भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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एकोनत्रिंशोऽध्यायः १४५

अग्निहोत्रगृहं कार्यं रवेरुत्तरतः शुभम्।
उदङ्मुखं भवेच्छम्भोर्मातृणां च गृहोत्तमम्॥१५॥
ब्रह्मा पश्चिमतः स्थाप्यं विष्णुरुत्तरतस्तथा।
निक्षुभा दक्षिणे पार्श्वे रवेः राज्ञी तु वामतः॥१६॥

उत्तर में सूर्य का अग्निहोत्र गृह होना चाहिये, जो शुभप्रद होता है। उत्तर की ओर मुख किये शम्भु तथा मातृकाओं का गृह उत्तम होता है। पश्चिम में ब्रह्मा तथा उत्तर में विष्णु स्थापनीय हैं। रवि के दक्षिण पार्श्व में निक्षुभ तथा वाम पार्श्व में राज्ञी को स्थापित करना चाहिये॥१५-१६॥

पिङ्गलो दक्षिणे भानोर्वामतो दण्डनायकः।
श्रीमहाश्वेतयोः स्थानं पुरस्तादंशुमालिनः॥१७॥

सूर्य के दक्षिण में पिङ्गल तथा वाम पार्श्व में दण्डनायक की प्रतिमा स्थापित करनी चाहिये। अंशुमाली सूर्य के समक्ष श्री तथा महाश्वेता का स्थान होता है॥१७॥

तत्तथो अश्विनौ द्वारि पूजाकर्मगृहाद् बहिः।
द्वितीयायां तु कक्षायां राज्ञस्तोषौ व्यवस्थितौ॥१८॥
तृतीयायां तु कक्षायां स्थितौ कल्माषपक्षिणौ।
जान्दको माठरः स्थाप्यो दक्षिणां दिशमास्थितौ॥१९॥

पूजागृह के बाहरी द्वार में अश्विनीकुमार द्वय एवं द्वितीय कक्षा में राज्ञ एवं तोष के रहने का स्थान बनाना चाहिये। तृतीय कक्षा में कल्माष नामक पक्षिद्वय रहते हैं। दक्षिण दिशा में जान्दक तथा माठर की प्रतिमा स्थापित करनी चाहिये॥१८-१९॥

प्राप्नुयानूक्षुतायौ तु पश्चिमां दिशमास्थितौ।
उदीच्यां स्थापनीयस्तु कुबेरः सोम एव च॥२०॥

पश्चिम दिशा में प्राप्नुयान तथा ऊक्षुता को स्थापित करना चाहिये। उत्तर दिशा में कुबेर तथा चन्द्र की स्थापना करनी चाहिये॥२०॥

उत्तरेणैव ताभ्यां तु रेवन्तः सविनायकः।
यद्रवेर्विद्यते स्थानं चतुर्दिक्षु तु तत्र वा॥२१॥

उसके उत्तर में विनायक के साथ रेवन्त की स्थापना करनी चाहिये अथवा रवि के चतुर्दिक् जो स्थान है, वहाँ उनको स्थापित करना चाहिये॥२१॥

अर्घाय मण्डले द्वे वै कार्ये सव्यापसव्ययोः।
दद्यादुदयवेलायामर्घं सूर्याय दक्षिणे॥२२॥
उत्तरे मण्डले दद्यादर्घमस्तंगते रवौ।
चतुरस्रं चतुःशृङ्गं व्योमदेवगृहाग्रतः॥२३॥