साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 173, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वात्रिंशोऽध्यायः १६३
यावत् कीर्त्तिः पुण्यकृतो भानोः स्थाननिवेशनात्। तावत् स तु यदुश्रेष्ठ सूर्यलोके महीयते ॥५४॥
हे यदुश्रेष्ठ! सूर्य की प्रतिमा-स्थापन के फल से पुण्यवान् व्यक्ति की जब तक कीर्ति रहती है, तब तक वह व्यक्ति सूर्यलोक में सम्मानित होता है॥५४॥
स्थापयित्वा रविं भक्त्या विधिदृष्टेन कर्मणा। मासे मासे क्रतुफलं लभते नात्र संशयः ॥५५॥
भक्तिपूर्वक यथाविधि कर्म द्वारा सूर्य की स्थापना करके व्यक्ति प्रतिमास यज्ञ करने का फल-लाभ करता है; यह निसंदिग्ध है॥५५॥
एकहिनापि यद् भानोः पूजया प्राप्यते फलम्। न व्रतैरुपवासैर्वा दानैर्वा तदवाप्यते ॥५६॥
एक दिन के सूर्यपूजन से जो फल प्राप्त होता है, वह अनेक व्रत-उपवास तथा दान द्वारा भी नहीं मिल सकता॥५६॥
कृत्वा तु यन्महत् पापं यः पश्चात् सेवते रविम्। स याति सूर्यलोके तु नरो विगतकल्मषः ॥५७॥
यदि कोई महान् पाप करके भी सूर्य की सेवा करता है, तब वह व्यक्ति निष्पाप होकर सूर्यलोक में जाता है॥५७॥
न भवेद् दुष्टकाया च चन्द्रेण भूमिसन्निभा। स्वर्गे महीयते तावद् यावद् सूर्यस्य वेश्मनि ॥५८॥
वह व्यक्ति कभी भी दुष्ट देहधारी नहीं होता; अपितु चन्द्रमा तथा पृथ्वी के समान होकर सूर्यलोक में निवास करता है॥५८॥
इत्येवं सुख्यति तस्य यश्च भानोर्भूतानां स्थितिनिलयप्रसूतिहेतोः। श्रीभागी भवति नरो निकेतकारी कल्पानां वसति शतं च सूर्यलोके ॥५९॥
जो प्राणिगण की स्थिति, लय तथा जन्म के कारण सूर्यदेव के लिये ऐसा (प्रतिमा-स्थापनादि) सुख विधान करते हैं अर्थात् मन्दिर बनाते हैं, वे ऐश्वर्य का भोग करके शत कल्प-पर्यन्त सूर्यलोक में निवास करते हैं॥५९॥
यः प्रासादं रचयति पुमान् देवतानां प्रयत्नात् कीर्त्तिस्तस्य भवति विपुला वंशमार्गानुजाता। दिव्यान् कामान् लभति च सदा कामतश्चाप्रमेयां- स्तान् भुक्त्वासौ पुनरपि भवेच्चक्रवर्त्ती पृथिव्याम् ॥६०॥