साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 159, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रिंशोऽध्यायः १४९
समन्तादुपलभ्याथ तस्याधस्ताद् वसुन्धराम्। गायत्र्या परिपूतेन परितः प्रोक्ष्य वारिणा ॥१५॥ शुक्ले चापरिभुक्ते च परिधाय च वाससी। पूजयेद् गन्धमाल्यैश्च धूपैः स्वबलिकर्मभिः ॥१६॥
कार्तिकादि आठ मास में ऐसा काष्ठ संग्रह करना उचित है। प्रशस्त पुष्य नक्षत्रयुक्त शुभ दिन में शुभ नक्षत्र में नित्य उपवास रहकर अधिवास करे। चतुर्दिक लक्ष्य करके अपने नीचे की मिट्टी को गायत्री से पवित्र करके चारो ओर तथा ऊर्ध्व-अधः दिशा में जल छिड़के; तत्पश्चात् शुद्ध वस्त्रयुगल धारण करके गन्ध-माल्य, धूपदान, बलिकर्म प्रभृति से पूजन करे।।१३-१६।।
ततः कुशपरिस्तीर्णे हुत्वाग्निं च तदन्तिकम्। देवदारुसमिद्भिश्च मन्त्रेणानेन तत्त्ववित् ॥१७॥
तत्पश्चात् तत्त्वज्ञ पूजक कुश बिछाकर देवदारु की समिधा से इस मन्त्र द्वारा अग्नि में आहुति प्रदान करे।।१७।।
ॐ प्रजापतये सत्यसन्धाय नित्यं स्रष्ट्रे विधात्रे च चरात्मने नमः। सान्निध्यमस्मिन्कुरु देववृक्षे सूर्यावृतं मण्डलमाविशस्व स्वाहा ॥१८॥
'ॐ प्रजापति, नित्य सत्यप्रतिज्ञ, स्रष्टा, विधाता, चराचरात्मक को नमस्कार है। आप इस देवदारु वृक्ष में उपस्थित होकर (समिधा में उपस्थित होकर) सूर्यावृत मण्डल में प्रवेश करें—स्वाहा' ।।१८।।
एवं सम्पूजयित्वा तु वाक्यैस्तं परिशान्तये। वृक्षलोकस्य शान्त्यर्थं गच्छ देवालयं शुभम् ॥१९॥ देव त्वं यास्यसे तत्र छेददाहविवर्जितः। काले धूपप्रदानेन सपुष्पैर्बलिकर्मभिः ॥२०॥ लोकास्त्वां पूजयिष्यन्ति ततो यास्यसि निर्वृतिम्। वृक्षमूलं कुठारं च धूपैः पुष्पैश्च पूजयेत् ॥२१॥
इस प्रकार से पूजन कर शान्ति-कामना से नीचे लिखे वाक्यों को बोलकर वृक्षों की शान्ति हेतु शुभ देवालय में जाना चाहिये। 'छेदन तथा दाह-विवर्जित होकर तुम देवत्व का लाभ करो; यथाकाल धूप-पुष्प तथा बलिकर्म से लोग तुम्हारी पूजा करेंगे (अर्थात् मूर्ति बन जाने पर पूजन करेंगे), जिससे तुमको शान्ति मिलेगी।' यह कहकर वृक्ष की जड़ के पास वृक्ष के मूल की तथा कुठार (कुल्हाड़ी, जिससे वृक्ष काटा जायेगा) की पुष्प, धूप से पूजा करनी चाहिये।।१९-२१।।