भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

पृष्ठ 340, कुल 424 में से

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पृष्ठ 340

षष्टितमोऽध्यायः

(सोमसूत्रम्)

ध्यातव्य एष यत्लाद्यः सेवते ह्यखिलं जगत्।
आहावहोहवाभवेचारिणि परमशक्तिरात्मातन्त्र इति स्थिते ॥१॥

जो इस वस्तु को धारण कर सकते हैं, वे समस्त जगत् की सेवा करते हैं। 'आहा अहो ह वा भवे चारिणि' परमशक्ति आत्मा है—यह तन्त्र है।

ॐ अं ॐ उं व्योमव्यापिने। अनुषङ्गेण सप्तानां यथासंख्येयन संपुटः। पादांतस्थ-बीजाख्या योनयः। ॐ अं व्योमव्यापिने ॐ इं आं व्योम। ॐ आं ईं ॐ व्योमव्यापिने भूतिवितर चुम्ब चुम्ब। वर्णायाः प्रभृतिः स्यान्मयोक्ता विस्तरतः॥२॥

ऊपर मूल में लिखे ‘ॐ अं’ से लेकर ‘भूतिवितर चुम्ब चुम्ब’ मन्त्र से व्योमव्यापी परमात्मा का ध्यान करे। अनुषङ्ग में सात यथासंख्य सम्पुट होगा। पाद के अन्तस्थ बीजादि योनि है। ‘ॐ अं व्योमव्यापिने’ इत्यादि मूल में अंकित मन्त्रों का विस्तार से वर्णन करता हूँ॥२॥

कालात्मनः प्रसूतिन्ते मन्त्रराजस्य मुक्त्यर्थं वक्ष्यन्तेऽथो यथाशास्त्रविनिश्चयः।
चक्रं त्रिनाभ्यं तत् सर्वं संवत्सरमिति प्रभुः ॥३॥
द्वादशारं तु तन्मनसो प्रत्ययश्चार्द्धमासिकः।
त्रीणि षष्टिशतान्याहुरहोरात्राणि संकरः ॥४॥
कला मुहूर्ता दण्डाश्च निमिषास्तु प्रतिष्ठिताः।
तदर्धंन्नातिविश्वात्माव्यञ्जयच्छब्देहिनाम् ॥५॥
सप्तकः पञ्चभिर्युक्तः परितो बिन्दुभिर्युतः।
पुनः षोडशभिर्नद्धा त्रिनाभीत्युच्यते बुधैः ॥६॥

कालात्मा के प्रसूति को आपके मन्त्रराज को मुक्ति के लिये यथाशास्त्र मैं कहता हूँ। चक्र-त्रिनाभि-पर्यन्त ये सभी संवत्सर हैं। ये प्रभु हैं। द्वादशार है—उनका मन। प्रत्यय है—अर्धमासिक तीन षष्टिशत अहोरात्र। कला, मुहूर्त, दण्ड, निमेष प्रतिष्ठित हैं। वे वर्धित होकर अतिविश्वात्मा शब्ददेहियों का प्रकाशन करते हैं। जो पाँच सप्तक से युक्त, चारो ओर बिन्दुओं के साथ मिलित, पुनः १६ के साथ बद्ध हुआ। उसे पण्डितगण त्रिनाभि कहते हैं॥३-६॥