साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
३३० || श्रीसाम्बपुराणम् ||
है। ग-ष-ठ इत्यादि इकारान्त (जिसके अन्त में 'इ' है) द्वितीय है। यह द्वितीय प्रधि है। अ क च ट इत्यादि मूल में अंकित षोडशस्थित ध्रुव शाश्वत योगपीठ के लिये तृतीय प्रधि सिद्ध है॥१२-१३॥
अ क च ट त प य शान्ताः सर्वद्वितीयेनचाहवाराअधस्ताद् व्योम अयमुपरिष्टात् इ श र आ त अ य उ ध र आ व अ यः आशः अ श व आत अ ष उ य अ ग इ य अ ठ अ समा षोडशस्थिताय ध्रुवाय शाश्वताय योगपीठायः सा सिद्धा तृतीया प्रधिः।
साध्यस्थः स्यात् प्रकृत्यन्त आपस्तस्य तथा यतः ।
यन्नित्यं योगिने चेत्वे विज्ञेयाः स्युर्यथोक्तवत् ॥१४॥
साध्यस्थ होगा प्रकृत्यन्त एवं उसका जल भी वहीं होगा। उस नित्य वस्तु को योगी के लिये पूर्वोक्त के समान जानना चाहिये॥१४॥
आद्या यतो यकारः स्यान्नाहताश्वस्वरेण वः ।
अन्तरं च नमस्कारो विसर्गश्चान्त्यतः पदे ॥१५॥
विन्द्वन्तः पूर्वपक्षोत्र विसर्गश्चोत्तरा ध्रुवः ।
वसन्त एष विज्ञेयस्त्वग्रे ग्रीष्मादयः शुभाः ॥१६॥
जो आद्य 'य'कार है, वह आहत अश्वस्वर के समान नहीं है। मध्य में है—नमस्कार एवं अन्त पद में है—विसर्ग। विन्द्वन्त पूर्वपक्ष है। उत्तर में (बाद में) निश्चित विसर्ग है। इसे वसन्त ऋतु जानना चाहिये। पहले शुभ ग्रीष्मादि की बात हो चुकी है॥१५-१६॥
हवो अहवा अधस्ताद् व्योम अयमुपरिष्टात्। इशयः आस्त अ य इ न त प अ म उपज्ञा मम। आ ष य आ सा अ र च आ र अ य षोडशी विसर्गः। स्थिताय परित्यागिने ध्यानहाराय ॐ नमः सिद्धाः चतुर्थी प्रधिः; द्वितीयान्तः माधवो मासः। वसन्तर्तुः।
ह व अ ह व नीचे है। व्योम इसके ऊपर है। इ श य इत्यादि मूल में लिखित वर्ण षोडश विसर्ग हैं। 'स्थिताय' इत्यादि मूल में अंकित मन्त्र चतुर्थ प्रधि हैं। द्वितीयान्त है—माधव मास, वसन्त ऋतु।
विसर्गावांस्तु मः शुक्ले प्रकृत्यन्तः शावयुतः ।
स्वरवंतौ यशौ ज्ञेयौ रेफाद्यन्तौ पयौ स्मृतौ ।
भकारान्तो वकारस्तु प्रसवौ सर्वदैव हि ।
यश्चेञ्ज्ञानस्तथान्यश्च सृष्टो दिष्टः सबिन्दुकः ॥१७॥
अ क च त ट प य शा भवेदधस्ताद्व्योम अयमुपरिष्टात्। अ म इ य आ व अ प अ म अ र अ प र अं भ अ ऐ व ई श आ य अ य इ आ स अ ग इ ॐ नमो नमः सर्वप्रभवे ईशानाय असिद्धा पञ्चमी प्रधिः।
एकषष्टितमोऽध्यायः । ३३१
उकारो दीपितो यः स्याद्रेफादिन्द्रायुधो धनुः।
स्वरवन्तौ यतौ तेन युयुक्त्यनु तथा भवेत्॥१८॥
उकार दीपित मकार होगा, रेफ के पश्चात् इन्द्र का आयुध धनुष। ‘य’ तथा ‘त’ स्वरयुक्त होंगे (?)। ‘प’ तथा ‘च’ स्वरयुक्त तथा कादि रेफान्त-युक्त होंगे। उसके पश्चात् खद्योत तथा जैसे कहा गया हृदय जानना चाहिये।।१७-१८।।
स्वरवन्तौ पचौ कादिरेफान्तश्च यथा युतः।
पश्चात्खद्योतविज्ञेयो हृदयश्च यथोदितः॥१९॥
भवेदधस्ताद्व्योम अयमुपरिष्टात्। य म आ र द ध न अ यः अ त त उ प भः अ सः अ व आ क त र अ य अ उ ध अ र ऋ ह अ दः षोडशो विसर्गः। मूर्धाय तत्पुरुषाय व्यक्ताय अघोरहृदयाय च। अतस्तृतीयोरः शुक्नो मासः सिद्धा षष्ठी प्रधिः।
ऊपर व्योम है। ‘य म आ’ से लेकर ‘ह अ दः’ पर्यन्त (मूल में अंकित) १६ विसर्ग हैं। मस्तकरूप तत्पुरुष व्यक्त है तथा अघोर हृदय के उद्देश्य से तृतीय शुक्र (ज्येष्ठ) मास है। यह षष्ठी प्रधि सिद्ध है।
असौ ययतोऽन्यश्च ह्रस्वो यश्चायतो यतः।
मदमामध्यमेकाराद्गुकारेणैव दीपिताः॥२०॥
अदीर्घश्चैव दीर्घः स्यात्स्वरवन्तौ यशौ ततः।
दकारादियर्तुश्च स्याद्दीर्घो यस्तः स्वरेण च॥२१॥
उकारवान् मकारः स्याद् रेफादिस्तन्मनोन्नतः।
यद्देहान्ते च बिन्दुः स्यात्पक्षे शुक्ले तु पूजितः॥२२॥
यह ‘य य’ एवं अन्य ह्रस्व ‘ष’ आयत है। ‘म द म’, मध्यम ‘ऐ’ ‘गु’कार से दीपित है। अदीर्घ तथा दीर्घ होगा। तत्पश्चात् स्वरयुक्त ‘य’ तथा ‘श’, दकारादि ‘य’ एवं ‘तु’ दीर्घ होगा। ‘य’ तथा ‘त’ स्वरयुक्त होगा। ‘उ’कार-युक्त मकार होगा। रेफादि उसका मनोन्नत होगा। जिसके देह में बिन्दु है, वह शुक्ल पक्ष में पूजित होता है।।२०-२२।।
क च ट त प य शाः चारिणि अधस्ताद् व्योम अयमुपरिष्टात्। आ य अ ष आ च अ म य प द अ व व उ आ इ य अ स उ द य आ य त उ म अ र तः पा य वामदेवगुह्याय सद्योजाताय मूर्त्तये। असिद्धा सप्तमी प्रधिः।
‘क च ट त प’ इत्यादि मूल में अंकित अक्षर वामदेवगुह्य सद्योजात मूर्ति के उद्देश्य से कहे गये हैं। यह है सप्तमी प्रधि।
ऐकारान्तो यकारः स्यादक्षरं परमं पदम्।
नकारो मौन मश्च स्यात्ततो गाभ्यादुकारवान्॥२३॥
३३२ श्रीसाम्बपुराणम्
हीद्यायतश्च यस्तस्मादिकारान्तस्तथैव यत्। आवेद्भिद्धिः पुनर्यश्च गतकान्तः स उत्तमः॥२४॥
ऐकारान्त यकार अक्षय परम पद है। नकार मौन ‘म’ हो जाता है। तदनन्तर उकारयुक्त होगा। जो आयत है, वह रहता है विकारान्त। इस प्रकार पुनः गतकान्त उत्तम है। रेफयुक्त दो प़कारान्त उसके शेष स्वर हैं। ये दोनों ग्रीष्म मास हैं। अन्त में नमः शब्द कहना चाहिये॥२३-२४॥
पकारान्तौ सरेफौ द्वौ तदन्ते स्वर एव च। तावेतौ ग्रैष्मिकौ मासौ नमोऽन्तः सम्प्रवक्ष्यते॥२५॥
चारिणि अधस्ताद्व्योम अयमुपरिष्टात्। ऐं ष ॐ ङ अ न ॐ ङ म अ न अ म ङ ग मा ह य त ह गमाहयः ॐ ङ य स्त ओ र अः षोडशो विसर्गः। ॐ यः ॐ नमो नमो नमः गुह्यातिगुह्याय गोप्तेन शा चतुर्थो चः। शुचिर्मासो ग्रैष्मऋतुः सिद्धा अष्टमी प्रधिः।
चारिणी नीचे है। ऊपर है व्योम। मूल मे अंकित ‘ऐं ष ॐ’ से लेकर ‘ओ र अः’ तक षोडश विसर्ग है। ‘ॐ यः ॐ नमो नमो नमः’ गुह्य से अतिगुह्य रक्षक है ‘न श’ चतुर्थ च। यह है—ज्येष्ठ मास, ग्रीष्म ऋतु तथा अष्टमी प्रधि सिद्ध॥२५॥
हकारान्तो नकारः स्याद्वस्तुत आयतः स्वरः। स्वरवन्तौ यशौ तश्च रेफादीरोयुतश्च यः॥२६॥
हकारान्त नकार वास्तव में आयत स्वर है। स्वरवन्त ‘य श’ तथा ‘त’ है। रेफ के पश्चात् ‘ई र’ होगा ‘य’ से संयुक्त॥२६॥
गोदीर्घार्धः प्रकृत्यन्तः ककारस्तच्च दीर्घवान्। यकारः स्वरवान् जादि यश्चैवोकारदीपितः॥२७॥ हकारान्तस्तथाकारो रेफ उकारवांस्ततः। बिन्दुरित्यपदो ज्ञेयो नभस्यः पूर्वपक्षकृत्॥२८॥
गोदीर्घार्ध प्रकृत्यन्त तथा दीर्घयुक्त ककार, स्वरयुक्त यकार आदि तथा उकार दीपित यकार। हकारान्त ‘आ’कार, तदनन्तर ‘उ’कारयुक्त रेफ। बिन्दु को अपद जानना चाहिये। नभस्य (भाद्रमास) पूर्व पक्षकारक॥२७-२८॥
अ क च ट त प य शा आत्मतन्त्रे। अधस्ताद्व्योम अयमुपरिष्टात्। हे न अ घ आरी अ प अ सारव उप आ ग हे ध स क आत औ प उ जय हे त ऊ त निधनाय सर्वगोधकृता कठोऽतिरूपसिद्धा नवमी प्रधिः।
षोडशर्चपरो दीर्घः पकारः स्यात्पराश्रये स्वरो दीपितः ।
एकषष्टितमोऽध्यायः ३३३
‘अ क च त प य श’ आत्मतन्त्र है। निम्न में व्योम है, यह (आत्मतन्त्र) है ऊपर। मूल में अंकित ‘हे न अ’ से लेकर ‘हे त ऊ त’ यह है निधन का निमित्त अतिरूप सिद्ध नवमी प्रधि।
षोडशर्चपरो दीर्घः पकारः स्यात्पराश्रये स्वरो दीपितः । आद्यश्च चेत्यान्ना स्युश्च शुश्चैकारेण दीपितः ॥१२९॥ व्याख्यातो वै नमस्त्वेष यथावल्लक्षणान्वितः । नमश्चैवोच्यते भूयोः यथा वर्णो यथाक्रमम् ॥१३०॥
१६ अक्षरों के पश्चात् दीर्घ ‘प’कार है। पराश्रय में स्वर दीप्त है। ‘च शु च’ ऐकार द्वारा दीपित है। इस प्रकार उन लक्षणयुक्त ‘नमः’ शब्द व्याख्यात हुआ। अब वर्ण तथा क्रम के अनुसार नमः शब्द की व्याख्या होगी।।२९-३०।।
आत्मतन्त्र अधस्ताद्व्योम अयमुपरिष्टात्। आय अय अय अर आय अयन्तर अप अपय अत अनय एव विसर्गः षोडशः। अजाय परमेश्वरपराय अचेतन अपञ्चमो नभोमासः सिद्धा दशमी प्रधिः।
आत्मतन्त्र नीचे है। व्योम ऊपर है। ‘आय अय’ से लेकर ‘अपय अत अनय’ पर्यन्त षोडश विसर्ग है। अज परमेश्वर का अचेतन अपंचम नभो मास (श्रावण मास) दशमी प्रधि सिद्ध है।
स्वर एवास्तुत वनव्योम्नि स्यात्सानुनासिकः । पुनः सत्यश्च दीर्घश्च पश्चात्स्यादि नकारवान् ॥१३१॥ अयमेवमथाप्रमेय स्वरेफउकारदीपितः । पूर्ववच्च यकारः स्यात्तत्सर्वं पुनरेव तु ॥१३२॥
जो भी हो ‘त व न’ अनुनासिक के साथ व्योम में स्थित है। सत्य तथा दीर्घ है। बाद में ‘इ’ नकारयुक्त है। यही अनन्तर अप्रमेय है। स्वरेफ में ‘उ’कार दीपित है। पहले की तरह ‘म’कार होगा। वे सब (जो पहले कहे गये) पुनः होंगे।।३१-३२।।
अ क च ट त प य शान्ता इति स्थिते। अधस्ताद्व्योम अयमुपरिष्टात्। अव अन उवय इ यन आवय इयन अधर षोडशो विसर्गः। तेन व्योम्नि अव्योम्नि ऊ रूपिन्। अरूपं सिद्धा एकादशी प्रधिः।
अ क च त ट प इत्यादि के रहने के कारण नीचे व्योम है। ये ‘अकचट’ आदि उसके ऊपर हैं। ‘अव अन’ (मूलोक्त) इत्यादि षोडश विसर्ग है। उसके द्वारा व्योम तथा अव्योम में ‘अ ऊ’ रूपवान है। अरूप सिद्ध है एकादश प्रधि।
परेऽपिन्यश्च रेफान्तः स्थश्च स्यात्स्वरवांस्ततः । मकारः प्रथमाश्चेत्युस्तेजश्च विविसर्गवान् ॥१३३॥
रेफान्तस्थ-स्वरयुक्त होगा। मकार प्रथमा होने के कारण तेज विसर्गयुक्त होगा।।३३।।
३३४ श्रीसाम्बपुराणम्
यो योऽन्तस्थः प्रकृत्यन्तो विसर्गश्च पुनश्चतो। नभस्व एष व्याख्यातो वर्षाख्यश्च ऋतुस्त्वयम्। इनस्त्विये अधस्ताद्व्योम अयमुपरिष्टात्। इय अपर अथ अम एत अय एत अपद्रुत षोडशो विसर्गः। यिनः प्रथमः। तेजः ॐ ज्योतिः ऊं षष्ठो वः नभस्यो मासः। वर्षाख्य ऋतुः सिद्धा द्वादशी प्रधिः।
जो जो अन्तस्थ हैं तथा प्रकृति के अन्त में जो विसर्ग है, इन्हें भाद्रमास कहकर व्याख्या की जाती है। यह है—वर्षाकाल। ‘इन’ नीचे है, व्योम ऊपर है। ‘इय’ से लेकर ‘अपर’ (अपद्रुत) पर्यन्त षोडश विसर्ग हैं। ‘ॐ ज्योति’ से लेकर ‘षष्ठो वः’ पर्यन्त भाद्रमास है, वर्षा ऋतु। यह है सिद्ध द्वादशी प्रधि।
इष आदिगकारः स्याद्धूयाच्च तदनन्तरम्।
अश्श्लो लग्न ऐकारं आद्यः स्यात्तदनन्तरम्॥३४॥
धुकारश्च यआद्यश्च तस्मेशाद्यस्तथैव च।
अकाराद्दीपितो नः स्यादश्रैकारेण दीपितः॥३५॥
‘इ ष’ आदि गकार है। उसमें ‘अश्श्ल’ लग्न है। उसमें ऐकार आद्य होगा। धूकार एवं आद्य य, उसी तरह भस्मेशाद्य अकार के पश्चात् दीपित है एवं नकार ऐकार के द्वारा दीपित है॥३४-३५॥
क च ट त प य शा भूतिरधस्ताद्व्योम अयमुपरिष्टात्। अदूर अयम अ अगन अभव अम अ अभय सम अ आन य ऐ षोडशतत्त्वअरूपअनये अधूप अभस्म अनादियं सिद्धा त्रयोदशी प्रधिः।
‘क च ट त प य श’ भूति के निम्न है। व्योम ऊपर है। ‘अदूर अयम’ इत्यादि से लेकर ‘आन य ऐ’ षोडश तत्त्व हैं। ‘अरूप अनग्न अधूप अभस्म अनादिः’ त्रयोदश प्रधि सिद्ध है।
दीर्घा नकाराश्चत्वारो धूकाराश्च तथैव च।
ऊकारान्तः समो ज्ञेयः सोक्षरोभयदीपितः॥३६॥
पुनर्विसर्गरहितो ह्रस्वो वसु विसर्गवान्।
अक्षरश्शोथवक्रान्तो विसर्गेण विभूषितः॥३७॥
दीर्घ नकार तथा उसके धूकार को उकारान्त समान जानना चाहिये। वह उकार उभय दीपित है। अकार विसर्गरहित ‘र’ स्व वसु विसर्गयुक्त है। ‘श’ अक्षर यक्रान्त विसर्ग से विभूषित है॥३६-३७॥
भूरधस्ताद्व्योम अयमुपरिष्टात्। आन आन ऊध ऊध ऊं ऊं रभ ऊभ ऊं आवसः षोडशः। ना ना ना ना धू धू धू धू ऊं भुवः ऊं स्वः आसप्तमो रसः इषो मासः। सिद्धा चतुर्दशी प्रधिः।
एकषष्टितमोऽध्यायः ३३५
नीचे पृथ्वी। व्योम ऊपर। 'आन आन' से लेकर 'ॐ आवसः' पर्यन्त षोडश तत्त्व हैं। 'नाना नाना' से लेकर 'स्व आसप्तमो रसः' पर्यन्त आश्विन मास है। यह चतुर्दश प्रधि सिद्ध है।
ऊर्जस्योर्क आदिः स्यान्नद्रेकारेण दीपितः।
स्वरवन्तौ धनौ भूयो निधौ नः परिकीर्त्तितः॥३८॥
ओंकारान्तो नकारः स्याद्भादिर्भौवस्वरान्वितः।
प्रकृत्यासो मकारश्च शकारो बिन्दुरेव च॥३९॥
उर्ज का अर्क आदि होता है। नद् ऐकार द्वारा दीपित 'ध' तथा 'न' स्वरयुक्त है। और 'नि' तथा 'ध' यह दो 'न' कहकर कीर्तित हो गये। ॐकारान्त 'न'कार का 'भादि' 'भौव' स्वरयुक्त है। प्रकृति के साथ सोमकार तथा शकार बिन्दु है॥३८-३९॥
अ क च ट प यशाः महीरधस्ताद्व्योम अयमुपरिष्टात्। आ इ न अ धः अ म इ न अ ध अ न ल इ न अधः ॐ न अ द भ अ व इ श अवः अ स षोडशतत्त्वं अनिधननिधानोद्भवशिवशः। सिद्धा पञ्चदशी प्रधिः।
'अ क च ट त प य श' पृथ्वी के नीचे है। व्योम ऊपर है। मूलोक्त 'आ इ न' से लेकर 'अवः अ स' षोडश तत्त्व अनिधन निधानोद्भव शिव है। पञ्चदश प्रधि सिद्ध है।
रेफपूर्वो दकारः स्यात्परो स्वरेण मानवः।
आदिर्मध्याह्वकारेण मकारश्च स्वरान्वितः॥४०॥
पकारादीपितो हश्च साक्षाद्दीर्घैरमाततेः।
हकार अपतोदः स्यादेकारेण तु दीपितः॥४१॥
वः स्वः स्यात् स्वरवान् रश्च दकारोभयतस्तथा।
अन्तवतींशरेखा लक्षणतश्च शरद्ऋतुः॥४२॥
रेफपूर्वक दकार 'आ' के पश्चात् स्वरयुक्त मानव। आदि मध्याह्नकार के साथ स्वरयुक्त मकार। पकार दीपित 'ह' साक्षात् दीर्घयुक्त अम्। हकार एकार द्वारा दीपित। 'वः स्वः' एवं स्वरयुक्त 'र'। ऐसे ही उभयतः दकार अन्तवतीश रेखा-लक्षणार्थ यह है शरद् ऋतु॥४०-४२॥
महाधस्ताद्व्योम अयमुपरिष्टात्। अर च अप अर आम अत मनप असव अर अम आह यत अस आद्यः षोडशो विसर्गः। पूर्वपरआत्मने महेश्वर महादेवसमाः अष्टमोदीरः। ऊर्जो मासः। शरद्ऋतुः। असिद्धा षोडशी प्रधिः।
महा नीचे। व्योम ऊपर। 'अर च' से लेकर 'अस आद्यः' षोडश विसर्ग। (?)...… कीर्त्तिक मास। शरत् ऋतु। असिद्ध षोडश प्रधि।
३३६ श्रीसाम्बपुराणम्
एकारान्तः सहैवः स्यात्तरादिस्तु छान्तवः।
नमो दीर्घो हकारः स्यादेकारेण तु तत्सह ॥४३॥
स्वरवान्वै जकारोद्वयशोकारेण दीपितः।
ग आयतः प्रकृश्नावयकारस्तच्च पूर्ववत् ॥४४॥
वयव्यौमाधुकारेण दीपितौ तु सबिन्दुकौ।
विन्द्वन्तः शुक्लपक्षः स्याद्व्योमन्तः स्यादिरुच्यते ॥४५॥
ऐकारान्त के साथ 'इव' तरादि छान्तव। 'न' तथा 'म' दीर्घ। उसके साथ 'ए'कार युक्त होगा। हकार स्वरयुक्त होकर दो 'श' द्वारा दीपित इत्यादि॥४३-४५॥
(श्लोक ४४-४५ का अर्थ कुछ स्पष्ट नहीं है; अतः अनुवाद में असमर्थता है)
भूम्यधस्ताद्व्योम अयमुपरिष्टात्। ऐव असर अन अम आह ऐत अज आय आग इव अव ऊम षोडशतत्त्वं चेश्वरम्। हृातेजावायोगाधिपतये मुष्ण मां च असिद्धा सप्तदशी प्रधिः।
भूमि नीचे है। व्योम ऊपर है। 'ऐव असर' से लेकर 'इव अव ऊम' षोडश तत्त्व तथा ईश्वर हैं। 'गणाधिपति हमें मुक्त करो'। यह असिद्ध सप्तदश प्रधि है।
चकारादिर्मे शुक्लेऽथ स्याद्रान्तो यो मधौ ततः।
पुनरेतेशकारा फो दीर्घाभूयडवचतौ ॥४६॥
स्वरवन्तौ च तौ द्विस्तौ विसर्गश्चान्तिमे पदे।
सह ऐष समाख्यातस्सहस्यः सूर्यसंततः ॥४७॥
(इन दोनों का अर्थ स्पष्ट नहीं है; अतः आंशिक अर्थ प्रस्तुत है)
चकारादि 'म', रान्त 'म'................। पुनः ये 'शकार', 'फ' दीर्घ.........। स्वरयुक्त दो मकार। शेष विसर्ग। इसे 'ऐष' कहा है। यह है—पौष मास॥४६-४७॥
भूम्यधस्ताद्व्योम अयमुपरिष्टात्। अव अपर अम अल अपर अल अप अथ अश अर च अम अर अव षोडशो विसर्गः। वः प्रथमः ऊं सर्वः ऊं भवः ऊं अनवमोनः सहोमासः सिद्धाष्टादशी प्रधिः।
भूमि है निम्न, ऊपर है यह व्योम। 'अव अपर' से लेकर 'अम अर अव' षोडश विसर्ग। 'व' प्रथम, सर्व, भव, अनवमान। पौष मास। यह अष्टादशी प्रधि सिद्ध।
भं आदिर्व ओंकारान्तो दादिर्भः स्यात्स्वरेणवः।
शकारो वश्च रेफान्तो द्विरकारान्तो तस्तथा ॥४८॥
उकारवान् सश्च सोऽथ रेफान्तः पादशौ ततः।
रेफादीर्घः सदीर्घान्तः शुक्लोऽयं बिन्दुदीपितः ॥४९॥
एकषष्टितमोऽध्यायः ३३७
‘भ’ आदि, ओकारान्त ‘व’, दादि भ, स्वरयुक्त ‘व’, शकार, रेफान्त ‘व’ तथा द्विरकारान्त ‘त’। ऊकार युक्त ‘स’ एवं रेफान्त ‘ष’, रेफ के पश्चात् दीर्घयुक्त। दीर्घान्त इस शुक्ल बिन्दु के द्वारा दीपित है॥४८-४९॥
क च ट त प य शा इतरेतरव्योम अयमुपरिष्टात्। भ ॐ थ अदव अर अस अरव उभ अत उस अश्व अपर अद अस आरव अस षोडशत्वं भवोद्भवसर्वभूत-सुखप्रदसर्वसाध्यसिद्धः। एकोनविंशतिः प्रधिः।
क च ट त प य श इतरेतर हैं। इसके ऊपर है—व्योम। ‘भ ॐ थ’ से लेकर ‘अस आरव अस’ पर्यन्त षोडशत्व है। समस्त प्राणीगण का उद्भव, सर्व सुखप्रद तथा सकल साध्य का सिद्ध है। यह है उन्नीस प्रधि।
चरेद्व्रतं सुसिद्ध्यर्थं यथा वक्ष्यामि तन्त्रजम्।
प्राणायामसहस्रं तु बीजतत्त्वेन धारयेत् ॥५०॥
सम्यक् सिद्धि-हेतु अन्य व्रत का आचरण करे, जैसे मैं तन्त्र से कहूँगा। सहस्र प्राणायाम बीजतत्त्व के द्वारा धारण करे॥५०॥
पञ्चाग्निभिः शिवैरङ्गैः स्याद्हुतोऽनिलभक्षणः।
त्र्यहं त्र्यहं त्रिकं प्यस्तं जपेत्तापे जले क्रमात् ॥५१॥
पञ्चाग्नि (चारो ओर प्रज्ज्वलित अग्निकुण्ड हो तथा माथा के ऊपर तप्त सूर्य हो) साधन रूप मंगलमय अंग द्वारा वृत होकर वायु-भक्षण करके तीन दिन पञ्चाग्नि साधन करे तथा तीन दिन जल में जप करे॥५१॥
गुर्वाज्ञया भस्मसुप्स्यान्तर्धर्माहं पदमस्तके।
भुञ्जीताथोचितं भक्ष्यं योगस्यास्य सदा विधिः ॥५२॥
गुरुदेव के आदेश को लेकर भस्म लगाकर भस्म तथा (जल में ?) अन्तर्धर्मा होकर अहं पद मस्तक में रखकर यथोचित भोजन करे। यह इस योग की सर्वदा की विधि है॥५२॥
चरित्वैतद्व्रतं पुण्यं मुच्यते सर्वपातकैः।
पूज्यते सर्वसिद्धैश्च ज्ञानं चास्य प्रवर्तते ॥५३॥
ये भवन्ति हि वै दोषाः साधने दिव्यमानुषाः।
शरीरजास्तथा रागा नश्यन्ति तेन वै ध्रुवम् ॥५४॥
भूतव्रतान्तसिद्ध्यर्थमेकान्ते तु मनोरमे।
आत्मतुल्यसहायः स्याद्बीजनिर्दग्धकल्मषः ॥५५॥
इस पुण्य व्रत का आचरण करके सब पापों से मुक्ति मिलती है और समस्त सिद्धि के साथ पूजा होती है तथा ज्ञान भी प्रवर्तित होता है। साधन में जो दैव, मनुष्य, शरीरजात
३३८ श्रीसाम्बपुराणम्
तथा आसक्ति के कारण जो दोष उत्पन्न होता है, वह इस व्रत से निश्चित नष्ट हो जाता है। भूत व्रतान्त सिद्धि के लिये एकान्त मनोरम स्थान में अपने समान सहायक रखकर बीज मन्त्रों द्वारा पाप (कल्मष) निर्दग्ध कर दिया जा सकता है॥५३-५५॥
एकादशा निजव्याधिर्बोद्धव्याङ्गुष्ठमस्तके।
ललाटे तेन संपीड्य सर्वविघ्नान्निवारयेत्॥५६॥
एकादश व्याधि (नाश-हेतु) अंगुष्ठ को मस्तक (पर लाकर) जानकर उससे ललाट को दबाने से समस्त विघ्न शान्त हो जाते हैं॥५६॥
आहारार्थं च सर्वेषां चरेत्सम्यग्यथाक्रमम्।
वारुणे सलिलाहारं शुक्त्यजाक्षीरपोऽपि वा॥५७॥
शक्तस्य जपतस्तस्य विघ्नान्येतानि लक्षयेत्।
मेघानां स्तनितं विद्युद्वृष्टिक्षोभश्च सागरे॥५८॥
मत्स्यादयश्च दृश्यन्ते व्रते वारुणसंज्ञके।
कापिलं घृतमाग्नेये भुञ्जतो व्रतमाचरेत्॥५९॥
सबके आहारार्थ यथाक्रम से आचरण करे। जल में जल का पान करे अथवा चार तोला परिमाण बकरी के दुग्ध का पान करे। जप में समर्थ व्यक्ति इन विघ्नों को लक्ष्य करे—मेघ ध्वनि, विद्युत्, वृष्टि से सागर की क्षुब्धता (तूफान आदि)। वारुण नामक व्रत में मत्स्यादि। आग्नेय व्रत में कपिला गौ के दूध से घृत निकाल कर (उसका भोजन करके) व्रत का आचरण करे॥५७-५९॥
सर्वमादीप्यते तस्य शुक्लाद्धं च तथोदकम्।
वायव्येऽनिलभक्ष्यः स्याच्छ्वेताजाक्षीरभुग्यथा॥६०॥
विघ्नं पात्राशने पातो वातक्षोभश्च दारुणः।
आशोकं गोरसं पीत्वा व्रतमेतत्समाचरेत्॥६१॥
(अग्नि व्रत में) तदनन्तर कुछ दीप्त होकर तथा शुक्ल अर्घ्य का जल (ग्रहण करे)। वायुव्रत में वायुपान करे तथा श्वेत वर्ण की बकरी के दुग्ध का भक्षण करे। विघ्न परिलक्षित होते हैं—विद्युत्पात, दारुण वातक्षोभ। दुःख उपस्थित होने के पूर्व तक गाय का दुग्ध पान करे तथा व्रताचरण करे॥६०-६१॥
विघ्नं सर्गस्य सम्पातो ज्योतिषां पतनं तथा।
भूतानामिह सर्वेषामशक्तश्चरितुं व्रता॥६२॥
भूतयोनिव्रतं कुर्यादेषामन्यतमेन तु।
व्रतेन माससिद्धायामस्यां सिद्धा भवन्ति ते॥६३॥
हन्यादेतेन वै रोगान्दिव्यान्भौमान्स्वदेहजान्।
एतदेव व्रतङ्कुर्य्याच्छान्तिकर्मणि मन्त्रवित्॥६४॥
एकषष्टितमोऽध्यायः ३३९
सभी प्राणियों में व्रत आचरण में अशक्त व्यक्तियों को विघ्न परिलक्षित होता है—सृष्टि का विनाश, नक्षत्रादि का पतन। भूतयोनि व्रत करे। इन सबमें से किसी एक व्रत के आचरण द्वारा इसे करे। एक मास में व्रत द्वारा सिद्ध हो जाने पर सब (कामनायें) इससे सिद्ध हो जाती हैं। इस व्रत द्वारा दिव्य-भौम तथा निज देहजात रोगों का विनाश करे। मन्त्रज्ञ साधक शान्ति कर्मों में इन्हीं व्रत का पालन करे।।६२-६४।।
व्रतं वैवस्वतं कुर्वन् शाकाहारो भवेन्नरः।
साध्यादृषीन्वसूंश्चैव पश्येत्सर्वानशेषतः ।।६५।।
विघ्नप्रशमनं प्रोक्तं सर्वमन्त्रविधिस्त्वयम्।
मध्ये ध्यायञ्जपेन्मन्त्रन्तत्त्वस्य हृदयस्य च ।।६६।।
सूर्य के व्रत में शाकाहार करना चाहिये। साध्य-ऋषि वसुगण तथा सबको सर्वतोभाव से देखे। इन सब मन्त्रों का विधान विघ्ननाशार्थ कहा गया है। बीच में ध्यान करे। तत्त्व तथा हृदय मन्त्र का जप भी करे।।६५-६६।।
दृढासनः स्थिरमना जितवायुर्जितेन्द्रियः।
मुख्यां सिद्धिमवाप्नोति तत्त्ववाजप्रसूतिजाम् ।।६७।।
इति श्रीसाम्बपुराणे एकषष्टितमेऽध्याये ज्ञानोत्तरे शरीरसाधनमष्टमं पटलम्
•
दृढ़ासन, स्थिर मन, जितवायु तथा जितेन्द्रिय होकर तत्त्व तथा यज्ञ से मुख्य सिद्धि का लाभ करे।।६७।।
श्री साम्बपुराणोक्त इकसठवें अध्याय में ज्ञानोत्तर शरीर-साधन नामक अष्टम पटल समाप्त
•
द्विषष्टितमोऽध्यायः
(सर्वकार्यसिद्धिविधानम्)
सिद्धये सर्वकार्याणां विधानमभिधीयते।
सम्पुटानां यथा तत्त्वं कर्मणां सिद्धयेऽपि च ॥१॥
सकलीकृत्य देहं त्वं प्राणायामश्च योजयेत्।
शिवाख्यां परमाख्यां च योनिं हृन्नाभितस्तथा ॥२॥
वायुरग्नेरधस्ताच्च संहरन्सह पातकैः।
अन्तरे प्राणमायच्छेत्सद्यः सिध्यति योगवित् ॥३॥
ब्रह्मतत्त्वस्त्रिभिः शोध्यापद्य तेन शुभं भवेत्।
परस्यापि दहेन्मन्त्री ग्रामं नगरमेव च ॥४॥
समस्त कार्यसिद्धि-हेतु विधान तथा कर्मसिद्धि-हेतु सम्पुट के यथार्थ तत्त्व को कहा जा रहा है। अपनी देह को एकत्र (एकाग्र) करके प्राणायाम करे। शिवा एवं परमा योनि को हृदय तथा नाभि से, वायु को अग्नि के नीचे से पातक का संहार करे। अन्तर को प्राणयुक्त करने से योगी तत्काल सिद्धिलाभ करता है। ब्रह्मतत्त्व से तीन द्वारा (उपरोक्त तीन से) शोधन करने से अपना तथा अन्य का शुभ होता है। इसका मन्त्री (मननकारी साधक) ग्राम तथा नगर को भी दग्ध कर सकता है॥१-४॥
गृहं चापि दुराधर्षः भूतं चापि महाबलम्।
निहन्ति वै प्रयुक्तः सन् क्षणादग्निरिवेन्धनम् ॥५॥
व्याधिं चापि दुराबाधां तनुत्थां दैविकां तथा।
निहन्ति तत्र तूर्णं च दिवाकरव्रती नरः ॥६॥
दुर्धर्ष गृह तथा महाबलशाली भूत को (प्रयुक्त होने पर क्षणकाल में अग्नि जैसे काष्ठ को दग्ध करती है, वैसे) यह दग्ध कर देता है। सूर्यव्रतधारी नर देह के तथा दैव से दुराराध्य व्याधि का भी शीघ्र विनाश कर देता है॥५-६॥
बीजयोनिर्भवन्मध्ये पृथिव्याश्चारुणस्य च।
पूर्ववद् ध्यानयोगः स्यात्प्राणयोगस्तथैव च ॥७॥
तेषामध्ययने चैव ये पूर्वं चैव साधिताः।
शान्तिं चैतां प्रयुञ्जीत कृतकृत्यो भवेत्तदा ॥८॥
द्विषष्टितमोऽध्यायः ३४१
पृथ्वी तथा आरुण के मध्य बीजयोनि होगी एवं पूर्व के समान ध्यानयोग एवं प्राणयोग होगा। उनके अध्ययन के पूर्व जो साधित हुआ है, उसका शान्ति विधान करके वह कृतकृत्य हो जाता है॥७-८।।
द्रव्यापहरणो वापि न्यासनिर्यातनेऽपि वा।
नाशने चैव देवानां ग्रहोत्पादनकर्मणि ॥९॥
कुर्वन्नेतानि योगी स्याद्वायुरग्निमिवेन्धनम्।
परस्थानां च सर्वेषामपाहारः प्रयुज्यते ॥१०॥
द्रव्य का अपहरण, न्यास का निर्यातन, किंवा नाशन तथा देवताओं के ग्रहोत्पादन कर्म में इनका विधान करके योगी वायु के समान होता है अर्थात् प्रज्ज्वलित अग्नि के लिये जैसे वायु सहायक होती है, वैसे ही योगी इन कर्मों में सहायक हो जाता है। अन्य से इसको गोपित रखना होता है॥९-१०॥
एष संहरते सर्वं यत्किञ्चिज्जगतीगतम्।
आरूढः संशये युञ्जन्नान्यथा तु कदाचन ॥११॥
स तु होमस्तथाग्नौ तु यदा रोगेण युज्यते।
तत्क्षणाद्धन्ति तान् सर्वान् सरोगान् हन्ति योनिजान् ॥१२॥
स्थावरं जङ्गमं वापि कृत्रिमं चापि यद्विषम्।
क्षणान्नाशयति ह्येषः यदि सम्यक् प्रयुज्यते ॥१३॥
वे इस जगत् के सब कुछ का संहार कर सकते हैं। आरूढ़ योगी संशय उपस्थित होने पर ऐसा करते हैं, अन्यथा नहीं करते। रोग होने पर अग्नि में होम करे। ऐसा होने पर यह सब, विशेषकर योनिज समस्त रोग तत्काल विनष्ट हो जाते हैं। यदि सम्यक् रूप से प्रयोग किया जाय तब स्थावर, जंगम अथवा कृत्रिम विष भी तत्काल नष्ट हो जाता है॥११-१३॥
संक्रमेण तथा व्याधिर्विपरीतेन योजितः।
चिकित्सामन्त्रपूर्वेण क्रीडार्थमनुयोजयेत् ॥१४॥
ध्यायेत्तु वारुणे वायुं शांत्यर्थं शिवसम्पुटे।
वृष्टिं कारयते ह्येष भूतयोनिः सबीजकः ॥१५॥
षड्विधं च सृजत्यस्य भूतसंहारिणस्ततः।
वायुनावेष्टयेत्सर्वं स्तमितं स्याज्जगन्महत् ॥१६॥
संक्रामक व्याधि होने पर विपरीत भाव से युक्त करना होगा। मन्त्र से इसकी चिकित्सा होगी। उसे क्रीड़ार्थ युक्त करे। शान्ति-हेतु शिवसम्पुट वारुण में वायु का ध्यान करना चाहिये। ऐसा करने से वृष्टि होगी। यह है—बीज के साथ भूतयोनि॥१४-१६॥
३४२ श्रीसाम्बपुराणम्
अश्वानान्तु जपेन्मन्त्रं योगिनां च गतिं तथा।
निरुन्ध्याद्यद्यदीक्षेत व्रणव्याधिविषं च यत्॥१७॥
ध्यायँश्च होमयेन्नित्यं युक्तो मन्त्रार्चने नरः।
उद्घाटने च संहारे योज्यश्चापि दशात्मकः ॥१८॥
अश्व का मन्त्र जप करे। ऐसा करने से योगियों की गति तक का निरोध हो जाता है। यहाँ तक कि जो-जो देखा जायेगा, जो व्रण है, व्याधि अथवा विष है, सबका निरोध हो जायेगा। मन्त्र तथा अर्चन में लगा व्यक्ति ध्यान करके नित्य होम करे। उद्घाटन तथा संहार में भी ऐसे ही दशात्मक मन्त्र का प्रयोग करे।।१७-१८।।
सर्वत्र वेष्टनं कृत्वा ततः शान्तिं प्रयोजयेत्।
परमपुटमध्ये तु द्रव्यमन्त्रेण योजयेत्।
असन्देहेन सिद्ध्येत बद्ध्वा मन्त्रविभागशः ॥१९॥
इति श्रीसाम्बपुराणे ज्ञानोत्तरे द्विषष्टित्तमेऽध्याये नवमं पटलम्
सर्वत्र वेष्टन करे। तदनन्तर शान्ति प्रदान करे। परम पुट के मध्य में द्रव्य मन्त्र द्वारा युक्त करे। ऐसे मन्त्रविभाग से बन्धन करने पर निश्चय सिद्धि प्राप्त होती है।।१९।।
श्री साम्बपुराणोक्त सकल कार्यसिद्धि विधाननामक बासठवाँ अध्याय समाप्त
त्रिषष्टितमोऽध्यायः
साधकस्येह युक्तस्य व्याधिर्भवति दारुणः।
उपसर्गः समं तस्य चिकित्सास्य न दुष्यति ॥१॥
धातुरेको ग्रहो वापि कोष्ठे त्वध्यासितोऽपि वा।
स्मृत्वा यो मनसापायो मन्त्रकैर्न प्रशाम्यति ॥२॥
क्षेत्राच्चाण्डालसेनायाश्चाग्निहोत्रगृहातथा ।
तस्मादपञ्चतत्तूर्णं मासवृद्ध्यै प्रकल्पयेत् ॥३॥
क्षेत्राच्चाण्डालसेनाच्च तथा द्विजपरा अपि।
क्रमवृद्धं च तत्सर्वं बध्नीयान्मिश्रितं क्रमात् ॥४॥
साधन में प्रवृत्त साधक को दारुण व्याधि हो सकती है; साथ ही उपसर्ग भी परिलक्षित होते हैं। इनकी चिकित्सा करने में कोई दोष नहीं है। धातुज, किंवा ग्रहादि आक्रमण-जनित अथवा कोष्ठ में अध्यासित व्याधि, जो मनसा पाप (जनित) है, वह मन्त्र से भी प्रशमित नहीं होती। चण्डाल सेना के क्षेत्र से, किंवा अग्निहोत्री ब्राह्मण के घर से अपञ्च लाकर उसकी मासवृद्धि की व्यवस्था करनी चाहिये। क्षेत्र से तथा चण्डाल-सेना से द्विज-परायण व्यक्ति भी क्रमवृद्धि-हेतु जो सब मिश्रित करे, उसका क्रमश बन्धन करे।॥१-४॥
तिस्रः पोटलिकाः कार्याः सूतिकर्पटकेन च।
संमार्जनतटे चैव आरभेत चरोः क्रियाम् ॥५॥
अन्यजानां गृहस्थैश्च श्नपयेत्तण्डुलैश्च ताम्।
ध्यायन्वै पातकं घोरं सम्पुटं यदि दारुणम् ॥६॥
यावच्च श्रयते वह्नौ तावद्रागः प्रणश्यति।
खदिरेप्यतवा शूले चैकवृद्ध्या क्रमं गताः ॥७॥
बद्धाः पोटलिकाः सर्वाप्यापूर्वमवस्थिताः।
वरुणे त्वाकृतिं कृत्वा क्षुरकृत्तां तु होमयेत् ॥८॥
तीन पोटली बनाये। सूति के कर्पटक द्वारा तथा सम्मार्जन तट पर चरु की क्रिया आरम्भ करे। अन्य जाति के गृहस्थ के तण्डुल (चावल) द्वारा उस चरु का पाक करे। घोर पातक का चिन्तन करके दारुण सम्पुट करे। जब तक वह्नि में पाक होगा, उतने में रोग प्रशामित हो जायेगा। खदिर अथवा शूल में क्रमशः एक-एक की वृद्धि करे। पहले से रखी सभी पोटली को बन्द करे। वरुण की आकृति बना करके छूरे से उसको छिन्न करके होम करे।॥५-८॥
३४४ श्रीसाम्बपुराणम्
रुधिरं च विषं तैलमाहुत्यन्ते तु दीपनम्।
अन्ये पोटलिकेद्धोतुं जुहुयाच्छूललक्षिते ॥९॥
भागं बद्ध्वा तृतीयन्तु चरोः कर्म समारभेत्।
निवेद्य च बलिं तेन स्नायाद्रोगान्निहन्ति सः ॥१०॥
तत्क्षणाच्छुद्धिमाप्नोतिः चन्द्रवत्परिनिर्मलः ।
हत्वा रोगसहस्राणि ततः साध्यांश्च साधयेत् ॥११॥
रुधिर, विष तथा तैल को आहुति के अन्त में प्रदीप्त करे। अन्य दो शूलचिह्नित पुटली की आहुति प्रदान करे। तृतीय भाग बद्ध करके चरु कर्म करना चाहिये। उससे बलि (उपहार) निवेदन करके स्नान करे। ऐसा होने पर रोग विनष्ट हो जाता है॥९-११॥
शरीरान्मनसश्चैव ये तु रोगाः सुदारुणाः ।
पातकान्घातयेत्सर्वान् कृतज्ञः साधुसम्मतः ॥१२॥
राजा विप्रस्तथा वर्णाः साधनार्थं प्रतिष्ठिताः ।
आपत्सु घातयेत्तीव्रा विधिना घातकाः स तु ॥१३॥
जो सुदारुण शारीरिक तथा मानसिक रोग हैं, कृतज्ञ साधुजन-सम्मत उपाय से वह व्यक्ति समस्त पातकों का विनाश कर देता है। राजा, ब्राह्मण अथवा अन्य वर्ण के जो व्यक्ति साधनार्थ प्रतिष्ठित होते हैं, आपत् काल में उनका तीव्र भाव से विनाश करते हैं (पाप का विनाश करते हैं), विधि द्वारा वे बाधक होते हैं॥१२-१३॥
विनायका हरन्त्येते रूपैः सिद्धैश्च मन्त्रिणाम्।
न दोषघातने तेषामिति रुद्रः प्रभाषते ॥१४॥
इति श्रीसाम्बपुराणे ज्ञानोत्तरे त्रिषष्टितमोऽध्याये दशमं पटलं समाप्तम्
साधक के सिद्ध रूप से विनायक गण विनाश (पापों का) करते हैं। इस घातन में उसका कोई दोष नहीं होता, यह रुद्र ने कहा है॥१४॥
श्री साम्बपुराणोक्त ज्ञानोत्तर में रोगविनाश नामक तिरेसठवें अध्याय में दशम पटल समाप्त
चतुःषष्टितमोऽध्यायः
(मारणाभिचारः)
अभिचारविधिं श्रुत्वा मन्त्रः सर्वार्तिनाशनः।
अधःशूलान् ग्रहान् क्रूरान् भैरवांश्च महाबलान् ॥१॥
महामारी कुलोद्भूतानुत्सादयति मन्त्रवित्।
यमजिह्वां मृत्युभूतमघोरं चापि योजयेत् ॥२॥
प्राह्वनं तु महारौद्रं शत्रुपक्षभयंकरम्।
कुर्यात्तु कंटकं शालं याम्यां दिशिमुपाश्रितः ॥३॥
सबके लिये आर्तिनाशक मन्त्र अभिचार विधि को सुनकर मन्त्रवित् साधक अधःशूल, क्रूर ग्रह, महाबलशाली महामारी कुलोत्पन्न भैरव देव को उत्सारित करते हैं और यम की जिह्वारूप मृत्युस्वरूप अघोर को युक्त करते हैं। महारौद्र का आह्वान शत्रुपक्ष के लिये भयंकर है। दक्षिण दिशा का आश्रय लेकर कण्टक का शाल (चटाई) तैयार करे॥१-३॥
नैर्ऋत्यां वा श्मशाने वा त्रिकोणज्ञान्तमालिखेत्।
श्मशाने केशसंच्छन्ने कंटकैः सर्वतोवृते ॥४॥
द्वारं च कल्पयेत्तत्र कंटकैः कल्पितार्गलम्।
अन्त्रमालासमायुक्तं याम्यां दिशिमुपाश्रितम् ॥५॥
कपालैर्बहुभिश्चैव परितः परिवेष्टयेत्।
अग्न्यागारं त्रिकोणं च कल्पयेत्तत्र साधकः ॥६॥
नैर्ऋत्य कोण में अथवा श्मशान में त्रिकोण पद्म आदि का अंकन करे। केश आच्छादित श्मशान में सब दिशाओं में कण्टक द्वारा आवृत स्थान में द्वार की कल्पना करे तथा कण्टक द्वारा ही अर्गला तैयार करे। इसे दक्षिण दिशा की ओर अस्त्रमाला से युक्त होना चाहिये। नरकपाल से चारो दिशाओं को बाँधे (चारो दिशाओं में नर कपाल से वेष्टन करे)। साधक वहाँ अग्नि आगार तथा त्रिकोण की कल्पना करे॥४-६॥
रुधिराक्तेन सूत्रेण परितः परिवेष्टयेत्।
श्मशानभस्मना स्नातः कृष्णवासा जितेन्द्रियः ॥७॥
रक्तोष्णीषधरो मन्त्री रक्तयज्ञोपवीतवान्।
संक्रुद्धय भुकुटी वक्त्रो रक्तचन्दनशूलधृक् ॥८॥
३४६ श्रीसाम्बपुराणम्
रक्तलिप्त सूत्र से चतुर्दिक वेष्टन करना चाहिये श्मशान भस्म से स्नान करके कृष्ण (काला) वर्ण वस्त्र पहनकर जितेन्द्रिय साधक लाल रंग की पगड़ी तथा लाल यज्ञोपवीत धारण करके क्रुद्ध होकर भृकुटी बद्ध मुख करके रक्त चन्दन से लिप्त शूल धारण करे।।७-८।।
पुष्पं लोहमयं चापि धारयेच्छूलमुत्तमम्।
खदिरं रुधिराक्तं वा धारयेच्चाभिचारवान् ।।९।।
तदनन्तर पुष्प तथा लोहमय उत्तम शूल धारण करके अथवा अभिचारयुक्त होकर रुधिराक्त खदिर धारण करे।।९।।
अग्न्यागारस्य मध्ये तु प्रतिमाङ्कारयेद्बुधः।
शत्रोर्मूत्रपुरीषेण रुधिरेणान्त्रपांशुना ।।१०।।
पादपांशुं समालोड्य मूर्द्धस्मासानकी तथा।
बल्मीकसम्भवां चापि गृहीत्वा शत्रुमालिखेत् ।।११।।
बुद्धिमान व्यक्ति अग्निगृह के मध्य में शत्रु की प्रतिमा स्थापित करे तथा उसे शत्रु की मूत्रविष्ठा-रक्त तथा अन्त्र (आँत) पांशु से उसे लिप्त करे। ऐसे ही दीमक के बाबी की मिट्टी तथा भस्म से शत्रु को अंकित करे।।१०-११।।
खादिरैः कीलकैस्तस्य ऊर्ध्वकेशमधोमुखम्।
पाशेन वेष्टयित्वा तु शत्रोः प्राणान्निक्कृन्तयेत् ।।१२।।
खैर की लकड़ी की कील से शत्रु के ऊर्ध्वकेश तथा नीचे किया मुख पाश द्वारा वेष्टित करके शत्रु का प्राण-हरण करे।।१२।।
कुर्याच्छूलेन भिन्नं तु पादयोर्मूर्ध्नि विद्विषम्।
आयसस्रुवमादाय सोमं कुर्याद्विचक्षणः ।।१३।।
शत्रु (की प्रतिमा) का पादद्वय एवं मस्तक शूल से छिन्न करे। विचक्षण व्यक्ति लोहे के स्रुव द्वारा होम करे।।१३।।
अथ चेद्दशधा प्रोक्तमभिचारविधाविह।
कृष्णाच्छागोष्ट्रमातङ्गशलभानां च शोणितम् ।।१४।।
विषं च मलिनं तैलं चातुर्वर्णस्य शोणितम्।
वामहस्ते स्रुवं कृत्वा दक्षिणाभिमुखः स्थितः ।।१५।।
त्रिसंध्यं जुहुयात्क्रुद्धः फट्कारेणैव मन्त्रवित्।
कपालत्रयमारूढः द्वयोः पादौ निवेशयेत् ।।१६।।
तदनन्तर दश प्रकार की आभिचारिक विधि कही गयी है। कृष्णवर्ण का बकरा, ऊँट, हस्ती तथा शलभ का रक्त एवं विष, मलिन तैल तथा चार वर्ण के मनुष्य का रक्त, वाम
चतुःषष्टितमोऽध्यायः ३४७
हाथ में स्रुवा लेकर दक्षिण की ओर मुख करके खड़ा हो मन्त्रज्ञ साधक क्रुद्ध होकर 'फट्' कहते हुये त्रिसन्ध्या (प्रातः-मध्याह्न-सायं) होम करे। तीन कपालों (मनुष्य की खोपड़ी) पर आरूढ़ होकर दोनों पैरों को (शत्रु की प्रतिमा) उसके पैरों पर रखे॥१४-१६॥
ऊर्ध्वं शुक्लतरूणां च समिद्भिर्जुहुयान्नरः।
खदिरै रुधिराक्तैर्वा तथा निम्बमयैरपि ॥१७॥
अन्येन तु यथोक्तेन अव्यक्तं होमयेद् बुधः।
कुर्यात्प्रकुपितो होमं यावत्क्रोधो न नश्यति ॥१८॥
कल्पोक्तमभिचारं तु कुर्यात्सिद्धार्थमात्मनः।
सिद्धिस्त्रयो दशविधा अभिचारेण मन्त्रिणाम् ॥१९॥
शत्रोर्देशपरित्यागो व्याधिरर्थविनाशनम्।
उन्मत्ततान्धता चैव तथा चैवाङ्गहीनता ॥२०॥
वधो बन्धो नृपक्रोधोऽकस्माच्चापि धनक्षयः।
प्रयातं याचितं चापि आरण्यं च त्रयोदश ॥२१॥
ऊर्ध्व शुक्ल वृक्ष के काष्ठ से होम करना चाहिये। रक्त लिप्त खैर अथवा नीम की लकड़ी के द्वारा भी होम हो सकता है। यथाविधि अन्य काष्ठ द्वारा भी पण्डित व्यक्ति अव्याहत होम कर सकते हैं। अपनी सिद्धि के लिये कल्पोक्त अभिचार करना उचित है। मन्त्रज्ञ साधक के अभिचार द्वारा सिद्धि तेरह प्रकार की है। शत्रु देश-परित्याग, व्याधि, अर्थनाश, उन्मत्तता, अन्धता, अंगहीनता, वध, बन्धन, नृपक्रोध, अकस्मात् धनक्षय, परलोक-गमन, याच्ञा वृत्ति तथा वनगमन।।१७-२१।।
आभिर्निर्मिलितो दीप्तः प्रोक्षितो विधिना पुनः।
तत्त्वेनाप्यायितश्चैव कथं मन्त्रो न सिद्ध्यति ॥२२॥
आभिचारिक शब्द का अर्थ है—आभि = विमुक्त करना, दीप्त होना। उसमें विधिपूर्वक प्रोक्षित एवं तत्त्व द्वारा आप्यायित होने पर मन्त्र क्यों सिद्ध नहीं होगा? ।।२२।।
असिद्धौ तु पुरो दण्डः स्वमन्त्रात्ताडनं भवेत्।
अभिवार्य परं गच्छन् करं हन्यात्तथान्तकी ॥२३॥
ततो निकृन्तप्राणोऽसौ देहमुत्सृजति क्षणात्।
विधिना द्रव्यघटने क्रोधार्तः शत्रुपीड़ितः ॥२४॥
प्रतिलोमेन युञ्जीत घातके प्राणसंयुतः।
तत्क्षणाद् घातयेत्सर्वान् सेन्द्रब्रह्मपुरस्सरान् ॥२५॥
मन्त्र असिद्ध होने पर सर्वप्रथम कर्त्तव्य है उसमें स्वमन्त्र से ताड़ना। विनाशकारी अन्य को बाधा देने के लिये शत्रु (प्रतिमा) का हस्तच्छेदन करे। तदनन्तर शत्रु निष्प्राण होकर देहत्याग करेगा। यथाविधि द्रव्यसंग्रह होने पर शत्रुपीड़ित साधक क्रोधित होकर (पुरश्चरण
३४८ || श्रीसाम्बपुराणम्
को) प्रतिलोम द्वारा युक्त करे। इससे तत्क्षण ही साधक इन्द्र, ब्रह्मादि प्रमुख का भी विनाश कर सकता है॥२३-२५॥
आपत्सु योजयेन्मन्त्री यदा संशयितो भवेत्।
शरीरा मानसाश्चैव उपसर्गास्तु कीर्तिता ॥२६॥
जब संशयापन्न हो तब आपत्ति काल में साधक यह सब क्रिया करे। उपसर्ग दो प्रकार का मानसिक एवं शारीरिक कहा गया है॥२६॥
शारीरा व्याधयो ज्ञेया मानसा बहु विस्तराः।
स्त्रीकृत्वेवं त्यजैश्चैव बन्धुमित्रपुरःसरैः ॥२७॥
पीड्यते मन्त्रिणो ह्येते चोपसर्गैः सुदारुणैः।
सिद्धवाक्यमुपेतस्तु मन्त्रहोमपुरस्कृतः ॥२८॥
असंदेहात्तु सिद्ध्यन्ति बुद्ध्या योगाः सुमन्त्रिणः।
स्त्रीलोलास्तु न सिद्ध्यन्ति तथा चार्थविचिन्तकाः ॥२९॥
शारीरिक उपसर्ग व्याधियों को जानना चाहिये। मानसिक अनेक प्रकार के होते हैं। स्त्री लोगों को उपलक्ष्य करके ऐसे बन्धु-मित्र प्रभृति द्वारा किये (कर्तृक) सुदारुण उपसर्गों से साधक पीड़ित हो जाते हैं। सिद्ध वाक्य (उपदेश) प्राप्त करके मन्त्र, होम प्रभृति द्वारा मन्त्रज्ञ निःसंदेह सिद्धि प्राप्त करते हैं। जो स्त्रीलोलुप तथा स्वार्थी होते हैं, उनको सिद्धि नहीं प्राप्त होती॥२७-२९॥
स्त्रीभार्याशूद्रभार्यायां तथान्यासु च संरता।
क्रियालोपी चानुरोधी व्यसनी तृष्णया हतः ॥३०॥
स्त्रीगण, भार्या, शूद्र की भार्या अथवा अन्य स्त्री में जो आसक्त हैं, उनका क्रियालोप हो जाता है। जो अन्य से अनुरोध करते हैं, व्यसनी हैं, तृष्णा से आक्रान्त हैं—ऐसे लोग अग्राह्य हैं। विधानतः ये सभी उपसर्गयुक्त हैं॥३०॥
अग्राह्या मन्त्रिणो ह्येते विधाने ह्युपसर्गिणः।
आचार्ये चातिभक्तश्च तपस्वी च जितेन्द्रियः।
घातयेत्सर्वरोगांश्च बुद्ध्वा ज्ञानं सविस्तरम् ॥३१॥
इति श्रीसाम्बपुराणे मारणाभिचारे चतुःषष्टितमेऽध्याये एकादशं पटलम्
जो आचार्य के प्रति भक्तिमान हैं, तपस्वी तथा जितेन्द्रिय हैं, वे सविस्तार ज्ञान प्राप्त करते हैं एवं समस्त रोगों का विनाश करते हैं॥३१॥
श्री साम्बपुराणोक्त चौंसठवें अध्याय का एकादश पटल समाप्त
पञ्चषष्टितमोऽध्यायः
(देहगतरोगाणां चिकित्सा)
अथ भेदान् प्रवक्ष्यामि चाङ्गप्रत्यङ्गयोगजान्।
उभयस्यार्थविन्मन्त्री योन्यां बीजेन घातयेत् ॥१॥
बीजस्य चोद्भवत्वाय व्याधयोऽन्यान्यघातिनाम्।
योनिस्थं बीजयोगेन स्थानस्तम्भं विनिर्दिशेत् ॥२॥
तदनन्तर अंग तथा प्रत्यङ्ग के योगजात भेदों को कहूँगा। अंग तथा प्रत्यङ्ग के अर्थ को जानने वाला मन्त्री योनि तथा बीज द्वारा आघात करे। बीज का उद्भव ही व्याधि का अन्तिम विनाशक अर्थात् रोग का अन्त करने वाला है। बीजयोग द्वारा योनिस्थ स्थानस्तम्भ का निर्देश करे।।१-२।।
नेत्रयोः श्रवणं पीतं मुखे सिन्दूरवर्णकम्।
बाह्वंसयोश्च हरितमुदरे कृष्णमेव च ॥३॥
गुदशिश्ने विचित्रं तु नीलचित्रं तु जङ्घयोः।
चरणे कुक्कुटं युञ्ज्याद्वलिं माल्यं च सर्वतः ॥४॥
नेत्रद्वय तथा श्रवण में पीत वर्ण, मुख में सिन्दूर वर्ण, बाहु तथा स्कन्धद्वय में हरित् वर्ण, उदर में कृष्ण वर्ण, गुदा तथा शिश्न में विचित्र वर्ण, जङ्घाओं में नील चित्र, चरणों में कुक्कुट वर्ण तथा समस्त स्थान को बलि तथा माला द्वारा युक्त करे।।३-४।।
स्वस्थाने पूजयेत् तज्ज्ञो विपरीतेन नाशयेत्।
न नश्येत यदा व्याधिः स्नेहाहारेण योजितः ॥५॥
निग्रहस्तस्य वै कार्यः शारेण मन्त्रिणा तदा।
कीलयित्वा तु वै तं च योनिस्थं वर्णजैर्दृढम् ॥६॥
तत्त्वज्ञ जन स्वस्थान में पूजन करे। विपरीत का विनाश करे। स्नेहाहार द्वारा युक्त करने पर भी यदि व्याधि का विनाश न हो, तब मन्त्री 'शार' (?अस्त्र) द्वारा उसका निग्रह करे। योनिस्थ (व्याधि का) वर्णजात द्वारा दृढ़भाव से बन्धन करना चाहिये।।५-६।।
बिल्वं शिरसि वै पुष्यात्कन्दरं वक्रनेत्रयोः।
श्रोत्रे तु यास्यकं कीलं विन्यसेदश्मकन्तु वै ॥७॥
शाकजं वक्षसि प्रोक्तं बादरं पृष्ठ एव च।
उदरे च तथा शिग्रुं चन्दनं शिश्नजानुनी ॥८॥
सुरदारुमधःकाये वैतसं चरणे स्मृतम्।
प्रतिस्थाने न्यसेत् कीलं सर्वस्थानेषु मन्त्रवित् ॥९॥