साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयोऽध्यायः ७
योगिनश्चान्ते सांख्याश्च देहं त्यक्त्वा पुरातनम्। संशुद्धास्तु विशन्त्यस्मिंस्तेजोराशौ दिवाकरे ॥१४॥
अन्तकाल में योगीगण तथा सांख्यगण पुरातन देह का त्याग करके सम्यक् शुद्ध होकर इस तेजोराशि दिवाकर में ही प्रविष्ट हो जाते हैं।।१४।।
अस्य रश्मिसहस्राणि शाखा इव विहङ्गमाः। वसन्त्राश्रित्य मुनयः ससिद्धा दैवतैः सह ॥१५॥
जैसे पक्षीगण शाखा का सहारा लेकर निवास करते हैं, उसी प्रकार इस सूर्यरश्मिरूपी शाखा का अवलम्बन लेकर सिद्ध मुनिगण देवताओं के साथ वास करते हैं।।१५।।
गृहस्था जनकाद्याश्च राजानो योगधार्मिकाः। बालखिल्यादयश्चैव ऋषयो ब्रह्मचारिणः ॥१६॥ वानप्रस्थाश्च वर्णाद्या भिक्षुः पञ्चशिखस्तथा। योगमास्थाय ते सर्वे प्रविष्टाः सूर्यमण्डले ॥१७॥
गृहस्थ, जनकादि योगधर्माश्रित राजागण, बालखिल्यादि मुनिगण, ऋषिगण, ब्रह्म-चारीगण, वानप्रस्थावलम्बीगण, वर्णश्रेष्ठ ब्राह्मणगण, पञ्चशिख (मुनिगण) तथा संन्यासी गण—सभी योग का अवलम्बन लेकर सूर्यमण्डल में ही प्रविष्ट होते हैं।।१६-१७।।
विशेष—पञ्चशिख = कपिल के शिष्य आसुरि तथा उनकी पत्नी कपिला ने एक बालक को तत्त्वज्ञानोपदेश दिया था। यही बालक पञ्चशिख कहलाया। इसने २२ सूत्रात्मक तत्त्वमास ग्रन्थ से षष्टितन्त्र का प्रणयन किया था।
शुको व्यासात्मजः श्रीमान् योगधर्ममवाप्य सः। आदित्यकिरणान् पीत्वा ह्यपुनर्भवमास्थितः ॥१८॥
व्यासपुत्र शुकदेव ने योगधर्म का अवलम्बन करके सूर्यकिरण का पान करते हुये अपुनर्भव (जिससे पुनरागमन न हो, ऐसा मोक्ष) प्राप्त किया था।।१८।।
शब्दमात्रश्रुतिमुखा ब्रह्मविष्णुशिवादयः। प्रत्यक्षोऽयं परो देवः सूर्यस्तिमिरनाशनः ॥१९॥ तस्मादन्यत्र भक्तिर्हि मा कार्या शुभमिच्छता। दृष्टेन बाध्यते यस्माददृष्टं नित्यमेव हि ॥२०॥ त्वयातः सततं राजन्नभ्यर्च्यो भगवान् रविः। स हि माता पिता चैव कृत्स्नस्य जगतो गुरुः ॥२१॥
इति श्रीसाम्बपुराणे आदित्यमहिमा नाम द्वितीयोऽध्यायः