भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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१६२ | श्रीसाम्बपुराणम्

तत्पश्चात् होम की आहुति-हेतु पूर्व से संगृहीत मोदक, उल्लापिका, अपूप, शष्कुली शीर्ष, कृशर, पायस मिश्रित करके सभी दिशाओं में उपहार प्रदान करना चाहिये तथा दुग्ध, मधु एवं घी से तर्पण करना चाहिये। इसके अनन्तर नाना स्तोत्रों से सूर्य की स्तुति करनी चाहिये।।४५-४६।।

विप्रेभ्यो याजकेभ्यश्च ततो दद्याच्च दक्षिणाम्।
सूर्यक्रतौ महापुण्ये तेन कुर्यांश्च दक्षिणाम्॥४७॥

तदनन्तर ब्राह्मण तथा याजकगण को दक्षिणा प्रदान करनी चाहिये। तत्पश्चात् महापुण्यकारी सूर्य यज्ञ की दक्षिणा भी प्रदान करनी चाहिये॥४७॥

स्थाप्यतेऽनेन विधिना मद्भक्तैः प्रतिमा तु या।
सा तु वृद्धिकरी नित्यं सान्निध्यं च सदा भवेत्॥४८॥

मेरे भक्त द्वारा इस विधान से जो प्रतिमा स्थापित की जाती है, वह नित्य वृद्धिकारक होती है और मेरा सान्निध्य प्रदान करती है॥४८॥

चतुर्णामपि वर्णानां स्थापयेद् यस्तु भास्करम्।
सोत्तीर्णः सर्वसंसारात् सूर्यलोके महीयते॥४९॥
पश्यन्ति मानवा ये तु आदित्यस्याधिवासनम्।
सप्तजन्म सु ते जाता नीरोगाः सम्भवन्ति हि॥५०॥

ब्राह्मणादि चार वर्णों में से जो कोई भी सूर्य की प्रतिमा स्थापित करता है, वह संसार से उत्तीर्ण होकर सूर्य लोक में निवास करता है। जो लोग सूर्य का मन्दिर देखते हैं, वे सात जन्मों तक नीरोग होकर स्थित रहते हैं॥४९-५०॥

त्रिरात्रं येऽप्युपासन्ते भानोर्यात्राधिवासितम्।
गन्धमाल्योपहारैश्च ते यान्ति परमां गतिम्॥५१॥

गन्ध, माला तथा उपहार द्वारा तीन रात्रि-पर्यन्त जो सूर्य के यात्रा अधिवास की उपासना करते हैं, उनको परमगति प्राप्त होती है॥५१॥

आत्मीयं परकीयं च प्रतिमास्थापनं रवेः।
यः पश्यति पुमान् भक्त्या स पापात् परिमुच्यते॥५२॥

अपने द्वारा की जा रही अथवा अन्य द्वारा की जा रही रवि-प्रतिमा की स्थापना को जो व्यक्ति भक्तिपूर्वक देखते हैं, वे पापमुक्त हो जाते हैं॥५२॥

दशानामश्वमेधानां वाजपेयशतस्य तु।
फलं प्राप्नोति पुरुषं प्रतिष्ठाप्य दिवाकरम्॥५३॥

सूर्य-प्रतिमा की प्रतिष्ठा करने मात्र से लोग दश अश्वमेध तथा १०० वाजपेय यज्ञ का फल पा जाते हैं॥५३॥