भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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पृष्ठ 357

त्रिषष्टितमोऽध्यायः

साधकस्येह युक्तस्य व्याधिर्भवति दारुणः।
उपसर्गः समं तस्य चिकित्सास्य न दुष्यति ॥१॥
धातुरेको ग्रहो वापि कोष्ठे त्वध्यासितोऽपि वा।
स्मृत्वा यो मनसापायो मन्त्रकैर्न प्रशाम्यति ॥२॥
क्षेत्राच्चाण्डालसेनायाश्चाग्निहोत्रगृहातथा ।
तस्मादपञ्चतत्तूर्णं मासवृद्ध्यै प्रकल्पयेत् ॥३॥
क्षेत्राच्चाण्डालसेनाच्च तथा द्विजपरा अपि।
क्रमवृद्धं च तत्सर्वं बध्नीयान्मिश्रितं क्रमात् ॥४॥

साधन में प्रवृत्त साधक को दारुण व्याधि हो सकती है; साथ ही उपसर्ग भी परिलक्षित होते हैं। इनकी चिकित्सा करने में कोई दोष नहीं है। धातुज, किंवा ग्रहादि आक्रमण-जनित अथवा कोष्ठ में अध्यासित व्याधि, जो मनसा पाप (जनित) है, वह मन्त्र से भी प्रशमित नहीं होती। चण्डाल सेना के क्षेत्र से, किंवा अग्निहोत्री ब्राह्मण के घर से अपञ्च लाकर उसकी मासवृद्धि की व्यवस्था करनी चाहिये। क्षेत्र से तथा चण्डाल-सेना से द्विज-परायण व्यक्ति भी क्रमवृद्धि-हेतु जो सब मिश्रित करे, उसका क्रमश बन्धन करे।॥१-४॥

तिस्रः पोटलिकाः कार्याः सूतिकर्पटकेन च।
संमार्जनतटे चैव आरभेत चरोः क्रियाम् ॥५॥
अन्यजानां गृहस्थैश्च श्नपयेत्तण्डुलैश्च ताम्।
ध्यायन्वै पातकं घोरं सम्पुटं यदि दारुणम् ॥६॥
यावच्च श्रयते वह्नौ तावद्रागः प्रणश्यति।
खदिरेप्यतवा शूले चैकवृद्ध्या क्रमं गताः ॥७॥
बद्धाः पोटलिकाः सर्वाप्यापूर्वमवस्थिताः।
वरुणे त्वाकृतिं कृत्वा क्षुरकृत्तां तु होमयेत् ॥८॥

तीन पोटली बनाये। सूति के कर्पटक द्वारा तथा सम्मार्जन तट पर चरु की क्रिया आरम्भ करे। अन्य जाति के गृहस्थ के तण्डुल (चावल) द्वारा उस चरु का पाक करे। घोर पातक का चिन्तन करके दारुण सम्पुट करे। जब तक वह्नि में पाक होगा, उतने में रोग प्रशामित हो जायेगा। खदिर अथवा शूल में क्रमशः एक-एक की वृद्धि करे। पहले से रखी सभी पोटली को बन्द करे। वरुण की आकृति बना करके छूरे से उसको छिन्न करके होम करे।॥५-८॥