भारतकोश
संग्रह पर लौटें

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

त्रिंशोऽध्यायः १४९

समन्तादुपलभ्याथ तस्याधस्ताद् वसुन्धराम्। गायत्र्या परिपूतेन परितः प्रोक्ष्य वारिणा ॥१५॥ शुक्ले चापरिभुक्ते च परिधाय च वाससी। पूजयेद् गन्धमाल्यैश्च धूपैः स्वबलिकर्मभिः ॥१६॥

कार्तिकादि आठ मास में ऐसा काष्ठ संग्रह करना उचित है। प्रशस्त पुष्य नक्षत्रयुक्त शुभ दिन में शुभ नक्षत्र में नित्य उपवास रहकर अधिवास करे। चतुर्दिक लक्ष्य करके अपने नीचे की मिट्टी को गायत्री से पवित्र करके चारो ओर तथा ऊर्ध्व-अधः दिशा में जल छिड़के; तत्पश्चात् शुद्ध वस्त्रयुगल धारण करके गन्ध-माल्य, धूपदान, बलिकर्म प्रभृति से पूजन करे।।१३-१६।।

ततः कुशपरिस्तीर्णे हुत्वाग्निं च तदन्तिकम्। देवदारुसमिद्भिश्च मन्त्रेणानेन तत्त्ववित् ॥१७॥

तत्पश्चात् तत्त्वज्ञ पूजक कुश बिछाकर देवदारु की समिधा से इस मन्त्र द्वारा अग्नि में आहुति प्रदान करे।।१७।।

ॐ प्रजापतये सत्यसन्धाय नित्यं स्रष्ट्रे विधात्रे च चरात्मने नमः। सान्निध्यमस्मिन्कुरु देववृक्षे सूर्यावृतं मण्डलमाविशस्व स्वाहा ॥१८॥

'ॐ प्रजापति, नित्य सत्यप्रतिज्ञ, स्रष्टा, विधाता, चराचरात्मक को नमस्कार है। आप इस देवदारु वृक्ष में उपस्थित होकर (समिधा में उपस्थित होकर) सूर्यावृत मण्डल में प्रवेश करें—स्वाहा' ।।१८।।

एवं सम्पूजयित्वा तु वाक्यैस्तं परिशान्तये। वृक्षलोकस्य शान्त्यर्थं गच्छ देवालयं शुभम् ॥१९॥ देव त्वं यास्यसे तत्र छेददाहविवर्जितः। काले धूपप्रदानेन सपुष्पैर्बलिकर्मभिः ॥२०॥ लोकास्त्वां पूजयिष्यन्ति ततो यास्यसि निर्वृतिम्। वृक्षमूलं कुठारं च धूपैः पुष्पैश्च पूजयेत् ॥२१॥

इस प्रकार से पूजन कर शान्ति-कामना से नीचे लिखे वाक्यों को बोलकर वृक्षों की शान्ति हेतु शुभ देवालय में जाना चाहिये। 'छेदन तथा दाह-विवर्जित होकर तुम देवत्व का लाभ करो; यथाकाल धूप-पुष्प तथा बलिकर्म से लोग तुम्हारी पूजा करेंगे (अर्थात् मूर्ति बन जाने पर पूजन करेंगे), जिससे तुमको शान्ति मिलेगी।' यह कहकर वृक्ष की जड़ के पास वृक्ष के मूल की तथा कुठार (कुल्हाड़ी, जिससे वृक्ष काटा जायेगा) की पुष्प, धूप से पूजा करनी चाहिये।।१९-२१।।

१५०श्रीसाम्बपुराणम्

प्रयातायां तु शर्वर्यां पुनः सम्पूज्य तं नगम्।
ब्राह्मणेभ्यस्ततो दत्वा याजकेभ्यश्च दक्षिणाम्॥२२॥

रात्रि व्यतीत हो जाने पर पुनः उस वृक्ष का पूजन करके ब्राह्मण एवं पुरोहित गण को दक्षिण देनी चाहिये॥२२॥

छिन्द्याद्वनस्पतिं तज्ज्ञैस्तैः कृते स्वस्तिवाचने।
पूर्वस्यां दिशि पातोऽस्य ह्यैशान्यां चापि यद्भवेत्॥२३॥
अथवा चोत्तरस्यां तु तथा छिंद्यास्तु नान्यथा।
पूर्वैशान्यामुदक्पातो दिक्षु तिसृषु चोत्तमः॥२४॥
नैर्ऋत्याग्नेययाम्यासु दिक्षु पातस्त्वशोभनः।
वायवीवारुणीभ्यां तु दिग्भ्यां पातस्तु मध्यमः॥२५॥

ब्राह्मण तथा याजकगण स्वस्ति-वाचन करके निपुण लकड़हारे से वृक्ष को इस प्रकार कटवायें, जिससे कि वृक्ष पूर्व तथा उत्तर के मध्य के कोण (ईशानकोण) में गिरे अथवा उत्तर दिशा की ओर गिरे। अन्य ओर न गिरे, इस प्रकार काटना चाहिये। पूर्व, ईशान तथा उत्तर दिशा की ओर वृक्ष का गिरना उत्तम है। नैर्ऋत्य कोण, अग्नि कोण तथा दक्षिण दिशा में वृक्ष का गिरना अशुभ है। वायुकोण (उत्तर पश्चिम कोण) तथा पश्चिम दिशा में गिरना मध्यम है॥२३-२५॥

यस्य वश्या स्थिताः शाखा विनिर्दिष्टाः सुशाखिनः।
तासु पूर्वं ततश्छित्वा ततः पश्चादधोऽच्छिनत् ॥२६॥

जिस वृक्ष की शाखायें मजबूत हैं, उसकी सुशाखी (शोभन शाखा को) से पहले ऊपर की शाखाओं को काटकर तब निम्न (नीचे की ओर) तने से काटना चाहिये॥२६॥

अविलग्नमशब्दं च पतनं तु प्रशस्यते।
उत्पतेद् द्विदलं यस्य आपश्च मधुरक्तयोः॥२७॥
सर्पिस्तैलं क्षरेद् यस्तु पादपं तं विवर्जयेत्।
छेदनं तत्क्षणे वापि मण्डलं यस्य दृश्यते॥२८॥

वृक्ष का असंलग्न (कहीं भी युक्त न होना) तथा निःशब्द पतन (गिरना) प्रशंसनीय है। जिसका द्विदलं छिन्न हो, मधु अथवा रक्त जैसा जल, सर्पि और तेल जिस वृक्ष के कटने से क्षरित हो, उस वृक्ष का वर्जन कर देना चाहिये। जिसमें मण्डल (चक्र) देखा जाय, उस वृक्ष को तत्क्षण काट देना चाहिये॥२७-२८॥

सगर्भं तं विजानीयात् चिह्नैः समुपलक्षितम्।
पीतके मण्डले गोधा कृष्णे दीर्घभुजङ्गमः॥२९॥

त्रिंशोऽध्यायः १५१

गुड़वर्णस्तु पाषाणः कपिले गृहगोधिका।
अग्निवर्णे जलं ज्ञेयं मञ्जिष्ठाभे भवेत् कृमिः ॥३०॥
दोषैरेतैर्विनिर्मुक्तं दारुश्रेष्ठमुदाहरेत्।
प्रक्षाल्य पल्लवैः सम्यक् क्वचित् कालं विधारयेत् ॥३१॥

इति श्रीसाम्बपुराणे प्रतिष्ठापनकल्पे दारुपरीक्षा नाम त्रिंशत्तमोऽध्यायः

ऐसे चिह्न वाले वृक्ष को सगर्भ जानना चाहिये। पीतवर्ण मण्डल होने से गोधा (गोसांप), कृष्णवर्ण होने से दीर्घ सर्प, गुड़वर्ण होने से पाषाण, कपिल वर्ण होने से गृहगोधिका (छिपकिली), अग्निवर्ण होने से जल एवं रक्ताभ होने से कृमि रहते हैं। इन सब दोषों से रहित वृक्ष को ही श्रेष्ठ वृक्ष कहा गया है। पत्र के द्वारा अच्छी तरह धोकर काष्ठ को कुछ दिन रखना पड़ता है॥२९-३१॥

श्रीसाम्बपुराण में दारुपरीक्षा नामक त्रिंश अध्याय समाप्त

एकत्रिशोऽध्यायः

(प्रतिमालक्षणम्)

वशिष्ठ उवाच
अतः परं प्रवक्ष्यामि प्रतिमालक्षणं क्रमात्।
एकहस्ता द्विहस्ता च त्रिहस्ता वा प्रमाणतः ॥१॥

वशिष्ठ देव कहते हैं—अब प्रतिमालक्षण कहता हूँ। एक हाथ, दो हाथ तथा तीन हाथ अथवा जैसी इच्छा हो, उतने परिमाण की प्रतिमा का निर्माण करना चाहिये॥१॥

तथा सार्धत्रिहस्ता वा सवितुः प्रतिमा शुभा।
प्रासादाद् द्वारतो वापि यत्प्रमाणं प्रकीर्त्तितम् ॥२॥
तद्वा प्रमाणं कर्त्तव्यं सततं शुभमिच्छता।
एकहस्ता भवेत् सौम्या द्विहस्ता धनधान्यदा ॥३॥
त्रिहस्ता प्रतिमा भानोः सर्वकामप्रदा स्मृता।
सार्द्धतृतीयहस्ता तु सुभिक्षक्षेमकारिका ॥४॥

साढ़े तीन हाथ की सूर्यप्रतिमा शुभ होती है। प्रासाद से द्वार का जैसा प्रमाण कहा गया है, वैसा ही यह होगा (प्रासाद अर्थात् देवालय माप का—इसका तात्पर्य श्लोक ५ में है)। शुभाकांक्षी व्यक्ति सर्वदा उसी प्रकार के माप को ग्रहण करे। एक हाथ माप की प्रतिमा सौम्य होती है। दो हाथ की (प्रतिमा) धन-धान्य देती है। सूर्य की तीन हाथ की प्रतिमा सकल कामनापूरक कही जाती है। साढ़े तीन हाथ की प्रतिमा प्रचुर खाद्य तथा क्षेम (अप्राप्त वस्तु को देने वाली) प्रदात्री होती है॥२-४॥

अग्रे मध्ये च मूले च प्रतिमा सर्वतः शुभा।
गान्धर्वी सा तु विज्ञेया बहुधान्यधनावहा ॥५॥
देवागारस्य यद्द्वारं तस्मादष्टाङ्गमत्सृजेत्।
तृतीये पिण्डिका कार्या द्वौ भागौ प्रतिमा भवेत् ॥६॥

देवालय का जो द्वार है, उससे आठ भाग का परित्याग करना चाहिये। तृतीय भाग द्वारा पिण्डिका करनी चाहिये एवं दो भाग द्वारा प्रतिमा तैयार करनी चाहिये। वृक्ष के अग्रभाग, मध्यभाग तथा मूल की प्रतिमा सर्वदा शुभ होती है। इसे गान्धर्वी भी कहते हैं। यह धन-धान्य देने वाली होती है॥५-६॥

एकत्रिंशोऽध्यायः १५३

अङ्गुलैः स्वैर्भवेन्मूर्त्तिरशीतिश्चतुरङ्गुला ।
विस्तारायामतः कार्या वदनं द्वादशाङ्गुलम् ॥७॥
मुखं त्रिभागं चिबुकं ललाटं नासिका तथा ।
कर्णौ नासिकया तुल्यौ पाण्योर्वा निपतेतयोः ॥८॥
नयने द्व्यङ्गुले स्यातां तत्रिभागे तु तारके ।
तृतीयं तारकाभागं कुर्याद् दृष्टिं विचक्षणः ॥९॥

अपनी अंगुलियों से ८४ अंगुल परिमाण की मूर्त्ति होनी चाहिये। चेहरे का विस्तार १२ अंगुल होगा। उसके तीन भाग में मुख, चिबुक, ललाट तथा नासिका बनाये। नासिका के बराबर कर्णद्वय अथवा हस्तद्वय के अनुपात में कान बनाये। नेत्र २ अंगुल के होंगे, उसके तीन भाग में तारका (नेत्रतारका) होगी तथा विचक्षण व्यक्ति को तारका के तृतीय भाग में दृष्टि बनानी चाहिये।॥७-९॥

ललाटं मस्तकोत्सेधं कुर्यात्तत्सममेव तु।
परिणाहस्तु शिरसो भवेद् द्वात्रिंशदङ्गुलम् ॥१०॥
तुल्या नासिकया ग्रीवा मुखेन हृदयान्तरम्।
मुखमात्रा भवेन्नाभिस्ततो मेढ्रमन्तरा ॥११॥

ललाट में मस्तक का वेष्टन (उष्णीष) ललाट के समान होता है। ३२ अंगुल मस्तक का परिमाण होगा। मुख तथा हृदय के मध्य नासिका के तुल्य ग्रीवा होगी। मुख के सम परिणाम में नाभि तथा मेढ्र (लिंग) का निर्माण होगा॥१०-११॥

मुखविस्तारमुरसस्ततोऽर्धं तु कटिर्भवेत्।
बाहूप्रवाहतत्तुल्यावूरूजङ्घे च तत्समे ॥१२॥

मुख के विस्तार के समान वक्षःस्थल होगा। वक्ष का आधा कटिदेश होगा। उसके समान बाहुद्वय तथा प्रवाहु (केहुनी का निम्न भाग), उसके समान ऊरू तथा जंघा होगी॥१२॥

गुल्फाधस्तात्तु पादः स्यादुच्छ्रितश्चतुरङ्गुलैः ।
षडङ्गुलस्तु विस्तीर्णस्तस्याङ्गुष्ठाङ्गुलत्रयम् ॥१३॥
प्रदेशिनी च तत्तुल्या हीना शेषनखान्नखम् ।
चतुर्दशाङ्गुलः पादस्यायामः परिकीर्त्तितः ॥१४॥

गुल्फ का निम्न भाग चार अंगुल चौड़ा तथा छः अंगुल विस्तृत पैर होगा। तदनन्तर अंगुष्ठ तथा अंगुलित्रय प्रदेशिनी-व्यापी होता है, उससे कुछ छोटी कनिष्ठा अंगुलि होती है तथा शेष नख होते हैं। पाद का विस्तार चतुर्दश अंगुल कहा गया है॥१३-१४॥

१५४ श्रीसाम्बपुराणम्

एवं लक्षणयुक्ताया भवेत् पूजितलक्षणा।
अंसौ भुजौ तथैवोरू भ्रूललाटे सनासिकम्॥१५॥
गण्डं च नियतं मूर्तेः कुर्यात् तज्ज्ञः समुन्नतिम्।
विशालधवला ताम्रा पक्ष्मलायतलोचनः ॥१६॥

ऐसी लक्षणयुक्त प्रतिमा की पूजा करनी चाहिये। स्कन्धद्वय, भुजद्वय, ऊरू, भ्रू, ललाट, नासिका तथा गण्डःस्थल आदि की उच्चता आदि का निरूपण विज्ञ शिल्पी को स्वयं करना चाहिये। विग्रह विशाल, शुभ्र, ताम्र के समान पक्ष्म एवं विस्तृत नयन से युक्त होना चाहिये॥१५-१६॥

सस्मिताननपद्मास्यचारुबिम्बाधरः शुभः।
रत्नप्रोद्भासिमुकुटः कटकाङ्गदहारवान् ॥१७॥
अव्यङ्गपदबन्धादिसमायोगोपशोभितः ।
सुबाहुमण्डलश्चारुविचित्रमणिकुण्डलः ॥१८॥
कराभ्यां काञ्चनी मुद्रा प्राप्तहस्तसरोरुहम्।
एवं लक्षणसंयुक्तां कारयेदीप्सितप्रदाम् ॥१९॥

मृदु मन्द हास्ययुक्त मुखमण्डल तथा सुन्दर बिम्बाधर शुभ होता है। रत्न से उद्भासित मुकुट, कटक, अङ्गद तथा हार भी होना चाहिये। चरण नूपुरादि से शोभित हो, बाहुमण्डल सुन्दर हो, कर्णों में विचित्र मणिकुण्डल रहे एवं दोनों हाथ में काञ्चनी मुद्रा होनी चाहिये। ऐसे लक्षणों वाली प्रतिमा ईप्सित वर देने वाली होती है॥१७-१९॥

प्रजाभ्यश्च तदा भानुः शिवारोग्याभयप्रदः।
अत्यङ्गायां नृपभयं हीनाङ्गायामकल्पता ॥२०॥
ध्यातायां चक्षुषः पीड़ा कृशायां तु दरिद्रता।
सक्षतायां भयं शस्त्रात् स्फुटिता मृत्युकारिणी ॥२१॥

सूर्यदेव प्रजा का मंगल करते हैं। आरोग्य तथा अभय प्रदान करते हैं। उनके निर्मित विग्रह में अधिक अंग होने पर नृपभय एवं हीन अंग होने पर अकल्पता (विधि-बहिर्भूतता) होती है। ऐसी मूर्ति का ध्यान करने से नेत्रपीड़ा होती है। कृश मूर्त्ति से दरिद्रता होती है। मूर्ति के क्षतयुक्त होने से अस्त्रभय तथा टूटी-फूटी होने से वह मूर्ति मृत्युकारक हो जाती है॥२०-२१॥

दक्षिणावनतायां तु शश्वत् स्यादायुषः क्षयः।
उत्तरावनतायां तु वियोगो भवति ध्रुवम् ॥२२॥

मूर्ति के दाहिनी ओर झुकी होने से आयुक्षय होता है। वाम ओर झुकी होने से निश्चित मृत्यु होती है॥२२॥

एकत्रिंशोऽध्यायः १५५

तस्माद् भास्करभक्तेन लोकद्वयहितैषिणा।
नातिलोक्या न चालोक्य ऋज्वी मूर्त्तिः प्रशस्यते॥२३॥
ता मूर्त्तयः शुभा कार्यास्तदधीनास्तु सम्पदः।
शिरोरुगण्डवदनैः सर्वाङ्गावयवैस्तथा।
एवं लक्षणसम्पूर्णा सा शुभा प्रतिमा नृणाम्॥२४॥

इति श्रीसाम्बपुराणे प्रतिमालक्षणं नामैकत्रिंशोऽध्यायः


जो अत्यन्त उज्ज्वल न हो, निष्प्रभ भी न हो, ऐसी सरल प्रतिमा प्रशंसनीय होती है। अतएव इस लोक के तथा परलोक के हिताकांक्षी सूर्यभक्त को शुभ मूर्ति स्थापित करनी चाहिये। उससे सम्पत्ति मिलती है। मस्तक-ऊरु-गण्ड-वदन प्रभृति सभी अवयवविशिष्ट सम्पूर्ण लक्षणयुत प्रतिमा शुभप्रद होती है॥२३-२४॥

श्रीसाम्ब पुराण का प्रतिमालक्षण नामक एकत्रिंश अध्याय समाप्त

द्वात्रिंशोऽध्यायः

(प्रतिमाकल्पः)

वशिष्ठ उवाच

अतोऽधिवासनं कार्यं विधिदृष्टेन कर्मणा।
सामुद्रं तोयमाहृत्य जाह्नव्यं यामुनं तथा ॥१॥
सारस्वतं जलं पुण्यं चान्द्रभागं ससैन्धवम्।
पौष्करं च जलं श्रेष्ठं गिरिप्रस्रवणोदकम् ॥२॥
अन्यद्वा शुचि यत्तोयं नदीनदतटाकजम्।
यथाशक्त्या तदाहृत्य कलशैः काञ्चनादिभिः ॥३॥

वशिष्ठ देव कहते हैं—तदनन्तर विधिदृष्ट कर्म द्वारा मूर्ति का अधिवास करना चाहिये। एतदर्थ समुद्र जल लाये। उसी प्रकार से चन्द्रभागा, सरस्वती, यमुना, जाह्नवी तथा सिन्धु का पुण्यजल लाना चाहिये। पुष्कर तथा प्रस्रवण गिरि का भी जल श्रेष्ठ होता है एवं अन्यान्य नद, नदी तथा जलाशय-जात जो पवित्र जल है, उसे भी यथाशक्ति स्वर्णादि के कलश में लाना चाहिये॥१-३॥

ततस्तु मणिरत्नानि सर्वबीजौषधींस्तथा।
सुगन्धीनि च माल्यानि स्थलजान्यम्बुजानि च ॥४॥
चन्दनानि च मुख्यानि गन्धांश्च विविधान् वरान्।
ब्राह्मीं सुवर्चलां मुस्तां विष्णुक्रान्तां शतावरीम् ॥५॥
दूर्वां च शङ्खपुष्पीं च प्रियङ्गूं रजनीं वचाम्।
सम्भृत्य तांस्तु सम्भारान् नानाकर्मविधानवित् ॥६॥
वटाश्वत्थशिरीषाणां पल्लवैः कुशसंयुतैः।
कलशो परिविन्यस्तैर्देयं स्नानोदकं रवेः ॥७॥

तदनन्तर मणि, रत्न, सर्वबीजौषधि, सुगन्धि, माला, स्थलज तथा जलज पद्म, मुख्य चन्दन, विविध अष्टगन्ध, ब्राह्मी, सुवर्चला (अतसी, सूर्यमुखीपुष्प), मुक्ता (एक प्रकार का जड़विशेष), विष्णुक्रान्ता (अपराजिता मूल), शतावरी, दूर्वा, शङ्खपुष्पी, प्रियंगु (श्यामलतता, फलिनीलता, पीपल), रजनी, वच—इन सब नानाविध सम्भारों का संग्रह करके नाना कर्म में विधानज्ञ व्यक्ति वट, पीपल, शिरीष प्रभृति के पल्लव तथा कुश को कलश के ऊपर स्थापित करके रवि को स्नानार्थ जल प्रदान करे॥४-७॥

द्वात्रिंशोऽध्यायः १५७

काञ्चनै राजतैस्ताम्रैर्मृण्मयैः कलशैस्तथा। साक्षतैः सहिरण्‍यैश्च सर्वौषधिसमन्वितैः। गायत्रीपरिपूतैस्तैरष्टभिः स्नापयेद् रविम् ॥८॥

स्वर्ण, रौप्य (चाँदी), ताम्र, मृण्मय (मिट्टी) के कलश द्वारा अक्षत, हिरण्य, सर्वौषधियुत तथा गायत्री मन्त्र से शुद्ध आठ कलशों से सूर्यदेव को स्नान कराये॥८॥

कुशोत्तरां ततः कृत्वा वेदीं पक्वेष्टकामयीम् ॥९॥ तस्यां वेद्यां समारोप्य परिधाप्य च वाससी। प्रतिमामभिषिञ्चेत सोपवासः प्रयत्नतः ॥१०॥

पाँच ईटों की वेदी का निर्माण करे, उसमें कुश का संयोग करके प्रतिमा को नूतन वस्त्र पहनाकर उपवासी होकर प्रतिमा का अभिषेक यत्न से करना चाहिये॥९-१०॥

मूर्ध्नि सर्वौषधीन् दत्त्वा तथैवामलकानि च। वाक्यमुच्चारयेद्देवमुपर्यवकिरञ्जलम् ॥११॥

मस्तक पर सर्वौषधि तथा आमलकी प्रदान करके मस्तक पर जल डालते हुये नीचे लिखे मन्त्र का उच्चारण करना चाहिये॥११॥

देवास्त्वामभिषिञ्चन्तु ब्रह्मविष्णुशिवादयः। व्योमगङ्गाम्बुपूर्णेन आद्येन कलशेन तु ॥१२॥

ब्रह्मा-विष्णु-शिवादि देवगण आकाशगंगा के जल से पूर्ण प्रथम कलश द्वारा आपको अभिषिक्त करें॥१२॥

मरुतश्चाभिषिञ्चन्तु भक्तिमन्तो दिवस्पते। मेघतोयसुपूर्णेन द्वितीयकलशेन तु ॥१३॥

हे दिवस्पति सूर्यदेव! भक्तिमान् मरुद्गण मेघों से परिपूर्ण द्वितीय कलश से आपका अभिषेक करें॥१३॥

सारस्वतेन तोयेन पूर्णेन सुरसत्तमाः। विद्याधराभिषिञ्चन्तु लोकपालाः समागताः ॥१४॥ सागरोदकपूर्णेन चतुर्थकलशेन तु। वारिणा परिपूर्णेन पद्मरेणुसुगन्धिना ॥१५॥ पञ्चमेनाभिषिञ्चन्तु नागाश्च कलशेन ते। हिमवद्धेमकूटाद्या अभिषिञ्चन्तु पर्वताः ॥१६॥ निर्झरोदकपूर्णेन षष्ठेन कलशेन तु। सर्वतीर्थाम्बुपूर्णेन कलशेन दिवस्पते ॥१७॥

सप्तमेनाभिषिञ्चन्तु ऋषयः सप्त खेचराः।

१५८ श्रीसाम्बपुराणम्

सप्तमेनाभिषिञ्चन्तु ऋषयः सप्त खेचराः। वसवश्चाभिषिञ्चन्तु कलशेनाष्टमेन ते ॥१८॥ अष्टमङ्गलयुक्तेन देवदेव नमोऽस्तु ते। स्नापयित्वा क्रमेणैनं स्नानकर्मविधानवित् ॥१९॥

देवश्रेष्ठ विद्याधरगण सरस्वती के जल से पूर्ण तृतीय कलश से आपका अभिषेक करें। समागत लोकपालगण सागर जल से पूर्ण चतुर्थ कलश द्वारा आपका अभिषेक करें। नागगण पद्मररेणु द्वारा सुगन्धित जल से पूर्ण पञ्चम कलश से आपका अभिषेक करें। हिमवत् हेमकूट प्रभृति पर्वतगण (तदभिमानी देवगण) निर्झर के जल से पूर्ण कलश से आपका अभिषेक करें। हे दिवाकर! आकाशचारी सप्त ऋषिगण (मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु तथा वशिष्ठ) सकल जलपूर्ण सप्तम कलश द्वारा आपका अभिषेक करें। अष्ट वसुगण (गंगा से उत्पन्न भव-ध्रुव-सोम-विष्णु-अनिल-अनल-प्रत्यूष तथा प्रभव) अष्टमंगलयुक्त अष्टम कलश द्वारा आपका अभिषेक करें। हे देवदेव! आपको नमस्कार है। स्नानकर्म के विधान को जानने वाले व्यक्ति को इस प्रकार क्रमानुसार स्नान कराना चाहिये (यहाँ मूल संस्कृत के १२वें श्लोक से लेकर १८वें श्लोक-पर्यन्त अभिषेक का मन्त्र दिया गया है)॥१४-१९॥

ततो वर्धनिकां गृह्य वारिधारां समुत्सृजेत्। त्रिंशत्तु पुरतोऽर्कस्य आचमस्वेति च ब्रुवन् ॥२०॥

तदनन्तर वर्धनिका (क्षुद्र जलपात्र) लेकर ३० बार जल प्रदान करे तथा सूर्य से कहे कि आप आचमन करिये॥२०॥

ततोऽन्यत्र शुचौ देशे सुसंमृष्ट्यापलेपने। तण्डुलैः पद्मरागैश्च आलिखेच्चतुरन्तिकम् ॥२१॥

तदनन्तर अन्यत्र पवित्र देश में (भूमि को) लेपन से साफ करके तण्डुल (चावल) तथा पद्मराग द्वारा चारो ओर अंकित करे॥२१॥

पताकातोरणच्छत्रध्वजमालाद्यलङ्कृतम् । विचित्रस्रग्वितानाढ्यं प्रकीर्णकुसुमोत्करम् ॥२२॥ तस्य मध्ये कुशोस्तीर्णे मूर्त्तिं स्थाप्य विवस्वतः। तस्य चावाहनं कृत्वा दद्यादर्घ्यं प्रयत्नतः ॥२३॥

तदनन्तर पताका, तोरण, छत्र, ध्वजा तथा माला से अलंकृत करके विचित्र वर्णों की माला तथा पुष्पादि से मण्डप को शोभित करे। वहाँ कुशासन पर सूर्यदेव की मूर्त्ति स्थापित करके आवाहन के पश्चात् यत्नपूर्वक अर्घ्यदान करना चाहिये॥२२-२३॥

द्वात्रिंशोऽध्यायः १५९

सुवर्णमधुपर्कादि सुमनोदीपधूपकैः । देवाय स्पर्शयेद् गाञ्च सवत्सां रोहिणीं शुभाम् ॥१२४॥

स्वर्ण-मधुपर्कादि, पुष्प, धूप, दीप को देवता के उद्देश्य से निकालकर शुभ सवत्सा लाल गाय का स्पर्श (देवता को) कराये। उस समय यह मन्त्र पढ़ना चाहिये॥१२४॥

ॐ नमो गोपतये इत्युक्त्वा सहस्त्रांशो प्रसीदयेत् । एवम् मन्त्रेण सम्पूज्य परिधाय च वाससी ॥१२५॥

हे गोपते (सूर्य)! आपको नमस्कार है। हे सहस्त्रांशु! मुझपर प्रसन्न हो जाईये। इस मन्त्र से पूजा करके उनको वस्त्रद्वय पहनाये॥१२५॥

यज्ञोपवीतमावेष्ट्य बद्धोत्सङ्गस्तथैव च। सर्वगन्धैः समालिप्य चन्दनागुरुकुङ्कुमैः ॥१२६॥

उन्हें यज्ञोपवीत धारण कराकर (यज्ञोपवीत से आवेष्टन करके) तदनन्तर चन्दन, अगुरु, कुङ्कुम प्रभृति गन्ध का लेपन करे॥१२६॥

अलङ्कारैरलङ्कृत्य कुसुमैश्च सुगन्धिभिः । मालाभिश्च विचित्राभिरबद्धाभिरनेकशः ॥१२७॥

तत्पश्चात् विविध अलङ्कारों से अलंकृत करके सुगन्धि, कुसुम तथा अनेक विचित्र मालाओं को पहनाये॥१२७॥

ततो धूपं च नैवेद्यं दद्याच्चैव प्रयत्नतः । तत्तोरणं समुत्थाप्य मणेः शौरदयो धिया ॥१२८॥

तत्पश्चात् अनेक यत्न द्वारा धूप एवं नैवेद्य निवेदित करना चाहिये। तदनन्तर अकालोदित (अकाल में उगे) इन्द्रधनुष का (मणि का) चिन्तन करते हुये तोरण को उत्तोलित करे॥१२८॥

प्रज्वाल्यग्निं विधानेन कुर्याच्छान्तिं विधानतः । ततः स्वलङ्कृतां स्नातां मणिरत्नविभूषिताम् ॥१२९॥ कृत्वा प्रतिष्ठितां रक्षां प्रतिमामधिवासयेत् ॥१३०॥

विधान के अनुसार अग्नि प्रज्वलित करके यथाविधि शान्तिदान करे। तदनन्तर स्नात, अलंकृत, मणिरत्नादि से विभूषित प्रतिष्ठित प्रतिमा का अधिवास कराये॥१२९-३०॥

देवागारात्तथैश्याने दिग्भागे दिव्यसंज्ञिते । कृत्वा कुशपरस्तीर्णे वरास्तरणसंवृते । पूर्वशीर्षां शुभां शय्यां शुक्लां शुक्लाम्बरोत्तमाम् ॥१३१॥

१६०श्रीसाम्बपुराणम्

तस्यां संवेशयेत् सम्यङ् महाश्वेतामुदीरिताम्।
निक्षुभां दक्षिणे पार्श्वे वामे राज्ञीं च स्थापयेत् ॥३२॥
तदनन्तर देवमन्दिर में ईशान कोण में दिव्यनाम स्थान में कुश बिछाकर सुन्दर आस्तरण पर पूर्व की ओर मस्तक (मुख) करके (ताकि पैर पश्चिम की ओर रहे) शुभ्र वस्त्रों की उत्तम शय्या बनानी चाहिये। इस शय्या पर प्रसिद्ध महाश्वेता की स्थापना करनी चाहिये एवं उसके दाहिनी ओर निक्षुभा तथा बाँयीं ओर राज्ञी की स्थापना करनी चाहिये।।३१-३२।।

दण्डपिङ्गलकौ चास्य स्थाप्यौ पादप्रवेशितौ।
तस्यां शङ्खसितायां तु शय्यायां प्रतिमां रवेः ॥३३॥
पाद-प्रदान (पैर रखने के) स्थान पर दण्ड तथा पिङ्गल को स्थापित करना चाहिये। उस शङ्ख के समान शुभ्र शय्या पर सूर्यप्रतिमा की स्थापना करनी चाहिये।।३३।।

वसेच्च रजनीं तत्र स्तूयमानं चतुर्दिशम्।
ब्राह्मणैर्वन्दिभिश्चापि गीतज्ञैर्वरणैस्तथा।
कुर्याज्जागरणं तत्र सूर्यभक्तिसमन्वितैः ॥३४॥
वहाँ पूजक को रात में रहना चाहिये। चारो ओर से ब्राह्मण, बन्दीगण, वृत गीतज्ञ स्तव करते रहें तथा सब सूर्य के प्रति भक्तियुक्त होकर रात्रि-जागरण भी करें।।३४।।

प्रभातायां तु शर्वर्यां बोधयेद् दिग्विधानतः।
हविष्यं भोजयित्वा तु ब्राह्मणाम् याजकांस्तथा ॥३५॥
दक्षिणाभिश्च सम्पूज्य कृते वै स्वस्तिवाचने।
दीनान्धकृपणादींश्च सर्वानन्नेन तोषयेत् ॥३६॥
तत्पश्चात् प्रभात होने पर विधिपूर्वक प्रतिमा को जगाये। ब्राह्मण तथा याजकों को हविष्य भोजन कराकर स्वस्तिवाचन के साथ दक्षिणादि द्वारा उनकी पूजा करे। तदनन्तर दीन-अन्ध-कृपण प्रभृति सबको अन्न से परितुष्ट करना चाहिये।।३५-३६।।

ततो गर्भगृहस्यानमध्ये कृत्वा तु पिण्डिकाम्।
अवटे चास्य सौवर्णं न्यस्य सप्तहयं रथम्॥३७॥
सर्वबीजौषधींश्चैव तत्र दत्त्वा विधानवित्।
दत्तार्घ्यं स्थापयेत्तत्र यजमानं सहायवान् ॥३८॥
गौरांश्च सर्षपान् दत्त्वा अर्चां संस्थापयेत्ततः।
शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषैर्हस्ताधारासहाक्षतैः ॥३९॥
तदनन्तर गर्भगृह में पिण्डिका को प्रस्तुत (रख) करके उस गर्भ गृह में स्वर्ण तथा सप्ताश्व रथ स्थापित करे। तत्पश्चात् विधान को जानने वाला यजमान अन्य की सहायता

द्वात्रिंशोऽध्यायः १६१

से वहाँ सर्व बीजौषधि से युक्त अर्घ्य प्रदान करके उसे स्थापित करे। तदनन्तर श्वेत सरसों अर्पित करके (नीचे रखकर) वहाँ प्रतिमा स्थापित करनी चाहिये। तदनन्तर शङ्ख-दुन्दुभि आदि के शब्द के साथ हाथों से चावल छिड़कना चाहिये।।३७-३९।।

कृत्वा पुण्याहशब्देन स्वालयस्य प्रदक्षिणाम्।
शुभे लग्ने दिने ऋक्षे पूर्वाह्णे भानवेक्षणे।
मुहूर्त्ते च शुभे भानोः प्रतिमां स्थापयेद् बुधः ॥४०॥

तदनन्तर पुण्याह शब्दों द्वारा देवगृह की प्रदक्षिणा करे। शुभ लग्न में शुभ दिन तथा नक्षत्र में पूर्वाह्न काल में, सूर्यालोक (सूर्य के प्रकाश) में शुभ मुहूर्त में ज्ञानी व्यक्ति को सूर्य प्रतिमा का स्थापना कार्य करना चाहिये।।४०।।

नाधोमुखीं नोर्ध्वमुखीं न पार्श्वाननतां तथा।
समामभिमुखीं चेमां प्रतिमां च निवेशयेत् ॥४१॥

प्रतिमा निम्नमुखी अथवा ऊर्ध्वमुखी नहीं होनी चाहिये। सामने की ओर प्रतिमा का मुख हो, ऐसी स्थापना करनी चाहिये।।४१।।

पत्न्यौ चास्य ततः सम्यक् पार्श्वयोर्विनिवेशयेत्।
निक्षुभां दक्षिणे पार्श्वे रवे राज्ञीं तु वामतः ॥४२॥

तत्पश्चात् सूर्य की दोनों पत्नियों को विधान के अनुसार सूर्य के पार्श्व में स्थापित करना चाहिये अर्थात् दाहिनी ओर निक्षुभा तथा बाँयीं ओर राज्ञी की स्थापना करे।।४२।।

पिङ्गलो दक्षिणे भानोर्वामतो दण्डनायकः।
स्थाप्य चैव ततो वह्निं संस्थाप्य विधिवत् पुनः ॥४३॥

सूर्य के दाहिनी ओर पिङ्गल तथा बाँयीं ओर दण्डनायक की स्थापना करनी चाहिये। तदनन्तर पुनः विधिपूर्वक वह्नि-स्थापना करनी चाहिये।।४३।।

यजमानस्य शान्त्यर्थं शान्तिकर्म विधानवित्।
होमयेत् सर्वदेवानां स्वाहाकारैरितस्ततः ॥४४॥

यजमान की शान्ति के लिये शान्तिकर्म में निपुण पुरोहित द्वारा स्वाहायुक्त मन्त्रों से चारो ओर समस्त देवताओं का होम करना चाहिये।।४४।।

ततस्तदुपहारार्थं सम्भारैः प्राक्समाहृतैः।
मोदकोल्लापिकापूपशष्कुलीभूतशीर्षकैः ॥४५॥
कृशरैः पायसोन्मिश्रैः सर्वदिक्षु क्षिपेद् बलिम्।
तर्पयेत् क्षीरमध्वाज्यैः स्तूयात् स्तोत्रैश्च भास्करम् ॥४६॥

साम्ब०—११

१६२ | श्रीसाम्बपुराणम्

तत्पश्चात् होम की आहुति-हेतु पूर्व से संगृहीत मोदक, उल्लापिका, अपूप, शष्कुली शीर्ष, कृशर, पायस मिश्रित करके सभी दिशाओं में उपहार प्रदान करना चाहिये तथा दुग्ध, मधु एवं घी से तर्पण करना चाहिये। इसके अनन्तर नाना स्तोत्रों से सूर्य की स्तुति करनी चाहिये।।४५-४६।।

विप्रेभ्यो याजकेभ्यश्च ततो दद्याच्च दक्षिणाम्।
सूर्यक्रतौ महापुण्ये तेन कुर्यांश्च दक्षिणाम्॥४७॥

तदनन्तर ब्राह्मण तथा याजकगण को दक्षिणा प्रदान करनी चाहिये। तत्पश्चात् महापुण्यकारी सूर्य यज्ञ की दक्षिणा भी प्रदान करनी चाहिये॥४७॥

स्थाप्यतेऽनेन विधिना मद्भक्तैः प्रतिमा तु या।
सा तु वृद्धिकरी नित्यं सान्निध्यं च सदा भवेत्॥४८॥

मेरे भक्त द्वारा इस विधान से जो प्रतिमा स्थापित की जाती है, वह नित्य वृद्धिकारक होती है और मेरा सान्निध्य प्रदान करती है॥४८॥

चतुर्णामपि वर्णानां स्थापयेद् यस्तु भास्करम्।
सोत्तीर्णः सर्वसंसारात् सूर्यलोके महीयते॥४९॥
पश्यन्ति मानवा ये तु आदित्यस्याधिवासनम्।
सप्तजन्म सु ते जाता नीरोगाः सम्भवन्ति हि॥५०॥

ब्राह्मणादि चार वर्णों में से जो कोई भी सूर्य की प्रतिमा स्थापित करता है, वह संसार से उत्तीर्ण होकर सूर्य लोक में निवास करता है। जो लोग सूर्य का मन्दिर देखते हैं, वे सात जन्मों तक नीरोग होकर स्थित रहते हैं॥४९-५०॥

त्रिरात्रं येऽप्युपासन्ते भानोर्यात्राधिवासितम्।
गन्धमाल्योपहारैश्च ते यान्ति परमां गतिम्॥५१॥

गन्ध, माला तथा उपहार द्वारा तीन रात्रि-पर्यन्त जो सूर्य के यात्रा अधिवास की उपासना करते हैं, उनको परमगति प्राप्त होती है॥५१॥

आत्मीयं परकीयं च प्रतिमास्थापनं रवेः।
यः पश्यति पुमान् भक्त्या स पापात् परिमुच्यते॥५२॥

अपने द्वारा की जा रही अथवा अन्य द्वारा की जा रही रवि-प्रतिमा की स्थापना को जो व्यक्ति भक्तिपूर्वक देखते हैं, वे पापमुक्त हो जाते हैं॥५२॥

दशानामश्वमेधानां वाजपेयशतस्य तु।
फलं प्राप्नोति पुरुषं प्रतिष्ठाप्य दिवाकरम्॥५३॥

सूर्य-प्रतिमा की प्रतिष्ठा करने मात्र से लोग दश अश्वमेध तथा १०० वाजपेय यज्ञ का फल पा जाते हैं॥५३॥

द्वात्रिंशोऽध्यायः १६३

यावत् कीर्त्तिः पुण्यकृतो भानोः स्थाननिवेशनात्। तावत् स तु यदुश्रेष्ठ सूर्यलोके महीयते ॥५४॥

हे यदुश्रेष्ठ! सूर्य की प्रतिमा-स्थापन के फल से पुण्यवान् व्यक्ति की जब तक कीर्ति रहती है, तब तक वह व्यक्ति सूर्यलोक में सम्मानित होता है॥५४॥

स्थापयित्वा रविं भक्त्या विधिदृष्टेन कर्मणा। मासे मासे क्रतुफलं लभते नात्र संशयः ॥५५॥

भक्तिपूर्वक यथाविधि कर्म द्वारा सूर्य की स्थापना करके व्यक्ति प्रतिमास यज्ञ करने का फल-लाभ करता है; यह निसंदिग्ध है॥५५॥

एकहिनापि यद् भानोः पूजया प्राप्यते फलम्। न व्रतैरुपवासैर्वा दानैर्वा तदवाप्यते ॥५६॥

एक दिन के सूर्यपूजन से जो फल प्राप्त होता है, वह अनेक व्रत-उपवास तथा दान द्वारा भी नहीं मिल सकता॥५६॥

कृत्वा तु यन्महत् पापं यः पश्चात् सेवते रविम्। स याति सूर्यलोके तु नरो विगतकल्मषः ॥५७॥

यदि कोई महान् पाप करके भी सूर्य की सेवा करता है, तब वह व्यक्ति निष्पाप होकर सूर्यलोक में जाता है॥५७॥

न भवेद् दुष्टकाया च चन्द्रेण भूमिसन्निभा। स्वर्गे महीयते तावद् यावद् सूर्यस्य वेश्मनि ॥५८॥

वह व्यक्ति कभी भी दुष्ट देहधारी नहीं होता; अपितु चन्द्रमा तथा पृथ्वी के समान होकर सूर्यलोक में निवास करता है॥५८॥

इत्येवं सुख्यति तस्य यश्च भानोर्भूतानां स्थितिनिलयप्रसूतिहेतोः। श्रीभागी भवति नरो निकेतकारी कल्पानां वसति शतं च सूर्यलोके ॥५९॥

जो प्राणिगण की स्थिति, लय तथा जन्म के कारण सूर्यदेव के लिये ऐसा (प्रतिमा-स्थापनादि) सुख विधान करते हैं अर्थात् मन्दिर बनाते हैं, वे ऐश्वर्य का भोग करके शत कल्प-पर्यन्त सूर्यलोक में निवास करते हैं॥५९॥

यः प्रासादं रचयति पुमान् देवतानां प्रयत्नात् कीर्त्तिस्तस्य भवति विपुला वंशमार्गानुजाता। दिव्यान् कामान् लभति च सदा कामतश्चाप्रमेयां- स्तान् भुक्त्वासौ पुनरपि भवेच्चक्रवर्त्ती पृथिव्याम् ॥६०॥

१६४श्रीसाम्बपुराणम्

जो प्रयत्नपूर्वक देवता के गृह का निर्माण करते हैं, उनकी वंशपरम्परा की विपुल विपुल कीर्ति होती है। वे दिव्य भोगों का भोग करके पुनः (अगले जन्म में) पृथ्वी पर तेजस्वी राजा होते हैं।।६०।।

ये मानवा त्रिदशमूर्त्तिनिकेतनानि कुर्वन्ति साधुजनदृष्टिमनोहराणि।
तेषां मृतेऽप्यपरमार्थमये शरीरे लोके परिभ्रमति कीर्त्तिमयं शरीरम्।।६१।।

जो मानवगण साधुओं की दृष्टि को मनोहर लगने वाली देवप्रतिमा के मन्दिरों का निर्माण करते हैं, उनके पार्थिव शरीर का विनाश हो जाने पर भी उनका कीर्त्तिमय शरीर पृथ्वी पर परिभ्रमण करता रहता है (अर्थात् उनकी कीर्त्ति स्थायी हो जाती है)।।६१।।

इति मुनिन्र्ऋषभ सुताय विष्णोर्विधिमुपदिश्य च नारदो जगाम।
स च सवितुरिदं चकार भक्त्या भवनवरं भुवि शाश्वतं च नाम्ना।।६२।।

इति श्रीसाम्बपुराणे प्रतिमाकल्पो नाम द्वात्रिंशोऽध्यायः

इस प्रकार मुनिश्रेष्ठ नारद कृष्णपुत्र साम्ब को सूर्य-पूजाविधान का उपदेश करके चले गये। साम्ब ने भी अपने नाम से शाश्वत श्रेष्ठ सूर्यमन्दिर का निर्माण कराया।।६२।।

श्री साम्बपुराणोक्त प्रतिमाकल्प नामक द्वात्रिंश अध्याय समाप्त

त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः

(ध्वजारोपणम्)

नारद उवाच

अतः परं प्रवक्ष्यामि ध्वजारोपणमुत्तमम्।
पुरा देवासुरे युद्धे योद्धुं देवैर्जयैप्सुभिः ॥१॥

नारद कहते हैं—अब मैं उत्तम ध्वजा-आरोहण की बातें बतलाता हूँ। पूर्वकाल में देवासुर युद्ध के आरम्भ में जयलाभ-हेतु देवगण ने इसका निर्माण किया था॥१॥

कृत्वान्युपरि चिह्नानि वाहनानि शुभानि तु।
लक्ष्मचिह्नध्वजः केतुरितिपर्य्यायनामभिः ॥२॥

ध्वज के ऊपर उन-उन देवताओं के वाहन का चिह्न अङ्कित किया गया। लक्ष्म, चिह्न, ध्वजा, केतु—ये सभी पर्यायवाची शब्द हैं॥२॥

कीर्तितस्य च तस्येह प्रमाणं गदतः शृणु।
ध्वजवंशस्तु कर्तव्यो ह्यविद्धऋजुरव्रणः ॥३॥
प्रासादेन स तुल्यस्तु ध्वजवंशप्रमाणतः।
पताका च ध्वजे कार्या ध्वजवंशे विलम्बिनी ॥४॥

ध्वजा का प्रमाण कहता हूँ, सुनो! ध्वज के लिये बांस लाना चाहिये, जो कि अविद्ध, सीधा तथा व्रणादि से रहित हो (अक्षत) ध्वजा का प्रमाण प्रासाद के तुल्य प्रमाण से लेकर पता का निर्माण करना होगा॥३-४॥

देवागारस्य शिखरान्तिकभागमपमार्जनी।
युक्तवस्त्रमयी चित्रा सघंटा सुमनोहरा ॥५॥

देवालय के शिखर के तीसरे भाग प्रमाण का चित्रित मनोहारी पताका बनानी चाहिये॥५॥

ध्वजाग्रे चापि कर्तव्यो देवतालिङ्गसूचकः।
काञ्चनो वाथ रौप्यो वा मणिरत्नमयोऽपि वा ॥६॥
रङ्गका लिखिता वापि तद्वाहनसमाकृतिः।
गरुत्मांस्तु ध्वजे विष्णोरीश्वरस्य ध्वजे वृषः ॥७॥

१६६ श्रीसाम्बपुराणम्

ध्वजा के आगे देवता-चिह्नसूचक रौप्य, स्वर्ण, मणि, रत्नमय अथवा रंग से अंकित वाहन के समान (जिस देवता का ध्वज हो, उसके वाहन की) आकृति तैयार करनी चाहिये। जैसे विष्णु की ध्वजा में गरुड़, महादेव की ध्वजा में वृष आदि की आकृति बनानी चाहिये॥६-७॥

ब्रह्मणः पङ्कजं कार्यं रवेर्व्योम स्मृतं ध्वजे।
हंसो जलाधिपस्योक्तो धनदस्य नरो ध्वजे ॥८॥

ब्रह्मा की ध्वजा में पद्म, सूर्य की ध्वजा में आकाश चिह्न, वरुण की ध्वजा में हंस एवं, कुबेर की ध्वजा में मनुष्य का अंकन करना चाहिये॥८॥

मयूरः कार्तिकेयस्य हेरम्बस्य च मूषकः।
कुञ्जरो देवराजस्य यमस्य महिषो ध्वजे ॥९॥

कार्तिकेय की ध्वजा में मयूर, गणेश की ध्वजा में मूषक, देवराज इन्द्र की ध्वजा में हाथी तथा यम की ध्वजा में भैंसा अङ्कित करना चाहिये॥९॥

सिंहो ध्वजे तु दुर्गाया इत्येषा ध्वजकल्पना।
यस्य यो वाहनः प्रोक्तो ध्वजस्तस्य स एव तु ॥१०॥

दुर्गा की ध्वजा में सिंह—यह है ध्वजा-कल्पना। जिसका जो वाहन निश्चित है, वही उसकी ध्वजा में अंकित होता है॥१०॥

ततः सर्वौषधीभिस्तु स्नापयित्वा प्रयत्नतः।
समालभ्य च बध्नीयान् मध्ये प्रतिसरन्ततः ॥११॥

तदनन्तर सयत्न सर्वौषधि द्वारा स्नान कराकर उसे बीच से बाध देना (बाँस में) चाहिये॥११॥

कल्पयित्वा शुभां वेदीं कलशैरुपशोभिताम्।
तस्यां वेद्यां समारोप्य तां रात्रिमधिवासयेत् ॥१२॥

तत्पश्चात् वेदी का निर्माण करे। उसमें शोभित कलश की स्थापना करे और उस रात्रि वहीं (जागते हुये) अधिवास करे॥१२॥

नानाकुसुमचित्रैश्च स्रजस्तस्यां च लम्बयेत्।
अभ्यर्च्य वै प्रयत्नेन धूपमस्मै निवेदनम् ॥१३॥

तत्पश्चात् उसके ऊपर नानावर्ण के विचित्र पुष्पों की माला लटकाकर यत्नपूर्वक अर्चना करके धूप-निवेदन करे (अर्पण करे)॥१३॥

बलिकर्म ततः कुर्यात् कृसरा-पूपकादिभिः।
पललोल्लिपिकाभिश्च दधि-पायस-मोदकैः ॥१४॥

त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः १६७

उद्दिश्य लोकपालेभ्यो बलिं दद्यात्तु पायसम्।
ब्राह्मणान् स्वस्तिवाच्याथ कृत्वा पुण्याहमङ्गलम् ॥१५॥
वादित्रकृतनिर्घोषं जयशब्देन सङ्कुलम्।
शुभे लग्ने दिने ऋक्षे ध्वजमारोपयेद् बुधः ॥१६॥

तदनन्तर कृसर (खिचड़ी), अपूप (माल पूआ) प्रभृति से बलि प्रदान करे। मांस का तैयार खाद्य, दधि, पायस, मोदक आदि से लोकपालों के उद्देश्य से वायु को बलि प्रदान करना चाहिये। तदनन्तर ब्राह्मणगण स्वस्तिवाचन तथा पुण्याह मंगलाचरण करें। तब वाद्य ध्वनि तथा जयशब्द करें। शुभ लग्न, शुभ दिन तथा नक्षत्र का विचार करके विज्ञजन ध्वजारोहण करें ॥१४-१६॥

एवमारोपयेद्यस्तु ध्वजं देवालयोपरि।
श्रिया संवर्धते नित्यं प्राप्नोति च शुभां गतिम् ॥१७॥

इस प्रकार देवमन्दिर के ऊपर जो ध्वजारोहण करते हैं, दिनो-दिन उनका ऐश्वर्य वर्द्धित होता है और उनको शुभ गति मिलती है॥१७॥

न सुरा वस्तुमिच्छन्ति ध्वजहीने सुरालये।
मन्त्रस्तु स्थापने प्रोक्तो विधानज्ञैर्ध्वजस्य तु ॥१८॥

ध्वजारहित मन्दिर में देवता निवास नहीं करते। विधानज्ञ व्यक्ति को ध्वजा-स्थापनार्थ नीचे लिखे मन्त्र को पढ़ना चाहिये॥१८॥

एह्येहि भगवन्नीश विनिर्मिता परिचरवायु सार्धनुसारिणा।
श्रीकरश्रीनिवासरिपुध्वंसकारिन् पक्षिनिलयसर्वदेवता।
सततं कुरु सान्निध्यं शान्तिं स्वस्त्ययनं च मे भवतु।
सर्वविघ्ना अपसरन्तु स्वाहा ध्वजारोपणमन्त्रोऽयम् ॥१९॥

इति श्रीसाम्बपुराणे ध्वजारोपणं नाम त्रयस्त्रिंशत्तमोऽध्यायः

हे भगवन्! ईश्वर! आईये। ध्वजारोहण हो रहा है। आप वायु के साथ विचरण करें। आप के श्रीकर में लक्ष्मी का वास है। हे शत्रुध्वंसकारिन्! पक्षिगण के आश्रय देवतागण! आप नित्य सन्निहित हों। मुझे शान्ति तथा मंगल प्राप्त हो, समस्त विघ्न दूरीभूत हो जायँ। स्वाहा! यह ध्वजारोहण मन्त्र है॥१९॥

श्रीसाम्ब पुराणान्तर्गत ध्वजारोपण नामक त्रयस्त्रिंश अध्याय समाप्त

चतुस्त्रिंशत्तमोऽध्यायः

(देवयात्रा)

वसिष्ठ उवाच
अथ संवत्सरे पूर्णे स्थापितस्य दिवस्पतेः।
साम्बः पप्रच्छ भूयोऽपि नारदं चर्षिसत्तमम् ॥१॥
वशिष्ठदेव कहते हैं—सूर्यदेव के मन्दिर-स्थापना का एक-वर्ष पूर्ण हो जाने पर साम्ब ने ऋषिश्रेष्ठ नारद से कहा॥१॥

साम्ब उवाच
स्थापितस्य सहस्रांशोः पूर्णे संवत्सरे पुनः।
कथं सांवत्सरी पूजा कर्तव्या चर्षिसत्तम! ॥२॥
साम्ब कहते हैं—हे महर्षि! सहस्र किरण सूर्यदेव का वर्ष पूर्ण हो गया। अब किस प्रकार से सांवत्सरी पूजा करनी होगा, कहिये॥२॥

नारद उवाच
यथोक्तेन विधानेन प्रतिमास्थापने कृते।
संवत्सरे ततः पूर्णे स्नानकर्म विधानवित् ॥३॥
तीर्थोदकमुपानीय ह्यन्यच्चापि जलं शुचिः।
पूर्वोक्तेन विधानेन प्रतिमां स्नापयेद् बुधः ॥४॥
नारद कहते हैं—प्रतिमा-स्थापना काल में जैसा विधान कहा गया है, संवत्सर पूर्ण होने पर स्नानकर्म के विधानज्ञ विज्ञ व्यक्ति तीर्थजल तथा अन्य पवित्र जल लाकर पूर्वोक्त विधानानुसार प्रतिमा को स्नान करायें॥३-४॥

जपेच्च तीर्थनामानि मनसा संस्मरेत्ततः।
पुष्करं नैमिषं चैव कुरुक्षेत्रं पृथूदकम् ॥५॥
गंगा सरस्वती सिन्धुश्चंद्रभागा च नर्मदा।
पयोष्णी यमुना ताम्रा क्षिप्रा वेत्रवती तथा ॥६॥
सरितः सागराश्चैव सान्निध्यं कल्पयन्तु वै।
एवं स्नानविधिं कृत्वा ह्यर्चयित्वा प्रणम्य च ॥७॥
धूपमर्घ्यञ्च दत्वा तु प्रतिमामधिवासयेत्।