साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२ | श्रीसाम्बपुराणम्
उन विधाता, अपने प्रकाश द्वारा प्रभाव-विस्तारकारी, प्राणिगण के संहारार्थ रश्मि-प्रकाशक तेजस्वी सूर्य को नमस्कार है॥५॥
शक्रो वह्निर्यमो रक्षो वरुणोऽथ समीरणः।
धनदश्चेश्वरश्चैव अध ऊर्ध्वं तथैव च।
ये दिशो व्याप्य तिष्ठन्ति तस्मै सर्वात्मने नमः ॥६॥
जो इन्द्र, अग्नि, यम, राक्षस, वरुण, वायु, कुबेर तथा ईश्वररूप से ऊर्ध्व अधः सभी दिशाओं को व्याप्त करके स्थित हैं, उन सर्वात्मस्वरूप सूर्य को नमस्कार है॥६॥
उद्देशानुक्रमणिकाकथनम्
शौनको नैमिषारण्ये पुरा सूतमपृच्छत।
सत्रे द्वादशवार्षिक्ये गते काले च विश्रुते ॥७॥
**अनुक्रमणिका कथन—**पूर्वकाल में नैमिषारण्य क्षेत्र में द्वादशवार्षिक यज्ञ में अधिक समय व्यतीत हो जाने पर शौनक ऋषि ने सूत से इस प्रकार जिज्ञासा की॥७॥
एतस्मिन्नन्तरे काले कथामेतामपृच्छत।
त्वयात्र कथिताः सूत पुराणा बहुविस्तराः ॥८॥
षण्मुखस्य कथा चादौ पुनर्ब्रह्माण्डमेव च।
वायुनापि च यत् प्रोक्तं तथा सावर्णिकेन च ॥९॥
मार्कण्डेयेन यत् प्रोक्तं यद् वैशम्पायनेन च।
दधीचिना च यत् प्रोक्तं यच्च सर्वेण भाषितम् ॥१०॥
हरिणांपि च यत् प्रोक्तमृषिभिः समुदाहृतम्।
बालखिल्यैश्च यत्प्रोक्तं यच्छ्रुतं चर्षिभिः सह ॥११॥
उन्होंने जिज्ञासा किया कि हे सूत! अपने बहुत विस्तृत पुराणों को कहा है। प्रथमतः कार्तिकेय की कथा, तदनन्तर ब्रह्माण्ड की कथा एवं वायु तथा सावर्णि (सूर्यपुत्र) मनु की कथा भी कही। जिसे मार्कण्डेय, वैशम्पायन, दधीचि तथा शर्व (महादेव) ने कहा था, उसे भी कहा। जो हरि ने कहा तथा ऋषियों द्वारा जो कहा गया, बालखिल्यगण ने जो कहा था तथा ऋषियों से जो सुना, वह सब आपने कहा॥८-११॥
हरिपुत्रकृतं चात्र न त्वया कथितं मुने।
न मे कर्णसुखं मौनं प्रीणात्यमृतसस्मितम् ॥१२॥
हे मुने! किन्तु अपने हरिपुत्र साम्बकृत कुछ भी नहीं कहा, जो हमारे कर्णसुखकर मन के लिये प्रीतिकर नहीं है॥१२॥
भास्करस्य पुराणं यत् पृष्टं साम्बेन धीमता।
तदेतद्द्वादशाकारं न तु त्रिंशार्धमूर्तिकम् ॥१३॥