साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंएकत्रिंशोऽध्यायः १५३
अङ्गुलैः स्वैर्भवेन्मूर्त्तिरशीतिश्चतुरङ्गुला ।
विस्तारायामतः कार्या वदनं द्वादशाङ्गुलम् ॥७॥
मुखं त्रिभागं चिबुकं ललाटं नासिका तथा ।
कर्णौ नासिकया तुल्यौ पाण्योर्वा निपतेतयोः ॥८॥
नयने द्व्यङ्गुले स्यातां तत्रिभागे तु तारके ।
तृतीयं तारकाभागं कुर्याद् दृष्टिं विचक्षणः ॥९॥
अपनी अंगुलियों से ८४ अंगुल परिमाण की मूर्त्ति होनी चाहिये। चेहरे का विस्तार १२ अंगुल होगा। उसके तीन भाग में मुख, चिबुक, ललाट तथा नासिका बनाये। नासिका के बराबर कर्णद्वय अथवा हस्तद्वय के अनुपात में कान बनाये। नेत्र २ अंगुल के होंगे, उसके तीन भाग में तारका (नेत्रतारका) होगी तथा विचक्षण व्यक्ति को तारका के तृतीय भाग में दृष्टि बनानी चाहिये।॥७-९॥
ललाटं मस्तकोत्सेधं कुर्यात्तत्सममेव तु।
परिणाहस्तु शिरसो भवेद् द्वात्रिंशदङ्गुलम् ॥१०॥
तुल्या नासिकया ग्रीवा मुखेन हृदयान्तरम्।
मुखमात्रा भवेन्नाभिस्ततो मेढ्रमन्तरा ॥११॥
ललाट में मस्तक का वेष्टन (उष्णीष) ललाट के समान होता है। ३२ अंगुल मस्तक का परिमाण होगा। मुख तथा हृदय के मध्य नासिका के तुल्य ग्रीवा होगी। मुख के सम परिणाम में नाभि तथा मेढ्र (लिंग) का निर्माण होगा॥१०-११॥
मुखविस्तारमुरसस्ततोऽर्धं तु कटिर्भवेत्।
बाहूप्रवाहतत्तुल्यावूरूजङ्घे च तत्समे ॥१२॥
मुख के विस्तार के समान वक्षःस्थल होगा। वक्ष का आधा कटिदेश होगा। उसके समान बाहुद्वय तथा प्रवाहु (केहुनी का निम्न भाग), उसके समान ऊरू तथा जंघा होगी॥१२॥
गुल्फाधस्तात्तु पादः स्यादुच्छ्रितश्चतुरङ्गुलैः ।
षडङ्गुलस्तु विस्तीर्णस्तस्याङ्गुष्ठाङ्गुलत्रयम् ॥१३॥
प्रदेशिनी च तत्तुल्या हीना शेषनखान्नखम् ।
चतुर्दशाङ्गुलः पादस्यायामः परिकीर्त्तितः ॥१४॥
गुल्फ का निम्न भाग चार अंगुल चौड़ा तथा छः अंगुल विस्तृत पैर होगा। तदनन्तर अंगुष्ठ तथा अंगुलित्रय प्रदेशिनी-व्यापी होता है, उससे कुछ छोटी कनिष्ठा अंगुलि होती है तथा शेष नख होते हैं। पाद का विस्तार चतुर्दश अंगुल कहा गया है॥१३-१४॥