साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 153, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकोनत्रिंशोऽध्यायः
(प्रतिमालक्षणम्)
वशिष्ठ उवाच
अतः परं प्रवक्ष्यामि प्रतिमालक्षणं क्रमात्।
यथैवं नारदेनोक्तं साम्बानुग्रहकारिणा ॥१॥
वशिष्ठदेव कहते हैं—अब प्रतिमालक्षण कहूँगा, जिसे साम्ब के ऊपर अनुग्रह करके नारद ने जिस प्रकार कहा था॥१॥
न पुरा प्रतिमा ह्यासीः पूज्यते मण्डले रविः।
यथैतन्मण्डलं व्योम्नि स्थीयते सवितुस्तदा ॥२॥
एवमेव पुरा भक्तैः पूज्यते मण्डलाकृतिः।
यतः प्रभृति चाप्येषा निर्मिता विश्वकर्मणा ॥३॥
सर्वलोकहितार्थाय सूर्यस्य पुरुषाकृतिः।
प्रतिमास्थापनं चैव प्रमाणं च विधानतः ॥४॥
सर्वलोकहितं साम्ब कथ्यमानं निबोध मे।
गृहेषु प्रतिमायास्तु न तासां नियमः क्वचित् ॥५॥
पहले प्रतिमा नहीं थी; रवि की पूजा मण्डल में ही होती थी। जैसे आकाश में सूर्य का मण्डल है, वैसे ही सूर्य स्थापित होते थे। पूर्वकाल में भक्त मण्डलाकृति सूर्य का ही पूजन करते थे। जबसे विश्वकर्मा ने समस्त लोक के हितार्थ सूर्य की पुरुषाकृति प्रतिमा का निर्माण किया, तब से प्रतिमास्थापन तथा यथाविधान प्रमाण चलता है। हे साम्ब! समस्त संसार के हितार्थ मैंने तुमसे इसे कहता हूँ, सुनो। गृह में प्रतिमा-निर्माण का कोई नियम नहीं है॥२-५॥
मनसैवेप्सिताः कार्याः सर्वा एव शुभप्रदाः।
देवायतनविन्यासे कार्यं मूर्त्तिपरीक्षणम् ॥६॥
मन से ईप्सित कार्य सबके लिये शुभ देने वाला होता है। देवता के मन्दिर-निर्माण में मूर्ति की परीक्षा करना उचित है॥६॥
भूमेरश्च लक्षणं यत्नात् परीक्षां तत्त्वतो बुधैः।
आदौ भूमिं परीक्षेत कुर्याद्देवगृहं ततः ॥७॥