भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

पृष्ठ 168, कुल 424 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 168

१५८ श्रीसाम्बपुराणम्

सप्तमेनाभिषिञ्चन्तु ऋषयः सप्त खेचराः। वसवश्चाभिषिञ्चन्तु कलशेनाष्टमेन ते ॥१८॥ अष्टमङ्गलयुक्तेन देवदेव नमोऽस्तु ते। स्नापयित्वा क्रमेणैनं स्नानकर्मविधानवित् ॥१९॥

देवश्रेष्ठ विद्याधरगण सरस्वती के जल से पूर्ण तृतीय कलश से आपका अभिषेक करें। समागत लोकपालगण सागर जल से पूर्ण चतुर्थ कलश द्वारा आपका अभिषेक करें। नागगण पद्मररेणु द्वारा सुगन्धित जल से पूर्ण पञ्चम कलश से आपका अभिषेक करें। हिमवत् हेमकूट प्रभृति पर्वतगण (तदभिमानी देवगण) निर्झर के जल से पूर्ण कलश से आपका अभिषेक करें। हे दिवाकर! आकाशचारी सप्त ऋषिगण (मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु तथा वशिष्ठ) सकल जलपूर्ण सप्तम कलश द्वारा आपका अभिषेक करें। अष्ट वसुगण (गंगा से उत्पन्न भव-ध्रुव-सोम-विष्णु-अनिल-अनल-प्रत्यूष तथा प्रभव) अष्टमंगलयुक्त अष्टम कलश द्वारा आपका अभिषेक करें। हे देवदेव! आपको नमस्कार है। स्नानकर्म के विधान को जानने वाले व्यक्ति को इस प्रकार क्रमानुसार स्नान कराना चाहिये (यहाँ मूल संस्कृत के १२वें श्लोक से लेकर १८वें श्लोक-पर्यन्त अभिषेक का मन्त्र दिया गया है)॥१४-१९॥

ततो वर्धनिकां गृह्य वारिधारां समुत्सृजेत्। त्रिंशत्तु पुरतोऽर्कस्य आचमस्वेति च ब्रुवन् ॥२०॥

तदनन्तर वर्धनिका (क्षुद्र जलपात्र) लेकर ३० बार जल प्रदान करे तथा सूर्य से कहे कि आप आचमन करिये॥२०॥

ततोऽन्यत्र शुचौ देशे सुसंमृष्ट्यापलेपने। तण्डुलैः पद्मरागैश्च आलिखेच्चतुरन्तिकम् ॥२१॥

तदनन्तर अन्यत्र पवित्र देश में (भूमि को) लेपन से साफ करके तण्डुल (चावल) तथा पद्मराग द्वारा चारो ओर अंकित करे॥२१॥

पताकातोरणच्छत्रध्वजमालाद्यलङ्कृतम् । विचित्रस्रग्वितानाढ्यं प्रकीर्णकुसुमोत्करम् ॥२२॥ तस्य मध्ये कुशोस्तीर्णे मूर्त्तिं स्थाप्य विवस्वतः। तस्य चावाहनं कृत्वा दद्यादर्घ्यं प्रयत्नतः ॥२३॥

तदनन्तर पताका, तोरण, छत्र, ध्वजा तथा माला से अलंकृत करके विचित्र वर्णों की माला तथा पुष्पादि से मण्डप को शोभित करे। वहाँ कुशासन पर सूर्यदेव की मूर्त्ति स्थापित करके आवाहन के पश्चात् यत्नपूर्वक अर्घ्यदान करना चाहिये॥२२-२३॥