भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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३३० || श्रीसाम्बपुराणम् ||

है। ग-ष-ठ इत्यादि इकारान्त (जिसके अन्त में 'इ' है) द्वितीय है। यह द्वितीय प्रधि है। अ क च ट इत्यादि मूल में अंकित षोडशस्थित ध्रुव शाश्वत योगपीठ के लिये तृतीय प्रधि सिद्ध है॥१२-१३॥

अ क च ट त प य शान्ताः सर्वद्वितीयेनचाहवाराअधस्ताद् व्योम अयमुपरिष्टात् इ श र आ त अ य उ ध र आ व अ यः आशः अ श व आत अ ष उ य अ ग इ य अ ठ अ समा षोडशस्थिताय ध्रुवाय शाश्वताय योगपीठायः सा सिद्धा तृतीया प्रधिः।

साध्यस्थः स्यात् प्रकृत्यन्त आपस्तस्य तथा यतः ।
यन्नित्यं योगिने चेत्वे विज्ञेयाः स्युर्यथोक्तवत् ॥१४॥

साध्यस्थ होगा प्रकृत्यन्त एवं उसका जल भी वहीं होगा। उस नित्य वस्तु को योगी के लिये पूर्वोक्त के समान जानना चाहिये॥१४॥

आद्या यतो यकारः स्यान्नाहताश्वस्वरेण वः ।
अन्तरं च नमस्कारो विसर्गश्चान्त्यतः पदे ॥१५॥
विन्द्वन्तः पूर्वपक्षोत्र विसर्गश्चोत्तरा ध्रुवः ।
वसन्त एष विज्ञेयस्त्वग्रे ग्रीष्मादयः शुभाः ॥१६॥

जो आद्य 'य'कार है, वह आहत अश्वस्वर के समान नहीं है। मध्य में है—नमस्कार एवं अन्त पद में है—विसर्ग। विन्द्वन्त पूर्वपक्ष है। उत्तर में (बाद में) निश्चित विसर्ग है। इसे वसन्त ऋतु जानना चाहिये। पहले शुभ ग्रीष्मादि की बात हो चुकी है॥१५-१६॥

हवो अहवा अधस्ताद् व्योम अयमुपरिष्टात्। इशयः आस्त अ य इ न त प अ म उपज्ञा मम। आ ष य आ सा अ र च आ र अ य षोडशी विसर्गः। स्थिताय परित्यागिने ध्यानहाराय ॐ नमः सिद्धाः चतुर्थी प्रधिः; द्वितीयान्तः माधवो मासः। वसन्तर्तुः।

ह व अ ह व नीचे है। व्योम इसके ऊपर है। इ श य इत्यादि मूल में लिखित वर्ण षोडश विसर्ग हैं। 'स्थिताय' इत्यादि मूल में अंकित मन्त्र चतुर्थ प्रधि हैं। द्वितीयान्त है—माधव मास, वसन्त ऋतु।

विसर्गावांस्तु मः शुक्ले प्रकृत्यन्तः शावयुतः ।
स्वरवंतौ यशौ ज्ञेयौ रेफाद्यन्तौ पयौ स्मृतौ ।
भकारान्तो वकारस्तु प्रसवौ सर्वदैव हि ।
यश्चेञ्ज्ञानस्तथान्यश्च सृष्टो दिष्टः सबिन्दुकः ॥१७॥

अ क च त ट प य शा भवेदधस्ताद्व्योम अयमुपरिष्टात्। अ म इ य आ व अ प अ म अ र अ प र अं भ अ ऐ व ई श आ य अ य इ आ स अ ग इ ॐ नमो नमः सर्वप्रभवे ईशानाय असिद्धा पञ्चमी प्रधिः।