भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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पृष्ठ 174
१६४श्रीसाम्बपुराणम्

जो प्रयत्नपूर्वक देवता के गृह का निर्माण करते हैं, उनकी वंशपरम्परा की विपुल विपुल कीर्ति होती है। वे दिव्य भोगों का भोग करके पुनः (अगले जन्म में) पृथ्वी पर तेजस्वी राजा होते हैं।।६०।।

ये मानवा त्रिदशमूर्त्तिनिकेतनानि कुर्वन्ति साधुजनदृष्टिमनोहराणि।
तेषां मृतेऽप्यपरमार्थमये शरीरे लोके परिभ्रमति कीर्त्तिमयं शरीरम्।।६१।।

जो मानवगण साधुओं की दृष्टि को मनोहर लगने वाली देवप्रतिमा के मन्दिरों का निर्माण करते हैं, उनके पार्थिव शरीर का विनाश हो जाने पर भी उनका कीर्त्तिमय शरीर पृथ्वी पर परिभ्रमण करता रहता है (अर्थात् उनकी कीर्त्ति स्थायी हो जाती है)।।६१।।

इति मुनिन्र्ऋषभ सुताय विष्णोर्विधिमुपदिश्य च नारदो जगाम।
स च सवितुरिदं चकार भक्त्या भवनवरं भुवि शाश्वतं च नाम्ना।।६२।।

इति श्रीसाम्बपुराणे प्रतिमाकल्पो नाम द्वात्रिंशोऽध्यायः

इस प्रकार मुनिश्रेष्ठ नारद कृष्णपुत्र साम्ब को सूर्य-पूजाविधान का उपदेश करके चले गये। साम्ब ने भी अपने नाम से शाश्वत श्रेष्ठ सूर्यमन्दिर का निर्माण कराया।।६२।।

श्री साम्बपुराणोक्त प्रतिमाकल्प नामक द्वात्रिंश अध्याय समाप्त