साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 157, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रिंशोऽध्यायः
(प्रतिष्ठापनकल्पे दारुपरीक्षा)
वशिष्ठ उवाच
अतः परं प्रवक्ष्यामि प्रतिमाविधिविस्तरम् ।
अर्चाः सप्तविधा प्रोक्ता भक्तानां शुभवृद्धये ॥१॥
काञ्चनी राजती ताम्री पार्थिवी शैलजा तथा ।
वार्क्षी वालेख्या गायन्ति मूर्त्तिस्थानानि सप्त वै ॥२॥
वशिष्ठदेव कहते हैं—अब प्रतिमा-निर्माण का विधान विस्तार से कहता हूँ। भक्तों की शुभ वृद्धि हेतु सात प्रकार की अर्चनीय प्रतिमा कही गयी है। स्वर्णमयी, रौप्यमयी, ताम्री, पार्थिवी (मृण्मयी), प्रस्तरमयी, वार्क्षी (काठ की), अथवा आलेख्य (पट पर अंकित चित्र)—ये सात मूर्तियाँ कही गयी हैं॥१-२॥
मधूको देवदारुश्च राजवृक्षः सचन्दनः ।
बिल्वश्चाम्रातकश्चैव खदिरश्चम्पकस्तथा ॥३॥
निम्बः श्रीपर्णवृक्षश्च त्वशनः सरलोऽर्जुनः ।
रक्तचन्दनपर्यन्ताः श्रेष्ठाः स्युः प्रतिमाद्रुमाः ॥४॥
मधूक, देवदारु, राजवृक्ष, चन्दन, बिल्व, आमडा, कत्था, चम्पक, निम्ब, शाल्मलीवृक्ष, अशन (पीतशालक वृक्ष), देवदारु वृक्ष, अर्जुन तथा रक्तचन्दन—ये प्रतिमानिर्माणार्थ श्रेष्ठ वृक्ष कहे गये हैं॥३-४॥
वर्णानामानुपूर्व्येण द्वौ द्वौ वृक्षौ प्रकीर्त्तितौ ।
निम्बाद्याः सर्ववर्णानां वृक्षाः साधारणाः स्मृताः ॥५॥
आनुपूर्वीक चार वर्णों के दो-दो वृक्ष कहे गये हैं। ब्राह्मणादि सकल वर्णों के लिये निम्ब-प्रभृति साधारण वृक्षों को कहा गया है॥५॥
क्षीरिणो वर्जिताः सर्वे दुर्बलास्ते स्वभावतः ।
चतुष्पथेषु न ग्राह्या ये ये स्युस्तत्र वृक्षकाः ॥६॥
समस्त क्षीरीवृक्ष (जिसको तोड़ने पर दूध निकले) का वर्जन करना उचित है; कारण कि वे स्वभावतः दुर्बल होते हैं। चतुष्पथ पर जो वृक्ष अवस्थित हों, उनका भी ग्रहण नहीं करना चाहिये॥६॥