भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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पृष्ठ 16

६ श्रीसाम्बपुराणम्

वशिष्ठ उवाच

उद्यन् पश्यन् हि कुरुते जगद् वितिमिरं करैः ।
नातः परतरो देवः कश्चिदन्यो नराधिपः ॥७॥

वशिष्ठदेव कहते हैं—जो उदित होकर देखते-देखते ही अपने कर से (किरणों से) जगत् को वितिमिर (अन्धकाररहित) कर देते हैं, हे नराधिप! उनसे परतर कोई भी देवता नहीं है।।७।।

अनादिनिधनो ह्येष पुरुषः शाश्वतोऽव्ययः ।
तापयत्येष लोकांस्त्रीन् भ्रमन् रश्मिभिरुल्बणैः ॥८॥

यह पुरुष आदि-अन्तरहित है। शाश्वत तथा अव्यय है। ये भ्रमण करते-करते अपनी तीक्ष्ण रश्मियों से त्रिभुवन को तापित कर देते हैं।।८।।

सर्वदेवात्मको ह्येष तपसां चानुभावनः ।
सर्वस्य जगतो नाथः कर्मसाक्षी विभावसुः ॥९॥

ये ही सर्वदेवात्मक, तपस्या के अनुभावक, जगत् के नाथ, कर्म के साक्षी तथा प्रभा से युक्त हैं।।९।।

संक्षिपत्येष भूतानि तथा विसृजते पुनः ।
एको भाति तपत्येष कर्षते च गभस्तिभिः ॥१०॥
एष धाता विधाता च भूतानिर्भूतभावनः ।
न ह्येष क्षयमायाति नित्यमक्षयमण्डलः ॥११॥

ये ही समस्त प्राणियों का विनाश करते हैं और पुनः उनकी सृष्टि करते हैं। अकेले प्रकाशित होते हैं, ताप देते हैं तथा रश्मियों द्वारा आकर्षण करते हैं। ये ही धारणकर्त्ता तथा सृष्टिकर्त्ता हैं। समस्त प्राणियों के आदि तथा सभी के उत्पादक हैं। इनका कोई क्षय नहीं है। ये नित्य अक्षय (अविनश्वर) मण्डल में अवस्थित हैं।।१०-११।।

पितॄणां हि पिता ह्येष देवानामेष देवता ।
ध्रुवं स्थानं भजन्नेष यस्मान्न च्यवते पुनः ॥१२॥
सर्गकाले जगत् कृत्स्नमादित्यात् सम्प्रसूयते ।
प्रलये च तमे भाति आदित्यं दीप्ततेजसम् ॥१३॥

ये ही पितृगण के पिता एवं देवताओं के भी देवता हैं। ये ध्रुव (स्थिर) स्थान में अवस्थान करते हैं। उससे इनकी विच्युति नहीं होती। सृष्टिकाल में समस्त जगत् आदित्य से ही उत्पन्न होता है और प्रलय में यह दीप्ततेजा आदित्य में ही प्रवेश कर जाता है।।१२-१३।।