भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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१४८ श्रीसाम्बपुराणम्

देवतायतनस्थाश्च ये च वल्मीकसम्भवाः।
उत्तीर्णा देवता येषु चैत्यवृक्षाश्च ये स्मृताः ॥७॥

देवता के मन्दिर के पास जो वृक्ष है, जिन वृक्षों में वल्मीक (दीपक) उत्पन्न है, जिस वृक्ष से देवता चले गये हैं एवं चैत्यवृक्ष (रथ्या अथवा श्मशान पार्श्वस्थ बौद्धों का पूजनीय वृक्ष)—इनका वर्जन करना चाहिये॥७॥

श्मशानाश्रयजाताश्च पक्षिणां निलयाश्च ते।
सकोटराश्च ये वृक्षाः शुष्काग्रा ये च पादपाः ॥८॥
अस्तानिलानलहताः कुञ्जराशनदूषिताः।
ग्रामाभासरजोद्धस्ता बाला दुर्गन्धिनस्तथा ॥९॥
अकालफलपुष्पाश्च काले ताभ्यां विवर्जिताः।
शीर्णवज्राश्च तरयो रूक्षा ध्वांक्षनिषेविताः।
एकशाखा द्विशाखाश्च त्रिशाखा अधमा द्रुमाः ॥१०॥

श्मशानसीमा में जो वृक्ष उगा है, जिस वृक्ष पर पक्षियों का वास है, जिसमें काँटा है, जिसका अग्रभाग सूख गया है, वायु अथवा अग्नि से जो वृक्ष नष्ट है, हाथी के खाने से जो नष्ट है, जो ग्राम के मुर्गे अथवा गृद्ध की बीट से जड़ित है, जो वृक्ष छोटा है, जो दुर्गन्धयुक्त है, अकाल में जिस वृक्ष के फल तथा पुष्प नष्ट हो जाते हैं, काल में जिसमें पुष्प-फल होते ही नहीं (काल में अर्थात् ऋतु में), स्नुही वृक्ष, जो वृक्ष रूक्ष है तथा जिस पर गृद्ध रहते हैं, जिस वृक्ष की एक, दो अथवा तीन शाखायें मात्र हैं, ऐसे अधम वृक्ष का त्याग करना चाहिये॥८-१०॥

शुचौ समे विविक्ते च केशाङ्गारविवर्जिते।
प्रागुदक्प्रवणे हृद्ये देशे कण्टकवर्जिते ॥११॥
विस्तीर्णस्कन्धविटपः पुष्पवानृजुरव्रणः।
अभुग्नहीनोऽविकटः स तु ग्राह्यः शुभस्तरुः ॥१२॥

पवित्र स्थान में, निर्जन में उगे, केश-अङ्गार-रहित, जलाशय के निकट उगे, रमणीय कण्टक वर्जित जो वृक्ष विस्तीर्ण तना तथा शाखा वाला हो, पुष्पयुक्त, सीधा तथा अक्षत हो, जो टेढ़ा, खण्डित अथवा विकट न हो, ऐसे मंगलप्रद वृक्ष को प्रतिमा-निर्माणार्थ ग्रहण करना उचित है॥११-१२॥

तस्याप्यष्टसु मासेषु ग्रहणं कार्त्तिकादिषु ॥१३॥
प्रशस्ते पुष्यनक्षत्रे गुणयुक्ते शुभे दिने।
शकुने च शुभे नित्यं सोपवासोऽधिवासयेत् ॥१४॥