भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

पृष्ठ 358, कुल 424 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 358

३४४ श्रीसाम्बपुराणम्

रुधिरं च विषं तैलमाहुत्यन्ते तु दीपनम्।
अन्ये पोटलिकेद्धोतुं जुहुयाच्छूललक्षिते ॥९॥
भागं बद्ध्वा तृतीयन्तु चरोः कर्म समारभेत्।
निवेद्य च बलिं तेन स्नायाद्रोगान्निहन्ति सः ॥१०॥
तत्क्षणाच्छुद्धिमाप्नोतिः चन्द्रवत्परिनिर्मलः ।
हत्वा रोगसहस्राणि ततः साध्यांश्च साधयेत् ॥११॥

रुधिर, विष तथा तैल को आहुति के अन्त में प्रदीप्त करे। अन्य दो शूलचिह्नित पुटली की आहुति प्रदान करे। तृतीय भाग बद्ध करके चरु कर्म करना चाहिये। उससे बलि (उपहार) निवेदन करके स्नान करे। ऐसा होने पर रोग विनष्ट हो जाता है॥९-११॥

शरीरान्मनसश्चैव ये तु रोगाः सुदारुणाः ।
पातकान्घातयेत्सर्वान् कृतज्ञः साधुसम्मतः ॥१२॥
राजा विप्रस्तथा वर्णाः साधनार्थं प्रतिष्ठिताः ।
आपत्सु घातयेत्तीव्रा विधिना घातकाः स तु ॥१३॥

जो सुदारुण शारीरिक तथा मानसिक रोग हैं, कृतज्ञ साधुजन-सम्मत उपाय से वह व्यक्ति समस्त पातकों का विनाश कर देता है। राजा, ब्राह्मण अथवा अन्य वर्ण के जो व्यक्ति साधनार्थ प्रतिष्ठित होते हैं, आपत् काल में उनका तीव्र भाव से विनाश करते हैं (पाप का विनाश करते हैं), विधि द्वारा वे बाधक होते हैं॥१२-१३॥

विनायका हरन्त्येते रूपैः सिद्धैश्च मन्त्रिणाम्।
न दोषघातने तेषामिति रुद्रः प्रभाषते ॥१४॥

इति श्रीसाम्बपुराणे ज्ञानोत्तरे त्रिषष्टितमोऽध्याये दशमं पटलं समाप्तम्

साधक के सिद्ध रूप से विनायक गण विनाश (पापों का) करते हैं। इस घातन में उसका कोई दोष नहीं होता, यह रुद्र ने कहा है॥१४॥

श्री साम्बपुराणोक्त ज्ञानोत्तर में रोगविनाश नामक तिरेसठवें अध्याय में दशम पटल समाप्त