भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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पृष्ठ 154

.१४४ श्रीसाम्बपुराणम्

पण्डितों द्वारा भूमि का परीक्षण करना उचित है। पहले भूमि की परीक्षा करके तब मन्दिर का निर्माण करना चाहिये।।७।।

इष्टगन्धरसोपेता स्निग्धा भूमिः प्रशस्यते।
शर्करातुषकेशास्थिक्षाराङ्गारविवर्जिता ॥८॥

इष्ट गन्ध तथा रसयुक्त भूमि प्रशंसनीय है। शर्करा (धूल, बालू प्रभृति), तुष, केश, अस्थि, क्षार तथा अंगारयुक्त भूमि वर्जित है।।८।।

मेघदुन्दुभिनिर्घोषा सर्वबीजप्ररोहिणी।
शुक्ला रक्ता तथा पीता कृष्णाभावहिता क्षितिः ॥९॥

मेघ तथा दुन्दुभि की ध्वनियुक्त तथा समस्त बीजों के उत्पत्तियोग्य शुक्ल, रक्त, पीत, कृष्ण वर्ण वाली जमीन प्रशस्त होती है।।९।।

द्विजराजन्यवैश्यानां शूद्राणां च यथाक्रमम्।
परीक्षितायां भूम्यां तु मध्ये तस्याः प्रमाणतः ॥१०॥
उपलिप्य चतुर्हस्तं चतुरस्रं समन्ततः।
हस्तमात्रमधः खात्वा मध्ये तस्य दशाङ्गुलम् ॥११॥

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्रों द्वारा यथाक्रम से परीक्षित भूमि में परिमाप के अनुसार चार हाथ साफ करके चारो ओर चतुरस्र (चार कोण, चौकोर) बनाकर नीचे एक हाथ खोदना चाहिये। उसमें पुनः १० अङ्गुल का गर्त खोदे।।१०-११।।

गर्तमुत्कीर्त्तयेत्तं वै पांसुना परिपूरयेत्।
समे समगुणा ज्ञेया हीने हीनगुणा भवेत् ॥१२॥

उस गर्त को धूल से परिपूर्ण करना चाहिये। वह समान होने से समगुण तथा हीन होने से हीनगुण वाली होती है।।१२।।

वर्द्धमाने तु भूयोऽसौ भवेद्बुद्धिकरी क्षितिः।
नित्यं प्राङ्मुखमर्कस्य कदाचित् पश्चिमामुखम् ॥१३॥

वृद्धि होने से वह वृद्धिकरी भूमि होती है। नित्य सूर्य-प्रतिमा का मुख पूर्व की ओर करना चाहिये, परिस्थितिवशात् पश्चिममुख भी हो सकती है।।१३।।

स्थापनीयं गृहे सम्यक् प्राङ्मुखे स्थानकल्पना।
भवनाद्दक्षिणे पार्श्वे रवेः स्नानगृहं स्मृतम् ॥१४॥

गृह के पूर्व में सूर्यप्रतिमा स्थापित करनी चाहिये। गृह के दक्षिण पार्श्व में सूर्य का स्नानगृह बनाना चाहिये।।१४।।