साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 203, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टत्रिंशत्तमोऽध्यायः १९३
तत् कथायां रमेद्यस्तु स वै भक्तः सनातनः ।
नित्यं तु तन्मनाश्चैव देवपूजारतः सदा ॥८॥
तत्कर्मकृद् भवेद्यस्तु स वै भक्तः सनातनः ।
देवार्थं क्रियमाणानि यः कर्माण्यनुमन्यते ॥९॥
कीर्त्तनाद्वाष्परोमाञ्चीः स वै भक्ततरो नरः ।
नाभ्यसूयेच्च तद्भक्तं न वन्द्या चान्यदेवता ॥१०॥
नारद कहते हैं—भक्ति, श्रद्धा तथा समाधि का प्रसङ्ग कहता हूँ, सुनो। मन की भावना ही भक्ति है, इच्छा ही श्रद्धा है तथा ध्यान को समाधि कहते हैं। अब भक्त की बात कहता हूँ। सूर्यदेव भगवान् की बात से जो आनन्द लाभ करते हैं, वे ही सत्य भक्त हैं। वे नित्य भगवान् को मन अर्पित करते हैं तथा सर्वदा देवपूजा में रत रहते हैं। जो निरन्तर भगवान् का कर्म करते हैं, वे हैं सनातन भक्त। वे देवता के निमित्त क्रियमाण कर्मों का अनुमोदन करते हैं। भगवान् का कीर्तन करने में जिन्हें रोमाञ्च होता है तथा शरीर से वाष्प-जैसा निकलने लगता है, वे हैं भक्ततर व्यक्ति। वे अन्य भक्तों से कोई असूया नहीं करते। अन्य देवों की आराधना भी नहीं करते॥७-१०॥
आदित्यव्रतधारी च स वै भक्ततरो नरः ।
एवंविधा क्रिया भक्तिः सदा कार्या विजानता ॥११॥
गच्छंस्तिष्ठन् स्वपन् जिघ्रन्नश्नंश्च निमिषंस्तथा ।
यः स्मरेद् भास्करं नित्यं स वै भक्ततरो नरः ॥१२॥
भक्त्या समाधिना चैव शुद्धेन मनसा तथा ।
क्रियते नियमो यस्तु दानं वा यत्प्रदीयते ॥१३॥
प्रतिगृह्णन्ति तद्देवा मनुष्याः पितरस्तथा ।
पत्रं पुष्पं फलं तोयं भक्त्या यत्समुपाहृतम् ॥१४॥
जो आदित्य का व्रतधारण करते हैं, वे ही हैं भक्तश्रेष्ठ! ऐसा जानकर भक्ति-विधान करना उचित है। चलते-फिरते, बैठे हुये, निद्रा के समय, निःश्वास लेते हुये, भोजन करते-करते, पलके झपकाते जो नित्य भास्कर का स्मरण करते हैं, वे हैं श्रेष्ठ भक्त। भक्ति से, समाधि से, शुद्ध मन से जो नियमपालन तथा दान करते हैं, उसे देवगण-मनुष्यगण तथा पितृगण ग्रहण करते हैं। पत्र-पुष्प-फल-जल जो कुछ भी श्रद्धा से दिया जाय, वे उसे स्वीकार करते हैं॥११-१४॥
प्रतिगृह्णन्ति तद्देवा नास्तिकान् वर्ज्जयन्ति च ।
भावशुद्धिः प्रयोक्तव्या नियमाचारसंयुता ॥१५॥
भावशुद्ध्या कृतं यच्च तत्सर्वं सफलं भवेत् ।
स्तुतिजाप्योपहारेण पूजया च विवस्वतः ॥१६॥
साम्ब०—१३