देते हैं. आप ऋतु के अनुकूल सूर्य व मेघ को धारण करते हैं. (१०) अप्सु रेत: शिश्रिये विश्वरूपं तेज: पृथिव्यामधि यत्संबभूव. अन्तरिक्षे स्वं महिमानं मिमान: कनिक्रन्ति वृष्णो अश्वस्य रेत:.. (११) हे अग्नि! आप का वीर्य घोड़े के वीर्य की तरह है, विश्वरूप है, तेजोमय है, जल में (बादल रूप में) आश्रय पाता है, पृथ्वी पर जीवन शक्ति के रूप में है. अंतरिक्ष में अपनी व्यापक महिमा को फैलाए हुए है. वह सर्वत्र अपनी व्यापकता लिए हुए है. (११) अय २४ सहस्रा परि युक्ता वसान: सूर्यस्य भानुं यज्ञो दाधार. सहस्रदा: शतदा भूरिदावा धर्ता दिवो भुवनस्य विशपति:.. (१२) हे यजमानो! अग्नि हजारों किरणों वाले सूर्य के तेज को धारण करते हैं. वे यज्ञ का मूल आधार है. वे स्वर्गलोक व पृथ्वीलोक को धारण करते हैं. वे सैकड़ोंहजारों प्रकार के ऐश्वर्यदाता व विश्वपति हैं. (१२) नाके सुपर्णमुप यत्पतन्त २४ हृदा वेनन्तो अभ्यचक्षत त्वा. हिरण्यपक्षं वरुणस्य दूतं यमस्य योनौ शकुनं भुरण्युम्.. (१३) हे वेन! उपासक आप को हृदय से पाने की इच्छा करते हैं. इस इच्छा से वे ऊपर देखते हैं. तब वे आप को अंतरिक्षलोक में अग्नि (विद्युत् रूपधारी) के पास पाते हैं. आप वरुण के दूत हैं, सोने के पंखों वाले हैं, यम की योनि में हैं व विश्व का भरणपोषण करने वाले हैं. (१३) ऊर्ध्वो गन्धर्वो अधि नाके अस्थात्प्रत्यङ्कचित्रा बिभ्रदस्यायुधानि. वसानो अत्क २४ सुरभिं दृशे क २४ स्वा ३ र्ण नाम जनत प्रियाणि.. (१४) हे वेन! आप ऊंचे स्वर्गलोक के पास रहते हैं. आप अद्भुत आयुध धारण कर के सुशोभित होते हैं. आप सूर्य की तरह प्राणियों के लिए जल धारण कर के उसे बरसाते हैं. (१४) द्रप्स: समुद्रमभि यज्जिगाति पश्यन् गृध्रस्य चक्षसा विधर्मन्. भानु: शुक्रेण शोचिषा चकानस्तृतीये चक्रे रजसि प्रियाणि.. (१५) हे वेन! जब आप समुद्र के जल को ले कर गिद्ध जैसी दृष्टि से देखते हुए मेघों के पास ebook converter DEMO Watermarks*
पहुंचते हैं तब सूर्य की तरह चमकते हुए तीसरे लोक से प्राण जल बरसाते हैं. (१५) ebook converter DEMO Watermarks*
इक्कीसवां अध्याय
इक्कीसवां अध्याय आशुः शिशानो वृषभो न भीमो घनाघनः क्षोभणश्चर्षणीनाम्. सङ्क्रन्दनो ऽ निमिष एकवीरः शत २४ सेना अजयत्साकमिन्द्रः.. (१) हे इंद्र! आप बैल की तरह भीमकाय, दुष्टनाशक, वैरियों के लिए क्षोभदायी, स्फूर्तिवान व आलस्यरहित हैं. अकेले आप ही ऐसे वीर हैं, जो सारी शत्रु की सेना को पराजित कर देते हैं. (१) सङ्क्रन्दनेनानिमिषेण जिष्णुना युत्कारेण दुश्च्यवनेन धृष्णुना. तदिन्द्रेण जयत तत्सहध्वं युधो नर इषुहस्तेन वृष्णा.. (२) हे इंद्र! आप शत्रुओं को क्रंदन करा (रुला) देने वाले हैं. आप आलस्यरहित हैं. आप विजेता व निपुण हैं. योद्धा इंद्र की सहायता से युद्ध जीत कर शत्रुओं को भगाते हैं. (२) स इषुहस्तैः स निष्षङ्गिभिर्वशी स २४ स्रष्टा स युध इन्द्रो गणेन. स २४ सृष्टजित्सोमपा बाहुशर्ध्यू ३ ग्रधन्वा प्रतिहिताभिरस्ता.. (३) इंद्र युद्ध (विद्या) में दक्ष हैं. वे सृष्टि के विजेता, सोमरस पीने वाले, बाहुबली, धनुर्धारी व शत्रुओं के नाशक हैं. वे तलवार और बाण धारण करने वाले योद्धाओं के सहयोग से शत्रुओं को वशीभूत कर लेते हैं. (३) बृहस्पते परि दीया रथेन रक्षोहामित्राँ अपबाधमानः. प्रभञ्जन्सेनाः प्रमृणो युधा जयन्नस्माकमेध्यविता रथानाम्.. (४) हे इंद्र! आप सब के पालनहार, राक्षसों के नाशक, शत्रुओं के बाधक, सेना के विध्वंसक व हमारे रथों के रक्षक हैं. युद्ध में हम विजयी हों. (४) बलविज्ञायः स्थविरः प्रवीरः सहस्वान्वाजी सहमान उग्रः. अभिवीरो अभिसत्वा सहोजा जैत्रमिन्द्र रथमा तिष्ठ गोवित्.. (५) हे इंद्र! आप सब के बल को जानते हैं. आप अत्यंत वीर, स्थविर और उग्रता सहन करने वाले हैं. आप बल सहित ही पैदा हुए हैं. आप महावीर व गोपालक हैं. आप विजयी रथ में बैठने की कृपा कीजिए. (५) गोत्रभिदं गोविदं वज्रबाहुं जयन्तमज्म प्रमृणन्तमोजसा. इम २४ सजाता अनु वीरयध्वमिन्द्र २४ सखायो अनु स २४ रभध्वम्.. (६) ebook converter DEMO Watermarks*
हे इंद्र! आप दुश्मनों के गढ़ भेद देते हैं. आप वज्रबाहु, शत्रुनाशक, विजेता, गोपालक, नेता और पराक्रमशील हैं. शत्रु पर क्रोध करने में आप इंद्र का अनुगमन कीजिए. (६) अभि गोत्राणि सहसा गाहमानो ऽ दयो वीरः शतमन्युरिन्द्रः. दुश्च्यवनः पृतनाषाडयुध्यो ३ स्माक ॐ सेना अवतु प्र युत्सु.. (७) हे इंद्र! आप हमारी व सेनाओं की रक्षा कीजिए. आप अद्भुत युद्धवीर, शत्रुजित्, स्थिर, वीर, अनीति के प्रति क्रोधी व शत्रु पर दया न करने वाले हैं. आप शत्रु के गढ़ भेदने वाले हैं. (७) इन्द्र आसां नेता बृहस्पतिर्दक्षिणा यज्ञः पुर एतु सोमः. देवसेनानामभिभञ्जतीनां जयन्तीनां मरुतो यन्त्वग्रम्.. (८) हे इंद्र! आप हमारे नेता होइए. बृहस्पति सब से आगे होने की कृपा करें. सोम दक्षिण यज्ञ के संचालक हैं. वे भी अग्रगामी हों. मरुद्गण शत्रुनाशक हैं. वे देवताओं की सेना में सब से आगे होने की कृपा करें. (८) इन्द्रस्य वृष्णो वरुणस्य राज्ञ आदित्यानां मरुता ॐ शर्ध उग्रम्. महामनसां भुवनच्यवानां घोषो देवानां जयतामुदस्थात्.. (९) हे इंद्र! आप शक्तिमान हैं. वरुण राजा हैं. मरुद्गण तीव्र बल वाले हैं. आप शत्रु के डेरों के नाशक, महान मन वाले व विजयशील हैं. देवताओं का जयघोष सर्वत्र व्याप्त हो, सर्वत्र गूंजे. सभी देवताओं का हमें सहयोग प्राप्त हो. (९) उद्वर्षय मघवन्नायुधान्युत्सत्वनां मामकानां मना ॐ सि. उद्वृत्रहन्वाजिनां वाजिनान्युद्रथानां जयतां यन्तु घोषाः.. (१०) हे इंद्र! आप क्षमतावान हैं. आप अस्त्रशस्त्रधारी युद्धवीरों के मन में उत्साह भरें. आप हमारे मन में भी जोश भरें. आप हमारे युद्धरथ के घोड़ों को वेगवान बनाइए. विजयी हो कर आते हुए हमारे रथों के जयघोष गूंजें. (१०) अस्माकमिन्द्रः समृतेषु ध्वजेष्वस्माकं या इषवस्ता जयन्तु. अस्माकं वीरा उत्तरे भवन्त्वस्माँ उ देवा अवता हवेषु.. (११) हे इंद्र! आप युद्धों में हमारी सेना के रक्षक होइए. हमारे बाण शत्रुविजय करें. हमारे वीर युद्धों में विजय प्राप्त करें. यज्ञ में देवता हमारी रक्षा करें. हमारे ध्वजों पर विजय अंकित हो. (११) असौ या सेना मरुतः परेषामभ्येति न ओजसा स्पर्धमाना. तां गूह्त तमसापव्रतेन यथैतेषामन्यो अन्यं न जानात्.. (१२) हे मरुद्गणो! बल से स्पर्धा करती हुई शत्रुसेना हम पर आक्रमण करे तो आप उस सेना ebook converter DEMO Watermarks*
को घने अंधकार से घेर लीजिए, जिस से वे एकदूसरे को पहचान तक न सकें और अपनी ही सेना का संहार कर दें. (१२) अमीषां चित्तं प्रतिलोभयन्ती गृहाणाङ्गान्वप्वे परेहि. अभि प्रेहि निर्दह हृत्सु शोकेरन्धेनामित्रामस्तमसा सचन्ताम्.. (१३) हे पाप के देवता! आप शत्रुओं के चित्त प्रति लोभी बनाइए. आप शत्रुओं के अंगों को भी कस लीजिए. आप शोकों की ज्वालाओं से शत्रुओं का हृदय दहलाइए. आप घनघोर अंधेरा कर के शत्रु को अचेत (बेहोश) बना दीजिए. (१३) प्रेता जयता नर इन्द्रो वः शर्म यच्छतु. उग्रा वः सन्तु बाहवो ऽ नाधृष्या यथासथ.. (१४) हे वीर मनुष्यो! इंद्र आप को सुखशांतिमय बनाने की कृपा करें. आप के बाहु उग्र हों. आप को शत्रु अधीन न बना सके. आप उन पर आक्रमण कर के विजय प्राप्त कीजिए. (१४) अवसृष्टा परा पत शरव्ये ब्रह्मसं ꣪ शिते. गच्छामित्रान्प्र पद्यस्व मामीषां कं च नोच्छिषः.. (१५) हमारे बाण वेदमंत्रों और स्तुतियों से प्रेरित किए गए हैं. वे बाण जब हम छोड़ें तो शत्रु कितना ही दूर क्यों न हो, उस पर जा कर गिरें. उन शत्रुओं में से कोई भी बच न पाए. (१५) कङ्काः सुपर्णा अनु यन्त्वेनान् गृध्राणामन्नमसावस्तु सेना. मैषां मोच्यघहारश्च नेन्द्र वया ꣪ श्येनाननुसंयन्तु सर्वान्.. (१६) हे इंद्र! बाण मांसाहारी बाज की तरह शत्रुओं का अनुगमन (पीछा) करें. शत्रुओं की सेना गिद्धों का भोजन हो जाए. उन का कोई अवशेष न रह पाए. पाप में लगे पापी भी बच न पाएं. मांसाहारी पक्षी उन का भी अनुगमन (पीछा) करें. (१६) अमित्रसेनां मघवन्न्रस्मां छत्रयतीमभि. उभौ तामिन्द्र वृत्रहन्नग्निश्च दहतं प्रति.. (१७) हे इंद्र! आप अमित्रों की सेना का नाश कीजिए. आप वृत्रहंता व धनवान हैं. आप और अग्नि मिल कर शत्रुओं की सेना को भस्म करने की कृपा करें. (१७) यत्र बाणाः संपतन्ति कुमारु विशिखा इव. तत्र नो ब्रह्मणस्पतिरदितिः शर्म यच्छतु विश्वाहा शर्म यच्छतु.. (१८) जहां बाण इस तरह गिरते हैं, जैसे बिना चोटी वाले चंचल बालक गिर रहे हों, वहां अदिति और ब्रह्मणस्पति हमें सुख देने की कृपा करें. वे सदैव हमारा कल्याण करने की कृपा करें. (१८) वि रक्षो वि मृधो जहि वि वृत्रस्य हनू रुज. वि मन्युमिन्द्र वृत्रहन्नमित्रस्याभिदासतः.. (१९) ebook converter DEMO Watermarks*
हे इंद्र! आप राक्षसों व हिंसकों का विनाश करने की कृपा कीजिए. आप वृत्रासुर जैसे राक्षसों की ठोड़ी तोड़ दीजिए. आप अमित्रों का क्रोध और घमंड दूर करने की कृपा कीजिए. (१९) वि न इन्द्र मृधो जहि नीचा यच्छ पृतन्यतः. यो अस्माँ अभिदासत्यधरं गमया तमः.. (२०) हे इंद्र! हमारी सेना युद्धों में शत्रुओं को पराजित कर दे. हमारे शत्रु मुंह नीचा कर के हमारे सामने आएं. आप उन शत्रुओं को पतन के गर्त में डाल दीजिए, जो हमें अपने अधीन (वश में) करना चाहते हैं. (२०) इन्द्रस्य बाहू स्थविरौ युवानावनाधृष्यौ सुप्रतीकावसह्यौ. तौ युञ्जीत प्रथमौ योग आगते याभ्यां जितमसुराणा १४ सहो महत्.. (२१) इंद्र के बाहु हाथी की सूंड की तरह हैं. आप सर्वप्रथम उन भुजाओं को युद्ध में प्रेरित करने की कृपा कीजिए. आप बलजित्, स्थिर व जवान हैं. आप पर किसी का वश नहीं चल सकता. (२१) मर्माणि ते वर्मणा च्छादयामि सोमस्त्वा राजामृतेनानु वस्ताम्. उरोर्वरीयो वरुणस्ते कृणोतु जयन्तं त्वामु देवा मदन्तु.. (२२) हे इंद्र! हम आप के मर्म स्थानों को कवच से ढकते हैं. राजा सोम आप को अमृतमय बनाने की कृपा करें. वरुण आप को सुख प्रदान करने की कृपा करें. देवता आप को प्रसन्नता प्रदान करें. (२२) अन्धा अमित्र भवताशीर्षाणो ऽ हय इव. तेषां वो अग्निनुन्नानामिन्द्रो हन्तु वरंवरम्.. (२३) हे इंद्र! सिर रहित सांप जैसे अंधा होता है, वैसे ही हमारे अमित्र हो जाएं. उन में से जो अग्नि की ज्वाला से बच जाएं, उन बचे हुए शत्रुओं को आप स्वयं नष्ट करने की कृपा कीजिए. (२३) यो नः स्वो ऽ रणो यश्च निष्ठ्यो जिघा १४ सति. देवास्त १४ सर्वे धूर्वन्तु ब्रह्म वर्म ममान्तरं १४ शर्म वर्म ममान्तरम्.. (२४) जो हमारे अपने हो कर विश्वासपूर्वक छल से हमें मारना चाहते हैं, देवगण उन सभी धूर्तों को नष्ट करने की कृपा करें. वेदों के मंत्र हमारे मर्मस्थान के कवच हैं. वे हमें सुख प्रदान करने की कृपा करें. (२४) मृगो न भीमः कुचरो गिरिष्ठाः परावत आ जगन्था परस्याः. सृक १४ स १४ शाय पविमिन्द्र तिग्मं वि शत्रूं ताढि विमृधो नुदस्व.. (२५) ebook converter DEMO Watermarks*
हे इंद्र! आप पर्वत में रहने वाले शेर के समान भयंकर हैं. दूर से यहां आ कर दूर तक मारक तीखे वज्र से शत्रुओं का नाश करने की कृपा कीजिए. आप लड़ाकू शत्रुओं को दूर करने की कृपा कीजिए. (२५) भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः. स्थिरैरंगैस्तुष्टुवा ॐ सस्तनूभिर्व्यशेमहि देवहितं यदायुः.. (२६) हे देवगणो! आप की कृपा से कानों से कल्याणकारी वचन सुनें, आंखों से मंगलमय दृश्य देखने को मिलें. हम स्वस्थ हाथपैर और अंगों से आप की स्तुति कर सकें. आप देवताओं की कृपा से हमें जो भी आयु प्राप्त हुई है, उस का हम स्तुतिपूर्वक सदुपयोग कर सकें. (२६) स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः. स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु.. (२७) इंद्र हमारा कल्याण करने की कृपा करें. सर्वज्ञाता पूषा हमारा कल्याण करने की कृपा करें. अहिंसक अस्त्रशस्त्र वाले गरुड़ व ज्ञान धारण करने वाले बृहस्पति हमारा कल्याण करने की कृपा करें. (२७) (सामवेद पूर्ण)
अथर्ववेद ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ ... वेद ॥ अथर्ववेद ॥ ेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजु ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद , ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ '॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजुव वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ य वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजु ॥ ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववे सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजुर्वेद ॥ ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजुर्वेद ॥ ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अ अथर्ववेद ॥ यजुर्वेद ॥ ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ र्वेद ॥ यजुर्वेद ॥ ऋग्वेद ॥ ॥ अथर्ववेद ॥ यजुर्वेद ॥ ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अ... सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजुर्वेद ॥ ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अ... सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजुर्वेद । ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ य '॥ ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजु वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजु ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ ेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववे र्वेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजु ऋग्वेद ॥ सामवे अथर्ववेद ॥ डा. गंगा सहाय शर्मा एम.ए. (हिंदी, संस्कृत), पी-एच.डी., व्याकरणाचार्य