साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 160, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ें| १५० | श्रीसाम्बपुराणम् |
|---|
प्रयातायां तु शर्वर्यां पुनः सम्पूज्य तं नगम्।
ब्राह्मणेभ्यस्ततो दत्वा याजकेभ्यश्च दक्षिणाम्॥२२॥
रात्रि व्यतीत हो जाने पर पुनः उस वृक्ष का पूजन करके ब्राह्मण एवं पुरोहित गण को दक्षिण देनी चाहिये॥२२॥
छिन्द्याद्वनस्पतिं तज्ज्ञैस्तैः कृते स्वस्तिवाचने।
पूर्वस्यां दिशि पातोऽस्य ह्यैशान्यां चापि यद्भवेत्॥२३॥
अथवा चोत्तरस्यां तु तथा छिंद्यास्तु नान्यथा।
पूर्वैशान्यामुदक्पातो दिक्षु तिसृषु चोत्तमः॥२४॥
नैर्ऋत्याग्नेययाम्यासु दिक्षु पातस्त्वशोभनः।
वायवीवारुणीभ्यां तु दिग्भ्यां पातस्तु मध्यमः॥२५॥
ब्राह्मण तथा याजकगण स्वस्ति-वाचन करके निपुण लकड़हारे से वृक्ष को इस प्रकार कटवायें, जिससे कि वृक्ष पूर्व तथा उत्तर के मध्य के कोण (ईशानकोण) में गिरे अथवा उत्तर दिशा की ओर गिरे। अन्य ओर न गिरे, इस प्रकार काटना चाहिये। पूर्व, ईशान तथा उत्तर दिशा की ओर वृक्ष का गिरना उत्तम है। नैर्ऋत्य कोण, अग्नि कोण तथा दक्षिण दिशा में वृक्ष का गिरना अशुभ है। वायुकोण (उत्तर पश्चिम कोण) तथा पश्चिम दिशा में गिरना मध्यम है॥२३-२५॥
यस्य वश्या स्थिताः शाखा विनिर्दिष्टाः सुशाखिनः।
तासु पूर्वं ततश्छित्वा ततः पश्चादधोऽच्छिनत् ॥२६॥
जिस वृक्ष की शाखायें मजबूत हैं, उसकी सुशाखी (शोभन शाखा को) से पहले ऊपर की शाखाओं को काटकर तब निम्न (नीचे की ओर) तने से काटना चाहिये॥२६॥
अविलग्नमशब्दं च पतनं तु प्रशस्यते।
उत्पतेद् द्विदलं यस्य आपश्च मधुरक्तयोः॥२७॥
सर्पिस्तैलं क्षरेद् यस्तु पादपं तं विवर्जयेत्।
छेदनं तत्क्षणे वापि मण्डलं यस्य दृश्यते॥२८॥
वृक्ष का असंलग्न (कहीं भी युक्त न होना) तथा निःशब्द पतन (गिरना) प्रशंसनीय है। जिसका द्विदलं छिन्न हो, मधु अथवा रक्त जैसा जल, सर्पि और तेल जिस वृक्ष के कटने से क्षरित हो, उस वृक्ष का वर्जन कर देना चाहिये। जिसमें मण्डल (चक्र) देखा जाय, उस वृक्ष को तत्क्षण काट देना चाहिये॥२७-२८॥
सगर्भं तं विजानीयात् चिह्नैः समुपलक्षितम्।
पीतके मण्डले गोधा कृष्णे दीर्घभुजङ्गमः॥२९॥