भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

पृष्ठ 167, कुल 424 में से

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द्वात्रिंशोऽध्यायः १५७

काञ्चनै राजतैस्ताम्रैर्मृण्मयैः कलशैस्तथा। साक्षतैः सहिरण्‍यैश्च सर्वौषधिसमन्वितैः। गायत्रीपरिपूतैस्तैरष्टभिः स्नापयेद् रविम् ॥८॥

स्वर्ण, रौप्य (चाँदी), ताम्र, मृण्मय (मिट्टी) के कलश द्वारा अक्षत, हिरण्य, सर्वौषधियुत तथा गायत्री मन्त्र से शुद्ध आठ कलशों से सूर्यदेव को स्नान कराये॥८॥

कुशोत्तरां ततः कृत्वा वेदीं पक्वेष्टकामयीम् ॥९॥ तस्यां वेद्यां समारोप्य परिधाप्य च वाससी। प्रतिमामभिषिञ्चेत सोपवासः प्रयत्नतः ॥१०॥

पाँच ईटों की वेदी का निर्माण करे, उसमें कुश का संयोग करके प्रतिमा को नूतन वस्त्र पहनाकर उपवासी होकर प्रतिमा का अभिषेक यत्न से करना चाहिये॥९-१०॥

मूर्ध्नि सर्वौषधीन् दत्त्वा तथैवामलकानि च। वाक्यमुच्चारयेद्देवमुपर्यवकिरञ्जलम् ॥११॥

मस्तक पर सर्वौषधि तथा आमलकी प्रदान करके मस्तक पर जल डालते हुये नीचे लिखे मन्त्र का उच्चारण करना चाहिये॥११॥

देवास्त्वामभिषिञ्चन्तु ब्रह्मविष्णुशिवादयः। व्योमगङ्गाम्बुपूर्णेन आद्येन कलशेन तु ॥१२॥

ब्रह्मा-विष्णु-शिवादि देवगण आकाशगंगा के जल से पूर्ण प्रथम कलश द्वारा आपको अभिषिक्त करें॥१२॥

मरुतश्चाभिषिञ्चन्तु भक्तिमन्तो दिवस्पते। मेघतोयसुपूर्णेन द्वितीयकलशेन तु ॥१३॥

हे दिवस्पति सूर्यदेव! भक्तिमान् मरुद्गण मेघों से परिपूर्ण द्वितीय कलश से आपका अभिषेक करें॥१३॥

सारस्वतेन तोयेन पूर्णेन सुरसत्तमाः। विद्याधराभिषिञ्चन्तु लोकपालाः समागताः ॥१४॥ सागरोदकपूर्णेन चतुर्थकलशेन तु। वारिणा परिपूर्णेन पद्मरेणुसुगन्धिना ॥१५॥ पञ्चमेनाभिषिञ्चन्तु नागाश्च कलशेन ते। हिमवद्धेमकूटाद्या अभिषिञ्चन्तु पर्वताः ॥१६॥ निर्झरोदकपूर्णेन षष्ठेन कलशेन तु। सर्वतीर्थाम्बुपूर्णेन कलशेन दिवस्पते ॥१७॥

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