साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 175, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रयस्त्रिंशोऽध्यायः
(ध्वजारोपणम्)
नारद उवाच
अतः परं प्रवक्ष्यामि ध्वजारोपणमुत्तमम्।
पुरा देवासुरे युद्धे योद्धुं देवैर्जयैप्सुभिः ॥१॥
नारद कहते हैं—अब मैं उत्तम ध्वजा-आरोहण की बातें बतलाता हूँ। पूर्वकाल में देवासुर युद्ध के आरम्भ में जयलाभ-हेतु देवगण ने इसका निर्माण किया था॥१॥
कृत्वान्युपरि चिह्नानि वाहनानि शुभानि तु।
लक्ष्मचिह्नध्वजः केतुरितिपर्य्यायनामभिः ॥२॥
ध्वज के ऊपर उन-उन देवताओं के वाहन का चिह्न अङ्कित किया गया। लक्ष्म, चिह्न, ध्वजा, केतु—ये सभी पर्यायवाची शब्द हैं॥२॥
कीर्तितस्य च तस्येह प्रमाणं गदतः शृणु।
ध्वजवंशस्तु कर्तव्यो ह्यविद्धऋजुरव्रणः ॥३॥
प्रासादेन स तुल्यस्तु ध्वजवंशप्रमाणतः।
पताका च ध्वजे कार्या ध्वजवंशे विलम्बिनी ॥४॥
ध्वजा का प्रमाण कहता हूँ, सुनो! ध्वज के लिये बांस लाना चाहिये, जो कि अविद्ध, सीधा तथा व्रणादि से रहित हो (अक्षत) ध्वजा का प्रमाण प्रासाद के तुल्य प्रमाण से लेकर पता का निर्माण करना होगा॥३-४॥
देवागारस्य शिखरान्तिकभागमपमार्जनी।
युक्तवस्त्रमयी चित्रा सघंटा सुमनोहरा ॥५॥
देवालय के शिखर के तीसरे भाग प्रमाण का चित्रित मनोहारी पताका बनानी चाहिये॥५॥
ध्वजाग्रे चापि कर्तव्यो देवतालिङ्गसूचकः।
काञ्चनो वाथ रौप्यो वा मणिरत्नमयोऽपि वा ॥६॥
रङ्गका लिखिता वापि तद्वाहनसमाकृतिः।
गरुत्मांस्तु ध्वजे विष्णोरीश्वरस्य ध्वजे वृषः ॥७॥