साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 162, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकत्रिशोऽध्यायः
(प्रतिमालक्षणम्)
वशिष्ठ उवाच
अतः परं प्रवक्ष्यामि प्रतिमालक्षणं क्रमात्।
एकहस्ता द्विहस्ता च त्रिहस्ता वा प्रमाणतः ॥१॥
वशिष्ठ देव कहते हैं—अब प्रतिमालक्षण कहता हूँ। एक हाथ, दो हाथ तथा तीन हाथ अथवा जैसी इच्छा हो, उतने परिमाण की प्रतिमा का निर्माण करना चाहिये॥१॥
तथा सार्धत्रिहस्ता वा सवितुः प्रतिमा शुभा।
प्रासादाद् द्वारतो वापि यत्प्रमाणं प्रकीर्त्तितम् ॥२॥
तद्वा प्रमाणं कर्त्तव्यं सततं शुभमिच्छता।
एकहस्ता भवेत् सौम्या द्विहस्ता धनधान्यदा ॥३॥
त्रिहस्ता प्रतिमा भानोः सर्वकामप्रदा स्मृता।
सार्द्धतृतीयहस्ता तु सुभिक्षक्षेमकारिका ॥४॥
साढ़े तीन हाथ की सूर्यप्रतिमा शुभ होती है। प्रासाद से द्वार का जैसा प्रमाण कहा गया है, वैसा ही यह होगा (प्रासाद अर्थात् देवालय माप का—इसका तात्पर्य श्लोक ५ में है)। शुभाकांक्षी व्यक्ति सर्वदा उसी प्रकार के माप को ग्रहण करे। एक हाथ माप की प्रतिमा सौम्य होती है। दो हाथ की (प्रतिमा) धन-धान्य देती है। सूर्य की तीन हाथ की प्रतिमा सकल कामनापूरक कही जाती है। साढ़े तीन हाथ की प्रतिमा प्रचुर खाद्य तथा क्षेम (अप्राप्त वस्तु को देने वाली) प्रदात्री होती है॥२-४॥
अग्रे मध्ये च मूले च प्रतिमा सर्वतः शुभा।
गान्धर्वी सा तु विज्ञेया बहुधान्यधनावहा ॥५॥
देवागारस्य यद्द्वारं तस्मादष्टाङ्गमत्सृजेत्।
तृतीये पिण्डिका कार्या द्वौ भागौ प्रतिमा भवेत् ॥६॥
देवालय का जो द्वार है, उससे आठ भाग का परित्याग करना चाहिये। तृतीय भाग द्वारा पिण्डिका करनी चाहिये एवं दो भाग द्वारा प्रतिमा तैयार करनी चाहिये। वृक्ष के अग्रभाग, मध्यभाग तथा मूल की प्रतिमा सर्वदा शुभ होती है। इसे गान्धर्वी भी कहते हैं। यह धन-धान्य देने वाली होती है॥५-६॥