भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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पृष्ठ 341

षष्टितमोऽध्यायः ३२७

द्वितीयं सप्तभिः प्रोक्तं परं यच्च प्रभाषते। नाभिगर्भे स्थितं सप्तयोनिविष्टभ्यसूचिकाम् ॥७॥ त्रिशतं नवभिः षट्कं वर्णास्ते स्वके स्थिताः। ग्रहनक्षत्रगर्भान्ता योनिविष्टभ्यपूर्विकाम् ॥८॥ त्रिशतं नवति त्रीणि गणना कीर्त्यतेऽधुना। आरेषु शब्दाः पर्याप्तास्तेषु विंशत्प्रतिष्ठिताः ॥९॥ चतुर्विंशतिसंख्याका वर्द्धयंस्तेषु चार्पिताः। भेदाः षोडशप्राप्तैषा द्विधा योनिश्च मध्यमा ॥१०॥

द्वितीय सात के साथ युक्त है। जिसे पर कहा गया, वह नाभिगर्भ में स्थित सप्त योनि को आवृत करके स्थित है। ३९६ वर्ण स्वर में स्थित हैं। वह ग्रह, नक्षत्र में स्थित है। वह योनि को आवृत करके स्थित है। यहाँ ३९३ की गई है और सब शब्दपर्यन्त रहते हैं। उनमें २० प्रतिष्ठित हैं। २४ संख्या वर्धित होकर उसमें अर्पित है। इसके १६ भेद हैं। इनके दो भाग में मध्यम योनि है॥७-१०॥

त्रिंशद्वैष्ट्याः प्रोक्ताः पञ्चानां द्विगुणा पदैः। विद्येश्वरप्रसूत्यर्थं लक्षमध्ये भजेत् तथा ॥११॥

कारिकापरशुशक्तिरेते सप्त हृदये सिद्धाः। ॐ आं ईं ऊं व्योमव्यापिने ॐ— एते पञ्चविद्येश्वरप्रस्तावे सिद्धाः। अ आ इ ई उ ऊ ऋ ॠ ऌ ॡ ए ऐ ओ औ अं अः एतेषां षोडशतत्त्वज्ञाने सिद्धाः। क ख ग घ ङ च छ ज झ ञ ट ठ ड ढ ण त थ द ध न प फ ब भ म य र ल व श ष स ह आकारासि ताः स्पर्शज्ञाने सिद्धाः। त्रयस्त्रिंशत्। आहवप्रतिमध्ये आसनं बोद्धव्यम्। एषा प्रधिप्रथमा सिद्धी। ऊं ऊं ऊं ऊं द्वादशेष्वपि बोद्धव्यः केवलं वर्णभेदः। पृथगेषा भवति अतः प्रसिद्धः प्रकृतकारणात्।

इति श्रीसाम्बपुराणे षष्टितमेऽध्याये ज्ञानोत्तरे सोमसूत्रे सप्तमं पटलम्

जो ३० तथा १२ कहा गया है, पञ्च भाग के द्विगुण पद द्वारा विद्येश्वर की उन्नति के लिये वह लक्ष में भजनीय है। कारिका पशु शक्ति है। यह सब सप्त हृदय में सिद्ध है। 'ॐ आं ईं ॐ व्योमव्यापिने ॐ' इससे पञ्च विश्वेश्वर प्रस्ताव सिद्ध होता है। 'अ' से 'अः' पर्यन्त १६ स्वर तत्त्वज्ञान में सिद्ध है। मूल में लिखित 'क' से लेकर 'ह' पर्यन्त आकार स्पर्श स्थान में सिद्ध हैं। ३३ आहवप्रति में आसन है। इससे प्रधिप्रथमा सिद्ध है। 'ॐ ॐ ॐ ॐ' इन चार को द्वादश में जानना चाहिये। यह केवल वर्णभेद है। यह पृथक् होता है, इसीलिये प्रकृत कारण में प्रसिद्ध है॥११॥

श्री साम्बपुराणोक्त साठवें अध्याय का ज्ञानोत्तर सोमसूत्र नामक सप्तम पटल समाप्त