भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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पृष्ठ 343

एकषष्टितमोऽध्यायः ३२९

अकचटतपयशवर्गाः। आवह अधस्ताद्व्योम अयमुपरिष्टात्। ॐ उ व य अ मा आ व य इ मा त न र च य अ मा उ व या अ म य ज र आ या अ य अ स अ र व आ व य—षोडशत्वं व्योमव्यापिने व्योम व्योमरूपाय सर्वव्यापि पूर्वपक्षः सिद्धः। प्रथमा अपि।

एनसावास्तु विज्ञेया मध्यमस्य विदिक् स्थिताः ।
इकारान्तो यशौ चापि तज्जारपुरुषः स्मृतौ ॥१९॥

'अ क च त ट प' वर्ण हैं। आवह नीचे से व्योम है। यह ऊपर से 'ॐ उ व' से लेकर 'आ व य' पर्यन्त मूल में अंकित वर्ण के षोडशत्व व्योमव्यापी तथा व्योमरूप पूर्व-पक्ष सिद्ध है। प्रथम भी वही है। मध्यम में विदिक् स्थित पापमुक्त पुरुष को जानना चाहिये। इकारान्त 'ष' तथा 'श'—ये जार पुरुष कहे गये हैं॥१९॥

ऐकारोऽथ स्वरश्चाद्यौ नकारो बिन्दुदीपितः ।
दीर्घान्तः प्रथमस्तस्य पश्चाद्यश्चायतश्च न ॥२०॥

'ऐ'कार तथा स्वर, आदि में बिन्दु-दीपित 'न'कार, उसके दीर्घान्त के पश्चात् जो है, वह है—आयत॥२०॥

थकारश्च यकारः स्यात्प्रवृत्तः स्वर एव च ।
नकार आयतश्चैव विसर्गः सर्वतो मतः ॥२१॥

थकार तथा यकार हैं—प्रकृत स्वर। नकार तथा आयत—इन सब स्थानों में विसर्ग जानना चाहिये॥२१॥

यहवा अधस्ताद् व्योम अयमुपरिष्टात्। भाषा ऐन इशाम्ब यं अ य अ आ ना आ थ अ य अ आ न षोडशो विसर्गः। व्यापिने शिवाय अनन्ताय अनाथाय अनाथो मधुमासः। प्रथमोऽरसिद्धाद्द्वितीया प्रधिः।

मूल में अंकित 'य ह व' से 'अ आ न' पर्यन्त षोडश विसर्गव्यापी, शिव, अनन्त, अनाथ—मधुमास है। प्रथम 'अ' सिद्ध है। द्वितीय प्रधि (चक्र का धार—नेमि) है। रेफान्तस्थ (जिसमें अन्त में रेफ है), प्रकृत्यन्त (प्रकृति के अन्त में) तकार दीर्घयुक्त है।

रेफास्तस्यः प्रकृत्यन्तस्तकारो दीर्घसंयुतः ।
पश्चात्स्याद् ह्रस्व उकारो वकारश्च तथा मतः ॥२२॥
याद्य शान्ताः शाश्वतः स्युर्यश्चैवोङ्कारदीपितः ।
ग ष ठः सस्खविहून्त इकारान्तो द्वितीयकः ॥२३॥

बाद में ह्रस्व है, उसी प्रकार उकार तथा वकार को भी जानना चाहिये। यादि (जिसके आदि में 'य' है), शान्त (जिसके अन्त में 'श' है)—यह नित्य है। जो ॐकार से दीपित