साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 202, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टत्रिंशत्तमोऽध्यायः
(देवपूजादिफलम्)
वसिष्ठ उवाच
तत्तेहं वर्णयिष्यामि साम्बेन च यथा पुनः।
नारदः परमोदारः पृष्टोऽभूत् संशयो महान् ॥१॥
वशिष्ठ ऋषि कहते हैं—अब मैं तुमसे जो वर्णन करूँगा, उसे साम्ब ने उदार प्रकृति वाले नारद से पूछा था॥१॥
साम्ब उवाच
श्रुता दारुपरीक्षा मे प्रतिमालक्षणं तथा।
देवयात्राविधानं च ह्यग्निकार्यविधिं तथा ॥२॥
अतः परं तु विप्रेन्द्र! प्रब्रूहि मम पृच्छतः।
देवपूजाफलं यच्च यच्च दानफलं भवेत् ॥३॥
प्रणिपाते नमस्कारे तथा चैव प्रदक्षिणे।
धूपदीपप्रदाने च सम्मार्जनविधौ च यत् ॥४॥
उपवासे च यत्प्रोक्तं तत्फलं नक्तभोजनम्।
अर्घ्यश्च कीदृशः प्रोक्तः कुत्र वा सम्प्रदीयते।
कथं च क्रियते भक्तिः कथं देवः प्रसीदति ॥५॥
भक्तिं श्रद्धां समाधिं च कथ्यमानां निबोध मे ॥६॥
साम्ब नारद से पूछते हैं—मैंने आपसे दारुपरीक्षा, प्रतिमालक्षण, देवयात्रा विधान तथा अग्निकार्य की बातें सुनी। हे विप्रश्रेष्ठ! अब मेरी जिज्ञासा है कि देवपूजा का फल तथा दानकार्य का फल, प्रणिपात, नमस्कार, प्रदक्षिणा, धूप-दीप दान, मन्दिर में मार्जन विधि का फल, उपवास, रात्रिभोजन (दिन में केवल एक बार भोजन) का जो फल है, उसे कहिये। अर्घ्य किसे कहते हैं, कहाँ वस्त्र चढ़ाना पड़ता है, भक्ति कैसे की जाती है तथा देवता कैसे प्रसन्न होते हैं? साथ ही भक्ति-श्रद्धा तथा समाधि के भी सम्बन्ध में कहने की कृपा कीजिये॥२-६॥
नारद उवाच
मनसो भावना भक्तिरिच्छा श्रद्धा च कथ्यते।
ध्यानं समाधिरित्युक्तं शृणु भक्तिविकल्पनाम् ॥७॥