साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 166, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वात्रिंशोऽध्यायः
(प्रतिमाकल्पः)
वशिष्ठ उवाच
अतोऽधिवासनं कार्यं विधिदृष्टेन कर्मणा।
सामुद्रं तोयमाहृत्य जाह्नव्यं यामुनं तथा ॥१॥
सारस्वतं जलं पुण्यं चान्द्रभागं ससैन्धवम्।
पौष्करं च जलं श्रेष्ठं गिरिप्रस्रवणोदकम् ॥२॥
अन्यद्वा शुचि यत्तोयं नदीनदतटाकजम्।
यथाशक्त्या तदाहृत्य कलशैः काञ्चनादिभिः ॥३॥
वशिष्ठ देव कहते हैं—तदनन्तर विधिदृष्ट कर्म द्वारा मूर्ति का अधिवास करना चाहिये। एतदर्थ समुद्र जल लाये। उसी प्रकार से चन्द्रभागा, सरस्वती, यमुना, जाह्नवी तथा सिन्धु का पुण्यजल लाना चाहिये। पुष्कर तथा प्रस्रवण गिरि का भी जल श्रेष्ठ होता है एवं अन्यान्य नद, नदी तथा जलाशय-जात जो पवित्र जल है, उसे भी यथाशक्ति स्वर्णादि के कलश में लाना चाहिये॥१-३॥
ततस्तु मणिरत्नानि सर्वबीजौषधींस्तथा।
सुगन्धीनि च माल्यानि स्थलजान्यम्बुजानि च ॥४॥
चन्दनानि च मुख्यानि गन्धांश्च विविधान् वरान्।
ब्राह्मीं सुवर्चलां मुस्तां विष्णुक्रान्तां शतावरीम् ॥५॥
दूर्वां च शङ्खपुष्पीं च प्रियङ्गूं रजनीं वचाम्।
सम्भृत्य तांस्तु सम्भारान् नानाकर्मविधानवित् ॥६॥
वटाश्वत्थशिरीषाणां पल्लवैः कुशसंयुतैः।
कलशो परिविन्यस्तैर्देयं स्नानोदकं रवेः ॥७॥
तदनन्तर मणि, रत्न, सर्वबीजौषधि, सुगन्धि, माला, स्थलज तथा जलज पद्म, मुख्य चन्दन, विविध अष्टगन्ध, ब्राह्मी, सुवर्चला (अतसी, सूर्यमुखीपुष्प), मुक्ता (एक प्रकार का जड़विशेष), विष्णुक्रान्ता (अपराजिता मूल), शतावरी, दूर्वा, शङ्खपुष्पी, प्रियंगु (श्यामलतता, फलिनीलता, पीपल), रजनी, वच—इन सब नानाविध सम्भारों का संग्रह करके नाना कर्म में विधानज्ञ व्यक्ति वट, पीपल, शिरीष प्रभृति के पल्लव तथा कुश को कलश के ऊपर स्थापित करके रवि को स्नानार्थ जल प्रदान करे॥४-७॥