साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१५४ श्रीसाम्बपुराणम्
एवं लक्षणयुक्ताया भवेत् पूजितलक्षणा।
अंसौ भुजौ तथैवोरू भ्रूललाटे सनासिकम्॥१५॥
गण्डं च नियतं मूर्तेः कुर्यात् तज्ज्ञः समुन्नतिम्।
विशालधवला ताम्रा पक्ष्मलायतलोचनः ॥१६॥
ऐसी लक्षणयुक्त प्रतिमा की पूजा करनी चाहिये। स्कन्धद्वय, भुजद्वय, ऊरू, भ्रू, ललाट, नासिका तथा गण्डःस्थल आदि की उच्चता आदि का निरूपण विज्ञ शिल्पी को स्वयं करना चाहिये। विग्रह विशाल, शुभ्र, ताम्र के समान पक्ष्म एवं विस्तृत नयन से युक्त होना चाहिये॥१५-१६॥
सस्मिताननपद्मास्यचारुबिम्बाधरः शुभः।
रत्नप्रोद्भासिमुकुटः कटकाङ्गदहारवान् ॥१७॥
अव्यङ्गपदबन्धादिसमायोगोपशोभितः ।
सुबाहुमण्डलश्चारुविचित्रमणिकुण्डलः ॥१८॥
कराभ्यां काञ्चनी मुद्रा प्राप्तहस्तसरोरुहम्।
एवं लक्षणसंयुक्तां कारयेदीप्सितप्रदाम् ॥१९॥
मृदु मन्द हास्ययुक्त मुखमण्डल तथा सुन्दर बिम्बाधर शुभ होता है। रत्न से उद्भासित मुकुट, कटक, अङ्गद तथा हार भी होना चाहिये। चरण नूपुरादि से शोभित हो, बाहुमण्डल सुन्दर हो, कर्णों में विचित्र मणिकुण्डल रहे एवं दोनों हाथ में काञ्चनी मुद्रा होनी चाहिये। ऐसे लक्षणों वाली प्रतिमा ईप्सित वर देने वाली होती है॥१७-१९॥
प्रजाभ्यश्च तदा भानुः शिवारोग्याभयप्रदः।
अत्यङ्गायां नृपभयं हीनाङ्गायामकल्पता ॥२०॥
ध्यातायां चक्षुषः पीड़ा कृशायां तु दरिद्रता।
सक्षतायां भयं शस्त्रात् स्फुटिता मृत्युकारिणी ॥२१॥
सूर्यदेव प्रजा का मंगल करते हैं। आरोग्य तथा अभय प्रदान करते हैं। उनके निर्मित विग्रह में अधिक अंग होने पर नृपभय एवं हीन अंग होने पर अकल्पता (विधि-बहिर्भूतता) होती है। ऐसी मूर्ति का ध्यान करने से नेत्रपीड़ा होती है। कृश मूर्त्ति से दरिद्रता होती है। मूर्ति के क्षतयुक्त होने से अस्त्रभय तथा टूटी-फूटी होने से वह मूर्ति मृत्युकारक हो जाती है॥२०-२१॥
दक्षिणावनतायां तु शश्वत् स्यादायुषः क्षयः।
उत्तरावनतायां तु वियोगो भवति ध्रुवम् ॥२२॥
मूर्ति के दाहिनी ओर झुकी होने से आयुक्षय होता है। वाम ओर झुकी होने से निश्चित मृत्यु होती है॥२२॥