भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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एकषष्टितमोऽध्यायः

(शरीरसाधनम्)

त्रिनाभ्यसन्तसम्भूतं बीजिनं प्रथमं पदम्।
प्रतिमध्येषु सर्वेषु स्थितं यत् परमं पदम्॥१॥
संपृक्तौ वायव्यैशान्यामोङ्कारेण प्रदीपितौ।
अकारान्तो मकारः स्याद्दिशि सर्वत्र निष्ठितः॥२॥
पूर्ववर्चवदीर्घान्तो नैर्ऋतिं दिशमाश्रितः।
इकारान्तः पकारोऽथ वायवीदिशमाश्रितः॥३॥
एकारान्तो नकारः स्यादैशान्याधिष्ठितो बहिः।
आद्यो वै दक्षिणस्तस्य द्वितीयस्तस्य दक्षिणः॥४॥

नाभि से उत्पन्न बीजधारी का प्रथम पद है। सबमें परमपद उपस्थित है। वायु तथा ईशान कोण में युक्त होकर ॐकार द्वारा प्रदीपित होता है। अकारान्त मकार सभी दिशाओं में अधिष्ठित है। पूर्ववर्च तथा दीर्घान्त नैर्ऋत्य दिशा का आश्रय लेकर स्थित है। इकारान्त पकार वायवी दिक् का आश्रय लेकर स्थित है। 'ए'कारान्त 'न'कार ईशान दिक् के बाहर स्थित है। आद्य निश्चित रूप दक्षिण है। द्वितीय उसके दक्षिण है॥१-४॥

पुनरष्टौ स्थितां बाह्यान्मकारस्तु द्वितीयके।
ऊकारो वा तथा रेफस्तृतीयं पद्ममाश्रितः॥५॥
आकाराद्दीपिताश्चैव पकारो नैर्ऋते पदे।
तस्योत्तरे पकारः स्याद्द्वितीयं पद्ममाश्रितः॥६॥

पुनः आठ बाहर हैं। मकार द्वितीय है। ऊकार अथवा रेफ तृतीय पद का आश्रय करके स्थित है। 'आ' से दीपित होकर मकार नैर्ऋत्य स्थान में अवस्थित है। उसके उत्तर में 'प'कार द्वितीय पद्म का आश्रय लेकर स्थित है॥५-६॥

बिन्दुरेवमधः पूर्वपक्षं च पूरयेच्छुभम्।
पूर्वपक्षो यथा ह्येष तद्वदेवोत्तरो भवेत्॥७॥
भेदस्त्वक्षरयोर्न स्यादक्षरे तस्य निश्चयः॥८॥

इस प्रकार निम्न बिन्दु शुभ पूर्वपक्ष का पूरण करके स्थित है। जिस प्रकार पूर्वपक्ष, उसी प्रकार उत्तर पक्ष होगा। अक्षर का (दोनों का) भेद नहीं होता, अक्षर में उसका निश्चय होता है॥७-८॥