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साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

द्वात्रिंशोऽध्यायः १५७

काञ्चनै राजतैस्ताम्रैर्मृण्मयैः कलशैस्तथा। साक्षतैः सहिरण्‍यैश्च सर्वौषधिसमन्वितैः। गायत्रीपरिपूतैस्तैरष्टभिः स्नापयेद् रविम् ॥८॥

स्वर्ण, रौप्य (चाँदी), ताम्र, मृण्मय (मिट्टी) के कलश द्वारा अक्षत, हिरण्य, सर्वौषधियुत तथा गायत्री मन्त्र से शुद्ध आठ कलशों से सूर्यदेव को स्नान कराये॥८॥

कुशोत्तरां ततः कृत्वा वेदीं पक्वेष्टकामयीम् ॥९॥ तस्यां वेद्यां समारोप्य परिधाप्य च वाससी। प्रतिमामभिषिञ्चेत सोपवासः प्रयत्नतः ॥१०॥

पाँच ईटों की वेदी का निर्माण करे, उसमें कुश का संयोग करके प्रतिमा को नूतन वस्त्र पहनाकर उपवासी होकर प्रतिमा का अभिषेक यत्न से करना चाहिये॥९-१०॥

मूर्ध्नि सर्वौषधीन् दत्त्वा तथैवामलकानि च। वाक्यमुच्चारयेद्देवमुपर्यवकिरञ्जलम् ॥११॥

मस्तक पर सर्वौषधि तथा आमलकी प्रदान करके मस्तक पर जल डालते हुये नीचे लिखे मन्त्र का उच्चारण करना चाहिये॥११॥

देवास्त्वामभिषिञ्चन्तु ब्रह्मविष्णुशिवादयः। व्योमगङ्गाम्बुपूर्णेन आद्येन कलशेन तु ॥१२॥

ब्रह्मा-विष्णु-शिवादि देवगण आकाशगंगा के जल से पूर्ण प्रथम कलश द्वारा आपको अभिषिक्त करें॥१२॥

मरुतश्चाभिषिञ्चन्तु भक्तिमन्तो दिवस्पते। मेघतोयसुपूर्णेन द्वितीयकलशेन तु ॥१३॥

हे दिवस्पति सूर्यदेव! भक्तिमान् मरुद्गण मेघों से परिपूर्ण द्वितीय कलश से आपका अभिषेक करें॥१३॥

सारस्वतेन तोयेन पूर्णेन सुरसत्तमाः। विद्याधराभिषिञ्चन्तु लोकपालाः समागताः ॥१४॥ सागरोदकपूर्णेन चतुर्थकलशेन तु। वारिणा परिपूर्णेन पद्मरेणुसुगन्धिना ॥१५॥ पञ्चमेनाभिषिञ्चन्तु नागाश्च कलशेन ते। हिमवद्धेमकूटाद्या अभिषिञ्चन्तु पर्वताः ॥१६॥ निर्झरोदकपूर्णेन षष्ठेन कलशेन तु। सर्वतीर्थाम्बुपूर्णेन कलशेन दिवस्पते ॥१७॥

सप्तमेनाभिषिञ्चन्तु ऋषयः सप्त खेचराः।

१५८ श्रीसाम्बपुराणम्

सप्तमेनाभिषिञ्चन्तु ऋषयः सप्त खेचराः। वसवश्चाभिषिञ्चन्तु कलशेनाष्टमेन ते ॥१८॥ अष्टमङ्गलयुक्तेन देवदेव नमोऽस्तु ते। स्नापयित्वा क्रमेणैनं स्नानकर्मविधानवित् ॥१९॥

देवश्रेष्ठ विद्याधरगण सरस्वती के जल से पूर्ण तृतीय कलश से आपका अभिषेक करें। समागत लोकपालगण सागर जल से पूर्ण चतुर्थ कलश द्वारा आपका अभिषेक करें। नागगण पद्मररेणु द्वारा सुगन्धित जल से पूर्ण पञ्चम कलश से आपका अभिषेक करें। हिमवत् हेमकूट प्रभृति पर्वतगण (तदभिमानी देवगण) निर्झर के जल से पूर्ण कलश से आपका अभिषेक करें। हे दिवाकर! आकाशचारी सप्त ऋषिगण (मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु तथा वशिष्ठ) सकल जलपूर्ण सप्तम कलश द्वारा आपका अभिषेक करें। अष्ट वसुगण (गंगा से उत्पन्न भव-ध्रुव-सोम-विष्णु-अनिल-अनल-प्रत्यूष तथा प्रभव) अष्टमंगलयुक्त अष्टम कलश द्वारा आपका अभिषेक करें। हे देवदेव! आपको नमस्कार है। स्नानकर्म के विधान को जानने वाले व्यक्ति को इस प्रकार क्रमानुसार स्नान कराना चाहिये (यहाँ मूल संस्कृत के १२वें श्लोक से लेकर १८वें श्लोक-पर्यन्त अभिषेक का मन्त्र दिया गया है)॥१४-१९॥

ततो वर्धनिकां गृह्य वारिधारां समुत्सृजेत्। त्रिंशत्तु पुरतोऽर्कस्य आचमस्वेति च ब्रुवन् ॥२०॥

तदनन्तर वर्धनिका (क्षुद्र जलपात्र) लेकर ३० बार जल प्रदान करे तथा सूर्य से कहे कि आप आचमन करिये॥२०॥

ततोऽन्यत्र शुचौ देशे सुसंमृष्ट्यापलेपने। तण्डुलैः पद्मरागैश्च आलिखेच्चतुरन्तिकम् ॥२१॥

तदनन्तर अन्यत्र पवित्र देश में (भूमि को) लेपन से साफ करके तण्डुल (चावल) तथा पद्मराग द्वारा चारो ओर अंकित करे॥२१॥

पताकातोरणच्छत्रध्वजमालाद्यलङ्कृतम् । विचित्रस्रग्वितानाढ्यं प्रकीर्णकुसुमोत्करम् ॥२२॥ तस्य मध्ये कुशोस्तीर्णे मूर्त्तिं स्थाप्य विवस्वतः। तस्य चावाहनं कृत्वा दद्यादर्घ्यं प्रयत्नतः ॥२३॥

तदनन्तर पताका, तोरण, छत्र, ध्वजा तथा माला से अलंकृत करके विचित्र वर्णों की माला तथा पुष्पादि से मण्डप को शोभित करे। वहाँ कुशासन पर सूर्यदेव की मूर्त्ति स्थापित करके आवाहन के पश्चात् यत्नपूर्वक अर्घ्यदान करना चाहिये॥२२-२३॥

द्वात्रिंशोऽध्यायः १५९

सुवर्णमधुपर्कादि सुमनोदीपधूपकैः । देवाय स्पर्शयेद् गाञ्च सवत्सां रोहिणीं शुभाम् ॥१२४॥

स्वर्ण-मधुपर्कादि, पुष्प, धूप, दीप को देवता के उद्देश्य से निकालकर शुभ सवत्सा लाल गाय का स्पर्श (देवता को) कराये। उस समय यह मन्त्र पढ़ना चाहिये॥१२४॥

ॐ नमो गोपतये इत्युक्त्वा सहस्त्रांशो प्रसीदयेत् । एवम् मन्त्रेण सम्पूज्य परिधाय च वाससी ॥१२५॥

हे गोपते (सूर्य)! आपको नमस्कार है। हे सहस्त्रांशु! मुझपर प्रसन्न हो जाईये। इस मन्त्र से पूजा करके उनको वस्त्रद्वय पहनाये॥१२५॥

यज्ञोपवीतमावेष्ट्य बद्धोत्सङ्गस्तथैव च। सर्वगन्धैः समालिप्य चन्दनागुरुकुङ्कुमैः ॥१२६॥

उन्हें यज्ञोपवीत धारण कराकर (यज्ञोपवीत से आवेष्टन करके) तदनन्तर चन्दन, अगुरु, कुङ्कुम प्रभृति गन्ध का लेपन करे॥१२६॥

अलङ्कारैरलङ्कृत्य कुसुमैश्च सुगन्धिभिः । मालाभिश्च विचित्राभिरबद्धाभिरनेकशः ॥१२७॥

तत्पश्चात् विविध अलङ्कारों से अलंकृत करके सुगन्धि, कुसुम तथा अनेक विचित्र मालाओं को पहनाये॥१२७॥

ततो धूपं च नैवेद्यं दद्याच्चैव प्रयत्नतः । तत्तोरणं समुत्थाप्य मणेः शौरदयो धिया ॥१२८॥

तत्पश्चात् अनेक यत्न द्वारा धूप एवं नैवेद्य निवेदित करना चाहिये। तदनन्तर अकालोदित (अकाल में उगे) इन्द्रधनुष का (मणि का) चिन्तन करते हुये तोरण को उत्तोलित करे॥१२८॥

प्रज्वाल्यग्निं विधानेन कुर्याच्छान्तिं विधानतः । ततः स्वलङ्कृतां स्नातां मणिरत्नविभूषिताम् ॥१२९॥ कृत्वा प्रतिष्ठितां रक्षां प्रतिमामधिवासयेत् ॥१३०॥

विधान के अनुसार अग्नि प्रज्वलित करके यथाविधि शान्तिदान करे। तदनन्तर स्नात, अलंकृत, मणिरत्नादि से विभूषित प्रतिष्ठित प्रतिमा का अधिवास कराये॥१२९-३०॥

देवागारात्तथैश्याने दिग्भागे दिव्यसंज्ञिते । कृत्वा कुशपरस्तीर्णे वरास्तरणसंवृते । पूर्वशीर्षां शुभां शय्यां शुक्लां शुक्लाम्बरोत्तमाम् ॥१३१॥

१६०श्रीसाम्बपुराणम्

तस्यां संवेशयेत् सम्यङ् महाश्वेतामुदीरिताम्।
निक्षुभां दक्षिणे पार्श्वे वामे राज्ञीं च स्थापयेत् ॥३२॥
तदनन्तर देवमन्दिर में ईशान कोण में दिव्यनाम स्थान में कुश बिछाकर सुन्दर आस्तरण पर पूर्व की ओर मस्तक (मुख) करके (ताकि पैर पश्चिम की ओर रहे) शुभ्र वस्त्रों की उत्तम शय्या बनानी चाहिये। इस शय्या पर प्रसिद्ध महाश्वेता की स्थापना करनी चाहिये एवं उसके दाहिनी ओर निक्षुभा तथा बाँयीं ओर राज्ञी की स्थापना करनी चाहिये।।३१-३२।।

दण्डपिङ्गलकौ चास्य स्थाप्यौ पादप्रवेशितौ।
तस्यां शङ्खसितायां तु शय्यायां प्रतिमां रवेः ॥३३॥
पाद-प्रदान (पैर रखने के) स्थान पर दण्ड तथा पिङ्गल को स्थापित करना चाहिये। उस शङ्ख के समान शुभ्र शय्या पर सूर्यप्रतिमा की स्थापना करनी चाहिये।।३३।।

वसेच्च रजनीं तत्र स्तूयमानं चतुर्दिशम्।
ब्राह्मणैर्वन्दिभिश्चापि गीतज्ञैर्वरणैस्तथा।
कुर्याज्जागरणं तत्र सूर्यभक्तिसमन्वितैः ॥३४॥
वहाँ पूजक को रात में रहना चाहिये। चारो ओर से ब्राह्मण, बन्दीगण, वृत गीतज्ञ स्तव करते रहें तथा सब सूर्य के प्रति भक्तियुक्त होकर रात्रि-जागरण भी करें।।३४।।

प्रभातायां तु शर्वर्यां बोधयेद् दिग्विधानतः।
हविष्यं भोजयित्वा तु ब्राह्मणाम् याजकांस्तथा ॥३५॥
दक्षिणाभिश्च सम्पूज्य कृते वै स्वस्तिवाचने।
दीनान्धकृपणादींश्च सर्वानन्नेन तोषयेत् ॥३६॥
तत्पश्चात् प्रभात होने पर विधिपूर्वक प्रतिमा को जगाये। ब्राह्मण तथा याजकों को हविष्य भोजन कराकर स्वस्तिवाचन के साथ दक्षिणादि द्वारा उनकी पूजा करे। तदनन्तर दीन-अन्ध-कृपण प्रभृति सबको अन्न से परितुष्ट करना चाहिये।।३५-३६।।

ततो गर्भगृहस्यानमध्ये कृत्वा तु पिण्डिकाम्।
अवटे चास्य सौवर्णं न्यस्य सप्तहयं रथम्॥३७॥
सर्वबीजौषधींश्चैव तत्र दत्त्वा विधानवित्।
दत्तार्घ्यं स्थापयेत्तत्र यजमानं सहायवान् ॥३८॥
गौरांश्च सर्षपान् दत्त्वा अर्चां संस्थापयेत्ततः।
शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषैर्हस्ताधारासहाक्षतैः ॥३९॥
तदनन्तर गर्भगृह में पिण्डिका को प्रस्तुत (रख) करके उस गर्भ गृह में स्वर्ण तथा सप्ताश्व रथ स्थापित करे। तत्पश्चात् विधान को जानने वाला यजमान अन्य की सहायता

द्वात्रिंशोऽध्यायः १६१

से वहाँ सर्व बीजौषधि से युक्त अर्घ्य प्रदान करके उसे स्थापित करे। तदनन्तर श्वेत सरसों अर्पित करके (नीचे रखकर) वहाँ प्रतिमा स्थापित करनी चाहिये। तदनन्तर शङ्ख-दुन्दुभि आदि के शब्द के साथ हाथों से चावल छिड़कना चाहिये।।३७-३९।।

कृत्वा पुण्याहशब्देन स्वालयस्य प्रदक्षिणाम्।
शुभे लग्ने दिने ऋक्षे पूर्वाह्णे भानवेक्षणे।
मुहूर्त्ते च शुभे भानोः प्रतिमां स्थापयेद् बुधः ॥४०॥

तदनन्तर पुण्याह शब्दों द्वारा देवगृह की प्रदक्षिणा करे। शुभ लग्न में शुभ दिन तथा नक्षत्र में पूर्वाह्न काल में, सूर्यालोक (सूर्य के प्रकाश) में शुभ मुहूर्त में ज्ञानी व्यक्ति को सूर्य प्रतिमा का स्थापना कार्य करना चाहिये।।४०।।

नाधोमुखीं नोर्ध्वमुखीं न पार्श्वाननतां तथा।
समामभिमुखीं चेमां प्रतिमां च निवेशयेत् ॥४१॥

प्रतिमा निम्नमुखी अथवा ऊर्ध्वमुखी नहीं होनी चाहिये। सामने की ओर प्रतिमा का मुख हो, ऐसी स्थापना करनी चाहिये।।४१।।

पत्न्यौ चास्य ततः सम्यक् पार्श्वयोर्विनिवेशयेत्।
निक्षुभां दक्षिणे पार्श्वे रवे राज्ञीं तु वामतः ॥४२॥

तत्पश्चात् सूर्य की दोनों पत्नियों को विधान के अनुसार सूर्य के पार्श्व में स्थापित करना चाहिये अर्थात् दाहिनी ओर निक्षुभा तथा बाँयीं ओर राज्ञी की स्थापना करे।।४२।।

पिङ्गलो दक्षिणे भानोर्वामतो दण्डनायकः।
स्थाप्य चैव ततो वह्निं संस्थाप्य विधिवत् पुनः ॥४३॥

सूर्य के दाहिनी ओर पिङ्गल तथा बाँयीं ओर दण्डनायक की स्थापना करनी चाहिये। तदनन्तर पुनः विधिपूर्वक वह्नि-स्थापना करनी चाहिये।।४३।।

यजमानस्य शान्त्यर्थं शान्तिकर्म विधानवित्।
होमयेत् सर्वदेवानां स्वाहाकारैरितस्ततः ॥४४॥

यजमान की शान्ति के लिये शान्तिकर्म में निपुण पुरोहित द्वारा स्वाहायुक्त मन्त्रों से चारो ओर समस्त देवताओं का होम करना चाहिये।।४४।।

ततस्तदुपहारार्थं सम्भारैः प्राक्समाहृतैः।
मोदकोल्लापिकापूपशष्कुलीभूतशीर्षकैः ॥४५॥
कृशरैः पायसोन्मिश्रैः सर्वदिक्षु क्षिपेद् बलिम्।
तर्पयेत् क्षीरमध्वाज्यैः स्तूयात् स्तोत्रैश्च भास्करम् ॥४६॥

साम्ब०—११

१६२ | श्रीसाम्बपुराणम्

तत्पश्चात् होम की आहुति-हेतु पूर्व से संगृहीत मोदक, उल्लापिका, अपूप, शष्कुली शीर्ष, कृशर, पायस मिश्रित करके सभी दिशाओं में उपहार प्रदान करना चाहिये तथा दुग्ध, मधु एवं घी से तर्पण करना चाहिये। इसके अनन्तर नाना स्तोत्रों से सूर्य की स्तुति करनी चाहिये।।४५-४६।।

विप्रेभ्यो याजकेभ्यश्च ततो दद्याच्च दक्षिणाम्।
सूर्यक्रतौ महापुण्ये तेन कुर्यांश्च दक्षिणाम्॥४७॥

तदनन्तर ब्राह्मण तथा याजकगण को दक्षिणा प्रदान करनी चाहिये। तत्पश्चात् महापुण्यकारी सूर्य यज्ञ की दक्षिणा भी प्रदान करनी चाहिये॥४७॥

स्थाप्यतेऽनेन विधिना मद्भक्तैः प्रतिमा तु या।
सा तु वृद्धिकरी नित्यं सान्निध्यं च सदा भवेत्॥४८॥

मेरे भक्त द्वारा इस विधान से जो प्रतिमा स्थापित की जाती है, वह नित्य वृद्धिकारक होती है और मेरा सान्निध्य प्रदान करती है॥४८॥

चतुर्णामपि वर्णानां स्थापयेद् यस्तु भास्करम्।
सोत्तीर्णः सर्वसंसारात् सूर्यलोके महीयते॥४९॥
पश्यन्ति मानवा ये तु आदित्यस्याधिवासनम्।
सप्तजन्म सु ते जाता नीरोगाः सम्भवन्ति हि॥५०॥

ब्राह्मणादि चार वर्णों में से जो कोई भी सूर्य की प्रतिमा स्थापित करता है, वह संसार से उत्तीर्ण होकर सूर्य लोक में निवास करता है। जो लोग सूर्य का मन्दिर देखते हैं, वे सात जन्मों तक नीरोग होकर स्थित रहते हैं॥४९-५०॥

त्रिरात्रं येऽप्युपासन्ते भानोर्यात्राधिवासितम्।
गन्धमाल्योपहारैश्च ते यान्ति परमां गतिम्॥५१॥

गन्ध, माला तथा उपहार द्वारा तीन रात्रि-पर्यन्त जो सूर्य के यात्रा अधिवास की उपासना करते हैं, उनको परमगति प्राप्त होती है॥५१॥

आत्मीयं परकीयं च प्रतिमास्थापनं रवेः।
यः पश्यति पुमान् भक्त्या स पापात् परिमुच्यते॥५२॥

अपने द्वारा की जा रही अथवा अन्य द्वारा की जा रही रवि-प्रतिमा की स्थापना को जो व्यक्ति भक्तिपूर्वक देखते हैं, वे पापमुक्त हो जाते हैं॥५२॥

दशानामश्वमेधानां वाजपेयशतस्य तु।
फलं प्राप्नोति पुरुषं प्रतिष्ठाप्य दिवाकरम्॥५३॥

सूर्य-प्रतिमा की प्रतिष्ठा करने मात्र से लोग दश अश्वमेध तथा १०० वाजपेय यज्ञ का फल पा जाते हैं॥५३॥

द्वात्रिंशोऽध्यायः १६३

यावत् कीर्त्तिः पुण्यकृतो भानोः स्थाननिवेशनात्। तावत् स तु यदुश्रेष्ठ सूर्यलोके महीयते ॥५४॥

हे यदुश्रेष्ठ! सूर्य की प्रतिमा-स्थापन के फल से पुण्यवान् व्यक्ति की जब तक कीर्ति रहती है, तब तक वह व्यक्ति सूर्यलोक में सम्मानित होता है॥५४॥

स्थापयित्वा रविं भक्त्या विधिदृष्टेन कर्मणा। मासे मासे क्रतुफलं लभते नात्र संशयः ॥५५॥

भक्तिपूर्वक यथाविधि कर्म द्वारा सूर्य की स्थापना करके व्यक्ति प्रतिमास यज्ञ करने का फल-लाभ करता है; यह निसंदिग्ध है॥५५॥

एकहिनापि यद् भानोः पूजया प्राप्यते फलम्। न व्रतैरुपवासैर्वा दानैर्वा तदवाप्यते ॥५६॥

एक दिन के सूर्यपूजन से जो फल प्राप्त होता है, वह अनेक व्रत-उपवास तथा दान द्वारा भी नहीं मिल सकता॥५६॥

कृत्वा तु यन्महत् पापं यः पश्चात् सेवते रविम्। स याति सूर्यलोके तु नरो विगतकल्मषः ॥५७॥

यदि कोई महान् पाप करके भी सूर्य की सेवा करता है, तब वह व्यक्ति निष्पाप होकर सूर्यलोक में जाता है॥५७॥

न भवेद् दुष्टकाया च चन्द्रेण भूमिसन्निभा। स्वर्गे महीयते तावद् यावद् सूर्यस्य वेश्मनि ॥५८॥

वह व्यक्ति कभी भी दुष्ट देहधारी नहीं होता; अपितु चन्द्रमा तथा पृथ्वी के समान होकर सूर्यलोक में निवास करता है॥५८॥

इत्येवं सुख्यति तस्य यश्च भानोर्भूतानां स्थितिनिलयप्रसूतिहेतोः। श्रीभागी भवति नरो निकेतकारी कल्पानां वसति शतं च सूर्यलोके ॥५९॥

जो प्राणिगण की स्थिति, लय तथा जन्म के कारण सूर्यदेव के लिये ऐसा (प्रतिमा-स्थापनादि) सुख विधान करते हैं अर्थात् मन्दिर बनाते हैं, वे ऐश्वर्य का भोग करके शत कल्प-पर्यन्त सूर्यलोक में निवास करते हैं॥५९॥

यः प्रासादं रचयति पुमान् देवतानां प्रयत्नात् कीर्त्तिस्तस्य भवति विपुला वंशमार्गानुजाता। दिव्यान् कामान् लभति च सदा कामतश्चाप्रमेयां- स्तान् भुक्त्वासौ पुनरपि भवेच्चक्रवर्त्ती पृथिव्याम् ॥६०॥

१६४श्रीसाम्बपुराणम्

जो प्रयत्नपूर्वक देवता के गृह का निर्माण करते हैं, उनकी वंशपरम्परा की विपुल विपुल कीर्ति होती है। वे दिव्य भोगों का भोग करके पुनः (अगले जन्म में) पृथ्वी पर तेजस्वी राजा होते हैं।।६०।।

ये मानवा त्रिदशमूर्त्तिनिकेतनानि कुर्वन्ति साधुजनदृष्टिमनोहराणि।
तेषां मृतेऽप्यपरमार्थमये शरीरे लोके परिभ्रमति कीर्त्तिमयं शरीरम्।।६१।।

जो मानवगण साधुओं की दृष्टि को मनोहर लगने वाली देवप्रतिमा के मन्दिरों का निर्माण करते हैं, उनके पार्थिव शरीर का विनाश हो जाने पर भी उनका कीर्त्तिमय शरीर पृथ्वी पर परिभ्रमण करता रहता है (अर्थात् उनकी कीर्त्ति स्थायी हो जाती है)।।६१।।

इति मुनिन्र्ऋषभ सुताय विष्णोर्विधिमुपदिश्य च नारदो जगाम।
स च सवितुरिदं चकार भक्त्या भवनवरं भुवि शाश्वतं च नाम्ना।।६२।।

इति श्रीसाम्बपुराणे प्रतिमाकल्पो नाम द्वात्रिंशोऽध्यायः

इस प्रकार मुनिश्रेष्ठ नारद कृष्णपुत्र साम्ब को सूर्य-पूजाविधान का उपदेश करके चले गये। साम्ब ने भी अपने नाम से शाश्वत श्रेष्ठ सूर्यमन्दिर का निर्माण कराया।।६२।।

श्री साम्बपुराणोक्त प्रतिमाकल्प नामक द्वात्रिंश अध्याय समाप्त

त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः

(ध्वजारोपणम्)

नारद उवाच

अतः परं प्रवक्ष्यामि ध्वजारोपणमुत्तमम्।
पुरा देवासुरे युद्धे योद्धुं देवैर्जयैप्सुभिः ॥१॥

नारद कहते हैं—अब मैं उत्तम ध्वजा-आरोहण की बातें बतलाता हूँ। पूर्वकाल में देवासुर युद्ध के आरम्भ में जयलाभ-हेतु देवगण ने इसका निर्माण किया था॥१॥

कृत्वान्युपरि चिह्नानि वाहनानि शुभानि तु।
लक्ष्मचिह्नध्वजः केतुरितिपर्य्यायनामभिः ॥२॥

ध्वज के ऊपर उन-उन देवताओं के वाहन का चिह्न अङ्कित किया गया। लक्ष्म, चिह्न, ध्वजा, केतु—ये सभी पर्यायवाची शब्द हैं॥२॥

कीर्तितस्य च तस्येह प्रमाणं गदतः शृणु।
ध्वजवंशस्तु कर्तव्यो ह्यविद्धऋजुरव्रणः ॥३॥
प्रासादेन स तुल्यस्तु ध्वजवंशप्रमाणतः।
पताका च ध्वजे कार्या ध्वजवंशे विलम्बिनी ॥४॥

ध्वजा का प्रमाण कहता हूँ, सुनो! ध्वज के लिये बांस लाना चाहिये, जो कि अविद्ध, सीधा तथा व्रणादि से रहित हो (अक्षत) ध्वजा का प्रमाण प्रासाद के तुल्य प्रमाण से लेकर पता का निर्माण करना होगा॥३-४॥

देवागारस्य शिखरान्तिकभागमपमार्जनी।
युक्तवस्त्रमयी चित्रा सघंटा सुमनोहरा ॥५॥

देवालय के शिखर के तीसरे भाग प्रमाण का चित्रित मनोहारी पताका बनानी चाहिये॥५॥

ध्वजाग्रे चापि कर्तव्यो देवतालिङ्गसूचकः।
काञ्चनो वाथ रौप्यो वा मणिरत्नमयोऽपि वा ॥६॥
रङ्गका लिखिता वापि तद्वाहनसमाकृतिः।
गरुत्मांस्तु ध्वजे विष्णोरीश्वरस्य ध्वजे वृषः ॥७॥

१६६ श्रीसाम्बपुराणम्

ध्वजा के आगे देवता-चिह्नसूचक रौप्य, स्वर्ण, मणि, रत्नमय अथवा रंग से अंकित वाहन के समान (जिस देवता का ध्वज हो, उसके वाहन की) आकृति तैयार करनी चाहिये। जैसे विष्णु की ध्वजा में गरुड़, महादेव की ध्वजा में वृष आदि की आकृति बनानी चाहिये॥६-७॥

ब्रह्मणः पङ्कजं कार्यं रवेर्व्योम स्मृतं ध्वजे।
हंसो जलाधिपस्योक्तो धनदस्य नरो ध्वजे ॥८॥

ब्रह्मा की ध्वजा में पद्म, सूर्य की ध्वजा में आकाश चिह्न, वरुण की ध्वजा में हंस एवं, कुबेर की ध्वजा में मनुष्य का अंकन करना चाहिये॥८॥

मयूरः कार्तिकेयस्य हेरम्बस्य च मूषकः।
कुञ्जरो देवराजस्य यमस्य महिषो ध्वजे ॥९॥

कार्तिकेय की ध्वजा में मयूर, गणेश की ध्वजा में मूषक, देवराज इन्द्र की ध्वजा में हाथी तथा यम की ध्वजा में भैंसा अङ्कित करना चाहिये॥९॥

सिंहो ध्वजे तु दुर्गाया इत्येषा ध्वजकल्पना।
यस्य यो वाहनः प्रोक्तो ध्वजस्तस्य स एव तु ॥१०॥

दुर्गा की ध्वजा में सिंह—यह है ध्वजा-कल्पना। जिसका जो वाहन निश्चित है, वही उसकी ध्वजा में अंकित होता है॥१०॥

ततः सर्वौषधीभिस्तु स्नापयित्वा प्रयत्नतः।
समालभ्य च बध्नीयान् मध्ये प्रतिसरन्ततः ॥११॥

तदनन्तर सयत्न सर्वौषधि द्वारा स्नान कराकर उसे बीच से बाध देना (बाँस में) चाहिये॥११॥

कल्पयित्वा शुभां वेदीं कलशैरुपशोभिताम्।
तस्यां वेद्यां समारोप्य तां रात्रिमधिवासयेत् ॥१२॥

तत्पश्चात् वेदी का निर्माण करे। उसमें शोभित कलश की स्थापना करे और उस रात्रि वहीं (जागते हुये) अधिवास करे॥१२॥

नानाकुसुमचित्रैश्च स्रजस्तस्यां च लम्बयेत्।
अभ्यर्च्य वै प्रयत्नेन धूपमस्मै निवेदनम् ॥१३॥

तत्पश्चात् उसके ऊपर नानावर्ण के विचित्र पुष्पों की माला लटकाकर यत्नपूर्वक अर्चना करके धूप-निवेदन करे (अर्पण करे)॥१३॥

बलिकर्म ततः कुर्यात् कृसरा-पूपकादिभिः।
पललोल्लिपिकाभिश्च दधि-पायस-मोदकैः ॥१४॥

त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः १६७

उद्दिश्य लोकपालेभ्यो बलिं दद्यात्तु पायसम्।
ब्राह्मणान् स्वस्तिवाच्याथ कृत्वा पुण्याहमङ्गलम् ॥१५॥
वादित्रकृतनिर्घोषं जयशब्देन सङ्कुलम्।
शुभे लग्ने दिने ऋक्षे ध्वजमारोपयेद् बुधः ॥१६॥

तदनन्तर कृसर (खिचड़ी), अपूप (माल पूआ) प्रभृति से बलि प्रदान करे। मांस का तैयार खाद्य, दधि, पायस, मोदक आदि से लोकपालों के उद्देश्य से वायु को बलि प्रदान करना चाहिये। तदनन्तर ब्राह्मणगण स्वस्तिवाचन तथा पुण्याह मंगलाचरण करें। तब वाद्य ध्वनि तथा जयशब्द करें। शुभ लग्न, शुभ दिन तथा नक्षत्र का विचार करके विज्ञजन ध्वजारोहण करें ॥१४-१६॥

एवमारोपयेद्यस्तु ध्वजं देवालयोपरि।
श्रिया संवर्धते नित्यं प्राप्नोति च शुभां गतिम् ॥१७॥

इस प्रकार देवमन्दिर के ऊपर जो ध्वजारोहण करते हैं, दिनो-दिन उनका ऐश्वर्य वर्द्धित होता है और उनको शुभ गति मिलती है॥१७॥

न सुरा वस्तुमिच्छन्ति ध्वजहीने सुरालये।
मन्त्रस्तु स्थापने प्रोक्तो विधानज्ञैर्ध्वजस्य तु ॥१८॥

ध्वजारहित मन्दिर में देवता निवास नहीं करते। विधानज्ञ व्यक्ति को ध्वजा-स्थापनार्थ नीचे लिखे मन्त्र को पढ़ना चाहिये॥१८॥

एह्येहि भगवन्नीश विनिर्मिता परिचरवायु सार्धनुसारिणा।
श्रीकरश्रीनिवासरिपुध्वंसकारिन् पक्षिनिलयसर्वदेवता।
सततं कुरु सान्निध्यं शान्तिं स्वस्त्ययनं च मे भवतु।
सर्वविघ्ना अपसरन्तु स्वाहा ध्वजारोपणमन्त्रोऽयम् ॥१९॥

इति श्रीसाम्बपुराणे ध्वजारोपणं नाम त्रयस्त्रिंशत्तमोऽध्यायः

हे भगवन्! ईश्वर! आईये। ध्वजारोहण हो रहा है। आप वायु के साथ विचरण करें। आप के श्रीकर में लक्ष्मी का वास है। हे शत्रुध्वंसकारिन्! पक्षिगण के आश्रय देवतागण! आप नित्य सन्निहित हों। मुझे शान्ति तथा मंगल प्राप्त हो, समस्त विघ्न दूरीभूत हो जायँ। स्वाहा! यह ध्वजारोहण मन्त्र है॥१९॥

श्रीसाम्ब पुराणान्तर्गत ध्वजारोपण नामक त्रयस्त्रिंश अध्याय समाप्त

चतुस्त्रिंशत्तमोऽध्यायः

(देवयात्रा)

वसिष्ठ उवाच
अथ संवत्सरे पूर्णे स्थापितस्य दिवस्पतेः।
साम्बः पप्रच्छ भूयोऽपि नारदं चर्षिसत्तमम् ॥१॥
वशिष्ठदेव कहते हैं—सूर्यदेव के मन्दिर-स्थापना का एक-वर्ष पूर्ण हो जाने पर साम्ब ने ऋषिश्रेष्ठ नारद से कहा॥१॥

साम्ब उवाच
स्थापितस्य सहस्रांशोः पूर्णे संवत्सरे पुनः।
कथं सांवत्सरी पूजा कर्तव्या चर्षिसत्तम! ॥२॥
साम्ब कहते हैं—हे महर्षि! सहस्र किरण सूर्यदेव का वर्ष पूर्ण हो गया। अब किस प्रकार से सांवत्सरी पूजा करनी होगा, कहिये॥२॥

नारद उवाच
यथोक्तेन विधानेन प्रतिमास्थापने कृते।
संवत्सरे ततः पूर्णे स्नानकर्म विधानवित् ॥३॥
तीर्थोदकमुपानीय ह्यन्यच्चापि जलं शुचिः।
पूर्वोक्तेन विधानेन प्रतिमां स्नापयेद् बुधः ॥४॥
नारद कहते हैं—प्रतिमा-स्थापना काल में जैसा विधान कहा गया है, संवत्सर पूर्ण होने पर स्नानकर्म के विधानज्ञ विज्ञ व्यक्ति तीर्थजल तथा अन्य पवित्र जल लाकर पूर्वोक्त विधानानुसार प्रतिमा को स्नान करायें॥३-४॥

जपेच्च तीर्थनामानि मनसा संस्मरेत्ततः।
पुष्करं नैमिषं चैव कुरुक्षेत्रं पृथूदकम् ॥५॥
गंगा सरस्वती सिन्धुश्चंद्रभागा च नर्मदा।
पयोष्णी यमुना ताम्रा क्षिप्रा वेत्रवती तथा ॥६॥
सरितः सागराश्चैव सान्निध्यं कल्पयन्तु वै।
एवं स्नानविधिं कृत्वा ह्यर्चयित्वा प्रणम्य च ॥७॥
धूपमर्घ्यञ्च दत्वा तु प्रतिमामधिवासयेत्।

चतुस्त्रिंशत्तमोऽध्यायः१६९

तीर्थों के नाम को लेते हुये मन ही मन स्मरण करे। पुष्कर, नैमिष, कुरुक्षेत्र, पृथूदक (कपालमोचन तीर्थ के कुछ दूर पर अवस्थित तीर्थविशेष का नाम), गंगा, सरस्वती, सिन्धु, चन्द्रभागा, नर्मदा, पयोष्णी, यमुना, ताम्रा, क्षिप्रा, वेत्रवती नदियों तथा सागरों का सम्मिलित नाम लेना चाहिये। उस जल से स्नान का विधान करके अर्चना एवं प्रणाम करके धूप एवं अर्घ्य देकर प्रतिमा का अधिवास करना होगा॥५-७॥

त्रिरात्रं सप्तरात्रं वा मासाद्धं मासमेव च॥८॥
अतोऽस्य कारयेद् यात्रां शान्तिहेतोर्जनस्य च।
रथेन दर्शनीयेन किङ्किणी-जालमालिना ॥९॥

जनगण की शान्ति हेतु तीन रात्रि, सात रात्रि अथवा आधा मास अथवा एक मास व्यापिनी किङ्किणी जालसमूह में दर्शनीय रथ से सूर्यदेव की यात्रा कराये॥८-९॥

प्रीणयित्वा द्विजान् सर्वान् दक्षिणाभोजनादिभिः।
रथस्थां प्रतिमां कृत्वा कुर्यात् स्थान-प्रदक्षिणम्॥१०॥

दक्षिणा, भोजन प्रभृति द्वारा ब्राह्मणों का सन्तोष विधान करके प्रतिमा को रथ पर स्थापित करके स्थान-प्रदक्षिणा करानी चाहिये॥१०॥

एवं वै क्रियमाणायां यात्रायां प्रतिवत्सरम्।
प्रजाश्च सुखमेधन्ते राजा जयति चाहितान् ॥११॥

इस प्रकार से प्रत्येक वत्सर में यात्रा करना चाहिये। इससे प्रजा सुखी रहती है और राजा शत्रुजित् हो जाता है॥११॥

नीरुजश्च जनः सर्वो गवां शान्तिर्भवेत्तथा।
कर्त्तारश्चापि यात्रायाः स्वर्गभाजो भवन्ति वै॥१२॥

सभी लोग नीरोगी होते हैं। गौ समूह को शान्ति मिलती है तथा यात्रा का विधान करने वाले भी स्वर्ग प्राप्त करते हैं॥१२॥

साम्ब उवाच

कथं सञ्चालयेद् भूयः स्थापितां प्रतिमां सकृत्।
एतत्तु वद विप्रर्षे सुमहान् संशयो हि मे॥१३॥

साम्ब कहते हैं—एक बार स्थापित की गयी प्रतिमा को कैसे चालित किया जाय? हे विप्रर्षि! यह कहिये। इस सम्बन्ध में मुझे महान् संशय है॥१३॥

नारद उवाच

पूर्वमेव सहस्त्रांशोर्यानहेतोर्महात्मनः।
संवत्सरस्यावयवैर्ब्रह्मणैः कल्पितो रथः॥१४॥

१७० श्रीसाम्बपुराणम्

सर्वेषां तु रथानां वै श्रेष्ठः स च रथः स्मृतः।
तं दृष्ट्वा तु ततस्त्वन्ये स्यन्दना विश्वकर्मणा ॥१५॥
कल्पिताः सर्वदेवानां सोमादीनामनेकशः।
वैवस्वतेन च ततो मनुनेक्ष्वाकवे पुनः ॥१६॥
रथो दत्तस्तु तेनापि मानुषेष्ववतारितः।
अतस्तु रथयानेन चालनं तु हितं रवेः ॥१७॥

नारद कहते हैं—महात्मा सूर्यदेव की सांवत्सरिक यात्रा के निमित्त ब्रह्मा ने पूर्व में रथ तैयार किया था। समस्त रथों में उसे श्रेष्ठ रथ कहा गया है। उसे देखकर विश्वकर्मा, चन्द्रमा प्रभृति ने अनेक रथ का निर्माण किया। उसके अनन्तर वैवस्वत मनु ने इक्ष्वाकु को रथ दिया। उससे मनुष्य लोक में रथ का प्रचलन हुआ। अतः रथयान से सूर्यदेव का चालन हितकर है॥१४-१७॥

तस्मान्न दुष्यते तेषां सवितुश्चालनं च यत्।
तस्माद्रथेन पर्येति भास्करः पृथिवीमिमाम् ॥१८॥
गच्छन्न दृश्यते चैव मण्डलं सवितुः सदा।
अदृश्यं चञ्चलं दृष्टं यस्माज्जाम्बवतीसुत ॥१९॥
तदेतां रथयात्रां तु दृष्ट्वा भानोर्मनीषिभिः।
अन्येषां चालनं नास्ति देवानां यदुनन्दन ॥२०॥

हे साम्ब! अतएव सूर्यप्रतिमा को (स्थापित स्थान से हटाकर) रथ पर बैठाकर यात्रा कराना दोषपूर्ण नहीं है। इसीलिये सूर्यदेव भी रथ पर बैठकर पृथ्वी का पर्यटन करते हैं। उनके गमन काल में (आकाश में) सर्वदा सूर्यमण्डल देखा जाता है। हे जाम्बवतीपुत्र साम्ब! जो अदृश्य अथवा चञ्चल है, वह दृष्ट होता है। इसी कारण मनीषीगण सूर्यदेव की रथयात्रा का विधान कहते हैं। हे यदुनन्दन! अन्य देवगण का चालन नहीं होता॥१८-२०॥

ब्रह्मविष्णुशिवादीनां स्थापितानां विधानतः।
तस्माद्रथेन देवस्य रवेर्यात्रा विधीयते ॥२१॥
प्रजानामिह शान्त्यर्थं प्रतिसंवत्सरं तथा।
काञ्चनो वाथ रौप्यो वा दृढदारुमयोऽपि वा ॥२२॥
दृढाक्षरथचक्रश्च रथः कार्यः सुयन्त्रितः।
तस्मिन् रथवरे श्रेष्ठे कल्पिते सुमनोहरे ॥२३॥

विधानपूर्वक स्थापित विष्णु, ब्रह्मा, शिवादि का चालन (यात्रा) विहित नहीं है। अतएव रथ पर सूर्यदेव की यात्रा का ही विधान है। प्रजागण की शान्ति के लिये प्रतिवर्ष स्वर्ण, रौप्य (चाँदी) अथवा मजबूत काष्ठ-निर्मित दृढ़ अक्ष तथा रथचक्रयुक्त रथ का निर्माण उचित है॥२१-२३॥

चतुस्त्रिंशत्तमोऽध्यायः १७१

आरोप्य प्रतिमां यत्नाद्यो जयेद्वाजिनः शुभान्।
हरिल्लक्षणसम्पन्नान् सुमुखा वशवर्तिनः ॥२४॥
कुङ्कुमेन समालब्धांश्चामरैश्च विभूषितान्।
सदश्वान् योजयित्वा तु रथाचार्यं प्रदापयेत् ॥२५॥

मनोहर श्रेष्ठ रथ निर्मित हो जाने पर उस पर यत्नपूर्वक (मन्दिर में स्थापित) सूर्य की प्रतिमा रक्खे। शुभ अश्वगण को उसमें जोते। हरित् वर्ण सुलक्षणयुत सुमुख तथा वशवर्ती अश्वों को नियुक्त करे। कुङ्कुम द्वारा लिप्त, चँवर से विभूषित सत् अश्वगण से युक्त रथ को रथचालक चलाये॥२४-२५॥

विधिवत् पूजयित्वा तु धूपमाल्यानुलेपनैः ।
आहारैर्विविधैश्चापि भोजयित्वा द्विजोत्तमान् ॥२६॥
सूर्यक्रतौ तु वितते एवमाहुर्मनीषिणः ।
यच्चिन्तयति भग्नाशः क्षुधया च प्रपीडितः ॥२७॥
अदाता हि पितॄंस्तेन स्वर्गस्थानपि पातयेत्।
यज्ञश्च दक्षिणाहीनः सवितुर्न प्रशस्यते ॥२८॥

उनका पूजन धूप-माला तथा अनुलेपन से यथाविधि करे तथा द्विजश्रेष्ठ गण को धूप-माल्यादि से सन्तुष्ट करके विविध आहार प्रदान करें। सूर्ययज्ञ आरम्भ करने पर मनीषी-गण यह कहते हैं कि यदि (द्विजगण की) आशा भङ्ग हो, यदि क्षुधा से पीड़ित हों, तब इसके दुष्फल से (पूजक के) पितरगण निम्नगामी होते हैं। सूर्य का दक्षिणारहित यज्ञ कभी भी प्रशंसित नहीं है॥२६-२८॥

तस्मान्नानाविधैः कामैर्भक्ष्यभोज्यान्नविस्तरैः ।
प्रीणयित्वा जनं सर्वमममुच्चारयेद्विधिम् ॥२९॥

अतएव नानाविध अभिलषित भक्ष्य, भोज्य तथा प्रचुर अन्न से जनगण का प्रीतिविधान करके निम्नांकित मन्त्र का उच्चारण करना चाहिये॥२९॥

बलिं गृह्णन्तु मे देवा आदित्या वसवस्तथा।
मरुतश्चाश्विनौ रुद्राः सुपर्णाः पन्नगा ग्रहाः ॥३०॥
असुरा यातुधानाश्च रथस्था देवताश्रयाः ।
दिक्पाला लोकपालाश्च ये च विघ्नविनायकाः ॥३१॥
जगतः स्वस्तिकुर्वाणास्तथा दिव्या महर्षयः ।
मा विघ्नो मा च मे पापं मा च मे परिपन्थिनः ॥३२॥
सौम्या भवन्तु तृप्ताश्च देवा भूतगणास्तथा ॥३३॥

१७२ श्रीसाम्बपुराणम्

हे देवगण! मेरा प्रदत्त उपहार-बलि-ग्रहण करिये। हे आदित्यगण! वसुगण, मरुद्गण, अश्विनीकुमारद्वय, रुद्रगण, (गरुड़ प्रभृति) पक्षीगण, सर्पगण, ग्रहगण, असुरगण, यातुधान गण, जो रथ में देवता का आश्रय लिये हैं, दिक्पाल गण, लोकपालगण, जो यात्रा के विघ्ननाशक हैं, इसी प्रकार जगत् के मंगलविधायक दिव्य ऋषिगण! मुझे कोई विघ्न न हो, कोई पाप न हो, हमारे परिपन्थी लोग सौम्य हों, देवगण तथा भूतगण तृप्त हों।।३०-३३।।

वामदेवैः पवित्रैश्च मानस्तोकरथन्तरैः ।
आकृष्णेन रजसेति ऋच एतामुदाहरेत् ॥३४॥
तत पुण्याहशब्देन कृतवादित्रनिस्वनः ।
रथापक्रमणं कुर्याद्वर्त्मना सुखमेधते ॥३५॥

तत्पश्चात् वामदेव पवित्र मानस्तोक तथा रथन्तर एवं ‘आ कृष्णेन रजसा’ इत्यादि ऋक् मन्त्रों का उच्चारण करना चाहिये। तत्पश्चात् पुण्याहशब्दों से वाद्य बजाकर रास्ते में रथयात्रा करे। इससे सुख बढते हैं।।३४-३५।।

पुरुषैश्चापि वोढव्यः सूर्यभक्तिसमन्वितैः ।
सुकृता ग्रहदानैश्च बलीवर्दैरथापि वा ॥३६॥
यथापर्वमुदानस्याद् विजने पथि गच्छतः ।
युगाक्ष-चक्रभङ्गो वा तथा नेयः शनैः शनैः ॥३७॥

रथ को सूर्य के प्रति भक्तिवान् लोगों द्वारा अथवा सांड द्वारा भी चालित किया जा सकता है। निर्जन पथ पर भी रथ निर्विघ्न चले, जिससे युगाक्ष तथा रथ की पहिया न टूटे, ऐसे धीरे-धीरे रथ को चालित करे।।३६-३७।।

रथभङ्गे द्विजभयं भग्नेऽक्षे क्षत्रियस्य च ।
तुलाभङ्गे तु वैश्यानां शम्याः शूद्रभयं भवेत् ॥३८॥

रथ भङ्ग होने पर ब्राह्मणों को भय, अक्ष (चक्का) टूटने पर क्षत्रियों को भय, तुला (ऊपर की लकड़ी) टूटने पर वैश्यों को भय तथा शम्या (युगकीलक) टूटने पर शूद्रों को भय होता है।।३८।।

युगभङ्गे त्वनावृष्टिः पीठभङ्गे प्रजाभयम् ।
परचक्रागमं विद्याच्चक्रभङ्गे रथस्य तु ॥३९॥
ध्वजस्य पतने चापि भयं नृणां विनिर्दिशेत् ।
प्रतिमां व्यङ्गतायान्तु राज्ञीमरणमादिशेत् ॥४०॥

रथ का युगभंग होने पर अनावृष्टि, पीठ-भंग होने पर प्रजागण को भय तथा चक्का टूटने पर शत्रुपक्ष के आने की सूचना समझनी चाहिये। ध्वजा गिरने पर जनता को भय तथा प्रतिमा का अंग-भंग होने पर रानी का मरण होता है।।३९-४०।।

चतुस्त्रिंशत्तमोऽध्यायः १७३

पर्यस्ते सुरथे वापि सर्वजानपदे भयम्।
उत्पन्नेष्वेवमाद्येषु ह्युत्पातेष्वशुभेषु च॥४१॥
बलिकर्म ततः कुर्याच्छान्तिहोमं तथैव च।
ब्राह्मणान् भोजयेद्यस्तु भूयो दद्याच्च दक्षिणाम्॥४२॥

रथ के खण्डित होने से समस्त जनपद के लिये भय की सूचना होती है। ऐसा अशुभ उत्पात होने पर बलिकर्म एवं शान्तिहोम करना कर्त्तव्य है। इसमें ब्राह्मणों को भोजनोपरान्त दक्षिणा भी देनी चाहिये।।४१-४२।।

पूर्वोत्तरे दिशोभागे रथस्याग्निं प्रकल्पयेत्।
समिद्भिस्तु घृताक्ताभिर्होमयेज्जातवेदसम्॥४३॥

रथ के पूर्व तथा उत्तर दिशा में अग्नि को स्थापित करके घृत से लिप्त समिधा द्वारा जातवेदा अग्नि में हवन करना चाहिये।।४३।।

स्वाहाकारं वदन् सम्यग् देवताभ्यस्त्वनुक्रमात्।
ग्रहेभ्यश्च प्रजाभ्यश्च नामान्युद्दिश्य होमयेत्॥४४॥
प्रथमं चाग्नये स्वाहा स्वाहा सोमाय चैव हि।
स्वाहा प्रजापतये चैव दद्यादाहुतयः क्रमात्॥४५॥

'स्वाहा' शब्द का उच्चारण करके सम्यक्रूपेण यथाक्रम से देवताओं का, ग्रहगण का तथा प्रजा का नामोल्लेख करके होम करना चाहिये। प्रथमतः अग्नि के लिये (अग्नये स्वाहा) स्वाहा लगाकर होम करे। तदनन्तर चन्द्र तथा प्रजापति के लिये उनके नाम के साथ स्वाहा लगाकर आहुति देनी चाहिये (जैसे सोमाय स्वाहा, प्रजापतये स्वाहा)।।४४-४५।।

स्वस्त्यस्त्विह च विप्रेभ्यः स्वस्ति राज्ञे तथैव च।
गोभ्यः स्वस्ति प्रजाभ्यश्च जगतः शान्तिरस्तु वै॥४६॥
शन्नोऽस्तु द्विपदे नित्यं शन्नश्चास्तु चतुष्पदे।
शं प्रजाभ्यस्तथैवास्तु शं सदात्मनि चास्तु मे॥४७॥

ब्राह्मणों का मंगल हो, राजा का मंगल हो, गौ तथा प्रजा का मंगल हो, विश्व की शान्ति हो। हमारे द्विपद (दो पैर वाले मनुष्यों का) जनपद का नित्य मंगल हो, चतुष्पद प्राणियों का मंगल हो, प्रजा का मंगल हो, हमारी आत्मा का सर्वदा मंगल हो।।४६-४७।।

भूः शान्तिरस्तु देवेश भुवः शान्तिस्तथैव च।
स्वश्चैवास्तु तथा शान्तिः शान्तिः सर्वत्र वास्तुनः॥४८॥
त्वमेव जगतः स्रष्टा पोष्टा चैव त्वमेव हि।
प्रजाः पालय देवेश शान्तिं कुरु दिवस्पते॥४९॥

१७४ श्रीसाम्बपुराणम्

इदमन्यच्च वक्ष्यामि शान्तेः परमकारणम्।
यात्राकारणभूतस्य पुरुषस्य स्वजन्मनः ॥५०॥

हे देवेश! पृथ्वी पर शान्ति हो, भुवलोक में शान्ति हो, स्वर्गलोक में शान्ति हो, सर्वत्र सब कुछ में शान्ति हो। हे देवेश! आप जगत् के स्रष्टा-पालक हैं। आप ही प्रजा का पालन करते हैं। हे दिवाकर! आप शान्ति का विधान करिये। यह एवं और भी शान्ति का परम कारण कहूँगा। जो पुरुष सूर्ययात्रा का विधान करते हैं, उनके स्वयं का जन्म भी शान्तिकारक हो जाता है॥४८-५०॥

दुष्टान् ग्रहांश्च विज्ञाय ग्रहशान्तिं समाचरेत्।
प्रादेशमात्राः कर्तव्यास्समिधो वा प्रमाणतः।
अर्कमय्यस्तथाऽर्कस्य पालाशयः शशिनस्तथा ॥५१॥
खादिर्य्यश्चैव भौमाय ह्यपामार्ग्यो बुधाय च।
आश्वत्थ्याश्चैव जीवाय हौदुम्बर्य्यः सिताय च ॥५२॥
असिताय शमीमय्यो दूर्वाः कार्यास्तु राहवे।
केतवे तु कुशाः कार्या दक्षिणां चाप्यतः शृणु ॥५३॥

दुष्ट ग्रहादि को जानकर ग्रहशान्ति का अनुष्ठान करना चाहिये। इसमें प्रादेश (द्वादश अंगुलि, आधा हाथ) प्रमाण की समिधा (काष्ठ) छोड़े। सूर्य के लिये मदार की लकड़ी, चन्द्रमा के लिये पलाश की लकड़ी, मंगल के लिये खैर (कत्था) की लकड़ी, बुध के लिये अपामार्ग की लकड़ी, बृहस्पति के लिये पीपल की लकड़ी, शुक्र के लिये गूलर की लकड़ी, शनि के लिये शमी की लकड़ी, राहु के लिये दूर्वा, केतु के लिये कुश द्वारा होम करे। अब दक्षिण की बातें सुनो॥५१-५३॥

सूर्याय चोत्तमां धेनुं शंखं दद्यात्तथेन्दवे।
रक्तोर्णं चैव भौमाय काञ्चनं सोमसूनवे ॥५४॥
पीतवासांसि जीवाय शुक्राद्याश्वं सितं तथा।
शनैश्चराय गां नीलां राहवे खण्डपायसम् ॥५५॥
छागं तु केतवे दद्याच्छृण्वेषां भोजनानि च।

सूर्य के लिये उत्तम गौ, चन्द्र के लिये शङ्ख, मङ्गल के लिये लाल वस्त्र, बुध के लिये स्वर्ण, बृहस्पति के लिये पीला वस्त्र, शुक्र के लिये सफेद घोड़ा, शनि के लिये नीली गौ (श्याम गौ), राहु के लिये खाण्ड पायस तथा केतु के लिये बकरा प्रदान करना चाहिये। अब इनके लिये भोजन का वर्णन सुनो॥५४-५५॥

गुडौदनं तु सूर्याय सोमाय घृतपायसम् ॥५६॥
हविष्यमन्नं भौमाय क्षीरान्नं सोमसूनवे।
दध्योदनं तु जीवाय शुक्रायाथ घृताशनम् ॥५७॥

चतुस्त्रिंशत्तमोऽध्यायः १७५

तिलपिष्टं च माषं च सूर्यपुत्राय दापयेत्।
राहवे दापयेन्मांसं केतवे चित्रमोदनम् ॥५८॥

सूर्य-हेतु गुड़-मिश्रित अन्न, चन्द्र-हेतु घृत-पायस, मंगल के लिये हविष्यान्न, बुध-हेतु क्षीरान्न, बृहस्पति-हेतु दधियुक्त अन्न, शुक्र-हेतु घृतान्न, सूर्यपुत्र शनि-हेतु तिलपिष्ट तथा उर्द का बड़ा प्रदान करे। राहु के लिये मांस एवं केतु के लिये विचित्र अन्न प्रदान करना होगा॥५६-५८॥

यथा बाणप्रहाराणां वारणं कवचं स्मृतम्।
तथा दैवोपघातानां शान्तिर्भवति वारणम् ॥५९॥
अहिंसकस्य दान्तस्य धर्मार्जितधनस्य च।
नित्यं च नियमस्थस्य सदानुग्रहणा ग्रहाः ॥६०॥

जैसे बाण की चोट से बचने के लिये कवच पहना जाता है, वैसे ही दैव के उपघात से बचने हेतु शान्तिकर्म आवश्यक है। अहिंसा-परायण, विजितेन्द्रिय, धर्मपथ से धनोपार्जन करने वाले, नियमों का सदा पालन करने वाले के प्रति ग्रह सदैव अनुग्रह करने वाले होते हैं॥५९-६०॥

ग्रहा गावो नरेन्द्रश्च ब्राह्मणाश्च विशेषतः।
पूजिताः पूजयन्त्येते निर्दहन्त्यपमानिताः ॥६१॥
यथा समुत्थितं यन्त्रं यन्त्रेण प्रतिहन्यते।
तथा समुत्थितां पीडां ग्रहशांत्या प्रशामयेत् ॥६२॥

ग्रहगण, गौगण, राजगण तथा विशेष करके ब्राह्मणगण का पूजन करने से ये व्यक्ति की सम्मानता करते हैं, किन्तु अपमानित होने से व्यक्ति को निःशेष दग्ध कर देते हैं। जैसे समुत्थित यन्त्र को अन्य यन्त्र से बाधित किया जा सकता है, वैसे ही उत्थित पीड़ा ग्रहशान्ति से प्रशमित होती है॥६१-६२॥

यज्वनां सत्यवाक्यानां तथा नित्योपवासिनाम्।
जपहोमपराणाञ्च ग्रहपीडा प्रशाम्यति ॥६३॥
एवं कृत्वा प्रजाशान्तिं कृत्वा च स्वस्तिवाचनम्।
पुनः सूर्यरथं कृत्वा कुर्यात् प्रक्रमणं ततः ॥६४॥

जो याजक तथा सत्यवादी हैं, नित्य उपवासी हैं, जप-होम परायण हैं, उनकी ग्रहपीड़ा प्रशमित हो जाती है। ऐसे प्रजागण का शान्ति-विधान एवं स्वस्तिवाचन करके सूर्य के रथ की परिक्रमा करनी चाहिये॥६३-६४॥

मार्गशेषं ततो गत्वा नयेद् देवालयं ततः।
अवतार्य रथाच्चैनं स्थापयेन्मण्डले तथा ॥६५॥

चतुर्थेऽहनि कर्तव्यं ततो विश्रमणं रवेः।

१७६श्रीसाम्बपुराणम्

चतुर्थेऽहनि कर्तव्यं ततो विश्रमणं रवेः।
धूपमाल्योपहारैश्च पूजयेन्मण्डले पुनः॥६६॥

तत्पश्चात् परिक्रमा करके देवालय में (अर्थात् रथयात्रा समाप्ति के पश्चात् का कृत्य कहा जा रहा है) जाकर देवता को रथ से उतार कर (जहाँ से उन्हें यात्रार्थ ले गये थे) उस मण्डल में उसी प्रकार स्थापित करना चाहिये। चौथे दिन सूर्यदेव को विश्राम कराना उचित है (अर्थात् तीन दिन की यात्रा समाप्ति के अनन्तर चतुर्थ दिन), तदनन्तर धूप, मालादि उपहारों से मण्डल में पूजा करनी चाहिये॥६५-६६॥

एवं विधिं तु सूर्याय कुर्याद्यः कोऽपि मानवः।
सपरार्द्धं तु वर्षाणां सूर्यलोके महीयते॥६७॥
न कुले जायते तस्य दरिद्रो व्याधितोऽपि वा॥६८॥

सूर्य के लिये जो कोई भी ऐसे विधान का पालन करता है, वह परार्ध-पर्यन्त सूर्यलोक में सम्मानित किया जाता है। उसके वंश में कोई भी दरिद्र अथवा रोगी जन्म नहीं लेता॥६७-६८॥

अथ संवत्सरे पूर्णे भानोर्यात्रादिने यदि।
रथप्रक्रमणं तत्र कथञ्चिन्नु कृतं भवेत्॥६९॥
ततो द्वादशवर्षे तु कर्तव्यं नान्तरा पुनः।
शान्तिकर्मार्थ कृत्वा वै होतव्यं भूतिमिच्छता॥७०॥

तदनन्तर (दूसरा) संवत्सर पूर्ण होने पर यात्रा के दिन यदि किसी प्रकार से रथ चालन न किया गया हो तो १२ वर्ष पूर्ण होने पर ही रथचालन करना चाहिये। बीच में नहीं करना चाहिये। तत्पश्चात् समृद्धि की कामना से शान्तिकर्म करके हवन करना चाहिये॥६९-७०॥

शक्रध्वजस्य चाप्येवं यदि नोत्थापनं कृतम्।
ततो द्वादशके वर्षे कर्तव्यं नान्तरा पुनः॥७१॥
इति मुनिऋषभः सुताय विष्णोर्विधिमुपदिश्य तु नारदो जगाम।
स च दशशतदीधितेश्चकार प्रणिपतितात्तिर्हरस्य देवयात्राम्॥७२॥

इति श्रीसाम्बपुराणे देवयात्रा नाम चतुस्त्रिंशत्तमोऽध्यायः॥२१॥


इसी प्रकार यदि ध्वज का उत्थापन न किया गया हो तब १२ वर्ष बीतने पर ही करना होगा, पहले नहीं। ऐसा कृष्णपुत्र साम्ब को उपदेश देकर मुनिवर नारद चले गये और साम्ब ने भी सहस्र किरण प्रणतजन आर्त्तिनाशक सूर्यदेव की यात्रा का उत्सव किया॥७१-७२॥

श्रीसाम्बपुराणान्तर्गत देवयात्रा नामक चतुस्त्रिंश अध्याय समाप्त